लापरवाही की आग, जिंदगी खाक

अधिकारियों ने कार्रवाई की होती तो यह अग्निकांड न होता

लापरवाही की आग, जिंदगी खाक

अधिकारी दुर्घटनाएं होने का इंतजार क्यों करते हैं?

फिर एक अग्निकांड हो गया। इस बार लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में एक इमारत सुलग उठी, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। इस दुर्घटना के बाद कार्रवाई की घोषणाएं हो रही हैं। लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने आनन-फानन में उस 'अवैध व्यावसायिक इमारत' को गिराने का नोटिस भी जारी कर दिया। क्या इसके अधिकारियों को यह इमारत पहले दिखाई नहीं दे रही थी? अगर उन्होंने समय रहते कार्रवाई की होती तो यह अग्निकांड ही न होता। हमारे देश में अधिकारी दुर्घटनाएं होने का इंतजार क्यों करते हैं? उनके द्वारा कर्तव्य में बरती जा रही यह लापरवाही जनता की जान पर भारी पड़ रही है। ऐसे अधिकारी इसलिए भी सुस्त रहते हैं, क्योंकि इन्हें कार्रवाई का डर नहीं रहता है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? निलंबित कर दिए जाएंगे! उसके बाद चुपके से बहाल हो जाएंगे। जनता जान गंवाती है तो गंवाती रहे। ऐसे अधिकारियों का क्या जाता है? इनकी नौकरी चलती रहती है। इनके ऐशो-आराम में कोई कमी नहीं आती है। एलडीए ने इस रिहायशी इमारत को व्यावसायिक तौर पर गैर-कानूनी तरीके से चलाने के मामले में अपने ही संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की है। जनता का दुर्भाग्य है कि यहां जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कराने के लिए पहले अपनी जान देनी होती है। आश्चर्य की बात यह है कि इस तीन मंजिला इमारत को साल 2016 में गिराने का आदेश दिया गया था, लेकिन दो महीने से भी कम समय में उस आदेश को वापस ले लिया गया था।

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जब दस साल पहले ही इमारत को गिराने का आदेश जारी हो गया था तो उसमें किसने हस्तक्षेप किया? जनता को यह जानने का हक है। अब एलडीए के ये शब्द पीड़ित परिवारों पर किसी वज्रपात से कम नहीं हैं, 'हमने लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी जांच शुरू कर दी है और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। ... ऐसे अधिकारियों की पहचान करने और इतने सालों में उनकी भूमिका और जिम्मेदारियों का पता लगाने की प्रक्रिया चल रही है।' क्या एलडीए यह सुनिश्चित कर सकता है कि भविष्य में ऐसा अग्निकांड नहीं होगा? क्या अधिकारी इसकी जिम्मेदारी लेंगे कि जो भी लापरवाही बरतेगा, उसके खिलाफ समय रहते कार्रवाई की जाएगी? क्या वरिष्ठ अधिकारियों को यह नहीं मालूम कि सरकारी दफ्तरों में फाइलें कैसे रोकी जाती हैं, कैसे आगे बढ़ाई जाती हैं और उन्हें कैसे अंतिम मंजूरी दी जाती है? अधिकारियों की लापरवाही और सुस्ती से कहीं बड़ी समस्या सरकारी दफ्तरों में फैला भ्रष्टाचार है। बच्चा-बच्चा जानता है कि दफ्तरों में जायज काम के लिए भी रिश्वत मांगी जाती है। जो व्यक्ति रिश्वत नहीं देता, उस पर दबाव डाला जाता है। उससे रिश्वत लेने के लिए कई तरह के पैंतरे आजमाए जाते हैं। जब फाइल 'भारी' हो जाती है तो वह सरपट दौड़ती है। उसे हर जगह से मंजूरी मिल जाती है। जो पहले ही रिश्वत दे देता है, उसकी सारी गलतियां माफ होती हैं। उक्त मामले में कार्रवाई के तहत चार लोगों की गिरफ्तारी के बाद सवाल उठता है- क्या इतने ही लोग दुर्घटना के जिम्मेदार हैं? क्या बाकी लोग अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभा रहे हैं? बिजली विभाग, अग्निशमन विभाग और एलडीए के कुछ अधिकारियों को निलंबित किया गया है। कई टीमें जांच में जुटी हैं। जांच का दायरा इसी इमारत तक सीमित न रखें। उन सभी इमारतों की जांच करें, जिनके नियम विरुद्ध निर्माण और उपयोग का संदेह है। साथ ही, सभी इमारतों में मजबूत अग्निशमन व्यवस्था सुनिश्चित करें। आग लगने के बाद कार्रवाई करने से कहीं बेहतर है कि पहले ही उसे रोकने के इंतजाम कर दें। इस काम में अधिकारियों की लापरवाही, सुस्ती और भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त न किया जाए।

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