याद करने का समय आ गया है ‘अपना वोट-अपनी ताकत’

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बेंगलूरु/दक्षिण भारत। गत वर्ष कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय दक्षिण भारत राष्ट्रमत ने अपना वोट अपनी ताकत का आगाज किया था और हमारे पाठकों ने इस अभियान को न केवल समर्थन दिया था बल्कि आगे भी बढाया था। आगे से आगे हमारे पाठकों ने अभियान की खास बातें अपने अपने वाट्सएप ग्रुप के माध्यम से प्रचारित की थीं।

इन प्रयासों का असर यह हुआ कि प्रवासी समुदायों के लोग (जो कि हमारा पाठक वर्ग है) जो किसी भी चुनाव में मतदान के लिए प्रायः घर से बाहर कम ही निकलते हैं उनको मतदान के दिन मतदान केन्द्रों पर लाइन में लगे देखा गया। मतदान प्रतिशत बढाने में इन लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।आप किस विचारधारा का समर्थन करते हैं यह आपका अधिकार है, आप किस पार्टी को सत्ता में लाना चाहते हैं यह आपकी सोच है परंतु आपका जो मूलभूत अधिकार है लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदान करना, उसका उपयोग करने पर ही आप इस अधिकार के अपने पास होने का अहसास कर सकेंगे।

कर्नाटक में 18 और 23 अप्रैल को तथा तमिलनाडु में 18 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के लिए मतदान है। हर जिम्मेदार नागरिक को मतदान के दिन अपने इस दायित्व को प्राथमिकता देते हुए निभाना चाहिए। सबसे पहले वोट देने जाना चाहिए और बाद में उस दिन की कार्यसूची में अन्य कार्यों को रखना चाहिए। उस दिन बहुत सी बार लोग दूसरों को तो उपदेश देते दिखाई देते हैं परंतु स्वयं आलस्यवश या मतदान को प्राथमिकता में न रखकर इधर उधर के कामों में अपने आप को व्यस्त रखते हैं। मतदान का समय निकल जाता है तो कहते हैं कि आज तो वोट देने का समय ही नहीं निकाल पाए, अगली बार देखेंगे।

व्यक्ति अपना दायित्व ठीक से नहीं निभाता और जब गलत प्रतिनिधि या असक्षम नेतृत्व चुनकर आ जाता है तो देश की जनता को इस गलती के लिए कोसता है। व्यक्ति यह भूल जाता है कि उसी जनता का हिस्सा वह स्वयं भी है।हर देशवासी का फर्ज है कि मतदान करते समय वह राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे। राष्ट्र के विकास और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए किसे नेतृत्व सौंपना चाहिए इस पर थो़डा चिंतन मनन करे। किसी दल या उम्मीदवार द्वारा दिए गए प्रलोभन या वादों के लालच में न आए।

अधिकांशतः निजी लालच या लाभ के कारण किए गए मतदान का परिणाम घातक ही आता है। वह राष्ट्र के हित में नहीं होता बल्कि बहुत सी बार तो नासमझी से दिए गए वोट का खामियाजा राष्ट्र को भुगतना पड़ता है। प्रदेश हो या देश, नेतृत्व गलत हाथों में जाते ही उसके परिणाम सामने आने लगते हैं परंतु छूटा हुआ तीर लौटकर वापस नहीं आता।

देशहित में क्या है, पूरे विश्व में देश की ख्याति कौन बढ़ा सकता है, दुश्मन देशों को लोहे के चने कौन चबा सकता है, भ्रष्टाचार और गरीबी से मुक्ति दिलाने की सामर्थ्य किसकी है, अतीत के क्रियाकलापों के आधार पर किस पर विश्वास किया जा सकता है, हमारी संस्कृति का संरक्षण करने का माद्दा किसमें है, हमारी एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने का ईमानदार प्रयास कौन कर सकता है, हमारी सेना और उसके शौर्य को कौन महत्वपूर्ण मानता है, जनता के बीच सौहार्द बना रहे ऐसी ईमानदारी किस नेतृत्व में है, विश्वपटल पर कूटनीतिक रूप से सूझबूझ वाला व्यक्तित्व कौन हो सकता है जिस पर विश्वास किया जा सके, यह सब छोटी छोटी दिखने वाली बड़ी बातें हैं जिन पर ठंडे दिमाग से सोचकर ही मतदान करना चाहिए।

हम खुद मतदान करें यह अच्छा है परंतु इतने पर ही कर्तव्य की इतिश्री न समझें। अपने मित्रों परिचितों से मतदान संबंधी चर्चा करें, उन्हें मतदान तिथि याद दिलाएं। पास पड़ोस के लोगों को भी प्रेरित करें ताकि मतदान के दिन वे घर पर बैठे न रह जाएं। मोर्निंग वाक के अपने साथियों से भी चर्चा करें। जिन्हें मतदान की अहमियत का अहसास न हो उन्हें अहसास कराएं। यह भी एक बड़ा दायित्व है। आज भी हमारे देश में औसतन मतदान 55-60 प्रतिशत के बीच ही रहता है। जिस दिन 80 प्रतिशत से ऊपर वोट पड़ने लगें तो समझ लीजिए देश का नागरिक जाग चुका है और देश के विकास के लिए कटिबद्ध हो गया है। हर नागरिक पर देश की समृद्धि, शांति, सौहार्द, सुरक्षा की जिम्मेदारी है और देश को एक अच्छा नेतृत्व देकर हम इस दायित्व का बखूबी निर्वहन कर सकते हैं।

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