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संपादकीय

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वर्ष 2012 के अंतिम महीने में निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार का दोषी मुकेश कुमार तिहाड़ जेल में बंद है और मृत्युदंड के क्रियान्वयन का इंतजार कर रहा है। निर्भया बलात्कार कांड देश के ऊपर एक गहरे कलंक की तरह चस्पा हो चुका है। आज भी जब कोई देशवासी उस जघन्य कांड की निर्ममता का स्मरण करता है तो उसका खून खौल उठता है। उस कांड के आरोपी मुकेश को मृत्युदंड की सजा मुकर्रर हो चुकी है। ब्रिटिश ब्रॉडकॉस्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) ने इस कांड का भी व्यवसायिक लाभ उठाने का घृणित कार्य किया है। सारी नैतिकताओं को ताक पर रख कर बीबीसी ने उस अपराधी का तिहाड़ जेल में साक्षात्कार किया ताकि उस पर एक वृत्चित्र बनाकर विश्‍वभर में दिखाया जा सके। बीबीसी का इसके पीछे मूल मकसद क्या है यह तो कहा नहीं जा सकता परन्तु प्रथम दृष्टया उसका ध्येय इससे आर्थिक लाभ अर्जित करना दिखाई देता है। विश्‍व महिला दिवस पर यह इंटरव्यू प्रसारित होना था किन्तु भारत सरकार ने न्यायालय के माध्यम से इसके प्रसारण पर रोक का इंतजाम कर दिया है। इस मामले ने पार्लियामेंट के अंदर और बाहर हंगामा बरपा रखा है। एक साथ अनेक सवाल उठ रहे हैं जिससे हमारे यहां की प्रशासनिक व्यवस्थाओं का लचीलापन और लुंंजपुंज कानूनी प्रक्रिया से बेखौफ हुए अपराधियों का बढ़ता हौसला दृष्टि गोचर होता है। विचार करने की बात है कि जिस आरोपी का अपराध साबित हो चुका है और उसे जघन्य अपराध के लिए मौत की सजा सुनाई जा चुकी है, उसका उसकी जेल में कोई मीडियाकर्मी इंटरव्यू कैसे कर लेता है, उसे अनुमति कैसे मिल जाती है? दूसरी बात एक मीडिया घराने की इसमें क्या रुचि हो सकती है कि वह एक अपराधी का पक्ष जनता के सामने लेकर जाए, वह भी ऐसा अपराधी जिसने एक ऐसा घिनौना कुकृत्य किया कि क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हों। स्वाभाविक है कि वह अपने बचाव में वक्तव्य देगा तथा या तो दुनियाभर से सहानुभूति बटोरने की कोशिश करेगा या फिर अन्याय का शिकार होने का रोना रोएगा। ऐसे व्यक्ति का इंटरव्यू प्रसारित करना भी नैतिकता के मानदंडों के खिलाफ है।

संसद में गृहमंत्री ने कहा है कि उन्होंने स्वयं मामले का संज्ञान लेकर जांच के आदेश दे दिए हैं परन्तु उन्हें मिली रपट के अनुसार बीबीसी ने जेल अधिकारियों को वास्तविकता छुपाकर गुमराह करते हुए इन्टरव्यू की अनुमति ले ली। हालांकि इतना कह देने भर से संबंधित जेल अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते हैं परन्तु यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे यहां थानों, छोटी कचहरियों में ही नहीं बल्कि बड़ी से बड़ी जेल में भी गैर कानूनी ढंग से पहुंच बनाई जा सकती है और कोई भी अपना काम कर निकल सकता है। यह सही है कि देश में ऐसी मानसिकता के लोगों की कोई कमी नहीं है जो अपराधी मुकेश कुमार की मानसिकता है परन्तु उसे जायज भी नहीं ठहराया जा सकता। अगर उसका इंटरव्यू छपता जिसमें उसने बलात्कार का शिकार होने वाली लड़कियों को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है, तो यह कितना बड़ा अपराध और हो जाता, इस पर चिंतन की जरूरत है। अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर हर कुछ करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

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आम आदमी पार्टी (आप) ने हमेशा यह जताने का प्रयास किया कि वह अन्य राजनीतिक दलों से हटकर है। उसने लोकसभा चुनावों में भले ही तीर न मारा हो परन्तु उससे पहले जब दिल्ली के विधानसभा चुनाव हुए थे तब इसने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को एक ही थैली का चट्टा बट्टा बताते हुए न केवल दिल्ली में अपनी मजबूत जमीन तैयार की बल्कि चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के बाद 28 सीटें लेकर दूसरे नंबर पर आई। भाजपा को उस समय 70 में से 32 सीटें मिलीं थीं किन्तु लाख प्रयासों के बावजूद वह सरकार नहीं बना सकी और कांग्रेस का समर्थन लेकर ‘आप’ पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए तथा उनकी सरकार दिल्ली में काबिज हो गई। केजरीवाल केवल 49 दिन सरकार को टिकाए रख पाए और फिर यह कहकर भाग खड़े हुए कि भाजपा और कांग्रेस उन्हें काम करने नहीं दे रही थीं। दिल्ली के लोगों की उन्हें सहानुभूति मिली और उसका लाभ ‘आप’ को फिर से हुए विधानसभा में इतना ज्यादा मिला कि भाजपा का तो सूपड़ा साफ हुआ ही, कांग्रेस का दिल्ली में मानो अस्तित्व ही मिट गया। दिल्लीवासियों ने सोचा कि केजरीवाल एक ईमानदार नेकनीयत वाले व्यक्ति हैं और उनकी टीम भी बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं की टीम है इसलिए ‘आप’ को 67 सीटों पर जीत दिलाकर दिल्ली की गद्दी सौंपी ताकि दिल् ली का विकास हो, ‘आप’ अपने सारे वादे पूरे कर सके और दूसरी पार्टियों पर तोहमत नहीं लगा सके कि काम नहीं करने दिया।

अब जुम्मा जुम्मा चार दिन हुए हैं सरकार बने कि आम आदमी पार्टी का अंदरुनी झगड़ा सड़क पर आ गया है। पार्टी के शीर्ष नेता फुटपाथ पर लड़ते झगड़ते दिखाई दे रहे हैं। चिट्ठियों के जरिए आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं तो अपने ही दिग्गजों के फोन टेप कर उन्हें लीक किया जा रहा है। पार्टी का अंदरुनी लोकपाल भी स्पष्ट कह रहा है कि पार्टी में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है तथा यह भी अन्य पार्टियों की तरह गुटबाजी का शिकार हो रही है। पार्टी के संस्थापकों में से रहे प्रशांत भूषण तथा योगेन्द्र यादव को पीएसी से हटाकर उनके पर कतरने की पूरी तैयारी की जा चुकी है तो वे कह रहे हैं कि पार्टी में अब लोकतंत्र नहीं बचा है। दो गुट साफ उभर कर आ गए हैं जिनमें से एक गुट भूषण परिवार पर पार्टी को कब्जे में लेने के षड़यंत्र का आरोप लगा रहा है तो दूसरा गुट कह रहा है कि केजरीवाल धीरे धीरे इसे व्यक्तिवादी पार्टी बनाने की साजिश रच रहे हैं। केजरीवाल कह रहे हैं कि वे इस गंदी कीचड़ फैंकने की राजनीति में नहीं पड़ना चाहते। उनके लिए दिल्ली के लोगों का विश्‍वास सर्वोपरि है परन्तु वे भी योगेन्द्र और प्रशान्त के आरोपों का जवाब नहीं दे रहे। उनके आरोप तो केजरीवाल की ईमानदारी पर भी प्रश्‍नचिन्ह लगाने वाले हैं। केजरीवाल भोले बगुला भगत बनकर यह दर्शा रहे हैं जैसे पार्टी में जो तू-तू मैं-मैं चल रही है उससे वही सर्वाधिक आहत हैं। सच्चाई यह है कि जहां पद और पैसा दोनों आते हैं वहां विकृतियां साथ आती ही हैं। आज आप पार्टी उन आम पार्टियों की तरह हो गई है जिनका वह विरोध करती आई थी। बुराइयों पर पर्दा डालने से खत्म नहीं होतीं। केजरीवाल ने निष्पक्ष रूप से समस्या का समाधान नहीं किया और चापलूसों की बातों में आकर निष्ठावान लोगों को बाहर किया तो उसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना ही पड़ेगा।

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लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री न केवल आत्म विश्‍वास से लबरेज दिखे बल्कि विपक्ष की बोलती बंद करने में सफल रहे। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी ही पार्टी के उन नेताओं को भी लताड़ लगाई जो समय समय पर उल्टे सीधे बयान देकर न केवल केन्द्र सरकार की किरकिरी कराने पर तुले रहते हैं बल्कि देश में सौहार्द के माहौल को बिगाड़ने का प्रयास भी करते हैं। उन्होंने विपक्ष का आह्वान भी किया कि कम से कम देशहित के मुद्दों पर तो सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें। मोदी ने कहा कि उनका (मोदी का) एक ही धर्म है भारत धर्म। उनके लिए राष्ट्र सर्वोच्च है। वे देश के 125 करोड़ देशवासियों के प्रधानमंत्री हैं। वे नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं कर सकते। उनका एक ही सूत्र है सबका साथ, सबका विकास। उन्होंने अपने हर वाक्य के प्रति प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा जो लोग षड़यंत्र रचकर संप्रदायों को लड़ाने का काम करते हैं या अपने बयानों से घृणा का वातावरण फैलाते हैं उनके कृत्यों से केन्द्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है। सरकार का एक ही ध्येय वाक्य है-देश का विकास। उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि विपक्षी बंधु कहते हैं कि हमने उनकी योजनाएं चुरा ली हैं और उनका नाम बदल बदलकर नई योजनाएं लाए हैं। मोदी ने कहा, अगर इस सरकार की योजनाएं वही हैं जो पूर्व सरकार की थीं तो फिर उनका समर्थन करना चाहिए। वे अपनी ही शुरू की गई योजनाओं का विरोध क्यों करते हैं? मोदी ने कांग्रेस का उसी के नेताओं के बयानों को हथियार बनाकर घेरा। मोदी ने मनरेगा का जिक्र करते हुए कहा कि वे इसे बंद करने वाले नहीं हैं जबकि कांग्रेस काफी समय से हाय तौबा मचाए हुए है कि यह सरकार मनरेगा बंद कर देगी। मोदी ने कहा कि मनरेगा तो यूपीए सरकार की नाकामी का स्मारक है, इसे यह सरकार बंद करने की बजाय कांग्रेस को स्मरण कराने के लिए कायम रखेगी। नरेन्द्र मोदी जिस समय सदन में अपना वक्तव्य दे रहे थे, उस समय विपक्षी नेता खामोशी से उनकी बात सुन रहे थे और पूरा देश इसे टीवी पर देख रहा था।

प्रधानमंत्री का जवाब इस मायने में लाजवाब था कि उन्होंने न तो पूर्व सरकार के गड़े मुर्दों को उखाड़ने का काम किया और न ही अपनी पार्टी के नेताओं के विवादास्पद बयानों का बचाव किया। उन्होंने कहा कि विकास के पथ पर आगे बढ़ने में विपक्ष का भी सहयोग चाहिए। हम विपक्ष के अनुभवी नेताओं के अनुभव का लाभ लेना चाहेंगे। उन्होंने विपक्ष के नकारात्मक रवैये के प्रति अप्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि केवल विरोध के लिए विरोध ठीक नहीं है। यह बात सही है कि हाल के वर्षों में विपक्ष अपनी गुणात्मक, रचनात्मक भूमिका का निर्वाह करने के बजाय सियासी रोटियां सेंकने में ज्यादा रुचि लेता है भले ही इससे राष्ट्र का नुकसान ही क्यों न हो। अब जनता जागरूक हो गई है इसलिए राष्ट्रहित के मुद्दों पर विपक्ष का नकारात्मक रवैया होने पर विपक्ष की खुली आलोचना होने लगती है। सरकार की खामियों की ओर ध्यान आकृष्ट करना और उसकी मनमानी पर अंकुश लगाना विपक्ष का कर्तव्य है किन्तु लोकतांत्रिक व्यवस्था में भारी बहुमत से चुनकर आई सरकार के हर काम में रोड़े अटकाना भी स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है। जनहित को सर्वोपरि मानते हुए विपक्ष अगर मुद्दों पर आधारित सरकार का समर्थन करने का रवैये अख्तियार करे तो इससे विपक्ष की प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी और सदन की गरिमा में भी इजाफा होगा।

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देश के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपना प्रथम पूर्ण बजट जिस समझदारी से पेश किया है उसमें उनकी योग्यता और दूरर्शिता दोनों परिलक्षित हो रही हैं। लोगों ने सोचा था कि पूर्व की तरह यह सरकार भी कुछ लोकलुभावन, तात्कालिक राहत देने वाले बजट प्रस्ताव लेकर आएगी परन्तु मोदी सरकार ने सारे कयासों को ठिकाने लगा दिया। जिस प्रकार से दो दिन पहले रेल बजट में आम जनता को लुभाने वाली सैंकड़ों नई रेलों की घोषणा करने के बजाय सरकार ने रेल के विकास को ध्यान में रखकर रेल बजट पेश किया वैसे ही अरुण जेटली ने देश को नई आर्थिक दिशा देने वाला ऐसा बजट प्रस्तुत किया है जिसमें भले ही इनकम टैक्स में छूट के प्रावधान नहीं दिए और इलेक्ट्रोनिक सामान या मध्यमवर्गीय परिवारों के दैनंदिन जीवन में काम आने वाली वस्तुओं को सस्ता करने का प्रयास नहीं किया किन्तु ऐसे ठोस प्रावधान किए हैं जिनसे देश के विकास को गति मिलेगी, रोजगार के अवसर निकलेंगे, आम आदमी बचत को बढ़ावा देकर आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्‍चित करेगा और इसके साथ साथ कृषि एवं सामाजिक सुरक्षा को मजबूती मिलेगी। देश के हित में जो था वही इस सरकार ने किया। सरकार ने जनता की नाराजगी और आने वाले चुनावों की भी चिंता नहीं करते हुए ऐसा दूरदर्शिताभरा बजट दिया है यह मोदी सरकार के साहस और अरुण जेटली के अर्थनीतिक अनुभव को प्रदर्शित करता है।

नए बजट में सेवाकर की दरों में मामूली बढ़ोतरी करने के साथ साथ इसका दायरा भी बढ़ाया है, इसका बड़ा राजस्व लाभ सरकार को अवश्य मिलेगा। जो राजस्व संग्रहित होगा उसको विकास योजनाओं पर खर्च किया जा सकेगा। पूर्व की सरकारों में या तो ऐसे नए चिंतन के साथ विकासोन्मुखी प्रावधान प्रस्तुत करने की किसी वित्तमंत्री ने हिम्मत नहीं दिखाई और यदि प्रयास किया भी गया तो उन्हें असफलता मिली। अरुण जेटली ने एक तरफ उद्योग-व्यवसाय और कॉर्पोरेट क्षेत्र के प्रोत्साहन को ध्यान में रखा है और दूसरी तरफ आम आदमी को भी नजरंदाज नहीं किया है। और सबसे बड़ी बात, यह सब प्रावधान पेश करते हुए वित्तमंत्री ने वित्तीय घाटे (राजकोषीय घाटे) को नजरंदाज नहीं किया बल्कि संतुलन बैठाने का प्रयास किया है। बचत को बढ़ावा देने का हर संभव प्रयास करना, सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता में शामिल करना, पेंशन कवरेज तथा घरों के लोकरों में बंद पड़े सोने के बदले उससे परिवार को आय का रास्ता दिखाना इस सरकार की आर्थिक मजबूती और देश के विकास के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई देती है। यह सरकार आधारभूत ढांचागत विकास पर भारी निवेश करने तथा कॉर्पोरेट टैक्स को चरणबद्ध तरीके से कम करने का निर्णय लेकर यह संदेश देना चाहती है कि विकास को गति देने के लिए उसे कॉर्पोरेट का भी सहयोग चाहिए। आम आदमी के हितों को चोट पहुंचाए बिना वह उद्योगपतियों को भी पैसा कमाने का अवसर देना चाहती है। हालांकि विपक्ष हायतौबा मचा रहा है कि जेटली का बजट कॉर्पोरेट हितों को ध्यान में रखकर अमीरों को और अमीर बनाने के लिए बनाया गया है परन्तु विपक्ष का यह प्रचार जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए है। गरीबों को केवल कुछ छूट देकर सशक्त नहीं बनाया जा सकता बल्कि उनके लिए दीर्घकालीन ठोस योजनाएं बनाकर उन्हें आत्म निर्भर करने की सोच ही राष्ट्रहित की सोच है जो इस बजट में दिखाई देती है।

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नई सरकार यानी नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा लाए जा रहे भूमि अधिग्रहण विधेयक पर संसद में चर्चा शुरू होती इसके पहले ही सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने जन्तर मन्तर पर दो दिन का धरना देकर विरोध जताया। वे कह रहे थे कि उनका किसी राजनीतिक पार्टी से कोई लेना देना नहीं है, वे केवल सरकार के कदम के खिलाफ विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी की सरकार ने अगर अपना कदम वापस नहीं लिया तो वे दिल्ली में मोदी सरकार के खिलाफ किसानों के हित में उग्र आंदोलन करने को बाध्य होंगे। दो दिन के धरने के बाद एक बार अन्ना वापस अपने गांव चले गए परन्तु उसी वक्त कांग्रेस के अग्रणी नेताओं ने भी धरना देकर ऐसा दर्शाया जैसे कांग्रेस किसानों के साथ ख़डी है। कांग्रेस में अभिनेता से नेता बनकर आए राज बब्बर ने फिल्मी अंदाज में प्रधानमंत्री को भला बुरा कहा और भूमि अधिग्रहण बिल को किसानों के लिए जानलेवा बताया। दिग्विजय सिंह से लेकर अहमद पटेल तक ने केन्द्र सरकार को खूब कोसा और कांग्रेस को किसानों का मसीहा बताया। हालांकि कांग्रेस के धरने में पांच सौ से ज्यादा लोग नहीं जुटे और थो़डी ही देर में यह भी पोल खुल गई कि गरीबों को यह कह कह कर लाया गया था कि आंदोलन में शामिल होंगे तो भूमिहीनों को भूखंड दिए जाएंगे। गरीब लोग बातों में आ गए और हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान से आकर धरने पर बैठ गए। बाद में दूसरी पोल वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सदन में यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री रहे आनन्द शर्मा का वह पत्र पढकर खोल दी जिसमें शर्मा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से आग्रह किया था कि भूमि अधिग्रहण में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाए ताकि उद्योग धंधों तथा ढांचागत विकास के कार्यों में व्यवधान नहीं आएं। जेटली ने कहा कि जो बात आनन्द शर्मा ने तब कही थी वही बात अब हम कह रहे हैं फिर हमारा क्यों विरोध किया जा रहा है? यह कांग्रेस का अवसरवादी यू-टर्न व्यवहार है। इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकतीं कि जब यह विधेयक सदन में लाया जाना है तो इससे पहले ही किसानों के हितों की बात करने वाले संगठनों और राजनीतिक दलों, विशेषकर कांग्रेस को इस विधेयक को लेकर स़डक पर नहीं उतरना था। इस मुद्दे पर सदन में व्यापक बहस होनी चाहिए ताकि देश हित में विपक्ष को किन किन प्रावधानों पर आपत्ति है, इसका खुलासा हो सके। सरकार ने तो स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह टकराव का रास्ता नहीं अपनाना चाहती परंतु विपक्ष को भी ठोस बहस कर तर्कसंगत समाधान के लिए आगे आना होगा। सरकार को किसान विरोधी साबित करने के लिए विपक्ष आंदोलन या विरोध प्रदर्शन का रास्ता अपनाकर सियासी लाभ उठाना चाहता है। सरकार को भी चाहिए था कि वह आनन्द शर्मा के पत्र का खुलासा जैसा कदम पहले ही उठाती और जनता को समझाने में कामयाब होती कि भूमि अधिग्रहण विधेयक किसी भी तरह से किसान विरोधी नहीं है। सरकार के नीति निर्धारकों को इसका भान होना चाहिए था कि विपक्ष इस विधेयक के बहाने किसानों को बहकाने में कामयाब हो जाएगा। बहरहाल, सरकार को अपने विधेयक पर पुनदृर्ष्टि डालकर राजनीतिक दलों में आम सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए। यह भी स्पष्ट है कि भूमि अधिग्रहण के बिना विकास का पहिया एक कदम भी आगे नहीं बढ पाएगा।

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कांग्रेस पार्टी के लिए पिछले नौ महीने काफी निराशाजनक रहे हैं। पार्टी को 2014 के आम चुनावों में काफी बुरी हार का सामना करना पड़ा जिस से वह अभी तक उबर नहीं पाई है। कांग्रेस कुछ समय से लगातार एक के बाद एक हार का ही सामना कर रही है। हाल ही में महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे प्रमुख राज्यों में हार का सामना तो करना ही पड़ा साथ ही दिल्ली में कांग्रेस के एक भी उम्मीदवार को जीत हासिल नहीं हुई। ऐसे समय में जब पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं में चिंता का माहौल है, पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का छुट्टी पर जाना कांग्रेस की मुश्किलों को और ब़ढ़ा सकता है। कांग्रेस को इस वक्त जरूरत है अपने घटते प्रभाव को संभालने और साथ ही संगठन को मज़बूत करने की। ऐसे में पार्टी को जब मार्गदर्शन की जरूरत है, अगर पार्टी के मुख्य चेहरे राहुल गांधी को छुट्टी पर जाने का मन करता है तो यह पार्टी के मनोबल के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। कांग्रेस पार्टी में राज्य स्तर के नेताओं की उतनी अहमियत नहीं होती क्योंकि पार्टी कई दशकों से एक ऐसी राष्ट्रीय पार्टी है जिसकी कमान दिल्ली में आलाकमान के हाथों में ही होती है लेकिन जब केंद्रीय नेतृत्व में शिथिलता आती है तो पार्टी के ढांचे को संभालने का मौका मिलना भी मुश्किल हो जाएगा। पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के छुट्टी पर जाने के फैसले से यही नज़र आ रहा है कि जिस नेता को पार्टी ने 2004 में युवा चेहरे के रूप में प्रदर्शित किया था, शायद वही पार्टी की कार्यशैली से नाखुश है। पर उन्हें भी यहां समझने की जरूरत है कि एक नेता को अगर पार्टी में अपना दबदबा बनाए रखना है तो उसे जरुरत के समय पर अग्रिम पंक्ति में खड़े रहकर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पार्टी के शीर्ष नेता को स्थिति सुधारने के लिए छुट्टी पर जाने की नहीं बल्कि ज़मीनी परेशानियों को समझने और पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिलकर ही पार्टी को सही दिशा और नई ऊर्जा देने की जरूरत होती है। कांग्रेस पार्टी लोकसभा में प्रमुख विपक्षीय पार्टी है और जब सरकार आम बजट संसद में पेश करने वाली है तब उनका (राहुल का) गायब हो जाना अनुचित ही लगता है। अगर राहुल पार्टी के मौजूदा ढांचे से नाखुश हैं और बदलाव लाना चाहते हैं तो उन्हें अपनी जिम्मेदारी संभलकर निभानी होगी ताकि पार्टी में उनकी बात को तवज्जोह मिल सके। अगर ऐसे समय पर छुट्टी पर जाने की सोचेंगे तो ऐसी सोच सिर्फ उनकी नाकामी को ही उजागर करेगी। राहुल ने अभी तक पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी भी नहीं ली है और वह असन्तुष्ट नेता के रूप में ही सामने आते हैं। कांग्रेस की अप्रैल 2015 में होने वाली आम बैठक में शायद राहुल को पार्टी के प्रमुख के रूप में चुना जा सकता है लेकिन अगर राजनीति की उठापटक का सामना करना है तो उन्हें चुनौतियों का सामना करने के लिए अभी से तैयार रहना पड़ेगा। राहुल को यह साबित करना पड़ेगा कि वह पार्टी के प्रमुख केवल इसलिए नहीं बनेंगे क्योंकि वे गांधी परिवार से हैं और इसके लिए सही दिशा में काफी काम करना पड़ेगा और कई कठिन फैसले लेने पड़ेंगे। अगर राहुल को कांग्रेस पार्टी को मौजूदा दलदल से बाहर निकलना है तो उन्हें कोई जादुई शक्ति की नहीं बल्कि एक सरल और कुशल रणनीति की जरूरत है।

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बजट सत्र शुरु हो चुका है और साथ ही केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पर सारे देश की आशाओं का सामना करने का समय भी समीप आ गया है। नरेंद्र मोदी सरकार का पहला सम्पूर्ण बजट इस हफ्ते पेश होने वाला है। सरकार की ओर से चुनावी घोषणापत्र में जो वादे किए गए थे उन्हें कई विशेषज्ञों ने अवास्तविक विचारों पर तैयार किए जाने का भी आरोप लगाया था। भाजपा सरकार के पहले नौ महीनों के कार्यकाल में विकास पर केंद्रित कोई भी ख़ास या अहम फैसले की अनिश्चितता पर ’इंडिया इंक’ की बढ़ती अप्रसन्नता के भी काफी स्पष्ट संकेत नज़र आ रहे हैं। हाल ही में उद्योग जगत के जाने माने चेहरे, दीपक पारेख ने भी टिप्पणी की है कि व्यापारियों के बीच बेचैनी ब़ढ़ रही है क्योंकि सरकार द्वारा व्यापार सम्बन्धी नीतियों में अभी तक कोई ख़ास बदलाव नहीं किए गए हैं। आगामी बजट से सभी क्षेत्र के लोगों को उम्मीद है कि जिन सभी योजनाओं और नीतिगत बदलावों के बारे में सरकार द्वारा किए गए चुनावी वादों में जिक्र किया गया था, इस बजट में सभी योजनाओं का विस्तृत रोड मैप पेश किया जाएगा। सरकार को इस बजट से सिर्फ निवेशकों की चिंताओं का समाधान ही नहीं ढूंढ़ना है बल्कि एक जागरूक युवा पी़ढ़ी की बढ़ती आशंकाओं का भी समाधान करना होगा।

इस बजट में अरुण जेटली के सामने मौजूद विकास और निवेश संबंधी चुनौतियों पर कुछ अहम फैसले लेने की उम्मीद करना उचित है क्योंकि समय आ गया है कि सरकार उठाए गए कदमों से उद्योग जगत को भरोसा दिलाए कि सरकार अपने द्वारा की गई घोषणाओं पर अमल करने के लिए अब तंत्र को भी क्रियान्वित करेगी। सरकार द्वारा घोषित कार्यक्रमों और नीतियों पर अगर सफल कार्रवाई की गई तो देश की अर्थव्यवस्था में काफी महत्वपूर्ण बदलाव और सुधार भी आने की उम्मीद है। सरकार को ऐसे माहौल में अपने ’अच्छे दिन’ अभियान को सफल बनाने की अधिक ज़िम्मेदारी है। भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक रूख अंतरराष्ट्रीय निवेशकों में भी दिखाई दिया है, साथ ही तेल की अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कीमत भी पिछले पांच वर्षों की तुलना में सबसे निचले स्तर पर है। अपने फैसलों को सही रूप में पेश करने के लिए सरकार को कानूनी दांव-पेच के बीच से भी होकर गुजरना होगा। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की स्थिति भी स्थिर है और मुद्रास्फीति भी पिछले कई वर्षों के मुकाबले कम है। कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक भारत एशिया में एक बहुत अहम अर्थव्यवस्था का रूप लेता हुआ भी दिख रहा है। हालांकि अभी भी सरकार द्वारा कई अहम प्रगतिशील फैसलों पर क्रियान्वयन बाकी है, साथ ही यह समय सरकार के लिए अपने सभी आलोचकों को चुप कराने के लिए एक सही मौका भी है। बस अगर जरूरत है तो सरकार को आगामी बजट में देश की आर्थिक स्थिति सुधारने में आ रही बाधाओं को हटाने की और निवेशकों तथा युवाओं के लिए सही अवसर प्रदान करने की। अगर इस बजट में सरकार सही फैसलों को लेने में सक्षम रहती है तो कई क्षेत्र के उद्यमियों की चिंताओं का निदान करने में भी वह सफल रहेगी। इसी के साथ राजनैतिक कारणों से भी यह बजट महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार के लिए अपने विरोधी दलों के साथ आम सहमति बनाकर इस बजट सत्र में कई विधेयकों को हरी झंडी दिखाने की पूरी कोशिश करनी है।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनावों के समय जनता से जो वादे किए थे उन पर भरोसा करते हुए देश की जनता ने भारी बहुमत से उन्हें सत्ता सौंपी ताकि देश के विकास में कोई भी निर्णय लेने के समय सरकार के समक्ष बाधा उत्पन्न नहीं हो। प्रधानमंत्री बनने के बाद कई अवसरों पर मोदी ने अपनी मंशा भी जाहिर की कि वे भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना चाहते हैं तथा उद्योग धंधों की स्थापना और संचालन में औपचारिकताओं के जंजाल को हटाकर उन्हें खुली हवा में सांस लेने का मौका देना चाहते हैं ताकि वे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कर आगे बढ़ सकें। उन्होंने मेक इन इंडिया जैसे अभियान की शुरुआत भी इसीलिए की ताकि अनिवासी भारतीयों तथा विदेशी कंपनियों की तरफ से देश में निवेश भी आकर्षित हो और यहां उद्योग धंधों के अनुकूल ऐसा वातावरण निर्मित हो कि लोग यहां से बाहर जाने के बजाय यहां की प्रतिभाएं यहीं उपलब्धियां हासिल करें। मोदी ने कई सशक्त देशों का दौरा किया और उन देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी भारत आए। इतना ही नहीं, अनिवासी भारतीयों का सम्मेलन भी आयोजित किया ताकि देश के लिए पूंजी जुटाई जा सके। प्रधानमंत्री के सभी प्रयासों को सकारात्मक रेस्पांश भी मिला। उनकी मंशा पर किसी को कोई संदेश नहीं है किन्तु जाने माने बैंकर और एचडीएफसी के प्रमुख दीपक पारेख का मानना है कि देश में अभी भी कारोबार के अनुकूल वातावरण नहीं बना है जिसके कारण उद्यमियों में बेचैनी व्याप्त है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि अब सरकार को बने नौ माह हो गए हैं।

मोदी सरकार का मूल मंत्र यही था कि वे बिजनेस फ्रेंडली वातावरण देंगे परन्तु जमीनी स्तर पर बहुत ही मामूली परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। दीपक पारेख अर्थतंत्र के जानकार हैं और उनको भी मोदी से बहुत सी आशाएं हैं कि वे नीति और नीयत में पारदर्शिता रखने वाले प्रशासक हैं। नीतियों और सुधारों से संबंधित सरकार के विभिन्न प्रकोष्ठों और योजनाओं के वे हिस्सा रहे हैं इसलिए उनके कथन को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं कि कारोबार से संबंधित पाबंदियां पहले की तरह कायम हैं। केन्द्र सरकार को काफी समय मिल चुका है कि वह अब सुधार लागू करे जो दिखाई भी दें। प्रधानमंत्री ने चुनाव के समय और प्रधानमंत्री बनने के बाद अनेक मौकों पर उद्योगपतियों और व्यवसायियों को यह आश्‍वासन दिया था कि उनकी सरकार बिजनेस फ्रेन्डली है। सरकार उनका पर्याप्त समर्थन करेगी, सहयोग देगी ताकि देश में उद्योग-व्यवसाय फलेगा-फूलेगा और राष्ट्र आर्थिक रूप से समृद्ध होगा किन्तु ये बातें अब फौरी तौर पर कही गई महसूस होने लगी हैं। जमीनी सच्चाई यह है कि हालात में परिवर्तन नहीं आया है। आज भी उद्योग धंधे लगाने में पहले की तरह बाबूगिरी से लेकर रिश्‍वतखोरी तक सबका सामना करना पड़ता है। प्रधानमंत्री की मंशा भले ही साफ हो परन्तु जब तक नीतियों में बड़े बदलाव नहीं होंगे तब तक उसके सकारात्मक परिणाम जमीन पर दिखाई नहीं देंगे। इन बदलावों के लिए सरकार को दृढ़ इच्छाशक्ति दर्शानी होगी तभी जंग खाए हुए पुराने तंत्र को झकझोरा जा सकेगा। नौकरशाही अभी भी उद्यमियों को अपेक्षित सहयोग नहीं कर रही है। हालात ज्यादा समय तक अगर ऐसे ही बने रहे तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने के समय जो नया उत्साह और उर्जा का संचार हुआ था वह काफूर हो जाएगा और एक बार फिर देश पर निराशा के बादल मंडराने लगेंगे।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने प्रारंभ में ही स्वास्थ्य सुरक्षा पर जोर देने की बात तो कही थी परन्तु उसका उचित प्रबंध करने में वह अभी तक कामयाब नहीं दिखाई दे रहे। वर्तमान में स्वाइन फ्लू या एच-1एन-1 वायरस संक्रमण के कारण 800 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और 13 हजार से ज्यादा मरीज इस बीमारी से पीड़ित हैं। हालांकि इतने बड़े देश में, जिसकी आबादी 125 करोड़ हो, उसमें यह संख्या बहुत बड़ी नहीं है परन्तु इस बीमारी से लड़ने की इच्छा शक्ति जब सरकारी तंत्र में दिखाई नहीं दे तो यह चिंता का विषय अवश्य है। हमारे देश में अभी भी सरकारी अमला किसी भी आपदा से लड़ने के लिए आग लगने पर कुआं खोदने की आदत से ग्रस्त है। ऐसा नहीं है कि स्वाइन फ्लू बीमारी भारत में पहली बार अपना असर दिखा रही है, बल्कि हर दो-तीन वर्ष बाद इसका संक्रमण बढ़ जाता है और सैंकड़ों लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं।

स्वाइन फ्लू नामक बीमारी का सूअरों से कोई लेना देना नहीं है, बस नाम से ऐसा आभास होता है कि इसके वायरस का संक्रमण सूअरों से फैलता है। वैसे अब इस बीमारी को एच-1,एन-1 संक्रमण के नाम से जाना जाता है जो कि लगभग 5 वर्ष पूर्व खूब जोर से फैला था तथा बाद में दो-तीन साल शिथिल अवस्था में रहा और अब इस वर्ष फिर तेजी से फैला है। यह बीमारी कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को जल्दी चपेट में लेती है जैसे कि निर्धन तबके के ऐसे लोग जो पहले से ही कुपोषण के शिकार हों या टीबी, अस्थमा तथा अन्य किसी बीमारी से ग्रस्त हों। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग सहज ही इसका इलाज नहीं करा पाते हैं क्योंकि इसका परीक्षण ही बहुत महंगा है। परीक्षण के लिए निजी अस्पतालों में पांच हजार से लेकर 10 हजार रुपए तक की राशि मनमर्जी से वसूली जाती है जबकि सरकारी अस्पतालों में इसके परीक्षण और दवा के स्टॉक न होने का रोना रोया जाता है। परिणाम स्वरूप लोगों की मौत होने लगती है। जब आंकड़े बढ़ना शुरू होते हैं और समाचार मीडिया में सुर्खियां बनते हैं तब सरकार की नींद खुलती है। केन्द्र सरकार ने कुछ बंदोबस्त किए हैं और सार्वजनिक चिकित्सा प्रणाली के जरिए दवा भी उपलब्ध कराई है परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। दवा की कमी तथा परीक्षण के लिए सरकारी अस्पतालों में मरीजों की लंबी लाइन के कारण इस रोग की दहशत भी बढ़ रही है। सरकारी अस्पतालों पर निर्भर मरीज जाएं तो जाएं कहां और इन अस्पतालों में न तो परीक्षण की समुचित व्यवस्थाएं हैं और न ही दवा का पर्याप्त स्टॉक है। सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के बीच लक्षणों में मामूली फर्क होने के कारण भी प्रारंभिक पांच-छह दिनों तक तो रोगी को स्वाइन फ्लू से ग्रस्त घोषित करने का निर्णय ही नहीं लिया जाता है और बाद में उसकी हालत मरणासन्न तक पहुंच जाती है। स्वाइन फ्लू की दवा मानी जाने वाली टेमीफ्लू दवा की कालाबाजारी भी होने के आरोप हैं। ऐसे में आम आदमी की चिकित्सा के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने के लिए नई सरकार को ईमानदार और ठोस प्रयास करने होंगे तभी मोदी के स्वस्थ भारत का सपना साकार हो सकेगा। इस तंत्र में वर्षों से दीमक लगी है जिसके कारण पूरा ढांचा ही खोखला हो गया है, जिसे दुरुस्त करना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेंगलूरु में एशिया के सबसे बड़े एयर शो ‘एयरो इंडिया’ के उद्घाटन अवसर पर अपने उद्बोधन में अपनी बात स्पष्ट कर दी कि अब भारत को रक्षा उपकरणों और हथियारों के नंबर-वन आयातक के ठप्पे से बाहर आने की जरूरत है। इतना ही नहीं, उनका जोर इस बात पर भी था कि भारत को इस क्षेत्र में भी समयबद्ध तरीके से ‘मेक इन इंडिया’ दृष्टिकोण को अपनाना होगा। इसके लिए यह जरूरी है कि अब जिन देशों के साथ भी हथियारों और रक्षा उपकरणों की डील हो उसमें यह शर्त भी शामिल हो कि वे देश उनके निर्माण की तकनीक भी साझा करेंगे ताकि भारत उस तकनीक का इस्तेमाल कर आने वाले वर्षों में वे उपकरण भारत में ही बनाने लग जाए और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए। यह दुखद है कि अब तक भारत में इस दिशा में प्रयास नहीं हुए कि रक्षा क्षेत्र में भी हमें आत्मनिर्भर होना चाहिए। अमेरिका, रूस, चीन जैसे विकसित देशों से हम खरीदी करते रहे और हमारे बजट का एक बड़ा हिस्सा विदेशों को जाता रहा।

अब प्रधानमंत्री की मेक इन इंडिया सोच से एक आशा की किरण जगी है और रक्षामंत्री के रूप में मनोहर पर्रिकर जैसा निर्विवाद नेता देश को मिला है जो बोलता कम है, काम करने में ज्यादा विश्‍वास करता है। मनोहर पर्रिकर ने साफ साफ दो बातें कही हैं कि हम स्वयं हथियार बनाएं और विदेशी तकनीक प्राप्त करें, इसके साथ साथ रक्षा खरीद प्रक्रिया को भी सरल बनाएं, यह जरूरी है। जटिल खरीद प्रक्रिया के कारण वर्षों तक हमारी सेना के लिए आवश्यक हथियार और उपकरण खरीदने में बाधाएं आती रहती हैं और हम जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाते हैं। रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि अब निर्णय लेने की भी समयसीमा तय की जाएगी और केवल सीमा ही तय नहीं की जाएगी बल्कि उसकी अनुपालना भी अनिवार्य रूप से की जाएगी। पर्रिकर ने कहा कि वे भाषण देने में नहीं बल्कि काम करने में विश्‍वास करते हैं।

गौरतलब है कि भारत को अपनी जरूरत की करीब 70 प्रतिशत रक्षा सामग्री आयात करनी पड़ती है। विदेशी मुद्रा के रूप में अरबों रुपए दूसरे देशों को चले जाते हैं। इतना सब होने के बावजूद आयातित सामान की गुणवत्ता पर भी समय समय पर सवाल खड़े होते रहे हैं। कई बार रक्षा सौदे विवादों का शिकार हुए हैं और इन विवादों के कारण रक्षा उपकरण और हथियार खरीदने में बाधाएं भी आईं। सौदे रद्द कर देने पड़े, खरीद प्रक्रिया और जटिल कर दी गई। कुल मिलाकर खामियाजा हमारे सुरक्षा प्रबंधों को ही भुगतना पड़ा। अब प्रधानमंत्री मोदी ने रक्षा क्षेत्र में आयात के युग को समाप्त करने की बात कही और इस क्षेत्र को भी मेक इन इंडिया अभियान से जोड़ दिया, यह एक अच्छा संकेत है। अब अनेक देशों ने भारत के साथ मिलकर रक्षा क्षेत्र संबंधी सामान के निर्माण में रुचि दिखाई है। विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर हमारी सक्षम कंपनियां रक्षा उपकरणों का निर्माण कर भारत को आर्थिक ताकत भी प्रदान कर सकती हैं। अंतरिक्ष और मिसाइल तकनीक में तो भारत ने अपना लोहा मनवा ही लिया है अब रक्षा उपकरणों के निर्माण में भी यदि आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए गए तो भारत एक महाशक्ति बनने के पायदान पर एक और कदम ऊपर चढ़ जाएगा।