वांगचुक भूखे रहे, 'क्रांतिवीरों' ने पकवान उड़ाए
सोनम वांगचुक कभी सीजेपी की आंखों के तारे थे
अब इल्ज़ामों के तीखे तीर झेल रहे हैं
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने जब से अपना अनशन खत्म किया है, उन पर उलाहनों की बौछार हो रही है। वे कल तक कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की आंखों के तारे थे। अब इल्ज़ामों के तीखे तीर झेल रहे हैं। लद्दाख का एक व्यक्ति दिल्ली की गर्मी में 26 दिनों तक भूखा बैठा रहा, लेकिन सीजेपी के समर्थक सोशल मीडिया पर टिप्पणियां कर रहे हैं कि 'वांगचुक को अपना अनशन लंबा खींचना चाहिए था, ताकि केंद्र सरकार पर और दबाव पड़ता, कुछ और मंत्रियों के इस्तीफे होते।' यह सुझाव देने वाले खुद तो जंतर-मंतर पर पिज्जा, बर्गर, पास्ता, समोसे, नूडल्स, मोमोज, सैंडविच, डोसा, छोले-भटूरे और कई पकवानों पर हाथ साफ कर रहे थे, लेकिन वांगचुक को भूखा रखना चाहते थे, ताकि देश में राजनीतिक अस्थिरता फैले। यह कैसी सोच है, जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किसी के जीवन की परवाह नहीं करती है? आज देश में बहुत लोग यह कहते हुए दिल्ली पुलिस की निंदा कर रहे हैं कि वह वांगचुक को उठाकर अस्पताल ले गई थी, इसलिए प्रदर्शनकारी भड़के और वे संसद भवन की ओर चल पड़े थे। सोचिए, अगर दिल्ली पुलिस उन्हें अस्पताल न ले जाती तो क्या होता? वांगचुक खुद एक वीडियो में स्वीकार कर चुके हैं कि अनशन की वजह से उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है। अगर सोनम वांगचुक धरना स्थल पर ही रहते तो उनकी तबीयत बिगड़ती और प्राणों पर बहुत बड़ा संकट मंडराता। उस स्थिति में सीजेपी के कथित क्रांतिवीर और उन्हें पर्दे के पीछे से समर्थन दे रहे संगठन हंगामा खड़ा करते कि देश की राजधानी में एक इन्सान ने भूख से तड़पकर दम तोड़ दिया।
उससे कानून व्यवस्था का कितना बड़ा संकट पैदा होता? आज जो 'क्रांतिवीर' कह रहे हैं कि 'वांगचुक को अनशन तोड़ने में इतनी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी, मंत्री के हाथ से गिलास लेने की जरूरत नहीं थी, शर्तों में स्पष्टता के लिए कुछ दिन और इंतजार करना चाहिए था', वे उनके नाम पर अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने के चक्कर में थे। चूंकि ऐसे मामलों में सहानुभूति की लहर चलती है, इसलिए जो व्यक्ति उस नाम का सहारा लेकर चुनावी मैदान में कूदता है, उसे फायदा मिलने की संभावना काफी ज्यादा होती है। वांगचुक अभी स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त कर रहे हैं। उन्हें पहले जैसी स्थिति तक पहुंचने में कई दिन लग सकते हैं। वहीं, सीजेपी के 'नौनिहाल' क्या कर रहे हैं? एक आलीशान होटल में जश्न मनाते हुए उनका वीडियो वायरल हुआ है! दूसरों से आदर्श, नैतिकता, संयम, सदाचार और तपस्या की उम्मीद करने वाले खुद मौज उड़ा रहे हैं! ये न जरा-सी भूख बर्दाश्त कर सकते हैं, न प्यास झेल सकते हैं, न पार्टी करने का मौका गंवा सकते हैं! हां, इनके लिए कोई और भूखा रह जाए, कोई और प्यासा रह जाए, वह इन्हें खुशी-खुशी कबूल है। अनशन तोड़ने के बाद सोनम वांगचुक बहुत दु:खी नजर आए थे, क्योंकि प्रदर्शनकारियों की ओर से उन पर दबाव डाला जा रहा था। क्या अनशन कोई सजावटी सामान है, जिसके लिए फ़रमाइश की जाए कि ऐसा नहीं, वैसा होना चाहिए? वांगचुक भी इसे महसूस कर रहे हैं। अगर न करते तो ऐसा कभी नहीं कहते कि 'अपने भाइयों, बहनों और छात्रों के लिए 26 दिन भूखा रहने के बाद, जिसमें मेरा 11 किलो शरीर खत्म हो चुका है, मसल्स चले गए हैं ... दिल्ली की तपती धूप में यह सब करने के बाद क्या मुझे किसी से चरित्र प्रमाण पत्र लेना होगा कि मेरा अनशन कितना पवित्र था? मैंने तोड़ा तो किसके हाथों तोड़ा? उसके हाथों क्यों तोड़ा? इसके हाथों क्यों नहीं तोड़ा? क्या सौदा हुआ? यह सब मुझे जवाब देना होगा?' ऐसा प्रतीत होता है कि वांगचुक का भी अन्ना की तरह इस्तेमाल किया गया है।

