आक्रांताओं के नाम पर सड़कें क्यों?

इन लोगों ने हमारे पूर्वजों के साथ कितना बुरा बर्ताव किया था!

आक्रांताओं के नाम पर सड़कें क्यों?

भारत में महापुरुषों के नाम पर सड़कें होनी चाहिएं

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने यह कहकर तुष्टीकरण की राजनीति पर करारा प्रहार किया है कि किसी भी सड़क का नाम अत्याचारियों और विदेशी शासकों के नाम पर नहीं होगा। दुनिया में शायद ही कोई देश होगा, जहां उन लोगों के नाम पर सड़कें हैं, जिन्होंने कभी वहां के निवासियों पर अत्याचार किए थे। भारत में बाबर, औरंगजेब समेत कई क्रूर शासकों के नाम पर इलाकों और शहरों तक के नाम हैं। इन लोगों ने हमारे पूर्वजों के साथ कितना बुरा बर्ताव किया था! क्या यह हमें भूल जाना चाहिए? जब कभी इन आक्रांताओं के खिलाफ आवाज उठाई जाती है तो कथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तुरंत मोर्चा संभाल लेता है। वे इन्हें महान समाजसुधारक और संस्कृति का उद्धारक मानते हैं। उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के पक्ष को मजबूती देने के लिए कई कुतर्क गढ़ रखे हैं। इनसे छोटा-सा सवाल है- क्या जर्मनी में 'हिटलर पथ' हो सकता है? क्या इटली में 'मुसोलिनी मार्ग' हो सकता है? क्या ब्रिटेन में इनके नाम पर किसी इमारत का नामकरण हो सकता है? क्या फ्रांस में किसी गली को इनके नाम से संबोधित किया जा सकता है? इन सवालों का एक ही जवाब है- बिल्कुल नहीं। ये देश ऐसा कोई कदम बर्दाश्त नहीं करेंगे। फिर, भारत में क्रूर आक्रांताओं के नाम पर सड़कें क्यों हैं? उनके नाम पर शिक्षण संस्थान क्यों चल रहे हैं? क्या हम अपने देश के महापुरुषों, स्वतंत्रता सेनानियों, लेखकों, संतों, दार्शनिकों, कलाकारों के नाम पर इनका नामकरण नहीं कर सकते हैं? आजादी के दशकों बाद भी राष्ट्रीय राजधानी में जॉर्ज पंचम की प्रतिमा लगी रही। उसे देखकर ऐसा महसूस होता था कि 'यह शख्स आज भी हमें कड़ी निगाहों से देख रहा है।'

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बाद में, उसे हटाकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा लगाई गई। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का बहुत बड़ा योगदान था। जब ऐसे त्यागी और तपस्वी योद्धाओं की प्रतिमाएं लगाई जाएंगी, किसी सड़क या संस्थान का नामकरण उनके नाम पर होगा तो लोगों को उनसे प्रेरणा मिलेगी। दुष्टों, आक्रांताओं और हत्यारों के नाम पर सड़कें होंगी तो इससे कैसा संदेश जाएगा? जिन्होंने भारत में विश्वविद्यालय तोड़े, मंदिरों का अपमान किया, देव प्रतिमाएं खंडित कीं, पुस्तकालयों में आग लगाई, खोपड़ियों के ढेर लगाए, उनकी सर्वत्र निंदा होनी चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि उनके नाम पर कई जगहों के नाम देखने को मिलते हैं। एक मशहूर अभिनेत्री ने अपने बेटे का नाम कुख्यात विदेशी आक्रांता के नाम पर रखा हुआ है। जिस शख्स की क्रूरता की कहानियों से इतिहास रक्तरंजित है, जिसने कई इलाकों में नवजात से लेकर वृद्ध तक को जिंदा नहीं छोड़ा था, उसके लिए इतना सम्मान क्यों? क्या यह हमारे पूर्वजों, योद्धाओं और असंख्य बलिदानियों का अपमान नहीं है? अक्सर यह कहा जाता है कि विदेशी आक्रांताओं ने यहां कई इमारतें बनवाईं, विकास कार्य किए, शिक्षण संस्थान खोले, विज्ञान एवं तकनीक को बढ़ावा दिया। क्या वे इमारतें बनवाने के लिए जमीन और सामान अपने साथ लेकर आए थे? उन्होंने हमारे देश में, हमारे संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए, हमारे पूर्वजों पर अत्याचार करते हुए इमारतें बनवाई थीं। अगर कोई शिक्षण संस्थान खोला, तो इसलिए, ताकि वहां से ऐसे नौजवान निकलें, जो उनके रंग में रंगे हों और साम्राज्य के लिए कभी खतरा न बनें। अगर उन्होंने विज्ञान एवं तकनीक में कुछ काम किया भी, तो अपने फायदे के लिए किया था। कई लोग कहते हैं कि 'अंग्रेज इस देश में ट्रेन और बिजली लेकर आए थे।' सवाल है- क्या उन्होंने जनकल्याण के लिए ऐसा किया था? उन्होंने इन आविष्कारों के जरिए अपनी लूट-मार को नए स्तर पर पहुंचाया था। उनके लिए जज्बाती होने की कोई जरूरत नहीं है।

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