सत्कर्म ही हमारी आत्मा को मुक्ति की ओर ले जाएँगे

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के अक्कीपेट स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ स्थानक भवन में चातुर्मास प्रवचन में मुनिश्री ज्ञानमुनिजी ने कहा कि इस संसार में अनेक तरह के मनुष्य रहते हैं। सभी मनुष्यों की सोच एक समान हो यह आवश्यक नहीं है। कोई सदाचारी है, तो कोई दुराचारी है, कोई लोभी है, तो कोई निर्लोभी है। किसी का आदर है, तो किसी का अनादर्। कोई कृपण है, तो कोई उदार्। दुनिया में उसी का सम्मान होता है जो सद्गुणों को ग्रहण करता है। हमें संसार की वस्तुओं से मोह नहीं रखना चाहिए्। ये सभी वस्तुएं नश्वर हैं्। जब हमने जन्म लिया तो हम अपने साथ कुछ नहीं लेकर आये थे और जब हमारी मृत्यु होगी तब भी हम अपने साथ कुछ नहीं लेकर जायेंगे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार नदी अपने तेज बहाव से क्षण भर में चीजों को बहाकर ले जाती है, वैसे ही हमारा जीवन भी तेजी से व्यतीत हो रहा है। जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है कोई नहीं जानता कि उसकी मृत्यु कब आएगी? जब तक हम जीवित हैं और स्वस्थ हैं हमें अपने शरीर को धर्म कार्यों में लगाना चाहिए। आखिर हमारे सत्कर्म ही हमारी आत्मा को मुक्ति की ओर ले जाएँगे। उन्होंने स्व. विजयराज लुणिया को समाज का एक महत्त्वपूर्ण सितारा बताते हुए कहा कि वह साधु साध्वियों के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धावान थे। वे अनेक संस्थाओं में अग्रणी थे और चिकपेट शाखा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अनेक सेवा कार्य संपन्न किये। उनके असमय निधन से समाज को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है। इसके साथ ही मुनिश्री ने दिवंगत शांतिलाल बडेरा को विनय संपन्न एवं सरल व्यक्तित्व का धनी बताते हुए जीवन की नश्वरता पर प्रकाश डाला। प्रारम्भ में लोकेशमुनि ने प्रेरक उद्बोधन दिया। साध्वी पुनीतज्योतिश्री की मंगलमय उपस्थिति रही।