स्क्रीन टाइम से ज्यादा संस्कार जरूरी

बच्चे अच्छी बातें सीखें

स्क्रीन टाइम से ज्यादा संस्कार जरूरी

सही मार्गदर्शन देना बड़ों की जिम्मेदारी है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए जो सुझाव दिए हैं, वे अत्यंत प्रासंगिक हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर अत्यधिक स्क्रीन टाइम का गलत असर हो रहा है। वहीं, पारिवारिक माहौल भी ऐसा होता जा रहा है, जहां बच्चे अकेलापन महसूस कर रहे हैं। वे मोबाइल फोन, कंप्यूटर या टीवी पर क्या देख रहे हैं - यह मालूम करने के लिए माता-पिता के पास समय नहीं है। उन्हें लगता है कि बच्चों को सबसे अच्छी सुविधाएं उपलब्ध करा देना काफी है। पहले, पारिवारिक मार्गदर्शन के कारण बच्चे अनुशासित रहते थे। अब इसका अभाव होता जा रहा है। भागवत ने सत्य कहा कि नई पीढ़ी को बातचीत करने की जरूरत है। उसके अकेलेपन को दूर करना होगा, जो भीतर घर कर रहा है। आज किशोरों और युवाओं को अमेरिका से लेकर दक्षिण कोरिया तक के मशहूर बैंड के नाम मालूम हैं। वे इनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। जब उन्हें महाभारत के योद्धाओं, स्वतंत्रता संग्राम के नायकों के बारे में पूछा जाता है तो वे उलझन में पड़ जाते हैं। वे पुस्तकों से दूर भागते हैं। उन्हें लगता है कि हर सवाल का जवाब सर्च इंजन या एआई टूल के पास है। वे उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आंखें मूंदकर विश्वास करते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री की भरमार है, जिसमें दावा किया जाता है कि 'बड़े-बुजुर्गों की बातों में कुछ नहीं रखा है। अगर उन्हें ही सबकुछ पता होता तो आज इतनी समस्याएं नहीं होतीं।' वास्तव में, यहां मुद्दा समस्याओं का होना या न होना नहीं, बल्कि अनुभव का होना है।

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सोशल मीडिया पर कई युवा स्वीकार करते हैं कि वे किशोरावस्था में कुसंगति के कारण शराब, जुआ और चरित्र संबंधी अन्य खराबियों में रुचि लेने लगे थे। उन्हें मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था। वे दोस्तों की बातों को ब्रह्मांड का अंतिम सत्य समझते थे। बाद में, उन्हें भारी नुकसान हुआ। उन्होंने अपना अनमोल समय, स्वास्थ्य और धन गंवा दिया। अगर उनके परिवार में इस मुद्दे पर बात की जाती, कोई बुजुर्ग सदस्य उन्हें समझाता तो वे उक्त बुराइयों से बच सकते थे। कई बच्चों में पढ़ने, आगे बढ़ने और कुछ करने की इच्छाशक्ति नजर नहीं आती। उन्हें माता-पिता द्वारा सुविधाएं पूरी उपलब्ध कराई जाती हैं, लेकिन वे पूरी तरह सुस्त दिखाई देते हैं। वे सुबह स्कूल जाने से पहले बहुत धीरे-धीरे तैयार होते हैं। उन्हें यह तो याद रहता है कि आज शाम को एक सेलिब्रिटी के कार्यक्रम का प्रसारण होगा, लेकिन वे शिक्षक द्वारा दिया गया गृहकार्य करना बड़ी आसानी से भूल जाते हैं। उन्हें अचानक याद आता है कि कल एक विषय का टेस्ट है। उन्हें अपने दोस्तों के जन्मदिन कंठस्थ रहते हैं। किस साल पार्टी में कौनसी ड्रेस पहनी थी, कहां से केक मंगवाया था, कौनसा गाना चलाया था, कौन-कौन आया था - ये सब उनकी याददाश्त में हमेशा कैद रहते हैं। दादी-नानी की कहानियां लुप्त होती जा रही हैं। उनकी जगह मोबाइल फोन पर दिखाई देने वाले विदेशी किरदारों ने ले ली है। पुरानी कहानियों से स्वस्थ मनोरंजन तो होता ही था, अच्छी सीख भी मिलती थी। विदेशी किस्से-कहानियां परोस रहे किरदारों में इनका घोर अभाव है। अक्सर वे बच्चों को ऐसे तौर-तरीके अपनाने के लिए कहते हैं, जो भारतीय समाज में स्वीकार्य नहीं हैं। ये बच्चे भविष्य में कैसे नागरिक बनेंगे? इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। बच्चे अच्छी बातें सीखें, अच्छी संगति में रहें, मानसिक रूप से मजबूत बनें, उनका भविष्य उज्ज्वल हो, इसके लिए सही मार्गदर्शन देना बड़ों की जिम्मेदारी है।

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