राकांपा प्रमुख शरद पवार
राकांपा प्रमुख शरद पवार

मुंबई/दक्षिण भारत। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार सत्ता संभाल चुकी है। वहीं, विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा विपक्ष में है। इस बीच विभिन्न रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक भाजपा महाराष्ट्र में अपनी सत्ता बरकरार रख सकती थी मगर इसके लिए उसे राकांपा प्रमुख शरद पवार की दो शर्तें माननी पड़तीं।

इसके बाद अजित पवार द्वारा खेमा बदलकर भाजपा के पक्ष में आने पर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं।​ रिपोर्ट के अनुसार, शरद पवार अपनी बेटी सुप्रिया सुले के लिए केंद्र में कृषि मंत्रालय चाहते थे। साथ ही महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद से देवेंद्र फडणवीस को हटाकर किसी और चेहरे को यह जिम्मेदारी दिलवाने के पक्ष में थे।

शर्तों का यह होता असर
रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा इन दोनों ही शर्तों से सहमत नहीं थी। चूंकि शरद पवार पूर्व में देश के कृषि मंत्री रह चुके हैं। अगर इस आधार पर राकांपा को केंद्र में कृषि मंत्रालय दिया जाता तो जदयू भी रेल मंत्रालय की मांग कर सकता था, क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूर्व में रेल मंत्रालय संभाल चुके हैं। ऐसे में भाजपा नहीं चाहती थी कि केंद्र में मंत्रालय को लेकर उसके एक अहम सहयोगी से रिश्तों में कड़वाहट आए और बिहार विधानसभा चुनाव में रणनीति पर इसका असर हो।

इसके अलावा, देवेंद्र फडणवीस ​को हटाकर किसी और चेहरे को इस पद पर लाने की मांग को भी भाजपा ने नकार दिया। चूंकि फडणवीस की छवि एक बेदाग, विनम्र और जनता से जुड़े राजनेता की रही है। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने स्पष्ट किया था कि सरकार आने पर फडणवीस ही मुख्यमंत्री होंगे। ऐसे में उन्हें हटाकर किसी और के हाथों में सूबे की कमान सौंपने से कार्यकर्ताओं में अच्छा संदेश नहीं जाता। इसलिए भाजपा अपने पुराने रुख पर ही कायम रही।

हकीकत में नहीं बदला गठजोड़
रिपोर्ट के अनुसार, अपनी उक्त दोनों मांगों के लिए शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक संदेश भी पहुंचाया। इस अवधि में राकांपा प्रमुख पवार को भी भाजपा के साथ नए सियासी समीकरणों की उम्मीद थी, इसलिए उन्होंने भाजपा के खिलाफ कोई सख्त टिप्पणी नहीं की। सिर्फ शिवसेना ही भाजपा पर हमला बोलती रही।

सूत्रों की मानें तो 20 अक्टूबर को संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शरद पवार की मुलाकात के दौरान राकांपा प्रमुख ने भाजपा से गठजोड़ को हकीकत में तब्दील करने की कोशिश की थी। हालांकि करीब 50 मिनट की बातचीत में प्रधानमंत्री मोदी राकांपा प्रमुख की मांगों से सहमत नहीं हुए।

दूसरी ओर, अजित पवार ने भाजपा को समर्थन देते हुए उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। माना जा रहा था कि इसके पीछे शरद पवार की मौन सहमति है और भाजपा बहुमत सिद्ध कर देगी। बाद में शरद पवार की दोनों शर्तों की वजह से भाजपा-राकांपा के बीच गठबंधन नहीं हो पाया और फडणवीस को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, शरद पवार को उम्मीद थी कि अपनी सरकार बचाने के लिए भाजपा उनकी शर्तों को मानेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और महाराष्ट्र में शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया।

दोनों स्थिति ‘फायदे का सौदा’
विश्लेषकों की मानें तो शरद पवार के लिए दोनों ही स्थिति ‘फायदे का सौदा’ थीं। अगर वे भाजपा को समर्थन देते तो महाराष्ट्र की सत्ता में भागीदार बनते। उपमुख्यमंत्री पद राकांपा को मिल ही चुका था। इसके अलावा अहम मंत्रालय भी मिल जाते। केंद्र की सत्ता में भी उनके लिए रास्ते खुल जाते। इसके विपरीत, शिवसेना को समर्थन देकर भी महाराष्ट्र की सत्ता आने का विकल्प मौजूद था जिसका उन्होंने इस्तेमाल किया और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाकर खुद के सिर विजेता का सेहरा बंधवाने में कामयाब रहे। हालांकि, अभी अहम सवाल बरकरार है कि क्या यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगी! देशभर में कयासों का दौर जारी है।