क्यों टूट रहीं तृणकां और शिवसेना (उबाठा)?
उद्धव ठाकरे ने पिछली घटना से कोई सबक नहीं सीखा!
इसमें अन्य पार्टियों के लिए गहरे सबक हैं
तृणमूल कांग्रेस के बाद शिवसेना (उबाठा) में बगावत ने इन दोनों पार्टियों में भारी असंतोष को उजागर कर दिया है। कहां तो इन पार्टियों के नेतृत्व भाजपा को पछाड़ देने की कसमें खाया करते थे, लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि अब अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं! शिवसेना जून 2022 में ऐतिहासिक टूट का सामना कर चुकी है। ऐसा प्रतीत होता है कि उद्धव ठाकरे ने उस घटना से कोई सबक नहीं सीखा। वे पार्टी को अपने पिता जैसा नेतृत्व नहीं दे पाए। अपने आस-पास ऐसे नेताओं का जमावड़ा कर लिया, जो जमीनी राजनीति पर कम पकड़ रखते हैं और सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। जो लोकसभा सांसद उनकी पार्टी के चिह्न पर चुनाव जीतकर आए, वे ही उनका साथ छोड़कर जा रहे हैं! संजय राउत ने उन सांसदों के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया, वह एक वरिष्ठ नेता को बिल्कुल भी शोभा नहीं देता है। ये राज्यसभा सांसद आखिर क्या साबित करना चाहते हैं? एक तरफ ये पार्टी के एकजुट होने का दावा करते हैं, दूसरी तरफ अपने ही सांसदों को संबोधित करते हुए मर्यादा भूल जाते हैं! इससे स्पष्ट होता है कि पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। शिवसेना (उबाठा) के नेतृत्व के साथ सांसदों का तालमेल नहीं बैठ रहा था। ऐसी स्थिति एक रात में पैदा नहीं होती है। लंबी अवधि तक संवादहीनता, गहरे मतभेद और अविश्वास का मिश्रण किसी पार्टी को इस मुकाम पर लाकर छोड़ता है। इसमें अन्य पार्टियों के लिए गहरे सबक हैं। असंतुष्ट नेता हर पार्टी में होते हैं। वे मौका देखकर अपना असली चेहरा दिखाते हैं। जब तक कोई पार्टी चुनाव जीतती रहती है, नेतृत्व की लोकप्रियता बरकरार रहती है, तब तक असंतुष्ट नेताओं के तेवर ढीले रहते हैं। जैसे ही पार्टी का प्रदर्शन कमजोर होने लगता है या चुनावी शिकस्त हो जाती है, नेतृत्व की स्थिति कमजोर पड़ जाती है, तब असंतुष्ट नेता अपनी आवाज बुलंद करते हैं। फिर, उन पर काबू पाना आसान नहीं रहता है।
तृणकां के साथ भी यही हुआ। हालांकि इसका मामला थोड़ा अलग है। जब तक ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं, उनकी खूब जय-जयकार हुई। अब हालात बिल्कुल उलट हैं। पार्टी के कई विधायक, सांसद और कार्यकर्ता ही नहीं, आम लोग भी खासे नाराज हैं। यह नाराजगी ममता बनर्जी से कहीं ज्यादा अभिषेक बनर्जी के साथ है। उन्हें तृणकां में वरिष्ठ पद विरासत में मिला, ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। वहीं, पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ उनके बर्ताव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। तृणकां से जुड़े कई जनप्रतिनिधियों ने सत्ता का खूब दुरुपयोग किया था। जो बंगाल कभी साहित्य, संस्कृति, कला और दर्शन के लिए जाना जाता था, वहां 'कटमनी कल्चर' ने जड़ें जमा ली थीं। लोगों को अपने जायज कामों के लिए भी तृणकां नेताओं को रुपए देने पड़ते थे। इससे आम जनता त्रस्त थी। लोगों के बीच यह सोच गहरी होती गई कि तृणकां नेतृत्व के आशीर्वाद के बिना इतनी गड़बड़ नहीं हो सकती। आज जब तृणकां के सांसद बगावत कर रहे हैं तो इसे सिर्फ असंतोष की अभिव्यक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए। वास्तव में, ये खुद को तृणकां के उस अतीत से भी दूर करना चाहते हैं। अगर ये तृणकां में रहेंगे तो जनता इनसे उन पुराने कारनामों के बारे में सवाल करेगी। चूंकि उस समय तृणकां सत्ता में थी, पार्टी पर ममता और अभिषेक की पकड़ मजबूत थी, इसलिए कोई तृणकां नेता चाह कर भी इनका विरोध नहीं कर सकता था। अब पार्टी सत्ता में नहीं है। ममता बनर्जी का सियासी करिश्मा खत्म हो चुका है। वे अपनी सीट तक नहीं बचा पाईं। अभिषेक बनर्जी में वह संघर्षशील नेता नजर नहीं आता, जो जमीन पर उतरे और सबको साथ लेकर चले। इसलिए तृणकां टूट रही है। यह कहां तक टूटेगी? इसका जवाब ममता और अभिषेक बनर्जी भी नहीं जानते होंगे!

