'वंदे मातरम्' का विरोध क्यों?
भारत में 'वंदे मातरम्' नहीं गाया जाएगा तो कहां गाया जाएगा?
कुछ लोगों ने इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर रखा है
संसद ने 'राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026' को पारित कर उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को नमन किया है, जो 'वंदे मातरम्' का उद्घोष कर भारत मां के लिए बलिदान हुए थे। इस गीत में अद्भुत ऊर्जा है। जो व्यक्ति इसे गाता है, उसके तन और मन में देशभक्ति की लहर पैदा हो जाती है। अंग्रेजी हुकूमत के ज़माने में जब अत्याचारी पुलिस अधिकारी हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों पर लाठियां और कोड़े बरसाते थे, तब उन्हें हर वार के जवाब में 'वंदे मातरम्' सुनने को मिलता था। अत्याचारी मार-मार कर थक जाते थे, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों का जोश कम होने का नाम नहीं लेता था। दुर्भाग्य की बात है कि आज जब 'वंदे मातरम्' को कानूनी संरक्षण दिया जा रहा है तो विपक्ष के कुछ राजनेताओं को यह कदम संविधान और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ लग रहा है! 'वंदे मातरम्' सुनकर अंग्रेज चिढ़ते थे। उनके रहमो-करम पर पलने वाले सरकारी अधिकारी भड़कते थे। अब तो भारत आज़ाद है। अगर यहां 'वंदे मातरम्' नहीं गाया जाएगा तो कहां गाया जाएगा? जो नेतागण इसका विरोध कर अपनी सियासी रोटियां सेक रहे हैं, वे एक बार इसका सही अनुवाद पढ़ें। इसमें भारत भूमि की सुंदरता और विविधता का वर्णन है। इसके शब्दों में देश की दिव्य शक्तियों का बखान है। भले ही कोई व्यक्ति इसका अर्थ न जानता हो, अगर वह शुद्ध भाव के साथ इसे गाता है तो दिव्यता को महसूस करता है। इस पर आपत्ति जताने के लिए कोई वजह होनी ही नहीं चाहिए। जिस गीत ने स्वतंत्रता की चेतना जगाई, देशवासियों को अंग्रेजों से लड़ने के लिए शक्ति दी, उसका सम्मान करना गर्व का विषय होना चाहिए। 'वंदे मातरम्' का सम्मान उन बलिदानियों का भी सम्मान है।
कुछ लोगों ने इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर रखा है। वे अजीब तर्क दे रहे हैं। जैसे- ''वंदे मातरम्' गाने से क्या हो जाएगा? क्या इससे रोटी मिल जाएगी?' इनसे कोई पूछे- 'क्या 'वंदे मातरम्' न गाने से सबकुछ हो जाएगा? क्या इसे नहीं गाएंगे तो छप्पन तरह के पकवान मिल जाएंगे?' मनुष्य को पेट भरने के अलावा भी कुछ सोचना चाहिए। हर काम दाल-रोटी के लिए नहीं होता है। राष्ट्र का गौरव भी होता है, जिसे याद करना चाहिए। बलिदान का इतिहास भी होता है, जिसे भूलना नहीं चाहिए। जो लोग आज 'वंदे मातरम्' न गाने के लिए तरह-तरह के बहाने बना रहे हैं, उनसे पूछना चाहिए- अगर डेढ़ सौ साल पहले सभी लोगों की यह सोच होती कि आज़ादी की लड़ाई से क्या हो जाएगा, क्या इससे रोटी मिल जाएगी, क्या इससे सरकारी नौकरी मिल जाएगी, क्या इससे मुफ्त इलाज मिल जाएगा, क्या इससे दैनिक जरूरतें पूरी हो जाएंगी, क्या इससे चीजें सस्ती हो जाएंगी ... तो इस देश का क्या होता? हमारा क्या होता? अंग्रेजी राज में 'वंदे मातरम्' गाने का मतलब था- जेल, पिटाई और फांसी! फिर भी हमारे पूर्वजों ने ज़िद नहीं छोड़ी थी। वे जेल गए, पिटाई बर्दाश्त की, फंदों पर लटके, लेकिन यह उद्घोष कभी शांत नहीं हुआ था। स्वतंत्रता सेनानियों का सपना था कि वे आज़ाद हिन्दुस्तान में 'वंदे मातरम्' गाएं। कई तो मन में यह आस लेकर ही बलिदान हो गए थे। आज उसी देश में कुछ लोग 'वंदे मातरम्' के खिलाफ बातें कर रहे हैं! अगर हम अपने राष्ट्रगीत का सम्मान नहीं करेंगे तो नई पीढ़ी पर उसका कैसा असर होगा? क्या वह देश का इतिहास नहीं भूल जाएगी? क्या वह त्यागी और बलिदानी योद्धाओं का सम्मान करना सीखेगी? उसे तो यही लगेगा कि अंग्रेज भ्रमण करते-करते भारत आए और एक दिन चाय-नाश्ता कर ब्रिटेन लौट गए थे। क्या हम यह सीख देना चाहेंगे? देश को बहुत बड़ी कीमत चुकाने के बाद आज़ादी मिली थी। हमें इसके प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए।

