वीर अब्दुल हमीद: भारत का वो सपूत जिसने ध्वस्त किए थे पाक के पैटन टैंक

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नई दिल्ली/दक्षिण भारत। पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान अपनी जनता को बेहतर ज़िंदगी तो नहीं दे पाए लेकिन वे एक ख्वाब उन्हें 1947 से ही दिखाते रहे हैं। वह है ‘कश्मीर’। इसके लिए पाकिस्तानी फौज आतंकवाद और युद्ध उन्माद का सहारा लेती रही है। साल 1965 की लड़ाई भी उसके ऐसे ही जंगी जुनून का नतीजा थी, जिसमें पाक को मुंह की खानी पड़ी। उस युद्ध में भारत के एक शूरवीर ने पाकिस्तान पर ऐसा प्रहार किया कि आज भी उसके फौजी अफसर उसका नाम नहीं भूले हैं।

देश के उस सपूत का नाम अब्दुल हमीद है। 1 जुलाई, 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में जन्मे अब्दुल का परिवार कपड़ों की सिलाई का काम करता था। उनके पिता मोहम्मद उस्मान चाहते थे कि बेटा इसमें दिलचस्पी ले, लेकिन अब्दुल फौजी बनना चाहते थे। स्कूली दिनों में वे कभी कुश्ती का अभ्यास करते, कभी नदी में तैरने चले जाते तो कभी गुलेल से निशाना लगाते। एक बार गांव में बाढ़ आई तो उन्होंने दो युवतियों की जान बचाई।

जब अब्दुल हमीद 21 साल के हुए तो फौजी बनने का उनका ख्वाब सच हो गया। 27 दिसंबर, 1954 को ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने शान से वर्दी पहनी और इसका मान बढ़ाया। उन्होंने 1962 में चीन के खिलाफ युद्ध में भाग लिया। साल 1965 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर हथियाने के नापाक इरादों के साथ जंग का ऐलान किया तो वीर अब्दुल हमीद भी मोर्चे पर भेजे गए। उन्होंने पाकिस्तानी फौज पर ऐसा हमला बोला कि दुश्मन के कई फौजी जान बचाकर भागे।

अब्दुल हमीद 8 सितम्बर, 1965 को पंजाब के खेमकरण सेक्टर में तैनात थे। उस समय पाक अपने पैटन टैंकों के दम पर जीत का सपना देख रहा था। ये उसे अमेरिका से मिले थे और अजेय समझे जाते थे। उस समय पाक ने इन्हीं टैंकों से असल उत्तर गांव पर हमला बोला। अब्दुल हमीद जहां तैनात थे वहां गन्ने के खेत थे। उन्होंने टैंकों को अपनी ओर आते देख रिकॉयलेस गन से फायर किया। निशाना सटीक लगा और पाकिस्तान का टैंक ध्वस्त हो गया। इससे पाकिस्तानी फौजी जान बचाकर भागने लगे। अब्दुल हमीद ने दुश्मन के कुल चार पैटन टैंक धराशायी किए।

उन्होंने सबसे आखिर में जिस टैंक की ओर फायर किया, उसने भी वीर अब्दुल हमीद की ओर गोला दाग दिया। इससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। 10 सितंबर, 1965 को उन्होंने आखिरी सांस ली। शहीद अब्दुल हमीद को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके बलिदान को नमन करते हुए भारत सरकार ने जनवरी 2000 में उन पर एक डाक टिकट भी जारी किया।

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