असम की राह

देश की बढ़ती आबादी के मद्देनजर यह पहले ही कहा जा चुका है कि जनसंख्या के मामले में चीन को छोड़ जल्द ही हम पहले पायदान पर पहुंच जाएंगे। निश्चय ही यह चिंता का विषय है। इसीलिए इस वर्ष स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने देश को संबोधित करते हुए जब देशवासियों से जनसंख्या नियंत्रण की अपील की तो यह उनकी भी चिंता का संकेत था। बहरहाल, इस समय जनसंख्या को काबू में रखना व्यापक विमर्श का विषय बन चुका है जो अच्छी बात है। अभी हाल ही में असम सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में जो बड़ा फैसला लिया है, वह संविधान विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। असम सरकार ने उन लोगों को सरकारी नौकरी न देने का फैसला लिया है, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। असम सरकार के इस फैसले के बाद वर्ष 2021 की शुरुआत के साथ ही यह फैसला लागू हो जाएगा और दो से अधिक बच्चे वाले लोगों को कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगा। असल में असम विधानसभा ने दो वर्ष पहले ही जनसंख्या नीति बनाई थी, जिसमें महिला सशक्तीकरण से लेकर बच्चियों की शिक्षा के साथ कई अन्य प्रावधान शामिल थे। इनमें एक प्रावधान जनसंख्या नियंत्रण का भी था। शुरू में इस कानून को असम के पंचायत और नगरपालिका चुनाव के लिए लागू किया गया था। वैसे, इस प्रकार की व्यवस्था सबसे पहले राजस्थान में और फिर हरियाणा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और गुजरात में भी लागू की गई थी। इसके तहत वही लोग पंचायत या नगरपालिका के विभिन्न पदों का चुनाव लड़ सकते थे, जिनके पास दो से अधिक बच्चे नहीं थे। असम राज्य सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए राज्य सरकार की नौकरियों में भी इस कानून को लागू कर दिया है। इसके साथ ही यह भी तय किया गया कि मौजूदा सरकारी कर्मचारियों को भी दो बच्चों के मानक का पालन करना होगा। अन्यथा उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा। असम सरकार का तर्क है कि कानून को लागू कराने वाले और सरकारी नीतियों को जनता तक पहुंचाने वाले पहले स्वयं में एक रोल मॉडल बनें और दूसरों के लिए एक उदाहरण पेश करें। राज्य सरकार को उम्मीद है कि अगर राज्य कर्मचारी एक रोल मॉडल के रूप में पेश किए जाएंगे तो निश्‍चित ही आम जनता का झुकाव भी जनसंख्या नियंत्रण कानूनों को अपनाने की ओर होगा। यों, कोई ऐसी भी नीति लागू करते हुए लचीलेपन का रुख अपनाया जाना चाहिए, क्योंकि दुनिया के कई देशों ने दो बच्चों की नीति को लागू जरूर किया लेकिन किसी को भी जनसंख्या नियंत्रण में कुछ खास सफलता नहीं मिली। वैसे भी, परंपरागत रूप में अपना देश पुरुष प्रधान है, जहां बच्चों की चाह में बच्चियों को जन्म से पहले ही कोख में मार दिया जाता है। ऐसे में यदि इस तरह के कानूनों को लागू करने में सख्ती बरती गई तो पहले बच्चे के रूप में लोग लड़के की ही इच्छा रखेंगे। ऐसे में आशंका है कि असुरक्षित गर्भपात को बढ़ावा मिलेगा और बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ योजना को चोट पहुंचेगी। फिर ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में बार-बार गर्भपात की स्थिति में मातृत्व मृत्यु दर में भी बढ़ोत्तरी होगी। इससे दूसरी तरह की जटिलताएं और समस्याएं सामने न आएं, यह सुनिश्‍चित करना भी जरूरी है।
दूसरी ओर, यह भी सच है कि प्राकृतिक संसाधनों और भूमि पर बढ़ते दबाव पर काबू पाने के लिए जनसंख्या को नियंत्रित करना जरूरी है। जिन राज्यों में साक्षरता का स्तर अधिक है, और जिन राज्यों में महिला सशक्तीकररण पर पर्याप्त जोर दिया गया है, वहां जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कमतर है। आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 की रिपोर्ट में जनसांख्यिकीय ट्रेंड शीर्षक के तहत यह जानकारी दी गई थी कि वर्तमान में देश कीफर्टिलिटी रेट 2.3 है, जबकि हमारा निर्धारित लक्ष्य 2.1 का है, जिसे हासिल करने में ज्यादा परेशानी नहीं होनी चाहिए।