गंभीर समस्या है नक्सलवाद

गंभीर समस्या है नक्सलवाद

पिछले अनेक वर्षों से छत्तीसग़ढ और झारखण्ड के अनेक इलाकों में नक्सली हिंसा को अंजाम देते आ रहे हैं। समय-समय पर दर्दनाक हादसों को अंजाम तक पहुंचते नक्सलियों ने फिर एक बार छत्तीसग़ढ के बस्तर क्षेत्र में सुकमा जिले में केंद्रीय रि़जर्व पुलिस बल के जवानों पर हमला बोल पच्चीस से अधिक जवानों को मौत के घाट उतार दिया। हमारी सरकारें नक्सली मामले को सार्थक ढंग से निपटाने में असफल रही हैं। यहाँ चिंता की बात यह है कि ऐसी घटना न तो पहली है और न ही आखिरी! अगर नक्सली संगठनों पर नकेल कसी नहीं गई तो हमारे जवान सर्वोच्च बलिदान देते ही रहेंगे। केंद्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारों को भी इस बात की समीक्षा करनी होगी की सुकमा में हुई घटना को क्या रोका नहीं जा सकता था? अगर हाँ, तो क्यों ऐसा बार-बार होता रहता है? एक तरफ सरकारें दावा कर रही है कि नक्सलवाद कम़जोर प़ड रहा है और वहीं दूसरी और नक्सली ऐसे खतरनाक हमलों को अंजाम दे रहे हैं। छत्तीसग़ढ के बस्तर क्षेत्र की स्थिति तो बहुत ख़राब हो चुकी है। इसी वर्ष होली से कुछ ही दिनों पूर्व बस्तर के ही कोत्ताचेरू में केंद्रीय रि़जर्व पुलिस बल के ही १२ जवानों को मार डाला था। उस घटना में जवानों को स़डक निर्माण में लगे मजदूरों की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। चिंता की बात यह है कि प्रशासन से ऐसी गलती बार-बार हो रही है और एक के बाद एक हो रहे हमलों का नुकसान हमारे जवानों को चुकाना प़ड रहा है। हमारे जवानों की सुरक्षा हमारी ि़जम्मेदारी है। अगर इतने हमलों के बाद भी अगर प्रशासन सीख नहीं लेता है तो इसे लापरवाही ही कहना होगा। ऐसे संवेदनशील इलाकों में क्या हमारे जवानों को बख्तरबंद गाि़डयां नहीं उपलब्ध कराई जानी चाहिए? सुकमा में हुई घटना के बाद देश भर के अनेक मंत्रियों ने घटना पर अपना खेद जताया परंतु यह काफी नहीं है, आवश्यकता है तो नक्सलियों के खिलाफ क़डी कार्यवाही की।अगर छत्तीसग़ढ के मुख्यमंत्री नक्सल समस्या पर काबू पाने में सक्षम नहीं है तो उन्हें तुरंत त्यागपत्र दे देना चाहिए। नक्सलियों के हमलों के बाद अगर मुख्यमंत्री आपात बैठक बुलाकर खुद की लापरवाही को छुपाने की कोशिश को स्वीकारा नहीं जा सकता है। वर्ष २००३ से अभी तक छत्तीसग़ढ की कमान रमन सिंह के हाथों में है और इतने लम्बे अरसे में भी अगर मुख्यमंत्री नक्सलियों पर नकेल नहीं कस सके तो यह उनकी सबसे ब़डी हार ही हैं। पहले तो वह यह दावा करते थे कि नक्सलियों से निपटने योजना को लेकर तत्कालीन केंद्र सरकार से उनके मतभेद थे। परंतु अब तो केंद्र में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो फिर क्या कारण है कि अभी तक छत्तीसग़ढ में नक्सली समस्या को सँभालने में सरकार विफल है? अगर आंध्र प्रदेश सरकार को नक्सलवादियों को खदे़डने में सफलता मिल रही है तो क्या छत्तीसग़ढ को इस से सीख नहीं लेनी चाहिए? सवाल यह भी है कि क्या केंद्र सरकार को नक्सलियों को आतंकी घोषित कर उनके खिलाफ क़डी कार्यवाही को अंजाम नहीं देना चाहिए? सच तो यह है कि नक्सल समस्या को ज़ड से मिटाने के लिए सरकारों को सख्त कार्यवाही कर ऐसे हमलों पर पूर्ण विराम लगाना होगा।

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