दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों का विश्लेषण
दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों का विश्लेषण

.. श्रीकांत पाराशर ..

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें (लिखे जाने तक रुझान) जीतकर शानदार प्रदर्शन किया और अति उत्साह में भरी भाजपा अपना आंकड़ा महज 8 की संख्या तक पहुंचा पाई। स्वाभाविक है कि भाजपा को इस बार गहन आत्ममंथन करना होगा। दिल्ली की हार उनके लिए सामान्य झटका नहीं माना जा सकता।

भाजपा संभवतः मुगालते में रही कि राष्ट्रीय मुद्दों पर दिल्ली का चुनाव जीता जा सकता है जबकि उनकी यह रणनीति सही साबित नहीं हुई। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आम आदमी पार्टी के स्थानीय मुद्दे बहुत सशक्त थे। दरअसल, केजरीवाल साढ़े चार साल तक तो कहते रहे कि दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर काम नहीं करने दे रहे, फिर पिछले छह महिने में सब बाधाएं अचानक कैसे खत्म हो गईं?

मतलब साफ है कि दिल्ली के कामकाज के मामले में केजरीवाल ने कोई तीर नहीं मारा, परंतु उन्होंने दिल्ली की जनता की नब्ज को पहचानते हुए जो मुफ्त में सुविधाएं देने की घोषणाएं कीं, वह जनता को खूब पसंद आईं। इनकी तुलना में राष्ट्रीय मुद्दे अप्रभावी रहे। उन्होंने अपनी घोषणाओं का महीनों पूर्व से जमकर प्रचार किया और उसका लोगों के मन पर प्रभाव भी पड़ा।

दूसरी बात, केजरीवाल के समक्ष भाजपा ने मुख्यमंत्री का कोई चेहरा पेश नहीं किया, इसका भी विपरीत प्रभाव पड़ा। मनोज तिवारी भी अपने आपको मुख्यमंत्री मानते रहे और प्रवेश वर्मा भी। भाजपा कार्यकर्ता काम में तो जुटे परंतु पूरे मन से नहीं। वे खुद असमंजस में रहे। उधर मतदाता को लगा कि उसके मत से कोई मोदी तो मुख्यमंत्री बनने वाले हैं नहीं, पता नहीं चुनाव के बाद किसको उनके सिर पर बिठाया जाएगा। उनको यह बात रास नहीं आई कि उनका वोट सीधा मोदी को जाएगा।

तीसरी महत्वपूर्ण बात है, एक धर्मविशेष के लोगों के वोटों का ध्रुवीकरण हुआ और आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को उसका लाभ मिला। दूसरी ओर के वोटों का विभिन्न कारणों से विभाजन हुआ इसलिए वे वोट पूरी तरह भाजपा को नहीं मिले।

उधर, केजरीवाल ने इन चुनावों में अपनी रणनीति बदली। उन्होंने मोदी को गालियां देना बंद कर दिया जबकि भाजपा के उम्मीदवारों ने केजरीवाल को आतंकवादी तक कह डाला। यह नकारात्मक चुनाव प्रचार दिल्ली की जनता को पसंद नहीं आया। इसका भी भाजपा को नुकसान हुआ।

शाहीनबाग को मुद्दा नहीं माना जा रहा है जबकि इसका लाभ “आप” को मिला। आप यह समझाने में सफल रही कि शाहीनबाग से निपटने की जिम्मेदारी भाजपानीत मोदी सरकार है, केजरीवाल सरकार की नहीं। और उधर मोदी सरकार इस प्रदर्शन से निपटने में नाकाम दिखाई दी। इससे जनता को लगा कि दिल्लीवालों को सड़क जाम से मुक्त करवाने में केन्द्र सरकार नाकारा साबित हो रही है। इसका सीधा नुकसान भाजपा को हुआ है।

हालांकि किसी दूसरी पार्टी के वोट काटने की अपेक्षा से अपनी जीत की आशा करना सही नहीं है परंतु यह सच्चाई है कि कांग्रेस के अस्तित्वहीन होने का नुकसान भी भाजपा को हुआ। अगर कांग्रेस मजबूत होती तो पार्टी को इसका भारी लाभ मिलता। कांग्रेस अपनी हार से खुश है क्योंकि उसकी हार से आम आदमी पार्टी जीती है।

बहरहाल, भाजपा को अपनी हार के कारणों पर मंथन करना चाहिए परंतु आम आदमी पार्टी को भी जीत का कोई अहंकार नहीं होना चाहिए। उसे केन्द्र सरकार के साथ सहयोगी रवैये के साथ दिल्ली की जनता के लिए काम करना चाहिए। कांग्रेस की तो क्या बात करें। वह एक लगातार सिकुड़ती पार्टी बनती जा रही है। कांग्रेस का नेतृत्व अगर अपने चाटुकारों से पिंड नहीं छुड़ाएगा या यों कहें कि कांग्रेस अपने नाकारा नेतृत्व से पिंड नहीं छुड़ा लेगी तब तक उसके हालात सुधरने मुश्किल हैं।