मस्तिष्क की धमनियां हो गई ब्लॉक, लेकिन डॉक्टरों ने बचा ली जान

मस्तिष्क की धमनियां हो गई ब्लॉक, लेकिन डॉक्टरों ने बचा ली जान

बेंगलूरु। मस्तिष्क हमारे शरीर का सबसे मुख्य हिस्सा है और इससे जु़डी कई ऐसी बीमारियां हैंै जिनका अगर समय रहते समुचित इलाज नहीं किया जाए तो इंसान की मौत भी हो सकती है। शहर की एक महिला को भी एक मस्तिष्क संबंधित गंभीर बीमारी थी लेकिन अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने उसे समुचित उपचार देकर उसकी जान बचा ली। ५६ वर्षीय शैलजा को शरीर में झुनझुनाहट महसूस होती थी। पहले तो उन्होंने इसे नजरअंदाज किया लेकिन जब उन्होंने नस विशेषज्ञ (न्यूरोलॉजिस्ट) डॉक्टरों से संपर्क किया तो पता चला कि वह ब्रेन एन्यूरिज्म नामक गंभीर बीमारी से पीि़डत हैं।द्ब्यडत्रल·र्ैं द्बष्ठ्र द्यर्टैं ध्ष्ठ ज्य्द्मष्ठ प्य्ध्र्‍ थ्द्ब्यद्मद्भय्ैं ब्रुंश्च त्र्र्‍्र झ्श्नद्नय्यप्त्रइस बीमारी के कारण दिल से मस्तिष्क में रक्त और ग्लूकोज ले जाने वाली चार प्रमुख धमनियोंं में से दो धमनियां पूरी तरह से ब्लॉक हो गई थीं और दो धमनियां एक साथ जु़ड गई थीं। इन जु़डी हुई धमनियों पर रक्त का बोझ बढने के कारण इनकी स्थिति भी दयनीय हो चुकी थी। ऐसे में उनके मस्तिष्क में रक्त और ग्लूकोज को सही ढंग से पहुंचाने के लिए इन धमनियों के बदले फ्लो डायवर्टर नामक स्टेंट लगाने की जरुरत थी। इसके साथ ही इस स्टेंट को लगाने के लिए एक लंबा ऑपरेशन करने की भी जरुरत थी।द्बद्यर्‍ज् ·र्ष्ठैं झ्य्फ् द्मब्र्‍्र त्र्ष्ठ द्बब्ैंख्ष्ठ डट्टष्ठ्रट्ट ज्रुट्टय्द्मष्ठ ·र्ष्ठैं झ्स्फ्ष्ठमध्यम वर्ग से ताल्लुक रखने वाली शैलजा के लिए इस प्रकार के ऑपरेशन का खर्च वहन करना मुमकिन नहीं था। शैलजा को मस्तिष्क की दो धमनियों के स्थान पर दो स्टेंट लगवाने की आवश्यकता थी। इस प्रकार के एक स्टेंट की कीमत आठ लाख रुपए होती है। सिर्फ दो स्टेंट लगवाने के लिए ही उन्हें कम से कम १६ लाख रुपए खर्च करने होते। इसके बाद ऑपरेशन का खर्च भी अलग से वहन करना होता। इतना खर्च करना शैलजा के वश में नहीं था लेकिन इसके बावजूद उनकी जान बचा ली गई।ज्द्बश्चद्मर्‍ ·र्ष्ठैं ़द्भरूद्यह् द्यष्ठ्यठ्ठद्भह्ध्ह्यज्डट्ट ठ्ठय्स्र ब्ष्ठ़·र्ष्ठैंफ् द्बख्रख्र ·र्ष्ठैं ्यध्ॅ ृय्ॅ ृय्ख्ष्ठइसे शैलजा की खुशकिस्मती कहा जा सकता है कि जब उनमें इस गंभीर रोग के लक्षण पा गए उसी दौरान बेंगूलरु में सोसायटी ऑफ न्यूरो वैस्कुलर इंटरवेंशन का दूसरी वार्षिक कांग्रेस यानी की सम्मेलन चल रहा था और इस सम्मेलन में दुनिया भर से मस्तिष्क रोगों के विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे थे। इसके साथ ही जिस अपोलो अस्पताल में शैलजा भर्ती थीं वहां के कुछ डॉक्टर भी इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे थे। अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने सम्मेलन के दौरान शैलजा की बीमारी पर चर्चा की और उनकी जान बचने की उम्मीद प्रबल हो गई। सम्मेलन में शामिल होने के लिए लिए आए जर्मनी के न्यूरो रेडियोलोजिस्ट डॉ हैन्स हेन्केस ने शैलजा के लिए दो फ्लो डायवर्टर दान करने की पेशकश की।प्रय्स्ध्ज्य् ·र्ैंह् ज्रुट्टय्द्मष्ठ झ्ठ्ठणक्कष्ठ द्बय्ख़य् ु.ू ध्य्क्वफ्लो डायवर्टर का प्रबंध होने के बाद गत १७ जून को अपोलो अस्पताल के डॉक्टर जेबी अगाडी,न्यूरो सर्जन रवि मोहन राव और इंटरवेंशनल न्यूरोरेडियोलोजिस्ट शरत कुमार जीज ने डॉ हेन्केस के साथ मिलकर शैलजा की सर्जरी शुरु की। सात घंटे तक चली इस सर्जरी के दौरान शैलजा की जांघ में एक की होल किया गया और उनका सफलतापूर्वक इलाज कर दिया। इसके बाद शैलजा को अन्य खर्च के मद में मात्र २.५ लाख रुपए का बंदोबस्त करना प़डा जो उन्होंने अपने बीमा से जुटा लिया। इस सर्जरी को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद डॉ कुमार ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि यह एक दुर्लभ बीमारी थी और डॉक्टरों के लिए जर्जर हो चुकी धमनियों को ठीक करना बहुत आसान नहीं था। इसमंे यदि थो़डी सी भी चूक होती तो मरीज की जान भी जा सकती थी और यदि इसका उपचार नहीं किया जाता तो उनके शरीर में एन्यूरेज्म के अन्य संकट पैदा हो सकते थे जिससे धमनियां फट सकती थीं और उनकी मौत हो सकती थी लेकिन डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक सर्जरी को अंजाम दिया और उनकी जान बच गई।

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