यह उदासीनता क्यों?

निश्चित रूप से यह स्थिति लोकतंत्र के लिए, देश के भविष्य के लिए ठीक नहीं है

यह उदासीनता क्यों?

जनता-जनार्दन की उपेक्षा कर कोई भी दल/व्यक्ति राजनीति में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकता

लोकसभा चुनाव के पहले चरण में कई स्थानों पर कम मतदान (प्रतिशत) होना कई सवाल खड़े करता है। आखिर क्या वजह है कि इतने प्रचार-प्रसार के बावजूद वहां मतदाताओं ने उदासीनता दिखाई? मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग कई कदम उठा रहा है। कर्मचारी भी चुनाव संबंधी दायित्वों को मुस्तैदी से निभा रहे हैं। नेतागण खूब रैलियां कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर चुनावी माहौल बना हुआ है। वहीं, मतदाता लोकतंत्र के उत्सव में उतना उत्साह नहीं दिखा रहे, जितना दिखाना चाहिए! अब तक जो आंकड़े आए, उनसे पता चलता है कि राजस्थान के (ज्यादातर) जिलों (जहां पहले चरण में वोट डाले गए) में तो लगभग 50 से 60 प्रतिशत ही मतदान हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो उन जिलों में लगभग आधे मतदाता वोट डालने ही नहीं गए! एक तरफ लोग सोशल मीडिया पर अपील कर रहे हैं कि मतदान जरूर करें, दूसरी तरफ बूथों पर कम उपस्थिति है! आखिर क्यों? इसका जवाब ढूंढ़ना जरूरी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आज भी कई लोग यह सोच रहे हों कि मेरे एक वोट से क्या हो जाएगा? अतीत में एक वोट के अंतर से उम्मीदवारों को हारते और सरकार को गिरते देखा जा चुका है। इसलिए लोकतंत्र में एक-एक वोट का अपना महत्त्व है। प्राय: यह माना जाता है कि शहरों की तुलना में गांवों में चुनावी माहौल ज्यादा होता है, लेकिन इस बार राजस्थान के कई गांवों में लोग यही कहते नजर आए कि मतदान केंद्रों पर वैसी 'रौनक' नहीं है! निश्चित रूप से यह स्थिति लोकतंत्र के लिए, देश के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में तो मतदान प्रतिशत बढ़ने के रिकॉर्ड कायम होने चाहिएं।

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मतदान प्रतिशत कम रहने के कई कारण हो सकते हैं। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के पर्याप्त अवसर न होने से काफी तादाद में लोगों को अन्यत्र जाना पड़ता है। लोग उसी राज्य के किसी कस्बे, बड़े शहर या दूसरे राज्य में रोजी-रोटी के अवसर तलाशते हैं। अगर एक परिवार के चार-पांच लोग भी 'बाहर' गए हों और वे मतदान के लिए जाना चाहें तो इस पर काफी रुपए खर्च हो जाते हैं। आने-जाने में समय भी लगता है, जिसके लिए छुट्टी मिलना मुश्किल होता है। ऐसे में आम आदमी यही सोचकर रह जाता है कि 'मेरे जाने या न जाने से कौनसी क्रांति आ जाएगी? ... मैं अपने काम-धंधे पर ध्यान दूं, जिससे मेरा घर चलेगा!' इस समस्या का काफी हद तक समाधान आरईवीएम प्रणाली से हो सकता है। जो लोग किसी कारणवश मतदान के लिए अपने गांव/शहर नहीं जा सकते, उन्हें अपने वर्तमान निवास-स्थान के आस-पास मतदान की सुविधा मिल जाए तो मतदान प्रतिशत बढ़ सकता है। निश्चित रूप से ऐसी व्यवस्था करना आसान काम नहीं है, लेकिन भारत के पास इसे संभव बनाने के लिए शक्ति और सामर्थ्य है। कम मतदान प्रतिशत की एक और बड़ी वजह राजनेताओं से जुड़ीं जनता की आकांक्षाएं पूरी न होना भी है। आज राजस्थान में यह कहने वाले बहुत लोग मिल जाएंगे कि 'नेता के निहाल करीं हीं? आपणो कामकाज करो।' आम लोगों में यह धारणा घर करती जा रही है कि 'नेतागण हमारी समस्याओं का समाधान करने के इच्छुक नहीं हैं ... ये वोट लेकर पांच साल तक हमारी सुध भी नहीं लेंगे!' उनमें से कई लोग राष्ट्रीय स्तर के राजनेताओं की तारीफ करते मिल जाते हैं, लेकिन वे स्थानीय नेताओं/उम्मीदवारों, सरकारी तंत्र के कामकाज से असंतुष्ट रहते हैं। ऐसे कुछ मतदाता 'नोटा' बटन भी दबा आते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस हो रहा है कि यह (बटन) कोई बेहतर समाधान लेकर नहीं आ रहा है। हर राजनीतिक दल के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वह अपने नेताओं/कार्यकर्ताओं को क्षेत्र में सक्रिय रखे। लोगों के मन में यह धारणा पैदा नहीं होनी चाहिए कि नेता उनकी परवाह नहीं करते। जनता-जनार्दन की उपेक्षा कर कोई भी दल/व्यक्ति राजनीति में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकता।

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