चुनाव सुधार ज़रूरी

हर चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होता है

चुनाव सुधार ज़रूरी

हमें मौजूदा जरूरतों को देखते हुए ऐसे कदम उठाने चाहिएं कि संसाधनों का बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल किया जा सके

केंद्र सरकार ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के जो फायदे गिनाए हैं, वे आज प्रासंगिक हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पूर्व में कह चुके हैं कि 'एक देश, एक चुनाव' पर चर्चा होनी चाहिए। निस्संदेह अगर देश इस दिशा में कदम बढ़ाता है तो यह बहुत बड़ा चुनाव सुधार होगा। इससे न केवल धन की बचत होगी, बल्कि समय और श्रम का समुचित उपयोग भी होगा। 

अब स्थिति यह है कि जैसे ही विकास कार्यों को धरातल पर उतारने की बात होती है, किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव आ जाते हैं। आचार संहिता लग जाती है, कुछ समय के लिए विकास कार्यों की गति धीमी पड़ जाती है। 

चुनाव करवाने पर बड़ी संख्या में कर्मचारियों, सुरक्षा बलों के जवानों को तैनात करना होता है। फिर नई सरकार आती है, मंत्री शपथ लेते हैं, कामकाज की शुरुआत होती है। कुछ माह बाद फिर किसी राज्य में चुनाव आ जाते हैं। वहां यही चक्र दोहराया जाता है। लोकसभा चुनाव में तो पूरा देश नई सरकार चुनने में व्यस्त हो जाता है। 

निस्संदेह हर चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होता है, लेकिन हमें मौजूदा जरूरतों को देखते हुए ऐसे कदम उठाने चाहिएं कि संसाधनों का बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल किया जा सके। 'एक देश, एक चुनाव' में इसकी संभावना नजर आती है। इसके लिए विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ करवाने पर चर्चा होनी चाहिए। नई व्यवस्था के तहत लगभग उतनी ही तादाद में कर्मचारियों और सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ दोनों चुनाव संपन्न हो सकते हैं। 

हालांकि ईवीएम की संख्या बढ़ानी होगी, लेकिन समय, श्रम और धन - तीनों की बचत होगी। बार-बार आचार संहिता लगने से कामकाज नहीं रुकेंगे। एक साथ चुनाव होंगे तो सरकारी मशीनरी विकास संबंधी कार्यों पर अधिक ध्यान दे सकेगी। उसकी कार्यकुशलता में वृद्धि होगी।

हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है। सबसे पहली समस्या तो सभी दलों को इसके लिए राजी करना है। इसके अलावा संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन करने होंगे। सरकार को जनता के बीच माहौल भी बनाना होगा। एक ओर जहां जनता को यह बताना होगा कि इससे विकास को बल मिलेगा, वहीं राजनीतिक दलों को यह समझाना होगा कि आपको चुनाव प्रचार पर कम संसाधन खर्च करने होंगे। 

'एक देश, एक चुनाव' के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि 'इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं', जो सत्य नहीं है। भारत में लोकतंत्र मजबूत है। यहां मतदाताओं में इतनी जागरूकता आ चुकी है कि वे विधानसभा और लोकसभा चुनावों के समय स्वतंत्र होकर उम्मीदवार को वोट दे सकते हैं। 

प्राय: विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे प्रभावी होते हैं, इसलिए मतदाता उसी आधार पर सोचकर वोट देता है। जबकि लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे चर्चा में रहते हैं, इसलिए मतदाता की प्राथमिकता भी बदल जाती है। इसकी पुष्टि के लिए कई उदाहरण मौजूद हैं। 

राजस्थान में साल 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती थी। कुछ माह बाद साल 2014 में लोकसभा चुनाव हुए तो सभी सीटें भाजपा के खाते में गईं। वहीं, साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जीत गई, लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में इस राज्य में कांग्रेस को निराशा ही हाथ लगी थी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लोकसभा चुनाव के दौरान जनता ने भाजपा पर भरोसा किया, लेकिन विधानसभा चुनाव 'आप' जीती थी। इसलिए यह कहना तर्क संगत नहीं है कि 'एक देश, एक चुनाव' से जनता किसी एक पार्टी के प्रभाव में आ जाएगी। 

नेतागण इस विषय पर चिंतन, मनन, अध्ययन और चर्चा करें। इसके हर पहलू को देखें और परखें। जो कानूनी अड़चन आए, उसे दूर करें। चुनाव प्रक्रिया का उद्देश्य लोकतंत्र को सशक्त बनाना भी है। इसके लिए जहां जरूरी हो, सुधार अवश्य करें।

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