साध्वी नीलांजनाश्री का कृतज्ञता ज्ञापन समारोह कल

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के जिन कुशलसूरी जैन आराधना भवन बसवनगुड़ी में विराजित साध्वीश्री नीलांजनाश्रीजी ने कहा कि चार प्रकार के शब्द दिखने में एक जैसे हैं लेकिन अर्थ बिलकुल अलग अलग है। यह रोज़मर्रा के जीवन में उपयुक्त बहुत सामान्य शब्द है। यह शब्द हैं, कुछ, कुछ कुछ, बहुत कुछ और सब कुछ। इस जीवन में मनुष्य प्रतिक्षण परिश्रम कर रहा है लेकिन इसका कोई मूल्यवान परिणाम नज़र नहीं आ रहा है। कई लोग इस दुनिया में सुबह से शाम तक बहुत मेहनत पुरुषार्थ करते हुए भी कुछ ही रूपये प्राप्त करते हैं। किसी को शाम तक व्यापार करने से भी कुछ कुछ ही मिलता है और किसी को अपनी पुण्याई और पुरुषार्थ से बहुत कुछ भी मिल जाता है, लेकिन सब कुछ किसी को भी प्राप्त नहीं होता है। कभी कभी पुण्य बहुत होने से मगर पुरुषार्थ की कमी होने से भी कुछ भी प्राप्त नहीं होता है ठीक वैसे ही पुरुषार्थ करने से भी पुण्य नहीं होने पर कुछ भी प्राप्त नहीं होता है, लेकिन परमात्मा ने हमें एक बहुत ही मूल्यवान त्याग का सूत्र दिया है, अगर हम पूरे संसार की संपत्ति को त्याग दें एवं हम इस संसार में रत्नत्रयी की धर्म आराधना करके बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं।

साध्वीश्री ने कहा कि इस संसार में जो भी हमें मिला है वह सभी नश्वर है। चाहे वह चक्रवर्ती या देवेन्द्र की सम्पत्ति क्यों न हो, लेकिन सम्यक ज्ञान, दर्शन और चारित्र की प्राप्ति होने से वह कभी नष्ट नहीं होता।
साध्वीवर्या ने क़हा कि जिस प्रकार एक हवा के झोंके से पेड़ पर से अनेक पत्ते टूट कर गिर जाते हैं, उसी तरह एक हवा के झोंके से हमारे जीवन का दीपक बुझ सकता है और इस दीपक के बुझने से पहले हमें सम्यक दर्शन प्राप्त कर लेना है नहीं तो हमारी आत्मा दुर्लभ बोधि बन जाएगी।
साध्वीश्री ने कहा कि जिस प्रकार चार माह का चातुर्मास बीत गया उसी प्रकार हमारे जीवन के चालीस वर्ष निकलने में भी देर नहीं लगेगी। बाद में पछताने के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा इसलिए समय रहते हमें धर्म आराधना करके अपने जीवन को सार्थक करना है, चातुर्मास समाप्ति के उपलक्ष्य में सोमवार को श्री नीलांजनाश्रीजी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन समारोह आयोजित किया गया है।