आठ दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर का समापन

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के कुम्बलगुड स्थित महाश्रमण समवशरण में आचार्यश्री महाश्रमणजी ने इंटरनेशनल प्रेक्षा फाउंडेशन के आठ दिवसीय शिविर के समापन समारोह में 11 देशों से संभागी शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए उन्हें जैन धर्म के सिद्धांतों को सीखकर साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। आचार्य प्रवर ने कहा कि जैन धर्म अहिंसात्मक विचारों पर आधारित है। जैन धर्म के सिद्धांत उनकी अपेक्षा के अनुरूप हो तो उन्हें जीवन में उतारें्। सभी को जीवन में अहिंसात्मक जीवन जीने की प्रेरणा दी। आचार्यप्रवर ने शिविरार्थियों को गुस्से से दूर रहने की प्रेरणा दी और बताया कि यह एक प्रकार का दुश्मन है जो अनेक बुराइयों का कारण बनता है और इससे मुक्त होने के लिए निरंतर प्रेक्षाध्यान की साधना करने की बात कही। विदेशी शिविरार्थियों द्वारा निरंतर सामायिक करने के विषय में फरमाया कि इससे आत्मा को पवित्र बनाना है। शिविरार्थियों को आत्मा और शरीर की भिन्नता के बारे में आचार्यप्रवर ने विस्तृत रूप से समझाया और प्रेक्षाध्यान के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ने की बात कही और इंटरनेशनल प्रेक्षा फाउंडेशन के पदाधिकारियों को प्रेक्षाध्यान के अधिकाधिक प्रचार और इसके लाभ जनमानस तक पहुंचाने की प्रेरणा दी।
मुनिश्री कुमारश्रमणजी ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेक्षा ध्यान के माध्यम से तेरापंथ धर्मसंघ से विदेशों के अनेक व्यक्ति जुड़े हैं और यहां पर प्रेक्षा ध्यान सीख कर अपने-अपने देशों में प्रेक्षाध्यान केंद्र चला रहे हैं्। शिविरार्थियों ने शिविर के बारे में अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा कि जैन धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है जहां पर हमें धर्म परिवर्तन किए बिना अहिंसा और आत्म साधना का मार्ग दिखाया जा रहा है। शिविरार्थियों ने लोगस्स पाठ और आचार्य महाप्रज्ञ जी द्वारा रचित गीतिका आत्म साक्षात्कार हो प्रेक्षा ध्यान के द्वारा गीत का संगान किया। गौरतलब है कि 8 दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर में जापान, यूक्रेन, रूस, फ्रांस, आयरलैंड, इंडोनेशिया, स्पेन, इजिप्ट, नेपाल, भूटान आदि देशों के शिविरार्थी भाग ले रहे हैं्। प्रेक्षा फाउंडेशन के अध्यक्ष रमेश बोल्या ने गुरुदेव के समक्ष अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए संस्था की गति प्रगति के बारे में जानकारी प्रदान की। संचालन मुनिश्री दिनेशकुमार जी ने किया।