छात्र आंदोलन मामला: बांग्लादेश ट्रिब्यूनल ने 3 पुलिस अधिकारियों को मौत की सज़ा सुनाई
ये फैसले को चुनौती दे सकते हैं
Photo: mofadhaka FB page
ढाका/दक्षिण भारत। बांग्लादेश के एक स्पेशल ट्रिब्यूनल ने रविवार को तीन पुलिस अधिकारियों को मौत की सज़ा सुनाई। इनमें ढाका के पूर्व पुलिस प्रमुख भी शामिल हैं, जिन्हें उनकी गैर-मौजूदगी में यह सज़ा सुनाई गई।
उन पर साल 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शन को दबाने की कोशिश करने का आरोप था। उस विरोध-प्रदर्शन के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिर गई थी।बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी-बीडी) ने हिंसा के दौरान एक इमारत की छज्जे पर लटके हुए युवक को गोली मारने समेत दो लोगों की हत्या के आरोप में ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस (डीएमपी) के पूर्व कमिश्नर हबीबुर रहमान, एडिशनल डिप्टी कमिश्नर राशेदुल इस्लाम और ढाका पुलिस स्टेशन के पूर्व इंचार्ज मशिउर रहमान को सज़ा सुनाई।
बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल के चेयरमैन मोहम्मद गुलाम मोर्तुज़ा मोज़ुमदार ने फ़ैसला सुनाया, 'उन्हें मौत होने तक गले में फंदा डालकर फांसी दी जाएगी।'
तीन जजों की बेंच ने एकसाथ एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर को उम्रकैद और एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर को 20 साल की सज़ा सुनाई। असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर ही एकमात्र ऐसा आरोपी था जो खुद मुकदमे में शामिल हुआ था।
छात्रों के नेतृत्व में हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शन, जो जुलाई और अगस्त में फैले और जिन्हें 'जुलाई विद्रोह' का नाम दिया गया, के कारण हसीना को 5 अगस्त, 2024 को भारत भागना पड़ा। तीन दिन बाद मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली थी।
साल 2025 में संरा के मानवाधिकार कार्यालय की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि 15 जुलाई से 15 अगस्त के बीच 'जुलाई विद्रोह' के दौरान 1,400 तक लोग मारे गए, जब हसीना सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ बड़े पैमाने पर सुरक्षा कार्रवाई का आदेश दिया था।
माना जा रहा है कि पांच दोषियों में से तीन देश या विदेश में कहीं फरार हैं और कानून के तहत, सरेंडर करने या गिरफ्तारी के बाद वे बांग्लादेश के उच्चतम न्यायालय की सर्वोच्च अपीलीय डिवीज़न में फैसले को चुनौती दे सकते हैं।
इससे पहले, 17 नवंबर, 2025 को आईसीटी-बीडी ने प्रदर्शनकारियों को काबू करने की कोशिश के दौरान अपराध करने में अपनी वरिष्ठ ज़िम्मेदारी के कारण, हसीना और उनकी कैबिनेट के गृह मंत्री असदुज़्ज़मान खान कमाल को उनकी अनुपस्थिति में मुक़दमा चलाने के बाद मौत की सज़ा सुनाई।
उसी दिन, विशेष अदालत ने पुलिस के पूर्व इंस्पेक्टर जनरल चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को पांच साल की जेल की सज़ा सुनाई, जो इस मामले में 'अप्रूवर' या सरकारी गवाह बन गए थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, रविवार को दोषी ठहराए गए पुलिस अधिकारियों पर आरोप था कि उन्होंने हसीना और वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर छात्रों और आम नागरिकों के खिलाफ जानलेवा बल का इस्तेमाल किया था।


