लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘सीएए’ बतौर विषय पढ़ाने की तैयारी

लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘सीएए’ बतौर विषय पढ़ाने की तैयारी

नागरिकता संशोधन कानून 2019

लखनऊ/भाषा। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन और विरोध में हो रहे धरने-प्रदर्शनों के बीच लखनऊ विश्वविद्यालय (एलयू) अपने छात्रों को ‘सीएए’ बतौर विषय पढ़ाने की तैयारी कर रहा है और इसे बाकायदा पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किए जाने की योजना है।

विश्वविद्यालय का राजनीति शास्त्र विभाग ‘सीएए’ को पाठयक्रम में शामिल करेगा। इस आशय का प्रस्ताव तैयार किया गया है। राजनीति शास्त्र विभाग की प्रोफेसर शशि शुक्ला ने कहा, हम लोग अपने विभाग में संविधान और नागरिकता पढ़ाते हैं। ये भारतीय राजनीति का एक समसामयिक मुद्दा है तो हम लोग चाहते हैं कि इसको अपने छात्र-छात्राओं को हम लोग पढ़ाएं।

उन्होंने कहा, ये अभी प्रस्ताव के स्तर पर है। अभी पूरी अकादमिक प्रक्रिया से होकर गुजरेगा। उसके बाद पाठयक्रम का हिस्सा बनेगा। प्रोफेसर शशि ने कहा, तो पहली चीज मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि फिलहाल यह पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। लेकिन फिर भी मैं स्पष्ट कर दूं कि हम लोग नागरिकता तो पढ़ाते ही हैं … संविधान तो हम पढ़ाते ही हैं। दूसरी बात ये है कि कोई पाठ्यक्रम जैसी चीज शुरू नहीं कर रहे हैं। हमारे यहां पेपर ही है इंडियन पॉलिटिक्स का। उसमें हम समसामयिक मुद्दे जो पढ़ाते हैं, उसमें अबकी बार इसको भी शामिल कर देंगे।

उन्होंने कहा, बस ये है हमारा प्रस्ताव जो शिक्षकों ने तय किया है। प्रस्ताव राजनीति शास्त्र विभाग की ओर से है। आप देख ही रहे हैं कि इस पर इतनी चर्चा हो रही है। प्रोफेसर ने कहा कि सबसे बड़ी बात है कि लोगों को जानकारी भी है और लोगों को गलत जानकारी भी है। विशेषकर हमारे छात्र-छात्राएं ये सवाल लेकर हमारे पास आते हैं कि उन लोगों से हर जगह पूछा जाता है इसके बारे में।

उन्होंने कहा, हम लोग सोचते हैं कि इसको एक विषय के रूप में शुरू कर देंगे। विषय में हमारे पास कई पेपर हैं इसलिए हमारा प्रस्ताव है कि हम सीएए को भी कई विषयों में से एक विषय के रूप में शामिल करेंगे। जब सवाल किया गया कि कब तक सीएए को पढ़ाना चालू किया जाएगा, प्रोफेसर शशि ने कहा कि इसमें कुछ समय लगेगा।

क्या अगले सत्र से इसे शुरू कर दिया जाएगा, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि अगर उचित अकादमिक संस्था से इसे मंजूरी मिल गई तो इसे अगले सत्र से शुरू किया जा सकता है। उधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस मुद्दे पर टवीट किया, सीएए पर बहस आदि तो ठीक है लेकिन कोर्ट में इस पर सुनवाई जारी रहने के बावजूद लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा इस अतिविवादित व विभाजनकारी नागरिकता कानून को पाठ्यक्रम में शामिल करना पूरी तरह से गलत व अनुचित है।

उन्होंने कहा, बीएसपी इसका सख्त विरोध करती है तथा यूपी में सत्ता में आने पर इसे अवश्य वापस ले लेगी। इस बीच प्रोफेसर ने कहा कि राजनीति शास्त्र विभाग ने 15 फरवरी को सीएए पर वार्षिक चर्चा कराने का मन बनाया है। यह चर्चा छात्रों के बीच एक स्वस्थ शैक्षणिक चर्चा होगी।

उन्होंने बताया कि इस विषय पर कई लोग चर्चा कर रहे हैं। ऐसे में हमारे छात्र-छात्राओं को भी सीएए के विभिन्न पहलुओं को समझना चाहिए, इसलिए तय किया गया कि अगले महीने इस मुद्दे पर एक चर्चा कराई जाए। विश्वविद्यालय और संबद्ध डिग्री कॉलेजों के छात्र-छात्राओं को इस चर्चा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

ऐसा पहली बार नहीं है कि लखनऊ विश्वविद्यालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों पर छात्र-छात्राओं को शिक्षित करने के लिए पहल की। इससे पहले 2017 में लखनऊ विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश में संभवत पहला ऐसा सरकारी विश्वविद्यालय बना, जिसने जीएसटी पर छह महीने का सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया। यह कोर्स 2017-18 शैक्षिक सत्र से शुरू किया गया। वाणिज्य विभाग से इस कोर्स को संचालित करने के लिए कहा गया था।

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