आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मोह के उन्मूलन के अनेक उपाय बताए।
आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मोह के उन्मूलन के अनेक उपाय बताए।

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। शहर के कुम्बलगुड़ स्थित महाश्रमण समवशरण में आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सम्बोधि प्रवचनमाला को आगे बढ़ाते हुए मोह के उन्मूलन के अनेक उपाय बताए। उन्होंने कहा कि एक उपाय आहार के संयम के रूप में बताया जा चुका है। उसी प्रकार मोह के उन्मूलन के अनेक उपाय हैं। इनमें है-निमित्तों से बचना, अल्पाहार, और इंद्रियों का संयम।

आचार्यश्री ने निमित्त और उपादान को विवेचित करते हुए कहा कि एक निमित्त होता है और एक उपादान होता है। उदाहरण के तौर पर समझें तो कुम्भकार द्वारा एक घड़े का निर्माण किया जाता है, जिसमें पीने का पानी भरा जाता है। उस घड़े के निर्माण के मूल में क्या है अर्थात् उसका उपादान क्या है? इस पर ध्यान दिया जाए तो प्राप्त होगा कि घड़े के निर्माण का उपादान अर्थात् मूल कारण मिट्टी है। कुम्भकार ने घड़े को बनाया, वह उसका निमित्त हो गया।

यहां कुम्भकार और घड़े बनाने के साधन का भी महत्त्व है, किन्तु घड़े के निर्माण के मूल में मिट्टी है। उसी प्रकार आदमी के जीवन में कोई कष्ट आता है तो उसका मूल कारण होता है आदमी का कर्म। किसी द्वारा कष्ट प्राप्त हुआ वह तो निमित्त मात्र होता है। कष्ट का उपादान तो खुद का कर्म है। आदमी के सुख-दुःख का मूल कारण आदमी के पाप-पुण्य होते हैं।

साधना की दृष्टि से उपादान और निमित्त दोनों का ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए्। साधु को निमित्तों से भी दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। निमित्त भी कई बार साधक को उत्पथ में ले जाने वाले हो सकते हैं। इसलिए निमित्तों से भी बचने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री ने स्वरचित महात्मा महाप्रज्ञ ग्रन्थ में वर्णित आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के जीवनवृत्त को व्याख्यायित किया। गुरुवार को उपासक श्रेणी की सेमिनार का समापन हुआ। उपासक श्रेणी के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि योगेशकुमारजी ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। डालमचंद नौलखा व सेमिनार शिविर के संयोजक जयंतीलाल सुराणा आदि ने हर्षाभिव्यक्ति दी।

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