इन बिगड़ैल बच्चों को सुधारें
प्रधानमंत्री की माता के लिए अभद्र शब्द बोले गए
मोदी की स्वर्गवासी माता का नाम बीच में लाने की क्या जरूरत थी?
जंतर-मंतर पर सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माता के लिए जिस तरह अभद्र शब्दों का प्रयोग किया, वह अत्यंत निंदनीय है। नागरिकों को सरकार की नीतियों से असहमत होने, उसके खिलाफ प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री की माता के लिए अभद्र शब्द बोले। किसी के लिए भी ये शब्द नहीं बोलने चाहिएं। जब प्रधानमंत्री ने ऐसे वीडियो देखे तो उन्हें गहरा दु:ख हुआ। यह स्वाभाविक है। वहीं, उन्होंने जिस तरह इन बिगड़ैल बच्चों को क्षमा किया, वह उनकी उदारता को दर्शाता है। प्रधानमंत्री के खिलाफ प्रदर्शन करना था तो खूब करते। उनकी स्वर्गवासी माता का नाम बीच में लाने की क्या जरूरत थी? उनका राजनीति से कोई संबंध नहीं था। उक्त घटनाक्रम को सामान्य मामला समझने की भूल न करें। इन लोगों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए और चौतरफा निंदा हुई तो ये कानूनी कार्रवाई के डर से अपनी गलती स्वीकार करने लगे। अगर कार्रवाई का डर न होता तो इन्हें कोई पछतावा नहीं होता। आज फिल्मों, ओटीटी मंच, सोशल मीडिया सामग्री में अभद्र शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। देश में एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो गई है, जो इन शब्दों को दोहराने में बड़प्पन महसूस करती है। जंतर-मंतर पर जो लड़की (प्रधानमंत्री की माता के लिए) गलत शब्द बोलकर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, उसकी उम्र देखिए! उसके मुंह से इतने गंदे शब्द निकल रहे थे! उसे यह सब किसने सिखाया होगा? यह कुसंगति का नतीजा हो सकता है। इसके अलावा फिल्मों और ओटीटी मंच पर प्रसारित सामग्री ने उसकी सोच में यह विकृति पैदा की होगी।
कई परिवारों में छोटे बच्चों को ऐसे शब्द सिखा दिए जाते हैं। जब वे अपनी तुतलाती बोली में उनका उच्चारण करते हैं तो सब हंसते हैं। जब वे बड़े होकर अभद्रतापूर्वक उन्हें दोहराते हैं तो लोग शिकायत करते हैं कि हमारे बच्चे बिगड़ गए। बिहार के एक वरिष्ठ नेता, जो अब राजनीति में खास सक्रिय नहीं हैं, के बारे में कहा जाता था कि उनका पालतू तोता अभद्र शब्द बोलने में पारंगत हो गया था। उसने ये शब्द उन 'नेताजी' से ही सीखे थे, जो बातचीत में उनका धुआंधार प्रयोग करते थे। ऐसे लोग खुद को निडर और विशेष प्रतिभा का धनी मानते हैं। जो बच्चे जंतर-मंतर जाकर अपशब्दों की बौछार कर रहे थे, उनकी यही मानसिकता रही होगी। कुछ तो माहौल ऐसा था, कुछ सोशल मीडिया पर वायरल होने का शौक चढ़ा होगा। कई किशोरों और युवाओं ने 'बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम नहीं होगा' को बहुत गंभीरता से ले लिया है। वे इसे तुरंत प्रसिद्धि पाने का नुस्खा समझते हैं। कई लोग इस पर अमल कर प्रसिद्ध हो चुके हैं। उन्हें बड़े-बड़े कार्यक्रमों में बुलाया जाता है। दर्शक उनसे आग्रह करते हैं कि एक बार फलां संवाद बोलें। आयोजक जानते हैं कि इस व्यक्ति की यही विशेषता है। वे गलत शब्द बोलने के लिए मोटी रकम देते हैं। हाल में स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर कितने अभद्र वीडियो सामने आए थे? ये लोग हास्य उत्पन्न करने के लिए अश्लीलता का सहारा लेते हैं, लेकिन समाज का भारी नुकसान करते हैं। जब ऐसे लोग जंतर-मंतर पहुंचते हैं तो भीड़ देखकर उद्दंड हो जाते हैं। उन्हें दो-चार कैमरे घेर लेते हैं तो खुद को महान सेलिब्रिटी समझने का भ्रम पाल लेते हैं। फिर ये विषवमन करने लगते हैं। इनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि गंदी मानसिकता रखने वाले अन्य लोगों को सबक मिले। इस बार नरेंद्र मोदी ने क्षमा कर दिया। भविष्य में किसी अन्य नेता के मामले में संभवत: कोई उदारता देखने को न मिले।

