गृहमंत्री अमित शाह एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
गृहमंत्री अमित शाह एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली/दक्षिण भारत। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लोकसभा चुनाव के दौरान आतंकियों और उन्हें पनाह देने वाली ताकतों के खिलाफ सख्ती बरतने की पैरवी कर चुके हैं। अब दोबारा सत्ता में आने के साथ ही मोदी ने अमित शाह को गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी, जिसके बाद शाह कश्मीर को लेकर उच्चाधिकारियों से लगातार बैठक कर रहे हैं।

ऐसे में विभिन्न रिपोर्टों के आधार पर दावा किया जा रहा है कि आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ और सख्ती बढ़ेगी, बल्कि यहां का राजनीतिक परिदृश्य भी बदल सकता है। इसके जरिए मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक, राजनीतिक और सामरिक सहित सभी महत्वपूर्ण परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बड़ा फैसला ले सकती है।

सकारात्मक हल का इंतजार
एक रिपोर्ट के अनुसार, मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों के परिसीमन पर विचार कर सकती है, जिसके बाद इस राज्य का सियासी नक्शा ही बदल जाएगा। भाजपा के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद शाह ने अपनी कुशल रणनीति से कई चुनाव जीते हैं। वहीं, 2019 लोकसभा चुनाव में उनकी रणनीति ने विपक्ष के कई दिग्गजों के किले ढहा दिए।

इसके आधार पर जम्मू-कश्मीर के भाजपा नेताओं का मानना है कि मोदी-शाह की जोड़ी इस बार कश्मीर मुद्दे का कोई सकारात्मक हल ढूंढ़ निकालेगी। इसके लिए ​परिसीमन पर विचार किया जा सकता है। अगर केंद्र ​सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो गृह मंत्रालय को एक परिसीमन आयोग का निर्माण करना होगा।

वर्षों पुरानी है परिसीमन की मांग
उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में वर्षों से परिसीमन की मांग की जाती रही है। इसका जम्मू इलाका कश्मीर की तुलना में बड़ा है, परंतु विधानसभा सीटों के लिहाज से यह पीछे है। संपूर्ण जम्मू-कश्मीर की 111 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से सिर्फ 87 सीटों पर ही चुनाव कराए जाते हैं, क्योंकि बाकी सीटें पाक अधिकृत कश्मीर में चली गईं। इन 87 सीटों में से कश्मीर को 46 सीटें दी गई हैं। वहीं जम्मू को 37 और लद्दाख को 4 सीटें ही मिली हैं।

जो 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर में चली गईं, परिसीमन में उतनी खाली सीटें जम्मू क्षेत्र में जोड़ने की मांग हो रही है। जम्मू—कश्मीर में 2002 में तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार ने परिसीमन पर 2026 तक रोक लगा दी थी। राज्य में अंतिम बार 1995 में परिसीमन हुआ और 87 सीटें बनाई गईं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 44 सीटों का बहुमत जरूरी होता है।

न्यायसंगत प्रतिनिधित्व
परिसीमन की मांग के पक्ष में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रफल का 15.73 प्रतिशत है, लेकिन यहां से 46 विधायक आते हैं। दूसरी ओर जम्मू संभाग में राज्य के क्षेत्रफल का 25.93 प्रतिशत भाग आता है, लेकिन यहां से 37 विधायक ही चुने जाते हैं। लद्दाख संभाग क्षेत्रफल का 58.33 प्रतिशत है और यहां से 4 विधायक ही चुनकर आते हैं।

जम्मू क्षेत्र के बारे में कहा जाता है कि इसे न्यायसंगत प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है, जिसके लिए परिसीमन जरूरी है। यदि परिसीमन में जम्मू और लद्दाख की सीटें बढ़ती हैं तो भविष्य में यह असमानता दूर हो सकती है। माना जा रहा है कि सीटों का समीकरण बदल जाने के बाद यहां कोई हिंदू भी मुख्यमंत्री बन सकता है।

धारा 370 हटाने की ओर कदम!
परिसीमन के विचार को धारा 370 हटाने की दिशा में एक कदम भी माना जा रहा है। चूंकि इसे हटाने के लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है। वरिष्ठ भाजपा नेता कई मंचों से इस धारा को ​हटाने की बात कह चुके हैं। ऐसे में अगर राजग को लोकसभा के अलावा राज्यसभा और भाजपा को जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में बहुमत प्राप्त होता है तो केंद्र सरकार कोई बड़ा फैसला ले सकती है। फिलहाल परिसीमन को लेकर आ रहीं खबरों से भाजपा नेता और कार्यकर्ता उत्साहित हैं।

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