प्रतीकात्मक योजनाएं, वास्तविक समस्याएं
सरकारों को अपनी योजनाओं से आगे भी सोचना चाहिए
युवाओं को रोजगार दें
तमिलनाडु में नवजातों के लिए सोने की अंगूठी संबंधी योजना अपनेआप में अनूठी है। अन्य राज्यों में भी इसकी काफी चर्चा हो रही है। मुख्यमंत्री विजय इसे तमिलनाडु में कैसे लागू करेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। जो बच्चे इस राज्य के सरकारी अस्पतालों में जन्म लेंगे, उन्हें यह अंगूठी 'थाई मामन सीर' (मामा की तरफ से मिलने वाला उपहार) नामक सांस्कृतिक परंपरा के तहत दी जाएगी। इस योजना को सरकारी अस्पतालों में प्रसव और कुल प्रजनन दर (टीएफआर) को बढ़ावा देने से जोड़कर देखा जा रहा है। अब सवाल है- क्या दंपति इसका लाभ लेंगे? जवाब है- कई दंपति जरूर लेंगे, लेकिन सभी दंपतियों के लिए यह राय बना लेना अभी जल्दबाजी होगी। लगभग 14 हजार रुपए की अंगूठी के लिए कितने शिक्षित और मध्यम आय वर्ग वाले दंपति आगे आएंगे? इस योजना के जरिए सरकार अपने चिकित्सा संस्थानों में जन्म लेने वाले हर बच्चे के लिए मामा की भूमिका निभाएगी, जो सराहनीय है। हालांकि अंगूठी देने के अलावा भी कई काम हैं, जो 'मामा' को करने होंगे। क्या तमिलनाडु के सरकारी अस्पतालों में इतनी सुविधाएं हैं कि वे उक्त योजना को सफलतापूर्वक लागू कर सकें? राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6) की मानें तो तमिलनाडु में हर साल लगभग 7.8 लाख प्रसव होते हैं। उनमें से 99.9 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों में होते हैं। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में 4.2 लाख यानी लगभग 53 प्रतिशत प्रसव होते हैं। मान लीजिए, अगर अंगूठी योजना के कारण यह आंकड़ा बढ़कर 70 प्रतिशत हो जाए, तो क्या राज्य के सरकारी अस्पतालों में उतने बेड, मशीनें और प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी हैं? अगर यह आंकड़ा 70 प्रतिशत के बजाय सिर्फ 60 प्रतिशत तक जाए, तो भी सरकारी अस्पतालों पर अच्छा-खासा दबाव बढ़ा सकता है। तमिलनाडु सरकार को इसके लिए पहले से जरूरी इंतजाम करने होंगे।
तमिलनाडु समेत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में जन्म लेने वाले बच्चे उज्ज्वल भविष्य के हकदार हैं। उन्हें यह हक कैसे दिया जाए? इसके लिए जरूरी हैं- साफ हवा, साफ पानी, सुरक्षित सड़कें, अच्छे सरकारी स्कूल, गुणवत्तापूर्ण एवं सस्ती चिकित्सा सुविधाएं और रोजगार की गारंटी। क्या कोई भी सरकार ये सुविधाएं दे रही है? पिछले चार दशकों में हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में टीएफआर में उल्लेखनीय गिरावट आई है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं हो रहा, क्योंकि परिवार नियोजन संबंधी अभियानों का दायरा बहुत बढ़ गया है। दरअसल लोग अपने जीवन में कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहे हैं। पहले, जिस उम्र में लोग माता-पिता बन जाते थे, आज उस उम्र में प्रतियोगी परीक्षाओं की पोथियां रट रहे हैं। इन परीक्षाओं में मुट्ठीभर लोग सफल होते हैं। बाकी करें तो क्या करें? सरकारी स्कूलों की हालत सब देख ही रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों की फीस इतनी बढ़ गई है कि हर दंपति उसे वहन नहीं कर सकता है। क्या ऐसे दंपति महज सोने की अंगूठी के लिए किसी बच्चे को इस दुनिया में लाना चाहेंगे? आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू तो प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा कर चुके हैं। ऐसी घोषणाओं पर तालियां खूब बजती हैं। इनके वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत प्रसारित होते हैं। समाज के एक वर्ग को लगता है कि नेतागण हमारी चिंता कर रहे हैं। जब उन्हें सरकार की ओर से सहायता मिलेगी तो उनकी खुशी दुगुनी हो जाएगी। सवाल है- यह खुशी कब तक रहेगी? आज की महंगाई के सामने कुछ हजार रुपए कब तक काम आएंगे? सरकारों को अपनी योजनाओं से आगे भी सोचना चाहिए। सबसे पहले सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों के हालात सुधारें। युवाओं को रोजगार दें। हवा, पानी की स्वच्छता सुनिश्चित करें। सुरक्षित माहौल दें। जो बच्चा इस देश में जन्म ले, उसे भविष्य में ठोकरें न खानी पड़ें। वह गर्व करे कि उसे महान संतों, ऋषियों, सुधारकों और योद्धाओं की धरती पर जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

