पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान

श्रीनगर/दक्षिण भारत। नफरत और दहशतगर्दी की बुनियाद पर खड़ा पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने से पहले ही कश्मीर को हथियाने के ख्वाब देखने लगा था। जिन्ना से लेकर जिया उल हक और मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान अपने मुल्क के हालात बेहतर करने के बजाय कश्मीर का राग लगातार अलापते रहे हैं। इसके लिए जंग और जिहाद के नारे भी खूब लगाए गए हैं। यूं तो कश्मीर की कई खबरें सोशल मीडिया में आती रहती हैं, लेकिन एक ताजा खबर इमरान को गौर से पढ़नी चाहिए, ताकि उन्हें अहसास हो कि असल में कश्मीरियत क्या है। वह कश्मीरियत जो हमदर्दी सिखाती है, जो आरती और अज़ान का सम्मान करती है।

मददगार बनकर आए पड़ोसी
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में वर्षों से रहते थे डॉ. रत्न लाल कौल। उनके साथ छोटा बेटा रहता था। बाकी परिजन और रिश्तेदार जम्मू रहते थे, चूंकि पुलवामा में हालात काफी बिगड़ चुके थे। हाल में डॉ. रत्न लाल कौल का निधन हुआ तो उनके बेटे ने पिता की पार्थिव देह जम्मू ले जाने की तैयारी की। पड़ोसियों और आसपास के लोगों को मालूम हुआ तो उन्होंने आग्रह किया कि ऐसा न करें। डॉ. रत्न लाल का जुड़ाव यहां की मिट्टी से रहा है, लिहाजा उनका अंतिम संस्कार यहीं करें।

अंतिम यात्रा में छह हजार लोग
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने के बाद लागू विभिन्न पाबंदियों को देखते हुए पड़ोसियों ने ही तीन गाड़ियां जम्मू भेजीं और डॉ. कौल के रिश्तेदारों को सकुशल पुलवामा लेकर आए। इसके बाद परंपराओं के अनुसार डॉ. कौल की अंतिम यात्रा निकाली गई और करीब छह हजार लोगों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी।

सुख-दुख के साथी थे, कैसे छोड़ते अकेला?
ऐसा नहीं है कि डॉ. कौल को कभी आतंकियों से धमकियां नहीं मिली थीं। पाक को अपना आका मानने वाले अलगाववादियों और आतंकियों ने चाहा था कि वे भी अपना घर छोड़कर चले जाएं लेकिन डॉ. कौल कहीं नहीं गए। इस इलाके में उन्हें जानने वालों की बड़ी तादाद थी। एक शख्स ने बताया कि वे बचपन से ही डॉ. कौल को जानते हैं। उनकी दवाइयों की दुकान हमेशा खुली रहती थी। वे हमारे सुख-दुख के साथी थे। फिर आखिरी वक्त में उन्हें अकेला कैसे छोड़ सकते थे?

कश्मीरियत ज़िंदा है, ज़िंदा रहेगी
डॉ. कौल के एक रिश्तेदार ने बताया कि शुरुआत में उन्हें यहां आने को लेकर कुछ आशंकाएं थीं लेकिन पड़ोसियों और अन्य लोगों ने बहुत अच्छा व्यवहार किया। डॉ. कौल की मौत पर पुलवामा को गमगीन देखा तो महसूस हुआ कि यही कश्मीरियत है, जिसे खत्म करने लिए जिहादियों ने खूब साजिशें रचीं लेकिन इसके बावजूद वह ज़िंदा है और ज़िंदा रहेगी।