परमात्मा का ज्ञान शील नंदनवन जैसा

दीक्षार्थियों को आशीर्वाद देते हुए उपाध्यायश्री

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के गणेशबाग में चार्तुमास हेतु विराजित उपाध्यायश्री प्रवीणऋषिजी म. सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि रिश्तों को पवित्र (विशुद्ध) बनाना चाहिए। उन्हें तोड़ना नहीं चाहिए और न ही रिश्तों को लेकर कोई नकारात्मक टिप्पणी करनी चाहिए्। सामान्यतया इंसान की सोच सीधा रिश्ता तोड़ने की होती है। वह रिश्तों को पवित्र नहीं करना चाहता है। यदि भोजन में कंकड़ आता है तो हम कंकर को ही निकालते हैं। इसी प्रकार रिश्तों में आई राग-द्वेष-मोह आदि की जो गंदगी है उसे निकालना चाहिए तथा व्यक्ति को अग्रगामी बनना चाहिए। हमारे जीवन का भी यही ध्येय होना चाहिए कि हमें निरंतर नदी के समान आगे बढते रहना चाहिए्। संत को भी सरिता की उपमा दी गई है। संत कभी छलांग नहीं लगाता है । वह निरंतर अपने सिद्धि पथ पर सरिता के समान आगे बढ़ता रहता है। उपाध्यायश्री ने कहा कि सिद्धि प्राप्ति की शुरूआत हो सकती है लेकिन उसका समापन नहीं होता है वो अनंत होती हैं, क्योंकि साधना में ज्ञान-शील-दर्शन का समावेश होता है। यदि सिद्धि प्राप्त करनी है या साधना का मार्ग चाहिए तो सर्वप्रथम भावों को शील अर्थात स्वभाव में आना चाहिए्। व्यक्ति जैसे ही ज्ञान से स्वभाव में पहुँचता है और उसे ग्रहण करता है तो श्रद्धा का जन्म होता है जिसकी सुगंध चारों और फैलती है। यह नहीं सोचना चाहिए कि यह मन को पसंद है या नहीं। जो भाव उत्पन्न हुए हैं उन्हें तुरंत कर लेना चाहिए।
संतश्री ने कहा कि जब तक यह मन में भय है हम शुरूआत नहीं कर सकते हैं। इस भय को निकालना ही पड़ेगा। लेकिन प्राय: हम वह करते हैं जो हमारे मन को सुहाता है, इसलिए जैसे ही जाना और कर लिया तो जानते जानते श्रद्धा का जन्म होगा ही। भक्ति का रस तब ही आयेगा जब हम उसे ग्रहण करेंगे और इसके माध्यम से जो सफलता प्राप्त होती है वह कभी समाप्त नहीं होती है। इसके लिए भावना और सूचना दोनों का ही प्रबल होना आवश्यक है। परमात्मा का ज्ञान शील नंदनवन जैसा है। जैसे नंदनवन में बैठने से आनंद की अनुभूति होती है उसी तरह परमात्मा के समवसरण में कोई भी जीव जाता है चाहे उसका मन हो या न हो वहॉं उसे परमात्मा की भक्ति का आनंद आता ही आता है।
शुक्रवार को गुरु आनंद चातुर्मास समिति की ओर से दीक्षार्थी सिमरन जैन और प्रीति जैन का स्वागत किया गया, जिनकी दीक्षा 8 दिसम्बर को पूना के चिंचवाड में श्री रवीन्द्रमुनिजी, रमणीकमुनिजी व उपप्रवर्तिनी साध्वीश्री रिद्धिमाजी के सानिध्य में संपन्न होगी।