सिंहासन हिलाने से नहीं, हुनर से मिलेगा रोजगार
हंगामा करने से बेरोजगारी नहीं मिटेगी
शीर्ष दस हजार अर्थशास्त्री भी सबको सरकारी नौकरी नहीं दे सकते
कांग्रेस के कुछ नेताओं को युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी की ज्यादा ही चिंता होने लगी है। इसके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने 'जॉब नहीं मिलेगा, तो सिंहासन हिलेगा' जैसी बढ़िया तुकबंदी के साथ केंद्र सरकार को चेतावनी दे दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश कंपनियों में भर्तियां घटने का मुद्दा उठाकर सरकार को आड़े हाथों ले रहे हैं। सरकार की नीतियों की आलोचना करना, उससे हर मुद्दे पर जवाब मांगना इनका अधिकार है। इन्हें अपने अधिकार का पूरा उपयोग करना चाहिए। साथ ही, अपनी रणनीति में थोड़ी स्पष्टता लानी चाहिए। विपक्ष का काम सिर्फ विरोध करते रहना नहीं है। उसे समाधान भी बताना चाहिए। अगर युवाओं को नौकरी नहीं मिली और सिंहासन हिल गया (जैसा कि राहुल गांधी कह रहे हैं), तो क्या उसके बाद सभी युवा अफसर लग जाएंगे? डॉ. मनमोहन सिंह विद्वान अर्थशास्त्री थे। दस साल तक प्रधानमंत्री रहने के बावजूद सबको नौकरी वे भी नहीं दे सके थे। जयराम रमेश जिन कंपनियों की बात कर रहे हैं, पूर्व में उनके ही मालिकों को कांग्रेस के बड़े नेता से लेकर कार्यकर्ता तक हजारों बार कोस चुके हैं। फिर उनसे नौकरी की उम्मीद क्यों करते हैं? यह विरोधाभास इस मुद्दे की गंभीरता को कम करता है। बेशक युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए। उनके जीवन में आर्थिक अभाव नहीं होना चाहिए। इसका तरीका क्या हो सकता है? भारत में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा समय तक राज किया है। क्या उसके नेता नहीं जानते कि बेरोजगारी कैसे दूर हो सकती है? आज भारत के युवाओं में बेरोजगारी की जो स्थिति है, उसके पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, उनके पास किताबी ज्ञान है, डिग्रियां हैं, लेकिन हुनर नहीं है। दूसरा, वे नौकरी करना चाहते हैं, लेकिन सरकारी, जिसमें कमाई भरपूर हो, सुविधाएं खूब हों, जहां मेहनत कम से कम करनी पड़े। कुछ लोग इसके अपवाद हो सकते हैं, जो हर क्षेत्र में होते ही हैं।
भारत में बच्चों के साथ सरकारी नौकरी का सपना तब से जोड़ दिया जाता है, जब दुनिया में उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता है। शिक्षा पद्धति का तो कहना ही क्या, बस पोथियां रटते जाएं और अगली कक्षा की ओर बढ़ते जाएं! हाल के वर्षों में स्थिति कुछ बेहतर हुई है, लेकिन सुधार की बहुत जरूरत है। यहां स्वरोजगार को हमेशा आखिरी विकल्प माना जाता है। इसे मजबूरी का प्रतीक बना दिया गया है। अगर बेरोजगारी से लड़ना है तो महात्मा गांधी के जीवन को गंभीरता से पढ़ लें। उन्होंने आज़ादी की लड़ाई के साथ लोगों को हुनरमंद बनाने पर कितना जोर दिया था! जब पूरे हिन्दुस्तान में अंग्रेजी माल बेरोक-टोक बिकता था और बड़े बाबू साहब उसे खरीदने में अपनी शान समझते थे, तब चरखा चलाना बहुत चुनौतीपूर्ण काम था। चरखा स्वदेशी, स्वाभिमान और स्वावलंबन का प्रतीक था। अगर आज बेरोजगारी का उन्मूलन करना है तो हमें उसी सोच को अपनाना होगा। युवाओं को हुनर सिखाएं और जिस चीज के साथ उनकी मेहनत जुड़ी हो, लोग उसे खरीदने में प्राथमिकता दें। कितने तरह के हुनर हैं, उनका क्या उपयोग है, बाजार क्या है, मांग क्या है, पूर्ति कैसे होती है, अर्थव्यवस्था कैसे चलती है, स्वदेशी चीजों का व्यापार किस तरह देश को फायदा पहुंचाता है - ये बातें हर बच्चे को स्कूली दिनों में सिखाई जाएं। बेरोजगारी दूर करने का यही सबसे असरदार तरीका है। रुपए बांटने, धरना देने, पुतला फूंकने, रास्ता रोकने, हंगामा करने, वाहनों के शीशे तोड़ने, हुड़दंग मचाने जैसे तरीकों से न कभी बेरोजगारी मिटी है, न कभी मिटेगी। अगर दुनिया के शीर्ष दस हजार अर्थशास्त्री आ जाएं तो वे भी मौजूदा हालात में सबको सरकारी नौकरी नहीं दे सकते। कहां से देंगे? इतनी सरकारी नौकरियां हैं ही नहीं। हुनर, स्वरोजगार और स्वदेशी को अपनाने से बेरोजगारी का उन्मूलन होगा। सभी राजनीतिक दल इस बात को स्वीकार करें।

