मानवता को समर्पित रूपमुनि का जोधपुर से रहा अटूट रिश्ता, इन कार्यों से धन्य हुई मरुधरा

0

जोधपुर/पाली। श्रमण संघ के वरिष्ठ प्रवर्तक व शेरे राजस्थान लोकमान्य संत रूपचंद्र महाराज (रूपमुनि) का जोधपुर से अटूट संबंध रहा। 76 साल पहले 30 जनवरी 1942 को वे जोधपुर में ही अपने गुरु मोतीलाल महाराज से दीक्षा लेकर वैराग्य के पावन पथ पर प्रस्थित हुए थे। संयोग यह भी रहा कि पिछले साल जोधपुर के ही महावीर कॉम्पलेक्स में उनका आखिरी चातुर्मास भी संपन्न हुआ था।

पाली जिले के नाडोल में पिता भैरू पुरी व माता मोतीबाई के घर जन्मे रूपमुनि को बचपन में ही अरधेश्वर के शैव पीठ मठ में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान वैराग्य जग गया। अपने शिक्षा गुरु मरुधर केसरी मिश्रीमल महाराज के साथ उन्होंने जीवनभर कुल 26 चातुर्मास किए। वर्ष 1986 में प्रवर्तक पद पर विराजमान रूपमुनि महाराज को उत्तरप्रदेश के मेरठ जिले में शेरे राजस्थान का अलंकरण दिया गया।

रूपमुनि को धर्म दिवाकर, प्रज्ञा पुरुषोत्तम आदि कई उपाधियों से जोड़ा जाता है, लेकिन इस लोक में वे जैन व जैनेतर समाजों में समान वंदनीय-पूजनीय रहे। रूपमुनि की इसी लोकप्रियता को देखते हुए पूर्व उप राष्ट्रपति व राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. भैरोसिंह शेखावत ने वर्ष 1994 में उन्हें लोकमान्य संत का अलंकरण प्रदान किया। रूप मुनि अपने शिष्यों में लोकमान्य संत, शेरे राजस्थान, अहिंसा दिवाकर, प्रज्ञा पुरुषोत्तम, धर्म दिवाकर, राष्ट्र संत, दायित्व पूर्ण प्रवर्तक के नाम से जाने जाते हैं।

उन्होंने गद्य पद के रूप में 3 हजार से ज्यादा पृष्ठों का ग्रंथ लिखा। मारवाड़ी को महत्व दिया।लोकमान्य जैन संत रूपमुनि महाराज का शनिवार को देवलोकगमन हो गया। उनके निधन से जैन समाज सहित सभी वर्गों में शोक की लहर है। उनके निधन से जैन समाज में तो जैसे एक युग का अंत हो गया है।

तेजस्वी, ओजस्वी और प्रखर व्यक्तित्व के धनी मुनि रूपचंद महाराज को न केवल जैन समाज बल्कि समाज के सभी वर्गों में श्रद्धा भाव से देखा जाता था। संत रूप मुनि जैन परंपराओं व जिन शासन की मान्यताओं को आम लोगों में पहुंचाते हुए सर्वहारा वर्ग के संत के रूप में लोकप्रिय हुए। उन्होंने पीड़ित मानवता के लिए पाली जिले को कई स्थायी प्रकल्प दिए। कई अस्पताल, धर्मशालाएं व प्याऊ का निर्माण कराया।

रूपमुनि ने अपने पाली जिले में 110 गोशालाएं अपने हाथों से खोलीं। 376 गोशालाओं में पलने वाले गोवंश के लिए अनुदान शुरू कराया। रूपमुनि ने कई जातियों में विद्यमान पशु बलि प्रथा रुकवाने के लिए पहले जागरूकता अभियान चलाया। मारवाड़ सहित देशभर में रूपमुनि एवं उनके गुरु के नाम पर 170 से अधिक संस्थाएं संचालित हैं। शनिवार दोपहर 12.45 बजे उनकी पार्थिव देह पाली पहुंची तो अंतिम दर्शन के लिए जैन धर्मावलंंबियों सहित लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।

उनका जन्म पाली जिले के नाडोल में विसं 1987 में श्रावण शुक्ला दसमी (दिनांक 14 अगस्त 1929) को हुआ। उनका सांसारिक नाम रूपपुरी गोस्वामी था। उनकी माता का नाम मोतीबाई व पिता का नाम भैरूपुरी जी था। उन्होंने सन 1938 में 9 साल की उम्र में वैराग्य धारण किया। 30 जनवरी 1942 को जोधपुर में दीक्षा ली। मानवता को स​मर्पित उनके महान कार्यों से मरुधरा धन्य हुई।

ये भी पढ़िए:
तबाही के बीच देवदूत बनकर आए जवान, अपनी पीठ को बना दिया बाढ़ पीड़ितों के लिए सीढ़ी
केरल के बाढ़ पीड़ितों पर किया अभद्र कमेंट, कंपनी ने कर्मचारी को नौकरी से निकाला
तालिबान आतंकियों ने अफगानिस्तान में बस पर किया हमला, 100 लोगों को बना लिया बंधक
दरिंदगी की हद, दहेज के लिए प्लास से उखाड़ दिए विवाहिता के दांत

LEAVE A REPLY