अपने उपकारी के प्रति सदैव कृतज्ञ रहें

चेन्नई/दक्षिण भारत। यहां के जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में ’सच्चे श्रावक-अच्छे श्रावक’ प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत श्रावक के उन्नीसवें गुण कृतज्ञता का वर्णन करते हुए मुनिश्री जयधुरंधरमुनिजी ने कहा कि हर जीव का परस्पर एक दूसरे पर उपकार रहता है इसीलिए जैन चिन्ह के नीचे ’परस्परोपग्रहो जीवानाम्र’ सूत्र अंकित किया जाता है। परस्पर सहयोग के बगैर जीवन नहीं चल सकता। व्यक्ति दूसरों से सहयोग लेने के लिए तत्पर रहता है परंतु जरूरत पड़ने पर अपने उपकारियों को सहयोग प्रदान करने में आगे नहीं आता। व्यक्ति को उपकारियों के उपकारों को न भूलते हुए कृतज्ञ बनना चाहिए। एक आदर्श श्रावक कृतहनी नहीं कृतज्ञ होता है। वफादारी का गुण पशु जगत में भी देखने को मिलता है। जहां वे अपने मालिक की रक्षा के लिये प्राण तक न्यौछावर कर देते हैं। जिस प्रकार पेड़ पर पत्थर मारे जाने पर भी वह फल ही देता है इसी प्रकार मनुष्य को भी अपकारी के प्रति भी उपकार का भाव रखना चाहिए। जिस थाली में खाता है उसी में छेद करने वाला कृतहनी सबसे बड़ा विश्‍वासघातक होता है। कृतज्ञता अनेक गुणों की जन्मभूमि है। कृतज्ञ व्यक्ति के सैंकडों मित्र एवं हजारों प्रशंसक बन जाते हैं, जबकि कृतध्नता शत्रुता, वैर एवं वैमनस्य बढ़ाने वाली सिद्ध होती हैं। कृतघ्नी पापी ही नहीं, महा पापी की क्षेणी में आता है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को तीन लोगों का उपकार कभी नहीं भूलना चाहिए। प्रथम जीवनदाता माता-पिता, दूसरा आजीविका दाता और तीसरा जीवन निर्माता गुरु का इन तीनों के उपकारों से संसार के समस्त जीव ॠणी हैं। इनके उपकारों को चुकाना या उससे उॠण होना इतना आसान नहीं है। अतः उपकारों का सदैव स्मरण करते रहना चाहिए। धर्मसभा में जयमल जैन युवक परिषद के अध्यक्ष देवराज रुणवाल एवं आशा रुणवाल के सजोड़े अठाई तप के अनुमोदनार्थ संघ की ओर से उनका सम्मान किया गया। सैदापेट संघ की नववर्ष महामांगलिक की विनती पर मुनिश्री ने स्वीकृति प्रदान की। मुनिवृंद के सान्निध्य में रविवार को विदाई एवं कृतज्ञता ज्ञापन समारोह के साथ चातुर्मास में सेवा देने वाले कार्यकर्ता एवं समिति के सदस्यों का सम्मान किया जाएगा।