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संपादकीय

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लोकतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों की राह में तर्कहीन आस्था को अवरोध नहीं बनना चाहिए ताकि समता आधारित प्रगतिशील समाज की स्थापना के प्रयास आगे बढ़ सकें। मसला रामपाल या आसाराम का नहीं बल्कि आस्था के नाम पर उस अराजक प्रवृत्ति से जुड़ा है, जो तर्कसंगत संवैधानिक न्याय व्यवस्था से मुंह चुराती है। चूंकि कानून ठोस तर्कों के आधार पर अपना काम करता है तो हरियाणा के हिसार जिले में बरवाला स्थित सतलोक आश्रम का माहौल उन्मादी हो गया है। यह तो होना ही था। आस्था और तर्क एक-दूसरे के घोर विरोधी हैं। भारत के आम जनजीवन में वैज्ञानिक सोच की कमी से स्थिति बदतर हो चुकी है। खुद को कानून से बड़ा मानने वाले शख्स के प्रति भी लोग आस्थावान और समर्पित हो सकते हैं, यह देखना किसी को अच्छा नहीं लग सकता है। धर्मभीरू समाज में धर्म का स्वरूप तभी सहज और स्वीकार्य होता है जब तक वह आस्था के रूप में रहे। जब आस्था उन्माद बन जाती है तो धर्म-अधर्म का घालमेल हो जाता है जो किसी के लिए सुखद नहीं होता। तब बल प्रयोग ही अंतिम विकल्प बचता है। संत रामपाल को पेश करने के हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना के लिए अनेक श्रद्घालु उन्मादी हो गए और पुलिस व प्रशासन आदेश को तामील करवाने को मजबूर। परिणाम जो रहा वह सबके सामने है। किसी धार्मिक आश्रम में आत्मघाती और गुरिल्ला युद्ध जैसी मोर्चेबंदी का ऐसा नजारा शायद ही कभी देखा गया हो। रामपाल की मोर्चेबंदी कितनी तगड़ी है, यह इसी से समझा जा सकता है कि पुलिस आश्रम के भीतर कथित लड़ाकू बाबा तक बुधवार दोपहर तक भी नहीं पहुंच सकी है। कई बार उसे अपना ऑपरेशन रोकना पड़ा है, ताकि आश्रम के अंदर मौजूद स्वेच्छा से या बंधक बनाकर रखी गई महिलाओं और बच्चों को बेवजह नुकसान न पहुंचे।
सवाल यह है कि सरकार व स्थानीय प्रशासन ने हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने में इतनी ढिलाई क्यों बरती? आज करेंगे, कल करेंगे के चक्कर में सतलोक आश्रम में अनुयायियों की संख्या 500 से 50 हजार होने की मोहलत क्यों दी गई? इससे साबित तो यह भी हो रहा है कि सरकार के स्तर पर गंभीर चिंतन, मंथन नहीं किया गया और न ही प्रशासनिक मुस्तैदी दिखाई गई। पुलिस की एक और खामी सामने आई है कि विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए उसे मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। वह श्रद्धालुओं को नियंत्रित कैसे कर पाती? आश्रम को युद्ध का मैदान बनने से वह नहीं रोक सकी तो इसके लिए प्रशिक्षण की अपरिपक्वता ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है। वैसे, इस पर विचार करने का वक्त भी अब काफी कम बचा है क्योंकि रामपाल के आश्रम में हुए घटनाक्रम को देखते हुए यह लगने लगा है कि आस्था के नाम पर अधार्मिकता समाज पर हावी होती जा रही है। असंत प्रवृत्ति के चंद लोग बेईमानी को बढावा दे रहे हैं। उनकी वकालत करनेवाले सबके सामने आकर अपने आका को कानून से ऊंचा बता रहे हैं। ऐसी मानसिकता से निपटने के लिए किसी भी पुलिस को कितना भी प्रशिक्षित कर दिया जाए, उसका फायदा नहीं होगा। जब तक समाज खुद ही पर्याप्त जागरूक और शिक्षित नहीं होगा, तब तक धर्माचरण बढने की कल्पना नहीं की जा सकेगी। सिर्फ अंधविश्‍वास के घेरे में घिरा आम आदमी अपनी छोटी-छोटी समस्याओं से घबराकर रामपाल जैसे लोगों पर अपनी आस्था न्यौछावर कर रहे हैं तो यह सरकार की असफलता भी कही जाएगी। भारत में सत्ता की राजनीति का स्वरूप अब इतना विकृत हो चुका है कि पार्टियां चुनावों में विभिन्न समुदायों का समर्थन पाने के लिए उनके धर्मगुरुओं के आशीर्वाद प्राप्त करने में जुट जाती हैं। लोग समझते हैं कि बाबा लोगों की पहुंच बड़ी होती हैऔर यही सोच उन्हें व्यक्तिगत फायदे के लालच में असंतों के जाल में फंसाती है। रामपाल के प्रकरण में यह तथ्य भी विचार करने योग्य है।

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भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने वैश्‍विक मीडिया पर अपना जो जादू चलाया है, वह इंग्लैंड के मशहूर समाचार पत्र द गार्जियन की इस टिप्पणी से स्पष्ट होता है, कभी अपने ही देश में बहिष्कृत रहे नरेंद्र मोदी 14 नवंबर को जी-20 शिखर सम्मेलन में राजनीतिक रॉक स्टार की तरह पहुंचे। सबसे बड़े लोकतंत्र के नए प्रधानमंत्री के रूप में इस 64 वर्षीय व्यक्ति में कुछ ऐसी बात है, जिसकी दूसरे नेतागण सप्ताह भर कामना करते रहे। द गार्जियन को यह भी दिखा कि इस शिखर वार्ता के दौरान दुनिया भर के निवेशकों के बीच भी मोदी सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता रहे। जिस प्रकार से वह लगातार भारत के प्रति दुनिया भर के पूंजी निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास करते रहे हैं, यह उसका एक बड़ा नतीजा माना जा सकता है। जी-20 से पहले भी मोदी अमेरिका और अन्य देशों में लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं। वाकई पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री को मिलने वाला सबसे बड़ा मीडिया समर्थन माना जा सकता है। पंडित नेहरू के मामले में वैश्‍विक नेता के रूप में उनका ऊंचा कद, उनकी बौद्धिक छवि और एक जन पक्षधर नेता के रूप में उनकी निजी लोकप्रियता जैसे कारकों की अहम भूमिका हुआ करती थी। मोदी के पास फिलहाल इनमें से कुछ भी नहीं है। वैश्‍विक नेता के तौर पर उनकी छवि अभी तराशने की कोशिश की जा रही है। उनकी अपनी कोई बहुत बड़ी वैचारिक पहचान भी नहीं है। उनकी खासियत यह है कि अनिवासी भारतवंशियों के साथ संवाद बना पाने में वह अत्यधिक सफल रहे हैं। इसका उन्हें भरपूर कूटनीतिक लाभ मिल रहा है। विरोधियों की दलील है कि यह समर्थन खुद-ब-खुद नहीं मिल रहा है। मोदी के ऐसे स्वागत के पीछे मुख्य भूमिका संघ परिवार से जुड़े संगठनों की महीनों की मेहनत और अच्छे-खासे खर्चे की है। अगर यह सच भी है तो इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। विदेशों में भारतीयों को एकजुट करने की रणनीतिक अहमियत समझी जानी चाहिए।
दरअसल, महत्वपूर्ण यह है कि मोदी का भूटान, नेपाल, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के दौरों पर बेहद शानदार स्वागत हुआ है। उन्होंने इन सभी देशों में भारत की छवि सुधारने की कोशिश की है। वह जहां भी भारत के विश्‍व गुरु बनने का सपना साकार करने की बात करते हैं, लोग उनका जोरदार तालियों से समर्थन करते हैं। पहली बार उन्होंने दुनिया भर में बसे हिंदुस्तानी समुदाय को एक सक्रिय, संगठित भारतीय पहचान देने का प्रयास किया है। यह प्रयास भारतीय विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है। विदेशों में बसे भारतीय अपने अपनाए गए देश में हर प्रकार से भारत के साथ खड़े होने की अपनी क्षमता साबित कर चुके हैं। वह विदेश में रह तो जरूर रहे हैं लेकिन उन्होंने अपने जीवन भर के प्रयासों से उस देश में अपनी ताकत बढाई है। अमेरिका में भारत समर्थक लॉबी भारत के लिए क्या उपलब्धियां हासिल कर सकती है, यह पूर्व में कई बार देखने को मिल चुका है। वहीं, भारत सरकार की तरफ से प्रवासी भारतीयों को उनके नए देश में सशक्त करने के लिए काफी कुछ किया जाता रहा है। अब ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश में भी इन लोगों के पैरों के नीचे की जमीन पुख्ता हो तो यह भारत के लिए बेहतर संभावनाएं विकसित करने में मददगार होगा। यह बात नरेंद्र मोदी भली-भांति जानते हैं। उनका राज्य गुजरात भारत के ऐसे राज्यों में से एक है, जहां के अधिकतम व्यापारी और तकनीकी कर्मचारी विकसित देशों में जाकर बसे हुए हैं। इन्हीं प्रवासियों की मदद से नरेंद्र मोदी की सभाएं आयोजित की जाती रही हैं। पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद विदेशों में मोदी की तूती बोलने के तथ्य को झुठलाने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन मोदी ने प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद काफी कम समय में खुर्शीद से अधिक विश्‍वसनीयता हासिल कर ली है। यह बात विरोध के लिए विरोध की मानसिकता रखने वाले राजनेताओं को अब जज्ब कर लेनी चाहिए। क्योंकि मोदी की छवि से भारत की छवि जुड़ रही है।

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भारतीय जनता पार्टी ने इस वर्ष संसदीय चुनाव के प्रचार अभियान में कालेधन के मुद्दे को काफी गर्मा दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई बार दावा किया है कि उनकी सरकार कालाधन भारत वापस लेकर आएगी और इस मामले में वह खुद काफी गंभीर हैं। जी-20 समूह की शिखर वार्ता में मोदी ने इस मुद्दे को उठाकर फिर से अपनी गंभीरता साबित कर दी है। शिखर सम्मेलन में यह मुद्दा उठने से माहौल गरमा गया है। अब देखने वाली बात यह होगी कि मोदी द्वारा उठाए गए काले धन के मुद्दे पर जी-20 देश किस तरह का रुख अपनाते हैं? इस समूह की दिशा और दशा अमेरिकी निर्देशन से ही तय होगी। तब यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि क्या मोदी कालेधन के मसले पर अमेरिकी रीति-नीति को चुनौती दे पाएंगे? जी-20 में काले धन को वापस लाने और करारोपण से जुड़ी संधियों को लेकर कोई नया प्रस्ताव पास होता है य ासर्वसम्मति बनती है, तो बतौर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुत बड़ी जीत होगी। काले धन का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाते हुए मोदी ने 20 औद्योगिक एवं प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों से इस चुनौती से निपटने के लिए वैश्‍विक समन्वय का आह्वान किया है। दूसरा बड़ा सवाल यह है कि कालेधन को लेकर अमेरिका निर्देशित आर्थिक उदारवाद और सुधारवाद की नीतियां कितनी और कहां तक इसकी इजाजत देती हैं? काले धन की समस्या सिर्फ भारत की ही नहीं वरन जी 20 में शामिल देशों सहित अन्य देशों की भी है। मोदी ने कालेधन की समस्या से निपटने के लिए सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान के नए वैश्‍विक मानकों पर शिखर नेताओं से खुलकर समर्थन मांगा था। मोदी ने इस समस्या से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए दुनिया के देशों के बीच नजदीकी समन्वय का आह्वान किया और कहा कि कर संबंधी सूचनाओं के स्वत: आदान प्रदान के नए वैश्‍विक मानक विदेशों में जमा कालेधन के बारे में जानकारी हासिल करने और उसे वापस लाने में कारगर होंगे। बहरहाल सम्मेलन में कर नीति और प्रशासन के मामले में सूचना साझा करने व आपसी सहायता को आसान बनाने वाले सभी कदमों के प्रति भारत का समर्थन जताया गया है। यह बात समझनी चाहिए कि काला धन पूंजीवाद का ही एक विकार है। काले धन की वापसी को लेकर प्रधानमंत्री कुछ भी कहते रहें, पर सच्चाई कुछ और ही है। काले धन पर मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और रीति-नीतियों का फर्क सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे के रूप में सामने आ चुका है। सियासी बोल वचनों के निहितार्थ को गंभीरता से समझना चाहिए। मोदी की यह बात अपनी जगह सही है कि काले धन का दुरुपयोग काले कारोबारों में होता है। यह बात सभी देश जानते और समझते हैं। दुनिया में खौफ और दहशत का कारोबार काले धन की बुनियाद पर फल-फूल रहा है। इस वक्त आतंकवाद से अमेरिका, भारत सहित लगभग पूरी दुनिया त्रस्त है। विश्‍व शांति और विकास की दृष्टि से जी 20 समूह को ठोस रणनीति बनानी चाहिए। पर, यह सब इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि काले धन के मालिकों की हनक से सरकारें उनके मुनाफे की नीतियां बनाती आई हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में कारपोरेट घरानों का सरकारों के कामकाज पर किस हद तक दखल होता है, यह किसी से छुपा नहीं है।
भारत सरकार के कर आधार में कमी और मुनाफे के स्थानांतरण के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा कर अदायगी से बचने की रणनीति अपनाई जाती है, जिससे संबंधित देशों के कर राजस्व पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसके तहत कंपनियां कर नियमों में खामी का फायदा उठाते हुए अपने लाभ को ऐसे देशों में स्थानातंरित करती हैं, जहां उन्हें कम या फिर बिल्कुल टैक्स नहीं देना पड़ता है। इससे उन देशों पर काफी असर पड़ता है, जो बहुत हद तक कंपनी टैक्स पर निर्भर हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा है कि पूंजी और प्रौद्योगिकी का आवागमन बढ़ने से कर चोरी और लाभ स्थानांतरण के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब हुए हैं।

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चार वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में स्थित माछिल में गोलियों से छलनी किए गए तीन नागरिकों को न्याय मिल गया है। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को अंजाम देने वाले सात सैन्यकर्मियों को उम्र कैद सुना दी गई है। इनके कोर्ट मार्शल के बाद इन सबको यह कठिन सजा सुनाई गई है। यह फैसला सेना के रुख में आए बदलाव का एक स्पष्ट संकेत देता है। सेना पिछले दिनों श्रीनगर में एक कार में सवार पांच युवकों पर गोली चलाने को भी अपनी गलती मान चुकी है। इस घटना में दो युवकों की मौत हो गई थी। जिस घटना की बाबत सैन्य अदालत का फैसला आया है वह अप्रैल 2010 में घटी थी। सेना ने तब दावा किया था कि उसने नियंत्रण रेखाा के पास माछिल सेक्टर में तीन घुसपैठियों को मार गिराया, जो पाकिस्तानी आतंकवादी थे। इस दावे पर फौरन सवाल उठने लगे। मारे गए लोगों के परिजनों का कहना था कि इन युवकों को धन और नौकरी का लालच देकर फौजी नियंत्रण रेखा के पास ले गए और फिर उन्हें मार डाला। फिर पुलिस की जांच से भी यही बात सामने आई कि मारे गए युवक राज्य के निवासी थे, न कि घुसपैठिए। इस बारे में सेना का दावा गलत पाया गया। पुलिस की जांच के आधार पर सामान्य अदालत में मुकदमा शुरू हुआ। फिर बाद में मामला सैन्य अदालत में चला गया। 14 वर्ष पहले के पथरीबल कांड को लेकर सेना के रवैए को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही थी कि माछिल मामले में भी शायद आरोपी बच निकलेंगे। इस अंदेशे को तब और बल मिला था जब पुलिस की जांच में सामने आए तथ्यों और सामान्य अदालत में दायर आरोपपत्र को नजरअंदाज करते हुए सेना ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं हैं। अगर सेना तब जो कह रही थी वह सही था, तो सैन्य अदालत ने आरोपियों को दोषी कैसे ठहराया? साफ है कि देर से ही सही, सेना को अपनी गलती का अहसास हुआ। यह बेहद दुखद है कि सेना को कोर्ट मार्शल और मामले को तर्कसंगत परिणति तक ले जाने की जरूरत महीनों घाटी में चले विरोध-प्रदर्शनों के बाद महसूस हुई। इन प्रदर्शनों के दौरान पांच महीनों के भीतर सीआरपीएफ की फायरिंग में 120 लोग मारे गए हैं। बहरहाल, सैन्य अदालत का फैसला उन फौजियों के लिए कड़ा संदेश है जो सोचते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं और वह चाहें कुछ भी करें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। ऐसे ही लोगों की वजह से सेना की साख को चोट पहुंचती है।
फैसले का कुछ सबक सरकार और समूचे सैन्यतंत्र के लिए भी है। रिहाइशी इलाकों में सेना की तैनाती नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कानून-व्यवस्था संभालना उसका काम नहीं है। अगर किन्हीं विशेष परिस्थितियों में कहीं सेना तैनात करनी पड़े, तो इस ड्यूटी की बाबत सैनिकों के प्रशिक्षण और उन पर निगरानी रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। कई मामलों की जांच यह बता चुकी है कि फर्जी मुठभेड़ के पीछे अपने को कानून से ऊपर समझने की मानसिकता के अलावा पदोन्नति और इनाम का लालच भी काम करता है। इसलिए पुरस्कृत करने से पहले मुठभेड़ के दावे की निष्पक्ष जांच का प्रावधान किया जाए। सर्वोच्च अदालत भी एक मामले की सुनवाई करते हुए यह हिदायत दे चुकी है। सैन्य अदालत का ताजा फैसला भले अपूर्व हो, पर माछिल जैसे और भी वाकये देश में हुए हैं, घाटी में भी और पूर्वोत्तर में भी। इसीलिए सशस्त्र बल विशेषाधिकार जैसे उस कानून पर भी पुनर्विचार करने की जरूरत है जो सुरक्षा बलों को, चाहे वे कुछ भी करें, दंडमुक्ति का आश्‍वासन देता है। यह अच्छी बात है कि इस कानून के बावजूद इस मामले में सजा सुनाई जा सकी। क्या सेना अपना यह रुख बनाए रखेगी? सेना की ईमानदारी पर शक की कोई जरूरत तो नहीं है लेकिन जिस प्रकार माछिल मुठभेड़ पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रतिक्रिया दी, उससे वहां के माहौल का स्पष्ट अंदाजा मिल गया है।

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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी की पुरानी दोस्त शिवसेना एक के बाद एक राजनीतिक गलतियां करती गई, अवसरवादिता के नुस्खे आजमाती गई। आखिरकार राज्य की सत्ता में भाजपा की राह साफ हो गई। बुधवार को विधानसभा में भाजपा सरकार ने महत्वपूर्ण विश्‍वासमत हासिल कर लिया। साथ ही शिवसेना अपने अब तक के राजनीतिक सफर की सबसे तेज ढलान पर आ गई, जहां से राज्य की राजनीति में खुद को दोबारा स्थापित करने के लिए इसे काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। वहीं, जिस तरह से विधानसभा चुनाव से पहले और उसके बाद शिवसेना के सुप्रीमो उद्घव ठाकरे गलत-सही निर्णयों में फर्क करने में विफल होते दिखे, उससे यह उम्मीद कम ही बंधती है कि शिवसेना को महाराष्ट्र में फिर से नई थाती दिलाने में वह कामयाब हो सकेंगे। क्या इसे राज्य में शिवसेना के खात्मे की तरफ उठने वाला पहला कदम माना जाना चाहिए? इस बात का उत्तर तो विधानसभा में विपक्षी दल के रूप में उसके प्रदर्शन को देखकर ही दिया जा सकेगा लेकिन शिवसेना ने देवेंद्र फड़नवीस की अगुवाई वाली भाजपा सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की तो उसे लेने के देने पड़ सकते हैं। कहा यह जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में शिवसेना नेता सुरेश प्रभु को भाजपा की सदस्यता देकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के बाद से शिवसेना के लगभग दो दर्जन विधायक भाजपा में शामिल होने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इस वर्ष संसदीय चुनाव के बाद से भाजपा की चुनावी गाड़ी जिस रफ्तार के साथ आगे बढती जा रही है, उसे देखते हुए उद्घव ठाकरे को आने वाले समय में पार्टी को एकजुट रखने में भी पसीना आ सकता है। वह काफी दिशाहीन भी नजर आ रहे हैं। अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक रहे बाल ठाकरे की तरह उद्घव ने अब तक न तो संगठनात्मक दक्षता दर्शाई है और न ही राजनीतिक समझ। वह चुनावी रैलियों में अपने घुटनों के बल बैठकर मतदाताओं का समर्थन मांगते दिखे लेकिन मतदाता नहीं पसीजे। निश्‍चित रूप से उद्घव के सामने इस प्रकार की चुनौती पहले कभी नहीं आई थी। वह स्थानीय नगरीय निकायों के चुनावों में सफलता के मंत्र और सूत्र तो जानते हैं लेकिन राज्य स्तर की राजनीति को समझने में विफल रहे हैं। वह संसदीय चुनाव के बाद एक तरफ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को राजनीति में नैतिकता का पाठ पढाते दिख रहे थे तो दूसरे हाथ में भाजपा के साथ पुरानी दोस्ती भूलकर राजनीतिक फायदे की सौदेबाजी भी कर रहे थे। हो सकता था कि लोग इसकी अनदेखी भी कर देते लेकिन भाजपा की रणनीति के सामने उद्घव बौने साबित हुए और यह तो दस्तूर है कि लोग जीतने वालों को ही पसंद किया करते हैं।
जो भी हो, यह संभावना अब तक बनी हुई है कि अगर विधानसभा में प्रमुख विपक्ष के तौर पर शिवसेना आम जनता से जुड़े मुद्दों पर सरोकार दिखाती है तो उसकी राजनीतिक जमीन आने वाले दिनों में कुछ पुख्ता हो सकती है। वहीं, वर्ष 2009 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों को याद करें तो उस बार से बेहतर स्थिति में शिवसेना नजर नहीं आती। उस चुनाव के बाद बाल ठाकरे ने सेना की हार से चिढकर महाराष्ट्र की जनता से इस बात का उत्तर मांगा था कि जनता ने उनके (बाल ठाकरे के) साथ विश्‍वासघात क्यों किया? स्पष्ट है कि पांच वर्षों में शिवसेना जमीनी स्तर पर ऐसा कुछ नहीं कर सकी है जिससे उसकी राजनीतिक मौजूदगी अधिक पुख्ता होती। वहीं, भाजपा को राकांपा के समर्थन से सत्ता में बने रहने में जो सफलता मिली है, उससे पार्टी राज्य में खुद को अधिक मजबूत करने की स्थिति में आ गई है। इसका फायदा भाजपा को निश्‍चित तौर पर मिलेगा।

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इस वर्ष केंद्र की सत्ता में हुए बदलाव के बाद से भारतीय राजनीति लगातार दिलचस्प होती जा रही है। एक तरफ केंद्र में गठबंधन की सरकार थोंपने वाले क्षेत्रीय क्षत्रप दरकिनार होकर घायल पड़े हैं तो दूसरी तरफ कुछ पार्टियां छोटी-मोटी मोर्चेबंदी की राह चल रही हैं। चूंकि इन्हीं सबके बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार तेज आर्थिक विकास की तैयारी के तहत सभी उचित कदम उठाते नजर आ रहे हैं, इसलिए आम तौर पर नागरिकों का ध्यान मोदी के निर्णयों पर टिका हुआ है। आस-पास की घटनाओं से लोग बहुत अधिक प्रभावित नहीं हो रहे। स्वाभाविक है कि अब तक की कमजोर सरकारों पर दबाव बनाकर अपनी सही-गलत बातें मनवाने वाली छोटी पार्टियां एक प्रकार से राजनीतिक ऑक्सीजन की कमी का सामना कर रही हैं। इससे सबसे अधिक प्रभावित महाराष्ट्र की शिवसेना नजर आ रही है। इसके पास आम तौर पर राष्ट्र स्तर की कोई सोच कभी नहीं रही लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में पैठ बनाने की खातिर वंशानुगत रूप से इसके मुखिया बने उद्घव ठाकरे जो रूप-रंग दिखा रहे हैं, वह अजीबो-गरीब है। अच्छा ही हुआ कि उनकी अनदेखी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार कर ऐसे लोगों को केंद्र में ले आए, जिनके दम-खम से आर्थिक विकास के साथ ही रक्षा व रेल सहित अन्य क्षेत्रों में पारदर्शिता आने की संभावना जताई जा सकती है। विवाद तो कुछ लोगों के बारे में उठ रहे हैं लेकिन अमूमन जो नए लोग आए हैं, उन पर संतोष ही जताया जा सकता है। इनकी छवि ईमानदार और कर्मठ नेताओं की है। इससे केंद्र सरकार के इर्द-गिर्द जो प्रभामंडल बना है, उसे नुकसान पहुंचाने की स्थिति में फिलहाल पूर्ववर्ती सरकार की अगुवाई करनेवाली कांग्रेस या समाजवादी पार्टी (सपा) के सुप्रीमो मुलायम सिंह नहीं हैं। बिहार के विधानसभा चुनाव में भले ही नीतीश कुमार और लालू यादव के गठबंधन ने भाजपा से कुछेक सीटें झटक ली हों लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा का सूरज एक बार फिर से खिल गया। इससे पुराने कथित जनता परिवार में खलबली मच गई। कांग्रेस तो राजनीति के हाशिए से बाहर हो चुकी है लेकिन सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने भाजपा के खिलाफ जनता परिवार का महागठजोड़ बनाने की पहल की। उनके आवास पर सपा, जद-यू, राजद, जद (एस), सजपा व इनेलो नेताओं – मुलायम, शरद यादव, नीतीश, लालू, एचडी देवेगौड़ा, कमल मोरारका और दुष्यंत चौटाला की बैठक हुई। खबरिया चैनलों ने इसे महामोर्चा कहा लेकिन खुद बैठक में शामिल नेताओं ने ऐसा कुछ नहीं कहा। जिस समय पूर्ववर्ती गठबंधन सरकारों की अगर-मगर-लेकिन वाली कमजोरियां भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के निर्णयों से दूर हो रही हैं, उस समय महामोर्चे के बारे में नहीं सोचा जा सकता। सो, बैठक के बाद जनता परिवार का महामोर्चा लोगों के दिमाग से रुखसत हो गया। खुद कांग्रेस ने ही उसकी खिल्ली उड़ाकर जनता परिवार की सोच को खारिज कर दिया है।
अब लोगों को यह विश्‍वास हो रहा है कि बाहरी रुकावटों के बिना काम करना और विकासपरक निर्णय लेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आसान होगा। उम्मीद यह बन रही है कि देश एक बार फिर से आठ प्रतिशत वार्षिक वृद्घि दर हासिल कर सकेगा। नौकरशाही से लेकर मंत्रालयों तक में फेरबदल के बाद अब मोदी प्रशासन संसद के शीत सत्र में तेजी से कदम बढ़ाने को तैयार है। जिन मोर्चों पर तेजी से काम करना है, उनकी समझ बिल्कुल साफ है। साथ ही, कई चीजों पर एक साथ काम हो रहा है। इनसे अर्थव्यवस्था की क्षमता बढ़ेगी। जिन मामलों में तत्काल बड़े बदलाव की जरूरत होगी, वहां सरकार अध्यादेश लाने से नहीं हिचकेगी। संसदीय चुनाव में आम मतदाताओं ने जो शानदार जनादेश दिया है, यह उसका ही सकारात्मक परिणाम है और मोदी इसे पूरी तरह से समझ रहे हैं।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में रविवार को 21 और नए मंत्रियों को शामिल कर लिया गया है और अब कुल मंत्रियों की संख्या 66 हो गई है। जिन्हें मोदी के हर कदम में गलतियां ढूंढने में आनन्द आता है, वे कह रहे हैं कि मोदी ने प्रारंभ में यह कहा था कि वे छोटा मंत्रिमंडल रखना चाहते हैं ताकि ‘मिनिमम गवर्नमेंट और मेक्सिमम गवर्ननेंस’ का सूत्र लागू किया जा सके, वह सूत्र कहां गया? हमें लगता है कि अपने 5 माह के कार्यकाल में शायद उन्होंने यह महसूस किया है कि इतने बड़े देश को, जिस ढंग से वे गतिमान करना चाहते हैं, वह मंत्रियों की संख्या कम करके करना आसान नहीं है। इसलिए मंत्रिमंडल सहयोगियों की संख्या बढ़ाकर भी उन्होंने यही संकेत दिया है कि वे प्रशासनिक व नीतिगत निर्णयों के क्रियान्वयन में तेजी लाना चाहते हैं, इसलिए यह विस्तार और मामूली फेरबदल एक प्रत्याशित कदम है।
इस विस्तार में उन्होंने कई पहलुओं पर एक साथ दृष्टि डाली है। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को अपने मंत्रिमंडल में रक्षामंत्री के रूप में लाकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि इस सरकार पर रक्षा सौदों में घपले-घोटालों के आरोप लगने का वे अवसर ही नहीं देना चाहते। एक ईमानदार और कठोर निर्णय लेने की छवि रखने वाले पर्रिकर को उचित दायित्व दिया गया है। इससे अरुण जेटली का थोड़ा कार्यभार हल्का होगा क्योंकि यह बहुत अहम और बड़ा मंत्रालय है, हालांकि उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय का काम भी अब देखना होगा। रेलमंत्री सदानंद गौड़ा के काम से मोदी संतुष्ट थे या नहीं, यह तो वे ही जानें परन्तु अत्यंत ईमानदार एवं सक्षम नेता की छवि वाले सुरेश प्रभु को रेल मंत्रालय सौंप कर उन्होंने यह जरूर जता दिया है कि उनके मन में रेलवे के क्षेत्र में कितना कुछ करने की योजना है, जिसे सुरेश प्रभु जैसा डायनेमिक शख्स ही साकार कर सकता है। सदानंद गौड़ा अपने प्रदेश में अपने बेटे के विवाद के कारण और पांच माह में अचानक संपत्ति में भारी इजाफा होने से हालांकि विवादों में घिरे थे, फिर भी उन्हें महत्वपूर्ण कानून मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वे सदानंद गौड़ा से नाखुश हैं।
हरियाणा के चौधरी वीरेन्द्र सिंह को कैबिनेट मंत्री बनाकर हरियाणा में भाजपा की भारी विजय के लिए एक उपहार और वहां जाट नेता को मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से गलत धारणा बनने की आशंका को निर्मूल सिद्ध करने का एक प्रयास है। जगत प्रकाश नड्डा का नाम कभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दावेदार के रूप में उभरकर आया था और बाद में अमित शाह को यह दायित्व सौंपा गया था। अब नड्डा को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट रैंक देकर उचित सम्मान दिया गया है। जहां राजस्थान के सांवरलाल जाट को विधानसभा चुनावों में प्रदेश के दिग्गज नेता और कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलेट को हराने का ईनाम दिया गया है वहीं ओलंपिक रजत पदक विजेता राज्यवर्धन सिंह को शामिल कर युवा चेहरों को आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। यूपीए सरकार का कोयला घोटाला उजागर करने वाले हंसराज अहीर को टीम में शामिल कर उनके काम की अहमियत का मूल्यांकन करने का काम किया गया है और वरिष्ठ भाजपा नेता यसवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा को उनकी काबिलियत का भरपूर लाभ देश को मिले, यह सोचकर शामिल किया गया है। पश्‍चिम बंगाल में भाजपा को पैर जमाने हैं तो बाबुल सुप्रियो को टीम में लेकर प्रदेश को संकेत देना जरूरी था। बिहार की जनता का विश्‍वास मजबूत करने के लिए वहां के राजीव प्रताप रूडी और गिरिराज सिंह को मंत्रिमंडल में लिया गया है ताकि आने वाले चुनावों में वहां भाजपा ज्यादा मजबूती के साथ विजयी हो। कुल मिलाकर मोदी ने नेताओं की योग्यता पर ज्यादा गौर किया है भले ही जातीय और प्रादेशिक संतुलन को भी थोड़ी अहमियत दी हो। उनकी सरकार अब और गति पकड़ेगी यह अपेक्षा करनी चाहिए।

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रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडलीय सहयोगियों की संख्या बढने के बाद भी अधिकांशत: चर्चा इस बात पर केंद्रित रही कि क्या वाकई गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर को रक्षा मंत्रालय का प्रभार सौंपा जाएगा? पिछले चार दिनों से मीडिया में यही चर्चा आम है कि पार्रिकर को यह अहम मंत्रालय सौंपा जा सकता है, जिसका काम फिलहाल केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली देख रहे हैं। अगर यह कयास सही साबित हुआ तो अपने पहनावे से लेकर कड़क अंदाज तक पर गर्व करने वाली भारतीय सेना को कई नए अनुभव हो सकते हैं। उसे एक ऐसे मंत्री मिलेंगे, जो किसी भव्य परेड के दौरान सामान्य पहनावे में ही अपने बेलौस अंदाज में मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं या फिर पिछली सीट के बजाय ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठकर गप्पें मारते हुए आगे बढ़ सकते हैं और अचानक ही अपने किसी स्पष्ट दो टूक बयान से हंगामा बरपा सकते हैं। पार्रिकर बहुत औपचारिकताओं में यकीन नहीं करते और न ही वह बहुत कूटनीतिक बातें करते हैं। उम्र को लेकर वह एक बार लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता तक पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। फिर भी, उनकी योग्यता पर संदेह नहीं है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग की पढाई कर चुके मनोहर पार्रिकर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की ताकत और कमजोरियों को अपने किसी भी पूर्ववर्ती रक्षा मंत्री की तुलना में बेहतर जानते होंगे। चूंकि वह इससे वकिफ हैं इसलिए वह कुछ तेजी से काम कर सकते हैं। फिर भी वह साधारण अभिरुचियों वाले शख्स ही हैं। उनके साथ सुरक्षा के जखीरे वाली कारों का कोई काफिला नहीं चलता। गोवा की सड़कों पर वह अपनी कार से उतरकर ट्रैफिक को दिशा देने लगते हैं। वह पहली बार केंद्र सरकार में काम करेंगे। पार्रिकर पहली बार अक्टूबर, 2000 में गोवा के मुख्यमंत्री बने लेकिन दो वर्ष बाद ही वह अपनी गलतियों से सत्ता गंवा बैठे। चार महीने बाद सत्ता में उनकी वापसी हुई और वर्ष 2005 तक वह मुख्यमंत्री रहे। अपने पिछले कार्यकाल में उन्होंने माना कि गुड फ्राइडे और सेंट जेवियर उत्सव का अवकाश खत्म करना एक भूल थी। भाजपा गोवा के ईसाइयों के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं है। वर्ष 2012 के चुनाव की तैयारी के बीच पार्रिकर ने उनके बीच पहुंच बढ़ाने के विशेष प्रयास किए। उस वर्ष भाजपा ने छह ईसाइयों को टिकट दिया और दो अन्य का समर्थन किया। ये आठों उम्मीदवार जीत गए। चुनाव अभियान के दौरान ओडिशा में ग्राहम स्टेंस मामले में भाजपा की भूमिका को लेकर कड़े सवाल किए जाते थे लेकिन पार्रिकर ने बड़े संयम के साथ उनका जवाब दिया और गुड फ्राइडे को लेकर अपने रवैये पर माफी भी मांगी। इस असामान्य विनम्रता ने अपना असर भी दिखाया। वर्ष 2002 में भाजपा की 17 सीटें 2012 में बढ़कर 21 हो गईं। इससे पहले तक उसे सरकार गठन के लिए छोटी पार्टियों और निर्दलीयों का समर्थन लेना पड़ता था। अब 40 सदस्यीय गोवा विधानसभा में सहयोगियों सहित भाजपा की अगुआई वाले सत्ता पक्ष को 26 विधायकों का साथ है।
वह किस तरह के रक्षा मंत्री साबित होंगे? पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने अपने अनुभव से कहा था कि या तो आप एक सक्षम रक्षा मंत्री हो सकते हैं या फिर एक संत। पार्रिकर निश्‍चित रूप से इस पद पर अपनी छाप छोड़ेंगे। वह चुपचाप चीजों को मानने वाले या बेवजह के दखल को स्वीकार करने वाले शख्स नहीं हैं। इसलिए निश्‍चित रूप से माना जा सकता है कि सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) और मंत्रिमंडल की कार्यवाहियों में एक नई गतिशीलता आएगी।

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आखिरकार भारत में खाद्य सुरक्षा से जुड़े मसलों पर अमेरिका और यूरोपीय संघ के तेवर नरम पड़ ही गए। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि भारत की दलीलों में निश्‍चित रूप से दम था। विश्‍व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के मंच पर भारत ने विकासशील देशों को अपनी गरीब आबादी का पेट भरने के लिए खाद्य भंडारों के इस्तेमाल की आजादी देने की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी भारत ने एक कड़ा संदेश देते हुए खाद्य सुरक्षा के मामले में किसी भी प्रकार की पाबंदी या बंदिश का विरोध किया है। इस विरोध की नींव में विश्‍व व्यवस्था में समानता का सूत्र स्पष्ट था, जो अब काम कर गया है। इस मसले पर विकासशील देशों का समर्थन जुटाने में भारत कामयाब रहा तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोपीय देशों के पास भारतीय तर्क की काट मौजूद नहीं थी। पिछले कई महीनों से वैश्‍विक व्यापार समझौते में जारी गतिरोध के बाद अब अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भारत की मांग मानने के संकेत दिए हैं। भारत की मांग यह है कि विकासशील देशों में कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की प्रक्रिया लचीली हो। इसके बदले भारत डब्ल्यूटीओ में विवादास्पद खाद्य सुरक्षा समझौते पर पहुंचने के बाद सीमा शुल्क नियमों को आसान बनाने की अंतरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर करेगा। भारत के विरोध के कारण यह संधि फिलहाल रुकी हुई है। यह संधि पश्‍चिमी देशों के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विकसित देश इसके मसौदे पर हस्ताक्षर करने के लिए भारत सरकार पर सतत दबाव बनाए हुए थे। पिछले वर्ष दिसंबर में बाली में डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के मंत्रियों की बैठक में सदस्य देश भारत की इस समस्या पर विचार करने के लिए सहमत हुए थे। भारत ने बाली में अगले चार वर्ष में विकासशील देशों द्वारा सब्सिडी कैप के नियमों का उल्लंघन करने पर डब्ल्यूटीओ के द्विपक्षीय निकाय द्वारा कोई विवाद नहीं उठाए जाने की मांग रखी। बैठक में शामिल मंत्रियों ने 31 जुलाई तक सीमा शुल्क संबंधी नियमों में बदलाव के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर करने पर सहमति जताई। फिर भी विकसित देशों ने नए समझौते के पक्ष में तर्क दिया कि इससे सुस्त वैश्‍विक अर्थव्यवस्था को 1 ट्रिलियन डॉलर मिलेंगे और इससे 13 वर्ष पुरानी दोहा वार्ता को आगे बढाने का रास्ता भी खुलेगा।
इस समझौते पर बातचीत उस समय बाधित हो गई, जब भारत ने खाद्य सुरक्षा पर अपनी चिंताओं को समझे बिना बंदरगाहों और हवाईअड्डों से सामान की आसान आवाजाही की सुविधा देने के समझौते पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। कई विकासशील देश वर्तमान नियमों से अलग हटते हुए अपने खाद्य उत्पाद के मूल्य पर 10 प्रतिशत सब्सिडी की सीमा का उल्लंघन करने वाले हैं। अगर ऐसा हुआ तो निश्‍चित रूप से डब्ल्यूटीओ उनके खिलाफ कड़ा कदम उठा सकता है। भारत का तर्क है कि 10 प्रतिशत की गणना दोषपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष 1986-88 की कीमतों पर आधारित है। भारत ने इसमें परिवर्तन की मांग की है। इस वर्ष जुलाई में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की भारत यात्रा पर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उन्हें इस मामले में भारत की चिंताओं से अवगत कराया था। उनके तर्क सुनने के बाद केरी इसका कोई जवाब नहीं दे सके थे। उन्हें स्वीकार करना पड़ा था कि भारत द्वारा उठाया जा रहा बिंदु ’तर्कसंगत’ है। इसी तरह इंग्लैंड के चांसलर जॉर्ज ऑसबर्न ने भी इस मुद्दे पर भारत के रुख का समर्थन किया। इसके बावजूद डब्ल्यूटीओ में सारा ध्यान व्यापार सुविधा के समझौते पर केंद्रित किया गया और विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा संबंधी समझौतों की अनदेखी की गई। अब, जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ के रुख में नरमी आई है तो उम्मीद की जा सकती है कि भारत की चिंताओं पर ध्यान दिया जाएगा।

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केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के बारे में काफी आकर्षित करने वाली बातें कहीं। इनसे यह तो लगता ही है कि केंद्र की सत्ता में पिछले वर्षों के दौरान भारी-भरकम अर्थशास्त्रियों की मौजूदगी के बावजूद आर्थिक तरक्की में जो सुस्ती देखने को मिल रही थी, वह सुस्ती अब तेज रफ्तार में तब्दील हो सकती है। यह उम्मीद कोई नई बात नहीं है। दरअसल गुजरात को तेज विकास की पटरी पर लाने वाले मोदी को केंद्रीय सत्ता की चाबी सौंपने के पीछे आम जनता की यही उम्मीद काम कर रही थी। अब जिस तरह केंद्र सरकार सिलसिलेवार ढंग से सुधारपरक कदम उठा रही है, वह दिलचस्प तो है ही, सकारात्मक भी है। जेटली के इस बयान का स्वागत ही किेया जा सकता है कि वर्ष 2008 से अटका और विवादों से घिरा रहा बीमा संशोधन विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में पारित किया जा सकता है। देश में भ्रष्टाचार मिटाने और सुधारों को आगे बढ़ाने का वादा भी एक सार्थक कदम की ओर उठने वाले कदमों का पूर्वाभास नजर आता है। इस नई सरकार ने अपने कुछ महीनों के अब तक के कार्यकाल में उचित और पारदर्शी व्यावसायिक परिवेश बनाने और सांठ-गांठ वाले पूंजीवाद को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए हैं। सो, देश में भ्रष्टाचार-मुक्त व्यावसायिक परिवेश विकसित करने के जेटली के वादे पर भरोसा करने का मन स्वाभाविक रूप से होता है। उन्होंने यह कहकर भी केंद्र के इरादों को स्पष्ट कर दिया कि आज एक गलत विचार पूरी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर सकता है। पिछली तिथि से कर लगाना एक ऐसा ही गलत विचार था जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा। निश्‍चित तौर पर यह बयान भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था की वैश्‍विक साख दोबारा कायम करने में मददगार साबित हो सकता है। उन्होंने कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार के निर्णय की तरफ इशारा करते हुए इस प्रकार के गलत निर्णय भविष्य में नहीं दोहराए जाने का भरोसा भी दिलाया। अगर सच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार इस इरादे को जमीनी स्तर पर साकार कर सकी तो देश की अर्थव्यवस्था को भ्रष्टाचार से होने वाले नुकसान से बचाने में सफलता मिल सकेगी।
उधर, सरकार श्रम सुधारों, कुछ सार्वजनिक उपक्रमों से विनिवेश और भूमि अधिग्रहण कानून में सुधारों को आगे बढ़ाने पर भी गौर कर रही है। आर्थिक माहौल को बदलने के क्रम में केंद्र सरकार को शहरों, कस्बों, गांवों और गली-मुहल्लों में बुनियादी बदलाव सुनिश्‍चित करने की कोशिश करनी चाहिए। यह जरूरी है, क्योंकि बदलाव के वादे पर केंद्र की सत्ता तक पहुंची मोदी सरकार की प्रतिबद्धता के बावजूद तमाम लोगों को अब तक यही लगता है किे कोई भी सरकार उनकी छोटी-बड़ी समस्याओं पर ध्यान नहीं देती है। चीजें जैसे चल रही हैं वैसे ही चलती रहेंगी। उनकी यह सोच दूर करना जरूरी है। अगर केंद्र सरकार से लेकर स्थानीय निकाय और पंचायतें एकजुटता और पूरे तालमेल के साथ इस दिशा में काम करें तभी ऐसी सोच नींव से दूर की जा सकेगी। यह एक कठिन काम है, क्योंकि हर राज्य की सरकार एक ही तरह से नहीं सोचती। जिन राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं, उनको विकास की दिशा में साथ लेकर चलना एक भारी चुनौती साबित हो सकता है। इन राज्यों की सराकारों की सोच और प्राथमिकताएं केंद्र की सोच और प्राथमिकताओं से अलग हैं। हमारे देश ने लोकतांत्रिक राजव्यवस्था अपनाई है तो केंद्र और राज्यों में मतभेद एक हद तक स्वाभाविक है, लेकिन जहां जीवन स्तर में सुधार की बात है, वहां राजनीति से हटकर राष्ट्रीय सोच अपनाने की जरूरत होगी।