कठिन परिस्थितियों से जूझने वाला ही ऊंचाइयों को पाता है

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के अक्कीपेट जैन मंदिर में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री देवेंद्रसागरजी ने कठिन से कठिन परिस्थिति में भी स्वयं को संयमित रखने का उपाय बतलाते हुए कहा कि जीवन की कठिनाइयों से निपटने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि सबसे पहले आप इसकी उपस्थिति को स्वीकार करें्। समस्याओं के बिना जीवन बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे विरोधी टीम के बिना कोई मैच। आप विरोधी टीम के बिना खेल का अभ्यास तक नहीं कर सकते हैं्। इसी प्रकार समस्याएं जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं। मान लेते हैं कि आपको एक महान विरोधी टीम के खिलाफ खेलने का मौका मिलता है, तो क्या आप इस बात पर गर्व नहीं करेंगे कि आपका प्रतिद्वंद्वी मजबूत है? ऐसी परिस्थिति में आप अपने सभी स्रोतों का इस्तेमाल का इस अवसर का सबसे अच्छा उपयोग करेंगे और अपनी सभी छिपी क्षमताओं को सामने लाकर अपनी सर्वश्रेष्ठ समर्थता के साथ इस खेल को खेलेंगे। उसी प्रकार आप जब जीवन में समस्याओं का सामना करते हैं, तो सबसे पहले उन्हें स्वीकार करें और उसे उस अवसर के रूप में देखें जो आपकी छिपी ताकतों को सामने लाएगा।
आचार्यश्री ने कहा कि अगर आप समस्या को स्वीकार लेते हैं तो इसे हल करने की ताकत का भी पता आप लगा लेंगे। तैयारी बिल्कुल वैसे ही करें जैसे आप क्रिकेट मैच में किसी विरोधी टीम का सामना करने के लिए करते हैं्। खुद को सबसे पहले उन समस्याओं को स्वीकार करने के लिए तैयार करें जो आपके नियंत्रण में नहीं हैं। ऐसी परिस्थितियों को स्वीकार करके, आप खुद को इसे आत्मसमर्पित नहीं कर रहे हैं बल्कि इससे निपटने के लिए रास्ते का निर्माण कर रहे हैं्॥