दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। देवनहल्ली स्थित सिद्धाचल स्थूलभद्र धाम व नाको़डा अवंती १०८ पार्श्वनाथ महातीर्थ की यात्रा कर आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी शुक्रवार को यलहंका पहुंचे। यहां जैन संघ के तत्वावधान में अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि जहां अतिक्रमण होता है, वहां प्रतिक्रमण जरुरी है। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में लिए हुए व्रत-नियमों को सुरक्षित रखने के लिए एवं इन व्रत नियमों में किसी प्रकार का भंग हुआ हो या अतिचारों का सेवन हुआ हो तो प्रतिदिन प्रतिक्रमण करना ही चाहिए। रत्नसेनजी ने कहा कि आत्मा को सुरक्षित रखने एवं भव के बंधनों को तो़डने के लिए व्रत नियमों का बंधन स्वीकार करना जरुरी है। यदि व्यक्ति के जीवन में व्रत नियमों के बंधन नहीं हैं तो प्रतिदिन अनावश्यक पाप कार्यों में वह जु़ड जाता है। इन अनावश्यक पापों से बचने के लिए व्रत नियम का स्वीकार परम श्रेयकारी है। उन्होंने कहा कि जब कभी भी इन व्रत नियमों में अतिक्रमण हो जाए, तब प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। आचार्यश्री शनिवार एवं रविवार को गंगानगर हेब्बाल पहुंचेंगे।

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