चित्त की प्रसन्नता हो तभी आप परमात्मा की सेवा कर सकते हैं

चेन्नई/दक्षिण भारत। यहां के किलपॉक में विराजित आचार्यश्री तीर्थभद्रसूरीश्‍वर ने कहा कि परमात्मा के तीसरे संभवनाथ के स्तवन में बताया गया है कि हमें परमात्मा की सेवा करनी चाहिए लेकिन उसके लिए पात्रता की जरूरत होती है। जिनकी सेवा में एक लाख देव तत्पर रहते हैं यदि उनकी सेवा करनी है तो योग्यता तो चाहिए। इसके लिए तीन प्रकार की भूमिका जिस साधक में रहती है वही योग्य होता है। पहली भूमिका अनादि काल से चित्त में रहे दोषों को दूर करना। आज संसार के सब प्राणियों में भय व्याप्त है, चित्त स्थिर भयमुक्त होने पर ही बन सकता है। चित्त की प्रसन्नता हो तभी आप परमात्मा की सेवा कर सकते हैं। मन में उद्वेग है तो यह संभव नहीं है। अखेद यानी सेवा साधना करते समय अन्दर खेद पैदा न हो। जब तक कार्य की सिद्धि न हो हमारा उत्साह बना रहना चाहिए। सेवा साधना को आगे बढो, एक दिन सिद्धि जरुर मिलेगी। उत्साह भंग होने के बाद सिद्धि संभव नहीं है। हमें हमारे जीवन में आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज वृद्धावस्था में स्वजन वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देते हैं। संसार में कितने ही रिश्ते जोड़ लो वह कोई काम के नहीं हैं। माता पिता व स्वजन के रिश्ते ही मुख्य रिश्ते होते हैं। उन्होंने कहा कि आज कोई भी आत्मा बंधन में रहने को तैयार नहीं है, इसीलिए कुटुम्ब, परिवार, रिश्ते, नाते हकीकत में आत्मा के लिए बंधन है। यह व्यक्ति को साधना व आराधना नहीं करने देते क्योंकि व्यक्ति को हमेशा परिवार की चिंता लगी रहती है।