कौनसा दांव चलेंगे नवाज?

अभी कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवार-उल हक काकड़ हैं

कौनसा दांव चलेंगे नवाज?

अब पाकिस्तान की सियासत में एक खालीपन आ गया है

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा लाहौर के मीनार-ए-पाकिस्तान में देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने का खाका प्रस्तुत करने संबंधी घोषणा हास्यास्पद है। उनके पास ऐसी कौनसी जादू की छड़ी है, जो कंगाली के कगार पर खड़े पाक को सोने की चिड़िया बना देंगे? 

नवाज भी इस तथ्य से परिचित हैं कि पाक की बदहाली का मर्ज उनकी दवाइयों से ठीक नहीं होने वाला, लेकिन इस बहाने उन्हें अपनी ब्रांडिंग का मौका मिल जाएगा। नवाज पाकिस्तान की राजनीति के घाघ खिलाड़ी हैं। उन्हें मालूम है कि कब कौनसा दांव चलना है। वे जनरल ज़िया-उल हक़ के दौर से अपनी सियासत चमका रहे हैं। बीच में मुशर्रफ का तख्ता पलट भी देखा, निर्वासित हुए। दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद जेलयात्रा की। फिर अदालत से राहत पाते हुए विदेश निकल गए। इस बीच इमरान खान की कुर्सी चली गई तो नवाज के छोटे भाई शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री बन गए। 

अभी कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवार-उल हक काकड़ हैं, लेकिन वे लोकप्रियता के मामले में नवाज के सामने कहीं नहीं टिकते। क्या नवाज शरीफ एक बार फिर पाकिस्तान में अपनी सियासी पारी का आगाज करने जा रहे हैं? वास्तव में उनके विदेश में रहने के दौरान भाई और बेटी सरकार चलाते रहे, लेकिन उन्हें जब भी कोई सलाह लेनी होती तो तुरंत फ्लाइट पकड़ते। इसलिए नवाज पाक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर न होकर भी पर्दे के पीछे से शासन संभालते रहे। 

हालांकि यह पाकिस्तानी फौज के आशीर्वाद के बिना संभव नहीं था। अब नवाज स्वदेश लौट रहे हैं तो इसके लिए उन्हें फौज ने हरी झंडी दिखाई है। इस बात का भरोसा दिलाया है कि पुराने मुकदमों में कोई सख्ती नहीं बरती जाएगी। फौज के लिए नवाज एक मजबूरी भी हैं। चूंकि उसने उनके मुकाबले में इमरान ख़ान को इस उम्मीद के साथ खड़ा किया था कि वे 'जी हुजूरी' करेंगे। इमरान को यह भ्रम हो गया था कि उनका कद सेना प्रमुख के कद से बड़ा हो गया है। इसका खामियाजा उन्होंने कुर्सी गंवाकर भुगता और जेल गए।

अब पाकिस्तान की सियासत में एक खालीपन आ गया है। फौज चाहती है कि इमरान को सत्ता से दूर रखा जाए, जिन्होंने उसे 'धोखा' दिया। जरदारी की पार्टी पीपीपी में ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जिसके नाम पर पूरे पाकिस्तान में वोट मिल सकें। बिलावल के पास खास अनुभव नहीं है। फौज उनके कद में तुरंत कोई इजाफा नहीं करना चाहती। 

शहबाज शरीफ और मरियम नवाज पीएमएल-एन के वरिष्ठ नेता जरूर हैं, लेकिन उनके पास वह करिश्मा नहीं कि लोग उन्हें सत्ता सौंपना चाहें। इसलिए आखिर में नवाज ही बचते हैं। अगर फौज उन्हें नहीं लाएगी तो किसे लाएगी? इस समय पाकिस्तान भयंकर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पेट्रोल और डॉलर के भाव आसमान छू रहे हैं। हाल में कुछ राहत जरूर दी गई, लेकिन वह नाकाफी है। खाद्यान्न संकट फिर मंडराने की आशंका है। आतंकवादी हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। ऐसे माहौल में फौज चाहती है कि नवाज शरीफ न केवल पाकिस्तान आएं, बल्कि जनता को यह दिलासा भी दें कि इन समस्याओं का समाधान उनके पास है। 

निस्संदेह नवाज शरीफ का शासन आदर्श नहीं था। आर्थिक समस्याएं तब भी थीं, लेकिन हालात इतने ज्यादा ख़राब नहीं थे। अर्थव्यवस्था किसी तरह चल रही थी, लोगों को रोटी मिल रही थी। जब इमरान कुर्सी पर बैठे, उन्होंने नए-नए प्रयोग कर अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया था। खाद्यान्न की कीमतें एकदम से बढ़ गई थीं। इस्लामाबाद, कराची जैसे शहरों में दस-दस घंटे बिजली कटौती होने लगी थी। 

नवाज के बारे में आम पाकिस्तानियों में यह धारणा है कि वे बड़ी-बड़ी क्रांतिकारी बातें नहीं करते, उन्होंने अतीत में खूब घपले-घोटाले किए, लेकिन किसी भी तरह से शासन चला लेंगे, लोगों को रोटी मिलती रहेगी। नवाज जानते हैं कि पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली दूर करना बहुत मुश्किल है। चूंकि राजस्व का बड़ा हिस्सा तो रक्षा बजट में चला जाता है। आतंकवाद की फंडिंग, भ्रष्टाचार, विदेशी कर्जों की अदायगी के बाद इतनी रकम नहीं बचती कि विकास कार्य किए जा सकें। फिर भी नवाज जनता को खुशहाली के सब्ज़-बाग़ दिखाएंगे, क्योंकि ऐसा करना उनकी मजबूरी है और वे खुद भी फौज के लिए मजबूरी हैं।

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