आधुनिकता के नाम पर नई विकृति
विवाह एक अनुशासन है
सहजीवन संबंध के पीछे शारीरिक आकर्षण मुख्य तत्त्व है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विवाह और सहजीवन संबंध के बारे में जो टिप्पणी की है, उससे युवाओं को शिक्षा लेनी चाहिए। भागवत ने सत्य कहा कि विवाह एक ऐसा अनुशासन है, जो धर्म के संस्कार देता है, जबकि सहजीवन संबंध की वास्तविकता पूरी दुनिया में देखी जा सकती है। उन्होंने जेन जी की मनोदशा के बारे में भी पूर्णत: सत्य कहा कि ये दूसरों की देखादेखी करते हैं, भावुक होते हैं, शांत मन से नहीं सोचते हैं और जो बात सही लगती है, उसी की ओर आकर्षित हो जाते हैं। सहजीवन संबंध के पीछे शारीरिक आकर्षण मुख्य तत्त्व होता है। जब तक यह बना रहता है, दोनों साथ रहते हैं। जैसे ही आकर्षण खत्म हुआ, दोनों के रास्ते अलग हो जाते हैं। पश्चिमी देशों में इसका खूब बोलबाला है। अब कई भारतीय युवा इस रास्ते पर चल पड़े हैं। इसका नतीजा पचास साल बाद जो होगा, सो होगा, लेकिन इसके रुझान आने लगे हैं। अक्सर सहजीवन संबंध भयंकर कड़वाहट के साथ खत्म होते हैं। कई मामलों में महिला-पुरुष को अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब सहजीवन संबंध के एक-दो साल बाद महिला ने पुरुष पर दुष्कर्म का आरोप लगाया। वहीं, पुरुष ने उस पर धोखा देने का आरोप लगाकर अपना बचाव किया। अदालतें भी ऐसे संबंधों पर चिंता जता चुकी हैं। भारत समेत कई देशों में संयुक्त परिवारों का चलन रहा है। उन्हें प्रगति के नाम पर धीरे-धीरे तोड़ा गया। ऐसा माना जाता है कि इसके पीछे पश्चिमी कंपनियों की साजिश थी। अगर संयुक्त परिवार होगा तो एक मकान, एक टीवी, एक वाहन, एक टेलीफोन, एक फ्रिज आदि से काम चल जाएगा। बड़े बच्चों के कपड़े बाद में छोटे बच्चों के काम आ सकते हैं। उनकी किताबें छोटे भाई-बहन पढ़ सकते हैं। अगर परिवार टूटेंगे तो सबको अपनी जरूरतों के लिए अलग-अलग चीजें खरीदनी होंगी।
अब इससे एक कदम आगे की तैयारी है! सहजीवन के पीछे कोई ठोस प्रतिबद्धता नहीं होती है। बस, भोगवाद को प्रधानता दी जाती है। यहां संयम की कोई शर्त नहीं है। इसमें आने के बाद भविष्य की परवाह कौन करे? खाएं, पीएं, मौज उड़ाएं। कल किसने देखा है? इस 'कल्चर' ने कई कंपनियों का धंधा खूब चमका दिया है। फिल्मों और वेबसीरीजों ने सहजीवन संबंध को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उनके जरिए युवाओं के मन में यह बात बैठाने की पूरी कोशिश की जाती है कि 'सहजीवन संबंध आधुनिकता की निशानी है।' हालांकि, जब इसमें कड़वाहट आती है तो पूरा खामियाजा एकसाथ भुगतने के प्रबल योग बन जाते हैं। माता-पिता को पछतावा होता है कि उन्होंने समय रहते बच्चों को मार्गदर्शन नहीं दिया। एक शख्स ने अपने मामा की आपबीती का वर्णन कुछ इस तरह किया- मामा दिखने में बड़े सीधे लगते थे। वे दो बच्चों के पिता थे। विदेश में उनकी नौकरी लगी तो यह वादा कर चले गए कि कुछ दिन बाद पत्नी-बच्चों को बुला लूंगा। सालभर गुजरने के बावजूद मामा ने उन्हें बुलाने की कोई कोशिश नहीं की। जब कभी परिवार इस बारे में पूछता तो वे कोई और बात शुरू कर देते थे। इस बीच, भांजे ने अपनी नौकरी लगवाने के लिए कई बार आग्रह किया, लेकिन मामा का एक ही जवाब होता था- 'अब यहां वह बात नहीं रही, धंधा मंदा चल रहा है, बड़ी मुश्किल से गुजारा हो रहा है।' एक दिन मामी और भांजे ने योजना बनाई। वे अचानक वहां पहुंच गए तो पता चला कि मामा एक महिला के साथ सहजीवन संबंध में रह रहे थे और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उसी पर उड़ा रहे थे। फिर तो भारी हंगामा और रोना-धोना हुआ। वह व्यक्ति बड़ी मुश्किल से स्वदेश लौटा। ऐसी घटना किसी और के साथ न हो, इसके लिए परिवार में खुलकर बात करें और इस विकृति से कोसों दूर रहें।

