नोटा और चुनाव परिणाम
नोटा और चुनाव परिणाम

जयपुर/दक्षिण भारत। क्या राजस्थान में विधानसभा चुनाव के दौरान कई उम्मीदवारों का खेल बिगाड़ चुका ‘नोटा’ लोकसभा चुनाव में भी असर दिखाएगा? इस सवाल ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को उलझन में डाल रखा है, क्योंकि जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो ऐसी कई सीटें थीं जहां नोटा की वजह से बाजी पलट गई। इस तरह नोटा एक ताकत बनकर उभरा। यह उन मतदाताओं को एक विकल्प उपलब्ध कराता है जो किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट नहीं देना चाहते।

इस वजह से विधानसभा चुनाव में नोटा बटन खूब दबा और कांग्रेस-भाजपा दोनों को ही कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा। नोटा का ही असर रहा कि कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम रह गया। अगर लोकसभा चुनाव में भी मतदाता उसी प्रकार नोटा पर यकीन करते हैं तो इससे इन दोनों पार्टियों की राह काफी मुश्किल हो सकती है।

विधानसभा चुनाव में नोटा की वजह से बाड़मेर की सिवाना सीट पर हार-जीत का अंतर सिर्फ 957 वोटों का रहा। यहां नोटा को 816 वोट मिले। वहीं, भीलवाड़ा की आसींद सीट पर नोटा के खाते में इतने वोट बरसे कि अगर वे शीर्ष दो उम्मीदवारों में से किसी को मिले होते तो यहां की सियासी तस्वीर कुछ और ही होती। यहां 154 वोट के अंतर से भाजपा जीती, जबकि नोटा के हिस्से में 2,943 वोट आए।

कुछ ऐसा ही नतीजा बूंदी सीट का रहा। यह सीट 713 वोटों के अंतर से भाजपा जीत पाई, जबकि यहां नोटा पर 1,692 मतदाताओं ने भरोसा जताया। चूरू सीट पर भाजपा के दिग्गज राजेंद्र राठौड़ सिर्फ 1,850 वोटों के अंतर से जीत सके, जबकि यहां 1,816 मतदाताओं ने नोटा को पसंद किया। जैसलमेर की पोकरण सीट पर नोटा ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। यहां 1,122 मतदाताओं ने नोटा को चुना और हार-जीत का फासला 872 वोटों का रहा।

हनुमानगढ़ की पीलीबंगा सीट से 2,441 वोट नोटा को मिले थे। यहां भाजपा उम्मीदवार सिर्फ 278 वोटों के अंतर से जीता था। इसके अलावा बांसवाड़ा की कुशलगढ़ सीट पर 11,002 मतदाताओं ने नोटा को चुना था। उदयपुर की झाड़ोल (7,457) और सिरोही की रेवदर (6,108) सीट पर भी खूब नोटा दबा। लोकसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को गंभीरता से इस पर विचार करना होगा कि जनता के मुद्दे क्या हैं और वह उनसे क्या चाहती है। अगर वे जनता से संवाद कायम नहीं कर पाए तो लोकसभा चुनाव में भी नोटा उनके समीकरण बिगाड़ सकता है।

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