कुंडली में सूर्य का दोष लाता है ये बड़ी मुसीबतें, कहीं आप तो नहीं हो रहे इनके शिकार?

Surya Deva
Surya Deva

बेंगलूरु। सनातन धर्म में ग्रहों को निर्जीव पिंड मात्र नहीं माना जाता है, जैसा कि पश्चिम के विचारकों ने माना है। हमारे ऋषियों ने इन्हें देवता की संज्ञा दी है, क्योंकि ये किसी न किसी रूप में हमें जीवन देते हैं। इन्हीं में से एक ग्रह है सूर्य।

शास्त्रों में सूर्य की महिमा बताई गई है और उसे सूर्यदेव कहा गया है। ज्योतिषशास्त्र में सूर्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुंडली में सूर्य की स्थिति मनुष्य के व्यक्तित्व को काफी हद तक प्रभावित करती है। जीवन में सुख-दुख, हानि-लाभ, यश-अपयश में काफी योगदान व्यक्तित्व का होता है।

कुंडली के हर भाव में सूर्य का अलग फल है। इसे विभिन्न योगायोग के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। अगर सूर्य प्रथम भाव में स्थित हो और शेष सभी शुभ ग्रह अच्छी स्थिति में हों तो, इस बात की प्रबल संभावना होती है कि ऐसे व्यक्ति में नेतृत्व का गुण होता है। वह नौकरी, व्यवसाय, राजनीति आदि में जहां भी होगा, नेतृत्व के गुण के कारण शीर्ष तक पहुंचेगा। अगर ऐसा व्यक्ति सेना में जाता है तो क​ठिन अभियानों का नेतृत्व करने में दिलचस्पी रखता है।

छठे भाव में सूर्य कई प्रकार से फल देता है। यदि चंद्रमा किसी क्रूर ग्र​ह के साथ न हो और सूर्य के साथ भी कोई क्रूर ग्रह न हो तो ऐसे जातक का स्वास्थ्य ठीक रहता है, परंतु इस भाव में सूर्य की अशुभ स्थिति रोग पैदा करती है। ऐसे जातक को हाई ब्लड प्रेशर, रक्तरोग, गर्मी से उत्पन्न होने वाली बीमारियां हो सकती हैं।

वहीं सप्तम भाव में सूर्य की शुभ स्थिति वैवाहिक जीवन तथा संतान के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। अगर यहां भी सूर्य किसी अशुभ ग्रह के साथ युति करता है तो ऐसे जातक का दांपत्यजीवन काफी तनावपूर्ण हो सकता है। अष्टम भाव में सूर्य की दोषपूर्ण स्थिति क्रोध, तनाव, अग्नि से जीवन को हानि तथा दुर्घटना की ओर संकेत करती है।

अत: कुंडली में ऐसी स्थिति का निर्माण होने की स्थिति में किसी विद्वान पंडित से पूजन तथा दोष दूर कराने की ​विधि जाननी चाहिए। हमारी संस्कृति में प्रात:काल सूर्यदेव को जल चढ़ाने की परंपरा इसीलिए है क्योंकि इससे मनुष्य आरोग्यवान तथा सौभाग्यशाली होता है। सूर्य नमस्कार करने से स्वास्थ्य अच्छा होता है और पुरुषार्थ करने से शीघ्र भाग्योदय होता है।

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