नोटा की भी सुनें

गुजरात में यह आंकड़ा 5 लाख एक हजार 202 को छू गया

नोटा की भी सुनें

राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चिंतन, मनन और अध्ययन करना चाहिए

गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए आत्म-मंथन का समय है। जो हारे हैं, उनके लिए तो है ही, जो जीते हैं, उन्हें भी ध्यान देना होगा कि चुनाव नतीजों के इन आंकड़ों के जरिए मतदाता क्या कहना चाहते हैं। इस बार दोनों ही राज्यों में बहुत बड़ी तादाद में मतदाताओं ने 'नोटा' का इस्तेमाल किया है। 

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गुजरात में यह आंकड़ा 5 लाख एक हजार 202 को छू गया है, जो राज्य में डाले गए कुल वोटों का करीब 1.57 प्रतिशत है। हिमाचल में भी यह आंकड़ा कम नहीं है। यहां 24 हजार 861 मतदाताओं ने किसी उम्मीदवार को वोट देने के बजाय नोटा दबाना पसंद किया। यह इस राज्य में डाले गए कुल वोटों का करीब 0.59 प्रतिशत (मामूली परिवर्तन संभव) है। 

राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चिंतन, मनन और अध्ययन करना चाहिए कि दोनों राज्यों में कुल लाखों मतदाताओं ने उन पर भरोसा क्यों नहीं किया? चूंकि नोटा कोई उम्मीदवार नहीं है, जिसके जीतने के बाद मतदाता उससे यह उम्मीद रखे कि वह उसकी आवाज बनेगा और क्षेत्र में विकास संबंधी गतिविधियों को आगे बढ़ाएगा। नोटा का अर्थ ही यह है कि मतदाता ऊपर दिए गए किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट नहीं देना चाहता है। 

कई सीटें तो ऐसी रहीं, जहां हार-जीत का अंतर बहुत मामूली रहा। अगर वहां नोटा के वोट निकटतम प्रतिस्पर्द्धी को मिल जाते तो तस्वीर बदल सकती थी। गुजरात की सोमनाथ सीट पर मात्र 922 वोटों के अंतर से भाजपा हार गई, जबकि यहां नोटा को 1,530 वोट मिल गए। वहीं, रापड़ सीट पर मतदाताओं ने जमकर नोटा दबाया। यहां 3,942 मतदाताओं ने किसी पार्टी और निर्दलीय पर भरोसा नहीं किया। इस सीट से कांग्रेस 577 वोटों के अंतर से हार गई। 

माणावदर में भी कमोबेश यही स्थिति थी। यहां भाजपा उम्मीदवार 3,453 वोटों के अंतर से हार गए, जबकि नोटा को 1,568 मतदाताओं का साथ मिला। यहां कुछ निर्दलीय खड़े हुए थे, जो टक्कर देने की स्थिति में तो नहीं थे, लेकिन उन्होंने खूब वोट तोड़े। यहां भी इन मतदाताओं ने अपना वोट स्थापित पार्टियों के बजाय निर्दलीयों और नोटा को देना मुनासिब समझा। लिमखेड़ा सीट पर भी अंतर बहुत मामूली रहा। यहां नोटा और निर्दलीय उम्मीदवार ने आम आदमी पार्टी का खेल बिगाड़ दिया।

खंभात में 3,711 वोटों के अंतर से भाजपा हारी। यहां 2,590 मतदाताओं ने नोटा और 17,728 मतदाताओं ने निर्दलीयों को वोट दिया, जो टक्कर में भी नहीं थे। दसाडा विधानसभा क्षेत्र के नतीजे भी बहुत चौंकाने वाले रहे हैं। यहां भाजपा जीती है, लेकिन 2,179 के अंतर से, जबकि 3,147 मतदाताओं ने नोटा को चुना है। ऐसी ही तस्वीर चाणस्मा के नतीजों की रही। यहां 1,404 वोटों के अंतर से भाजपा हारी और 3,293 वोट नोटा को मिले। 

अंकलाव में 2,729 के अंतर से भाजपा हार गई। यहां 2,692 मतदाताओं ने नोटा को चुना था। हिमाचल प्रदेश के भोरांज में कांग्रेस 60 वोटों के अंतर से जीती। इस सीट के 293 मतदाताओं ने किसी पार्टी/निर्दलीय को चुनने के बजाय नोटा दबा दिया। बिलासपुर में भी कड़े मुकाबले के बीच 276 के अंतर से कांग्रेस की शिकस्त हुई। यहां 270 वोट नोटा को और सैकड़ों वोट कुछ निर्दलीयों को मिले। 

हिमाचल की शिल्लाई सीट पर इतने मतदाताओं ने नोटा दबाया कि इसकी गिनती हार-जीत के अंतर से कहीं ज्यादा हो गई। यहां 382 के अंतर से कांग्रेस जीती, लेकिन 525 वोट नोटा को मिले। श्रीनैना देवीजी सीट पर नोटा को 225 वोट मिले। यहां 171 के अंतर से कांग्रेस हार गई। ये चुनिंदा आंकड़े हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं मतदाताओं के मन में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के प्रति भरोसा कुछ कम हुआ है, इसलिए वे उन्हें शासन में भागीदार बनाने के बजाय उस बटन को दबा देना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जो निश्चित रूप से विधानसभा या संबंधित क्षेत्र में उनका नेतृत्व नहीं कर सकता। 

राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को उन कारणों को जानना होगा, जिनके आधार पर ये मतदाता उनसे दूर हुए। कहीं ऐसा न हो कि नेतागण जीत के जश्न और सत्ता के गलियारों में इतने व्यस्त हो जाएं कि कालांतर में नोटा खंडित जनादेश का प्रतिबिंब बन जाए।

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