अभाव की मानसिकता छोड़ें
कई लोग 'स्कैरसिटी माइंडसेट' से ग्रस्त हैं
इससे देश की छवि पर नकारात्मक असर पड़ता है
मुंबई के एक मॉल में एक रुपए में कपड़े बेचे जाने की अफवाह के बाद भगदड़ जैसे हालात पैदा होना कोई सामान्य घटना नहीं है। इससे पहले भी कई जगहों पर ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। उक्त मॉल के बाहर जो लोग खरीदारी करने उमड़े, उनमें से ज्यादातर वे थे, जिनके घरों की अलमारियां पहले ही कपड़ों से भरी पड़ी थीं। यह आदत एक खास मानसिक स्थिति के कारण पैदा होती है, जिसे समझना और सुधार करना जरूरी है। इसे 'स्कैरसिटी माइंडसेट' यानी 'अभाव की मानसिकता' कहा जाता है। इससे प्रभावित व्यक्ति कोई चीज सबसे पहले हासिल करना चाहता है। उसे लगता है कि 'यह चीज कहीं खत्म न हो जाए! यह खत्म हो, उससे पहले मैं अपना हिस्सा ले लूं।' वह दूसरों की परवाह नहीं करता है। अक्सर यह हालत चीजों की कमी होने से नहीं, बल्कि लोगों की नीयत की वजह से पैदा होती है। इससे अनुशासन का अभाव झलकता है। जब सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल होते हैं तो विदेशों में हमारे देश की छवि पर नकारात्मक असर पड़ता है। हमें ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए। विवाह कार्यक्रमों में ऐसे नजारे खूब देखने को मिलते हैं। कई लोग अपनी प्लेट जरूरत से ज्यादा भर लेते हैं। उन्हें लगता है कि इसके बाद धरती पर खाना नहीं मिलेगा! वे अपनी बारी के लिए दूसरों को धक्का मारने से भी गुरेज़ नहीं करते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के जब नतीजे आए तो एक उम्मीदवार ने अपनी जीत की खुशी में कार्यकर्ताओं के लिए लड्डू मंगवाए थे। उन पर कार्यकर्ताओं का हुजूम इस तरह टूटा कि साबुत लड्डू दो-चार लोगों के हाथ ही आए होंगे। सड़क पर गिरे लड्डुओं के लिए भी छीना-झपटी मच गई थी। वहां मौजूद सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं के घरों में पर्याप्त खाना रहा होगा। वे मिठाई खरीदकर खाने में समर्थ थे। फिर 'अभाव की मानसिकता' का ऐसा प्रदर्शन क्यों?
ऐसे लोग हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि हम कहीं दूसरों से पीछे न रह जाएं। वे हर उपलब्धि की दूसरों से तुलना करते हैं। उन्हें डर रहता है कि अभी नहीं लेंगे तो कभी नहीं मिलेगा। अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में भयंकर अभावों से जूझ रहा है और वह ऐसा प्रदर्शन करे तो इसे काफी हद तक स्वाभाविक माना जा सकता है, लेकिन जो उससे बहुत बेहतर स्थिति में है, वह भी उसी हरकत को दोहराए तो इसे मामूली बात नहीं मानना चाहिए। कई लोग जब सिनेमा हॉल में दाखिल होते हैं तो अपनी सीट तक पहुंचने के लिए बहुत हड़बड़ी में रहते हैं। उन्हें डर रहता है कि कोई उनकी सीट पर न बैठ जाए या उठाकर ही न ले जाए! वे सीट पर बैठते ही राहत की सांस लेते हैं, जैसे किसी बादशाह का सिंहासन जीत लिया। इधर फिल्म पूरी हुई नहीं कि वापस यही सिलसिला शुरू हो जाता है। अब ये लोग सबसे पहले बाहर निकलने के लिए मशक्कत करने लगते हैं। अगर सबसे पहले बाहर निकल भी गए तो क्या हो जाएगा? क्या इससे कोई मेडल मिल जाएगा? जब इतनी जल्दी थी तो आए ही क्यों? ये लोग ऐसा क्यों करते हैं - यह इन्हें भी मालूम नहीं है। वास्तव में, यह 'अभाव की मानसिकता' का एक और उदाहरण है। ये इस आदत के वशीभूत होने के कारण अपनेआप ऐसा करने लगते हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि हममें यह आदत हमेशा से नहीं थी। कालांतर में विदेशी आक्रांता यहां शासन करने लगे और चीजों की कृत्रिम किल्लत पैदा होने लगी थी। इससे लोगों में यह आदत विकसित होती गई कि 'सबसे पहले मुझे मिले ... फिर किसी की परवाह नहीं है।' धीरे-धीरे यह आदत कई जगह दिखाई देने लगी। यह कोई सार्वभौमिक प्रवृत्ति नहीं है। स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, सिंगापुर, डेनमार्क और जापान जैसे देशों में ऐसी घटनाएं न के बराबर होती हैं। अगर वे लोग अपने सार्वजनिक व्यवहार में अनुशासन और शालीनता दिखा सकते हैं तो हम क्यों नहीं दिखा सकते? हमें 'अभाव की मानसिकता' छोड़नी चाहिए।

