बेंगलूरु। यहां कर्नाटक जैन भवन में आचार्र्यश्री पुष्पदंतसागरजी, प्रमुखसागरजी व मुनिश्री पूज्यसागरजी के सान्निध्य में गुरुवार को क्षमावाणी महापर्व मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः श्रीजी के अभिषेक के बाद वृहत् शांतिधारा की गई । आचार्यश्री ने क्षमावाणी का अत्यंत हृदयस्पर्शी संवेदन कराया। उन्होंने प्रतिक्रमण पाठ के एक मर्मस्पर्शी श्लोक का निरुपण करते हुए कहा कि मैं सभी प्राणी मात्र से क्षमा मांगता हूं और समस्त प्राणियों को भी क्षमा करता हूं। उन्होंने कहा कि मात्र परिचितों से चुन-चुनकर पहचान-पहचान कर क्षमा नहींं मांगी जाती है। पुष्पदंतजी ने कहा कि वीतरागी मुनि अन्य जीवों से क्षमा मांगते है। आचार्यश्री ने क्षमा के दो प्रकार बताते हुए व्यावहारिक क्षमा व आध्यात्मिक क्षमापर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक क्षमा का हमारे पास अभाव है तथा व्यावहारिक क्षमा हमारी आदत में बेशुमार है, जो बहुरुपों में अभिव्यक्त होती है लेकिन यह भावात्मक नहीं होती। इसी क्रम में आज जब आचार्यश्री ने अपने शिष्यों प्रमुखसागरजी व पूज्यसागरजी के समक्ष बैठकर व झुककर माफी मांगी और गले मिले तो वातावरण भावुक हो गया। इस मौके पर उपस्थित सभी लोगों ने आपस में हाथ मिलाकर-हाथ जो़डकर एक दूसरे से क्षमा याचना की।

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