यह है कश्मीरियत

शिवभक्त अपने आराध्य के दर्शन करने के लिए अमरनाथ यात्रा पर जा रहे हैं तो उनके स्वागत के साथ कश्मीरियत साकार हो रही है

यह है कश्मीरियत

कुछ उपद्रवियों की खुराफातों से न तो हमारी आस्था की ज्योति मंद पड़ेगी और न हमारी एकता की डोर टूटेगी

अमरनाथ यात्रा में गए शिवभक्तों का स्थानीय लोगों द्वारा स्वागत और सहयोग कश्मीरियत की काबिले-तारीफ मिसाल है। इस यात्रा को सफल बनाने में ईश्वर की कृपा, शिवभक्तों की लग्न तो है ही, स्थानीय लोगों के सहयोग की भी उल्लेखनीय भूमिका है। यात्रियों के लिए तंबू लगाने से लेकर छोटी-बड़ी हर तरह की मदद के लिए स्थानीय लोग तैयार रहते हैं। प्राय: मीडिया (मुख्य धारा व सोशल मीडिया) में कश्मीर से जुड़ीं सकारात्मक ख़बरें कम ही जगह पाती हैं। 

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बेशक कश्मीर की फ़िज़ा में दहशत घोलने में विदेशी ताकतों की बड़ी भूमिका है, जिसके परिणामस्वरूप यहां कई बार अप्रिय घटनाएं हुईं, लेकिन यह कश्मीर का असल मिज़ाज नहीं है। कमीर ऋषियों और संतों की भूमि है। यहां साहित्य, संगीत और विभिन्न कलाओं का विकास हुआ। सेवा और सत्कार कश्मीरियत का हिस्सा हैं। 

आज जब हजारों की तादाद में शिवभक्त अपने आराध्य के दर्शन करने के लिए अमरनाथ यात्रा पर जा रहे हैं तो उनके स्वागत के साथ कश्मीरियत साकार हो रही है। चूंकि स्थानीय लोग पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों में रहने के अभ्यस्त होते हैं। वहीं मैदानी व अन्य इलाकों से गए श्रद्धालुओं को कई बार स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हो जाती हैं। ऐसे में स्थानीय लोग उनकी मदद के लिए सबसे पहले पहुंचते हैं। वे मौके पर तैनात सुरक्षा बलों के साथ सहयोग करते हैं। 

बाबा अमरनाथ के दर्शन करने गए एक साधु महाराज के ये शब्द उल्लेखनीय हैं- 'जरूरी इंतजाम और दूसरी चीजें, जिनकी हमें जरूरत होती है, उसका ध्यान हमारे मुस्लिम भाइयों द्वारा रखा जाता है। साफ-सफाई से लेकर प्रसाद, खच्चर, पालकी सभी तरह की मदद स्थानीय मुस्लिमों द्वारा की जाती है। यह दुनिया के लिए भाईचारे का एक उदाहरण है। मुझे दुनिया के किसी कोने में इससे अच्छा भाईचारे का उदाहरण नहीं दिखा और मैं पूरे भारत की यात्रा कर चुका हूं।'

एक अन्य यात्री के ये शब्द भी कश्मीरियत को बयान करते हैं- 'स्थानीय लोगों ने व्यापक सहयोग दिया है। उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। अगर हम उनसे कोई एक चीज मांगते हैं तो वे दो देते हैं।' 

इन यात्रियों के सामान की सुरक्षा के लिए कई लोग तो निशुल्क सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। जब यात्री दर्शन के लिए जाते हैं तो अपना कीमती सामान, जैसे बैग, कैमरा, मोबाइल फोन आदि उनके जिम्मे छोड़ देते हैं। जब वे लौटकर आते हैं तो उनका सामान उन्हें उपलब्ध करा दिया जाता है। स्थानीय लोग इस सेवा को भाईचारा निभाने की एक कोशिश बताते हैं, जिसकी बदौलत वे कश्मीरियत को जिंदा रखे हुए हैं। इस यात्रा को सफल बनाने के लिए सुरक्षा बलों के जवान भी लगातार सेवाएं दे रहे हैं। उनका श्रम और साहस एक तपस्या की तरह है। 

पूर्व में कुछ आतंकी तत्त्वों ने यात्राओं को बाधित करने की कोशिश की थी, जिनका सुरक्षा बलों के जवानों ने डटकर सामना किया था। यह याद कर प्राचीन काल के ऋषियों के आश्रम में यज्ञ का दृश्य साकार हो जाता है, जब नकारात्मक व विध्वंसक शक्तियां उसमें विघ्न डालने की कोशिशें करतीं, लेकिन मानवता के रक्षक अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन्हें विफल कर देते थे और यज्ञ निर्विघ्न संपन्न होता था। अमरनाथ यात्रियों में बाबा भोलेनाथ के प्रति अटूट आस्था तो है ही, स्थानीय लोगों की सहायता और सुरक्षा बलों का साथ उन्हें भरोसा देता है कि वे यह यात्रा निर्विघ्न पूरी करेंगे। इसलिए हजारों की तादाद में यात्री जयकारे लगाते हुए आधार शिविरों के लिए रवाना हो रहे हैं। 

बुधवार को जो छठा जत्था रवाना हुआ, उसमें 6,000 से ज्यादा यात्री थे। दुनिया देख ले, यह है बाबा अमरनाथ का धाम, यह है भारत मां का मुकुट, यह है धरती की जन्नत और यह है भारत का अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर। कुछ उपद्रवियों की खुराफातों से न तो हमारी आस्था की ज्योति मंद पड़ेगी और न हमारी एकता की डोर टूटेगी।

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