कौन बदलेगा शिक्षा प्रणाली?
इसमें सुधार की जरूरत है
यहां दशकों पुराना ढर्रा चल रहा है
वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने देश की शिक्षा प्रणाली की प्रासंगिकता पर जो सवाल उठाए हैं, वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। उनके इन शब्दों से ज्यादातर लोग सहमत होंगे कि भारत की शिक्षा प्रणाली अपने बच्चों पर दबाव डालती है, उन्हें तनाव देती है। बेशक इसमें सुधार की जरूरत है। अब राहुल गांधी से एक सवाल है- देश में यह शिक्षा प्रणाली लागू किसने की थी? आप ही की पार्टी की सरकारें थीं, जो देश में ऐसी शिक्षा प्रणाली लेकर आईं और उसे आगे बढ़ाती रहीं। आज देश में इतनी बेरोजगारी है तो इसकी जिम्मेदारी हर उस राजनीतिक पार्टी को लेनी होगी, जो कभी न कभी सत्ता में रही है। भारत से जो लोग फिनलैंड, सिंगापुर, जापान, कनाडा, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में जाकर वहां की शिक्षा प्रणाली के बारे में बताते हैं तो आश्चर्य होता है। वहां बच्चे बहुत अच्छे माहौल में खेलकूद के साथ पढ़ाई करते हैं। हमारे देश में पाठ्यक्रम कई बार बदला, लेकिन तौर-तरीके नहीं बदले। यहां दशकों पुराना ढर्रा चल रहा है। किताबों की शैली अरुचिकर है। बच्चा उन किताबों को देखकर घबराता है। उसकी घबराहट उस समय और बढ़ जाती है, जब उससे कहा जाता है कि 'पढ़ ले, वरना बेरोजगार घूमेगा'। वह खूब पढ़ता है। इसके लिए रात-रातभर जागता है। फिर भी बेरोजगार रहता है। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि हमारी शिक्षा प्रणाली के साथ कुछ बड़ी समस्याएं हैं? जो नौजवान अपनी ज़िंदगी के सात-आठ साल सरकारी नौकरी की तैयारी में लगाने के बावजूद खाली हाथ रह जाता है, उसकी तकलीफ शब्दों में बयान नहीं की जा सकती है। इसमें उसका क्या दोष है? जो सत्ता में भागीदार रहे हैं, जिनके पास शिक्षा प्रणाली का निर्माण करने की शक्ति रही है, उनसे यह सवाल पूछा जाएगा।
हाल के वर्षों में चीन ने कई पाठ्यक्रम हटाए हैं। उसका तर्क है कि ये बाजार मांग के लिए प्रासंगिक नहीं हैं। उन पाठ्यक्रमों को लागू किया जा रहा है, जो युवाओं को रोजगार के लायक बनाते हैं। क्या हम भारत में ऐसा नहीं कर सकते? यहां कई परीक्षाओं में विचित्र सवाल पूछे जाते हैं। एक परीक्षा में 20 साल पुराने ऑस्कर पुरस्कार विजेता के बारे में पूछा गया! एक अन्य परीक्षा में घड़ी की सुइयों और पानी में उनकी परछाई के बारे में पूछा गया! अभ्यर्थी ऐसे सवालों के लिए कई-कई घंटे कोचिंग में बिताते हैं, मोटी-मोटी पोथियां रटते हैं। इनसे उन्हें अपने जीवन में कितना फायदा होगा? गणित की किताब में 'साझा' संबंधी एक अध्याय दिया जाता है। जब दो या दो से ज्यादा लोग साझेदारी में व्यापार करते हैं तो उनमें लाभ-हानि का बंटवारा कैसे किया जाए - यह उस अध्याय में सिखाया जाता है। विडंबना देखिए, उस अध्याय को समझकर भी बच्चा व्यापार करना नहीं सीख सकता! जब व्यापार करना ही नहीं आएगा तो साझेदारी कहां से होगी? पहले व्यापार करना सिखाइए। उसके बाद साझेदारी की बात कीजिए। भारत के स्कूलों में दशकों से एक प्रार्थनापत्र खूब लिखवाया गया- 'आपके पिताजी एक गरीब आदमी हैं। वे आपकी स्कूल फीस नहीं दे सकते, इसलिए प्रधानाध्यापक से विनती कीजिए कि मेरी स्कूल फीस माफ कर दें।' हाल में पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी ऐसा मुद्दा उठाया था। क्या यह प्रार्थनापत्र बच्चों के मन में हीनभावना भरने की कोशिश नहीं है? अगर किसी बच्चे के पिता सच में गरीब हैं तो उसके मन पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या किसी शिक्षा विशेषज्ञ ने उस बच्चे के बारे में सोचा है? ऐसा प्रार्थनापत्र लिखवाने की नौबत ही नहीं आनी चाहिए। जरूरतमंद बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुफ्त होनी चाहिए। शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए, जो बच्चों को देशभक्त, अनुशासित नागरिक और अच्छा इन्सान बनाए। साथ ही, उन्हें इतना काबिल भी बनाए कि रोजगार के लिए दूसरों के सामने हाथ न फैलाना पड़े। क्या राहुल गांधी कांग्रेस-शासित राज्यों में ऐसी शिक्षा प्रणाली लागू करके दिखाएंगे?

