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बाजार:

संपादकीय

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देश की दूरसंचार नीति के अनुसार बीते शुक्रवार से देशभर में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा लागू कर दी गई है। इस सेवा के मुताबिक कोई भी उपभोक्ता देश के किसी भी शहर या गांव से अगर और किसी क्षेत्र में स्थानान्तरित होता है तो नई जगह पर जाकर उसको अपने मोबाइल के लिए नया नंबर नहीं लेना पड़ेगा और वह अपने पुराने नंबर का उपयोग कर सकेगा। इस सुविधा से लोगों को अपने मोबाइल नंबर बदलने से होने वाली परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। साथ ही लम्बे अरसे से अगर किसी व्यक्ति के पास एक ही मोबाइल नंबर होता है तो उसे किसी भी तरह के काम के लिए ढूंढने वाले व्यक्ति को भी आसानी होती है। इससे पूर्व मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी सेवा सिर्फ क्षेत्रीय दूर संचार सर्कल तक ही सीमित थी। सरकार के इस फैसले का सबसे अधिक लाभ उपभोक्ता को ही होगा।
नब्बे के दशक में भारत में मोबाइल फ़ोन सेवा की शुरुआत हुई थी और इस सेवा के शुरुआती दौर में कई लोग मोबाइल फ़ोन को अपने सामाजिक रुतबे से जोड़कर देखा करते थे। लगभग 16 रूपए प्रति मिनट की दरों से शुरू हुई यह सेवा आज 1 पैसा प्रति क्षण पर पहुँच गई है। शुरुआती दौर में इस सेवा का उपयोग कर चुके लोगों को पता होगा, उस समय अगर वह किसी व्यक्ति का कॉल भी उठाते (इनकमिंग) तो उन्हें इस सुविधा का भी शुल्क भरना पड़ता था। मोबाइल सेवा से देश के दूरसंचार क्षेत्र में क्रांति आई है और साथ ही इस सुविधा ने देश के लोगों की ज़िन्दगी में तकनीक की मदद से काफी सहूलियत पेश की है। यह भी देखा गया है कि सरकार के दबाव और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण ही देश की निजी दूर संचार कंपनियों ने उपभोक्ताओं को अच्छी से अच्छी सुविधाएं प्रदान कराई हैं। अगर सरकार अपने नियमों को लागू करने में सख्ती नहीं बरतती तो आज भी आम जनता को कम्पनियों के फायदे अनुसार ही मोबाइल सेवा का उपयोग करना पड़ता। आज देश का शहरवासी अपने मोबाइल पर उपलब्ध सुविधाओं से और आधुनिक तकनीक की मदद से वह अपने जीवन को खुशनुमा बनाने में सफल रहा है। आज मोबाइल पर ही बिजली सुविधाओं का शुल्क भरा जा सकता है, घर परिवार के किसी भी सदस्य के लिए टैक्सी को मोबाइल के माध्यम से ही बुलाया जा सकता है, अगर किसी व्यक्ति को अपने से कोसों दूर रह रहे किसी परिजन को धन राशि भेजनी हो तो यह सुविधा भी मोबाइल के जरिए उपलब्ध है। साथ ही देश के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए भी मोबाइल पर कई अनोखी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, उदाहरण के तौर पर, किसानों के लिए उपज संबंधी जानकारियां, मौसम की स्थिति, क्षेत्रीय मंडियों में अलग अलग पदार्थों की मौजूदा कीमत की जानकारी आदि।
कम्पनियों को इस नई घोषणा से ख़ुशी नहीं होगी परन्तु सरकार के नियमों का पालन करना उनके लिए अनिवार्य है। दूरसंचार कंपनियों के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण भी आम उपभोक्ता को कई सेवाएं अच्छी दरों पर उपलब्ध हो रही हैं। उपभोक्ताओं को अपनी और आकर्षित करने के लिए समय-समय पर दूरसंचार कम्पनियॉं नई पेशकशों के साथ बाजार में अपने प्रतिद्वंंद्वी को पछाड़ने की होड़ में लगी हैं।

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आज़ादी के कई दशकों के बाद भी देश में विशिष्ट व्यक्तियों की जीवन शैली या उनकी ’वीआईपी संस्कृति’ में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। हालांकि यह संस्कृति देश की आज़ादी से पहले भी प्रचलन में थी परन्तु आज़ादी के इतने सालों के बाद भी इस संस्कृति ने देश के अनेक नागरिकों की मानसिकता पर अपनी पकड़ बना रखी है। इस वीआईपी संस्कृति को आम जनता एक और नाम से भी पहचानती है और वह है ’लाल बत्ती संस्कृति’। हाल ही में लेह से दिल्ली जा रहे देश के गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू और उनके साथ जम्मू और कश्मीर के उप मुख्यमंत्री निर्मल सिंह के लिए विमान में जगह बनाने के लिए एयर इंडिया के अधिकारियों ने अंतिम समय पर कथित रूप से विमान से एक परिवार के तीन लोगों को उतार दिया था। इस बात का पता लगते ही प्रधानमंत्री कार्यालय नेे विस्तृत जानकारी मांगी। केंद्रीय नागरिक उड्ययन मंत्री अशोक गजपति राजू को इस मामले में आगे आकर एयर इंडिया के अधिकारियों द्वारा उठाये गए इस कदम के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी और साथ ही जनता को यह भी आश्वासन देना पड़ा कि भविष्य में इस तरह की घटना फिर नहीं होगी।
राजू के आश्वासन से इतना तो साफ़ होता है कि केंद्र सरकार अपने सभी मंत्रियों और अधिकारियों से अनुशासन की उम्मीद करती है। किरण रिजीजू ने भी अपने बयान में यह कहा है कि उनको खुद पता नहीं था कि उनके लिए विमान में जगह बनाने के लिए किसी को उतारा गया है और साथ ही उन्होंने इस घटना के लिए खेद भी जाहिर किया। विपक्ष ने इस घटना के लिए किरण रिजीजू को दोषी माना और यह भी आरोप लगाए कि मंत्री के बोलने पर ही अधिकारियों ने विमान में उनकी जगह बनाई थी। क्या एयर इंडिया के अधिकारियों को उसी समय यह साफ़ नहीं कर देना चाहिए था कि किरण और उनके साथियों के लिए विमान पर जगह नहीं है और उन्हें अगली उड़ान का इंतज़ार करना होगा। एयर इंडिया पर भी इससे पहले देश के नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों को विशेष सत्कार देने के आरोप लगे हैं। शायद लेह से उड़ने वाला विमान अगर किसी निजी कंपनी का होता तो किरण रिजीजू और उनके साथ के लोगों को अगले विमान का इंतज़ार करना ही पड़ता।
अगर देश के नेता किसी अंतर्राष्ट्रीय सेवा के दौरान आम सुविधाओं से संतुष्ट होते हैं तो फिर देश में वह विशेष सुविधाओं की उम्मीद क्यों करते हैं? यह समस्या सिर्फ नेताओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि अग्रणी उद्योगपति, फिल्म कलाकार, क्रिकेट खिलाड़ी और ऐसे कई अन्य व्यक्तियों को अपने रुतबे को बरकरार रखने के लिए विशेष सुविधाओं की आदत पड़ गई है। कई बार देखा गया है कि हवाई अड्डों पर आम जनता के साथ कतार में खड़े रहने पर भी इन प्रतिष्ठित व्यक्तियों को परेशानी होती है। व्यंग यह भी है कि जिस आम जनता से अलग और विशेष होने के लिए ये व्यक्ति परेशान होते रहते हैं, इनको इस ओहदे पर पहुंचाने और इन्हेंे पद पर बैठाने वाली भी यही आम जनता है। भविष्य सिर्फ सादगी से रहकर अपने काम से अपनी पहचान बनाने वालों का ही है। देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर इसका अच्छा उदाहरण हैं और केंद्र सरकार के अन्य मंत्रियों को भी पर्रिकर की सादगी से सबक लेकर अपने ’विशिष्ट’ ओहदे की चाहत को छोड़ कर अपने काम पर ध्यान देने की जरूरत है।

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आर्थिक मंदी के इस मौसम में किसी भी व्यक्ति को अगर अपने वेतन में बढ़ोतरी मिलती है तो निश्चित रूप से वह खुश हो जाएगा। जहॉं एक तरफ आम आदमी को वार्षिक वेतन वृद्धि का इंतज़ार करना होता है और लगभग 5-8 प्रतिशत की वृद्धि से संतुष्ट होना पड़ता है वहीं दूसरी तरफ देश के सांसदों को वेतन वृद्धि का शानदार पैकेज मिल रहा है। देश के सांसदों को पहले से ही कई ऐसी सुविधाएं प्राप्त हैं जो शायद ही देश के किसी भी वरिष्ठ अधिकारी को मिलती हों परन्तु लगातार सांसदों की मांग पर फिर एक बार उनके वेतन और सुविधाओं में वृद्धि होने वाली है। पिछली बार सांसदों के वेतन में वृद्धि करीब चार साल पहले हुई थी। सांसदों की समिति ने ने फिर एक बार सिफारिश की है कि उनके वेतन में वृद्धि होनी चाहिए और इस सिफारिश को संभवत: जल्द ही लागू कर दिया जाएगा।
सांसदों को अपने वेतन को बढ़ाने के लिए सिर्फ एक संसदीय समिति द्वारा वेतन में वृद्धि की सिफारिश को मंजूरी देना होता है। इस बार सांसदों की मांग के अनुसार पेंशन में करीबन 75 प्रतिशत की वृद्धि होगी और साथ ही दुगने वेतन की अपेक्षा की गयी है। सांसदों का मौजूदा वेतन 50 हजार रुपए है और सांसदों ने इस धन राशि को निजी क्षेत्र के माध्यमवर्गीय अधिकारी से तुलना करते हुए वृद्धि की मांग की है। ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रति माह की निश्चित राशि के अलावा भी सांसदों को कई प्रकार के भत्ते मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर संसदीय सत्र में मौजूद रहने पर उन्हें प्रतिदिन 2000 रुपयों की राशि प्राप्त होती है। साथ ही प्रति वर्ष 20-25 हवाई यात्राओं का मुफ्त आनंद उठाने की अनुमति होती है। रेल यात्रा करते समय सांसदों को प्रथम श्रेणी वातानुकूलित यात्रा करने की सुविधा प्राप्त होती है। साथ ही रेल यात्रा के दौरान उनके सहयोगी को भी सुविधाएं दी जाती हैं। इसके साथ ही प्रतिवर्ष सांसदों के सरकारी निवास पर 5000 यूनिट बिजली और लगभग 50000 मुफ्त कॉल करने की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है।
अगर सांसदों को अपने वेतन को बढ़ाने के प्रस्ताव से जनता की आलोचना झेलनी पड़ती है तो इसका कारण वह खुद ही होते हैं। कई बार देखा गया है कि संसदीय सत्र के दौरान सांसदों द्वारा बहुत की ख़राब व्यवहार किया जाता है और उनके विरोध प्रदर्शन का तरीका भी सभ्य नहीं होता है। सत्र के दौरान होने वाले काम इसलिए अटक जाते हैं क्योंकि विपक्ष लगातार सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए हंगामा करता रहता है। कई बार अनेक दिनों तक कोई भी विधायी काम नहीं होता है परन्तु सांसदों को सत्र में मौजूदगी के लिए भी दैनिक भत्ता मिलता रहता है। यह तो तय है कि सांसदों का वेतन बढेगा, जिसे हो-हल्ला करने या चर्चा से रोका नहीं जा सकता परन्तु यह चर्चा उन्हें सोचने को बाध्य तो करेगी। संसद में जहां अनेक सांसद विद्वान और विवेकी प्रवृति के होते हैं वहीं कुछ सांसदों की असभ्य हरकतों से सभी पर सवालिया निशान लग जाता है। भविष्य में सांसदों को यह ध्यान रखना होगा कि उनके व्यवहार और कार्य शैली से आम जनता को किसी भी तरह से अघात न पहुंचे और सांसदों की मांगों को भी उनकी योग्यता और गुणवत्ता के आधार पर ही परखा जाए।

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देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को डिजिटल इंडिया परियोजना का उद्घाटन कर देश के विकास में एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है। इस परियोजना के तहत नरेंद्र मोदी देश की हर एक पंचायत को जोड़ना चाहते हैं और इसके लिए देश में इंटरनेट सेवा की सुविधाओं को बढ़ाते हुए ’ई-वाणिज्य’ को बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार की यह कोशिश है कि इस नई परियोजना से तकनीकी रूप से जुड़े हुए देश की परिकल्पना पूरी हो सकेगी। देश के दूरसंचार क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और साथ ही लाखों लोगों को रोजगार मिलने की भी उम्मीद है। सरकार ने इस परियोजना का उद्घाटन करने से पूर्व कुछ अंतर्राष्ट्रीय शोध पर अध्ययन करके यह पाया है कि वायरलेस इंटरनेट सेवा से ग्रामीण क्षेत्र के सर्वांगीण विकास को मजबूती मिलती है। देश के कई राज्यों की सरकारों द्वारा इंटरनेट पर विशेष सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं और राज्य की जनता को इनका लाभ पूर्ण रूप से तभी मिल सकेगा जब राज्यों के सभी इलाकों में इंटरनेट सेवा सुचारू रूप से प्रदान कराई जाएगी।
सरकार को ’डिजिटल इंडिया’ परियोजना की सफलता के लिए बहुत काम करना होगा। पहले तो देश के सभी छोटे बड़े कस्बों तक भी इंटरनेट सेवा पहुंचानी होगी और साथ ही यह भी कोशिश करनी होगी कि शुरुआती दौर से ही इंटरनेट की गति विश्‍व स्तरीय हो और इसके लिए देशभर में ऑप्टिकल फाइबर तारों का जाल बिछाना पड़ेगा। देश की राजधानी दिल्ली में चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने आश्‍वासन दिया था कि पूरी दिल्ली में वाई-फाई सेवा दी जाएगी जिसका क्रियान्वयन अभी तक शुरू नहीं हुआ है। साथ ही देश के कुछ ही शहरों में यह सेवा प्रदान कराई जा रही है। अगर पूरे देश को इंटरनेट सेवा से जोड़ना है तो दूरसंचार कंपनियों को यह ध्यान रखना होगा कि सिर्फ महानगरों में इंटरनेट की विशेष सुविधाएं प्रदान करने से समस्या हल नहीं होगी बल्कि देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित सेवाओं की सफलता पर ही यह सब निर्भर करेगा। कुछ वर्षों पूर्व तक देश में इंटरनेट सेवाएं सिर्फ तारों से जुडी प्रणाली पर ही आधारित थी परन्तु आज तकनीकी विकास की मदद से बिना तारों की सेवा (वाई-फाई) काफी लोकप्रिय होती नज़र आ रही है।
देश में मोबाइल फ़ोन उपयोग करने वालों की गिनती लगातार बढ़ रही है और वह दिन दूर नहीं जब इंटरनेट सेवा के इस्तेमाल के लिए कंप्यूटर से ज्यादा लोग अपने मोबाइल फ़ोन पर निर्भर होंगे। विश्‍व स्तर पर तकनीकी क्रांति की वजह से लगातार स्मार्ट फोनों के दाम गिरते जा रहे हैं और इन यंत्रों का इस्तेमाल करने वालों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है परन्तु देश की सरकार और दूरसंचार कंपनियों को आज भी दूरदराज क्षेत्रों में इंटरनेट सेवा पहुँचाने के लिए कई बुनियादी सुविधाओं को प्रदान करने में मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार की ’डिजिटल इंडिया’ परियोजना की सफलता मोबाइल फोनों पर इंटरनेट सेवा की उपलब्धि पर ही निर्भर है। देश के कई क्षेत्रों में घंटों तक बिजली नहीं रहती और ऐसे में मोबाइल अगर बंद हो जाएं तो कोई व्यक्ति इंटरनेट सेवा का लाभ कैसे लेगा। भारत सरकार की ’डिजिटल इंडिया’ परियोजना तब ही सफल होगी जब इंटरनेट सुविधाओं के साथ-साथ सरकार देश की जनता को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने में सक्षम रहे।

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मध्यप्रदेश सरकार की मुसीबत बना व्यापम घोटाला दिन प्रतिदिन सुर्खियां बटोर रहा है। इस घोटाले के सम्बन्ध में जिन अभियुक्तों को हिरासत में रखा गया है उनमें से अनेक की एक के बाद एक संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो चुकी है। इस घटनाक्रम से प्रशासन भी चिंतित है और इसकी गुत्थी सुलझाने की कोशिश में जुटा है। यह घोटाला वर्ष 2013 में उजागर हुआ था और तब से अब तक इस मामले से जुड़े 25 लोगों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है। हालांकि कुछ अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक यह संख्या 40 से भी अधिक है। इन लोगों में से डॉक्टर की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है और कई गवाहों ने न्यायालय से जांच की मांग की है। इस घोटाले की जांच स्पेशल टास्क फ़ोर्स द्वारा की जा रही है और उच्च न्यायालय इस जांच पर अपनी नज़र बनाए हुए है। विपक्ष ने सरकार पर इस मामले में कमज़ोर कार्रवाही का भी आरोप लगाया है।

इस घोटाले से मध्यप्रदेश सरकार की परेशानियां दुगनी हो गई हैं। एक तरफ घोटाले के सामने आने से सरकार की बहुत खिल्ली उड़ाई गई और वहीं दूसरी तरह इन रहस्यात्मक मौतों से भी मध्य प्रदेश सरकार की कार्य शैली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। सरकार की मुसीबत को और बढ़ाते हुए राज्य के गृह मंत्री बाबूलाल गौर ने यह कह दिया कि यह सभी मृत्यु सामान्य कारणों से हुई हैं और इनकी किसी भी तरह की जांच करने की जरूरत नहीं है। भारतीय जनता पार्टी केंद्र की तरह मध्यप्रदेश में भी अपने नेता शिवराज सिंह चौहान के समर्थन में खड़ी नज़र आ रही है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह की छवि एक साफ़ सुथरे नेता की है परन्तु व्यापम मामले में उनके रवैये से उनकी छवि पर भी असर पड़ा है। सरकार ने एक विज्ञप्ति जारी करते हुए अपने बचाव में कहा है कि अभी तक व्यापम घोटाले में 55 मुकदमे दायर किए गए हैंै और 2000 अभियुक्तों के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है। गौरतलब है कि इस घोटाले में लगभग 2500 लोगों का नाम सामने आया था। मध्यप्रदेश सरकार ने इस विज्ञप्ति में साफ़ किया है कि व्यापम घोटाले की तह तक जाने के लिए सरकार ने सभी आवश्यक कदम उठाए हैं और इस मसले में पूरी गंभीरता से जांच चल रही है।

व्यापम घोटाले की जांच में यह सामने आया है कि वर्ष 2008 से 2013 के बीच लगभग 1000 अयोग्य छात्रों को मेडिकल कालेजों में भर्ती कराया गया था। घोटाले के सामने आने के बाद इन विद्यार्थियों के प्रवेश को रद्द कर दिया गया था। शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश के विकास के लिए काफी सराहा गया है और वर्ष 2014 के आम चुनावों में भाजपा को मध्यप्रदेश से शानदार जीत हासिल हुई थी कई विशेषज्ञों ने मध्यप्रदेश में अच्छे प्रदर्शन का श्रेय शिवराज सिंह चौहान की विकासशील अगुवाई को दिया था। शिवराज सिंह को व्यापम घोटाले की वजह से विपक्ष का वार झेलना पड़ रहा है। उनको यह ध्यान रखना होगा कि उनकी साफ़ छवि पर किसी भी तरह की आंच न आए और इसके लिए अगर इन रहस्यात्मक मौतों की जांच करानी पड़े तो उन्हें बेझिझक इस मामले में फैसला लेते हुए जांच के आदेश देने चाहिएं। शिवराज सिंह को यह समझना होगा कि ऐसे किसी भी विवाद से सरकार को दूर रहना चाहिए जिससे आम जनता को सरकार पर किसी भी तरह का संदेह हो। मध्यप्रदेश की जनता ने शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के प्रति अपना भरोसा जताया है और इसे बरकरार रखने के लिए चौहान को आवश्यक कदम उठाने चाहिएं।

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मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने बलात्कार के एक मामले में बलात्कार की शिकार एक नाबालिग युवती को बलात्कारी से शादी करने का सुझाव दे दिया। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा दिए गए ऐसे सुझाव से देश की न्यायिक प्रणाली पर सवाल उठेंगे। जहॉं एक तरफ महिला सशक्तिकरण के लिए देश भर में अभियान चलाए जाते हैं वहीं दूसरी तरफ देश के वरिष्ठ बुद्धिजीवी व्यक्ति द्वारा दिए गए ऐसे बयान से देश के पुरुषों की मानिसकता उजागर होती है। न्यायाधीश ने ऐसा सुझाव देते वक्त यह भी नहीं सोचा कि बलात्कार की शिकार हुई उस नाबालिग युवती पर हुए दुष्कर्म के बाद भी उसकी पीड़ा ख़त्म नहीं हुई थी और वह गर्भवती हो गयी थी। मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा शिकार महिला को राहत के बदले और अधिक पीड़ा दी गई है। बलात्कार की शिकार किसी भी महिला के लिए उस सदमे से उभरना एक कठिन कार्य होता है और ऐसे में अगर बलात्कारी से महिला को रिश्ता जोड़ने को कहा जाए तो यह महिला का शोषण ही है। ऐसे फैसलों से दुष्कर्मियों का हौसला और बुलंद हो जाता है और महिलाओं की सुरक्षा पर एक खतरनाक साया मंडराने लगता है।

देश की महिलाएं सम्मान की पात्र हैं परन्तु उन्हें इस पुरुष प्रधान समाज में कई बार आक्रोश का सामना करना पड़ता है। न्यायाधीश का यह सुझाव देश के कानून के भी खिलाफ है जिसके अनुसार ऐसे दुष्कर्म करने वाले व्यक्ति से किसी भी तरह की सहानभूति नहीं दिखाते हुए उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाही का प्रावधान है। नाबालिग युवती ने साहस दिखाते हुए न्यायाधीश का यह निंदनीय सुझाव ठुकरा दिया है। इस मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि युवती का शोषण पहले बलात्कारी ने किया था और फिर गलत सुझाव देकर न्यायाधीश ने भी किया।

देश की न्यायिक व्यवस्था और समाज का दायित्व है कि किसी भी बलात्कार की शिकार महिला की पीड़ा पर जल्द से जल्द मलहम लगाई जाए और उनको उनके जीवन की नई शुरुआत करने में मदद की जाए। उन्हें बलात्कार के कलंक का सामना न करना पड़े यह भी हमारे समाज को सुनिश्‍चित करना होगा क्योंकि पहले से ही परेशान महिला पर ऐसे सामाजिक धब्बे से उसे सामान्य जीवन बहाल करने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

बलात्कार एक जघन्य अपराध है परन्तु इसके बावजूद कई बार देखा गया है कि घटना के बाद भी पीड़ित महिलाओं का सामाजिक शोषण जारी रहता है और आरोपी आराम से जमानत हासिल कर कारावास की दीवारों के बाहर आ जाते हैं। इस सुझाव की निंदा के साथ ही यह भी उम्मीद लगाई जानी चाहिए किइस मामले का संज्ञान लेते हुए उच्चतम न्यायालय निकट भविष्य में बलात्कार की शिकार महिलाओं के समर्थन में आदेश पारित करेगा। बलात्कार या हत्या जैसे निर्मम अपराधों में किसी भी तरह की मध्यस्थता और समझौते पर रोक लगनी चाहिए। देश में बलात्कार सम्बन्धी कानून मौजूदा स्थिति में काफी कड़ा है और न्यायालयों को यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरह के लापरवाह सुझाव या आदेश से न्यायिक प्रणाली की खिली उड़ सकती है। न्यायालय को सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं के खिलाफ देश भर में हो रहे अपराधों पर शिकंजा कसने के लिए ऐसे अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा सुनाई जाए।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन नई प्रमुख योजनाओं की घोषणा कर दी है और उम्मीद जताई जा रही है कि इन योजनाओं के सफल क्रियान्वयन से देश भर में शहरी जीवन की काया पलट जाएगी, चाहे छोटे शहर हों या कोई भी महानगर हो। स्मार्ट सिटी परियोजना, शहरों के विकास के लिए अमृत योजना एवं सभी के लिए आवास परियोजना की घोषणा कर प्रधानमंत्री ने देश में शहरों के विकास के लिए एक नए युग की शुरुआत कर दी है। हालांकि आवास और अमृत योजनाओं की तुलना पिछली सरकार की योजनाओं से काफी हद तक की जा सकती है परन्तु स्मार्ट सिटी परियोजना एक नई और परिवर्तनात्मक कोशिश है। विपक्ष का आरोप है कि अमृत योजना और आवासीय योजनाएं राजग सरकार के जेएनएनयुआरएम एवं राजीव आवास योजना का ही नया रूप है। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाए हैं कि सरकार किसी भी तरह की नई परियोजना नहीं ला रही है बल्कि राजग सरकार के समय शुरु की गई परियोजनाओं को नया नाम देकर जनता के सामने पेश कर रही है।
सरकार को नई योजनाओं की घोषणा करते समय पिछली सरकार की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन सम्बन्धी चुनौतियों के बारे में विस्तार से जान लेना चाहिए क्योंकि नई सरकार को भी पिछली सरकार की तर्ज पर ही चुनौतियों का सामना करना होगा। विपक्ष के आरोपों को अगर सही माना जाए तो भी नरेंद्र मोदी की सरकार ने आवास योजना और शहरी विकास योजना की घोषणा करने से पहले पूरी तरह से आने वाली समस्याएं और चुनौतियों को भांपकर उनका सामना करने की तैयारी कर रखी है। सरकारों के लिए नई योजनाओं की घोषणा करना आसान है और उन योजनाओं का सुचारु रूप से क्रियान्वयन मुश्किल। अगर केंद्र सरकार इन योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वयित कर देती है तो निश्चित रूप से देश भर में शहरी विकास के लिए यह सुनहरा युग साबित होगा।
सरकार द्वारा घोषित सभी योजनाएं विशाल और महत्वाकांक्षी हैं। 100 नई स्मार्ट सिटी को तैयार करना या 500 शहरों के जीर्णोद्धार के लिए नई कोशिशें आसान नहीं होंगी। देश के आर्थिक विकास से शहरी जीवन जुड़ा रहता है। देश की लगभग 30 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है और आने वाले दशकों में इस संख्या में तेजी से बढ़ोतरी होगी। स्मार्ट सिटी और अमृत योजना से सरकार देश के शहरों को इस विकास के लिए तैयार कर रही है और कोशिश कर रही है कि आने वाले समय में देश के शहर आधुनिक, कुशल और नयी जीवन शैली को अपनाने के लिए तैयार हों। देश के शहरों की सुविधाओं की तुलना अगर विश्व के विकसित देशों के समकक्ष शहरों से की जाए तो अभी भी भारत बहुत पीछे है और अभी इस दिशा में बहुत काम होना बाकी है।
बड़े शहरों के पास बसे छोटे शहरों से क्षेत्र को आर्थिक मजबूती मिलती है और इसके लिए सरकार को छोटे शहरों में भी अच्छी सुविधाएं प्रदान करनी होंगी मुख्य रूप से माध्यम और निचले वर्ग के लोगों के लिए। साथ ही आवासीय योजना से सरकार वर्ष 2022 तक लगभग 2 करोड़ से अधिक घर बनाएगी। इस योजना में राज्य सरकारों की अहम भूमिका रहेगी। सफल क्रियान्वयन के लिए सरकार को राज्यों की सरकारों के साथ मिल कर काम करना होगा। इन तीनों योजनों में हज़ारों करोड़ रुपयों के निवेश की अपेक्षा है और सरकार को ध्यान रखना होगा कि देश की जनता के धन का सही उपयोग हो।

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पिछले कुछ हफ़्तों से देश भर में पत्रकारों पर हो रहे हमले चिंताजनक हैं। कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश में एक पत्रकार जगेंद्र सिंह कि रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी। जहां परिवार का आरोप है कि गजेन्द्र को स्थानीय राजनेता एवं उत्तर प्रदेश के पिछड़ा विभाग मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा के इशारे पर जलाकर मार दिया गया था वहीं पुलिस के मुताबिक गजेन्द्र ने खुद पर केरोसिन छिड़ककर आत्महत्या की थी। गजेन्द्र सिंह ने अपनी फेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा था कि राम मूर्ति सिंह और उनके साथी क्षेत्र में अवैध खनन में शामिल हैं और गजेन्द्र को राम मूर्ति सिंह के आदमियों से जान का खतरा है। वहीं मध्यप्रदेश में एक और पत्रकार संदीप कोठारी को राज्य के मैंगनीज और रेत खनन माफिया द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया। उत्तर प्रदेश के एक और पत्रकार हैदर खान द्वारा अवैध खनन के खिलाफ लिखे गए लेख की वजह से उसके साथ बुरी तरह मारपीट करने के बाद उसे मोटरसाइकिल से बांध कर घसीटा भी गया। हैदर अस्पताल में भर्ती है और उसकी हालत गंभीर बताई जाती है। ये हमले सिर्फ इन पत्रकारों के खिलाफ नहीं हुए बल्कि क्षेत्र के अन्य सभी पत्रकारों के लिए एक छिपी हुई चेतावनी है कि अगर पत्रकार किसी भी तरह के गैर कानूनी मसले को उजागर करते हैं तो उसका अंजाम अच्छा नहीं होगा। देश की सरकारें पत्रकारों के खिलाफ होने वाले किसी भी तरह के अत्याचार का विरोध तो व्यक्त करती हैं परन्तु पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई भी विशेष कदम नहीं उठाए जाते हैं। इन हमलों के साथ ही पुलिस और प्रशासन का इस मुद्दे के प्रति रवैया भी काफी शर्मनाक है। जगेंद्र सिंह ने मरते वक़्त दिए गए बयान में साफ़ शब्दों में कहा था कि उनकी मौत का ज़िम्मेदार राम मूर्ति सिंह है परन्तु इसके बावजूद भी राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने मंत्री के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। पुलिस भी इस घटना को आत्महत्या घोषित करने में ही लगी नज़र आ रही है।

भारत को एक जीवंत लोकतंत्र माना जाता है और ऐसे समय में पत्रकारिता के खिलाफ हो रहे ये हमले बहुत ही दुखद हैं। पत्रकारों के खिलाफ समय समय पर हमले सदियों से होते आ रहे हैं। भारतीय प्रेस परिषद के मुताबिक पिछले 25 सालों में 75 से अधिक पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी है और सैंकड़ों पत्रकारों पर हमले हुए हैं। भारत एक लोकतंत्र है और ऐसे में पत्रकारों की हत्या गहरी साजिश की तरफ इशारा करती है। यह भी देखा गया है कि मारे गए अधिकतर पत्रकार ग्रामीण क्षेत्र के थे। पत्रकार अपनी ज़िन्दगियों को जोखिम में डालकर भ्रष्टाचार और गैर कानूनी हरकतों का खुलासा करते हैं। कई बार ऐसे खुलासों में यह भी देखा गया है कि आरोपियों को कुछ राजनेता और अधिकारियों का समर्थन मिल रहा था। इसलिए ये हमले पत्रकारों पर नहीं बल्कि देश के लोकतंत्र पर हुए हैं। देश की जनता को समझना होगा कि अगर पत्रकारों पर हो रहे इन हमलों को नज़रअंदाज़ किया गया तो भविष्य में देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है और कोई भी ताकतवर व्यक्ति देश की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कर सकता है। साथ ही सरकार को भी पत्रकारों के लिए कुछ विशेष सुरक्षा नियम बनाने होंगे जिसके तहत पत्रकार अपना काम बिना किसी भी तरह के डर या किसी के दबाव में आए भी पूर्ण रूप से स्वतंत्रता से कर सकें।

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देश भर के शहरों में तालाबों और झीलों की हालत बहुत खस्ता है। उन्हें लगातार प्रदूषित किया जा रहा है और क्षेत्रीय प्रशासन भी उनके रखरखाव में लगातार लापरवाही बरतता है। बेंगलूरु की झीलों की हालत भी देश के अन्य शहरों से बेहतर नहीं है। बेंगलूरु के सभी जल निकायों पर अतिक्रमण की समस्या मंडरा रही है। शहर की झीलों पर लगभग 45 प्रतिशत अतिक्रमण हो चुका है और यह लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा शहर भर से अनेक नाले भी इन झीलों में खुलते हैं। इन्हें प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। बेंगलूरु एक ऐसा शहर है जो बहुत ही तेज़ गति से विकसित हो रहा है और ऐसे में शहर की झीलों पर अतिक्रमण भी ज़ोरों पर है। हालांकि कर्नाटक के पर्यावरण सम्बन्धी कानून काफी सख्त हैं फिर भी अधिकारियों द्वारा इन्हें लागू करने में आलस नज़र आता है। कई बड़े भवन निर्माताओं, राजनेताओं और पुलिस की मिलीभगत से हमारी झीलें लगातार छोटी होती जा रही हैं। इस सांठगांठ से गैरकानूनी रूप से किए गए अतिक्रमण को कानूनी रूपरेखा का समर्थन मिल जाता है। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी झीलों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा भी कोई विशेष कानून नहीं बनाया गया है जिससे झीलों के संरक्षण को बढ़ावा मिल सके।

अब भी वक्त है और समय रहते इन झीलों को बचाया जा सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को साथ मिलकर पहले झीलों के अतिक्रमण को रोकने के लिए कड़े कानूनों को जनता के सामने लागू करना होगा। इसके साथ सभी झीलों में लापरवाही से गिराए जा रहे मलबे, निर्माण सामग्री एवं अनुपचारित कचरे पर रोक लगाना अनिवार्य है और यह तभी संभव है जब सरकारों और अधिकारों द्वारा कानूनों का सख्ती से पालन किया जाए। कई कारखाने भी अपने कचरे से झीलों में प्रदूषण फैलाते हैं। हाल ही में बेंगलूरु की एक झील में पहले झाग और बाद में आग की परत पाई गई थी क्योंकि उसमें छोड़े गए खतरनाक रसायनों के कारण से आग पकड़ ली थी। प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों के खिलाफ सख्त कार्रवाही के साथ उन पर आर्थिक दंड भी लगाया जाना चाहिए।

देश भर में जनता के बीच जागरूकता बढ़ी है और इसी कारण से अनेक शहरों में झीलों और तालाबों को बचाने के लिए लोगों और सामाजिक संस्थाओं ने छोटी बड़ी मुहिमें भी शुरू की हैं। जो कारखाने अपने कचरे का तकनीकी रूप से निपटान करते हैं और सफाई प्रक्रिया के पूरे होने के बाद ही झीलों में पानी को छोड़ते हैं उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। प्रशासन को विकास के साथ ही नागरिकों के जीवन की कुशलता का भी ध्यान रखना होगा। सरकार को झीलों का कायाकल्प करने के लिए एक विस्तृत पर्यावरण नीति बनाकर उसमें विशेषज्ञों के सुझावों के मुताबिक नियम बनाने होंगे। बेंगलूरु शहर का खुशनुमा मौसम इन्हीं झीलों की देन है और झीलों के लगातार अतिक्रमण से शहर की जलवायु पर भी असर पड़ेगा। समय रहते झीलों का संरक्षण शुरू कर देने से इस समस्या को सुधारा जा सकता है। इसके लिए प्रशासन, उद्योगपतियों और आम जनता को साथ मिलकर काम करना होगा और झीलों को सुन्दर बनाए रखने के लिए आगे आना होगा।

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देश भर के सभी बाज़ारों की छोटी एवं माध्यम वर्गीय दुकानों में नगदी लेन-देन काफी बड़ी संख्या में होते रहते हैं। विशेष तौर पर खुदरा व्यापार का बड़ा हिस्सा है नगदी लेन-देन। नकदी राशि देकर उत्पादों को खरीदने वाले व्यक्तियों पर सरकार की पकड़ नहीं रहती है और इस तरह के लेन-देन प्रमुख रूप से कर की चोरी के लिए भी किये जाते रहे हैं। देश भर के व्यापारी भी इस पद्धति में विश्‍वास रखते हैं क्योंकि नगदी राशि प्राप्त हो जाने से उनके द्वारा बेचे गए उत्पादों के लिए किसी भी तरह का इंतज़ार नहीं करना पड़ता है क्योंकि खुदरा व्यापारियों से ख़रीदे गए उत्पादों का अगर कोई व्यक्ति चेक से अथवा कुछ दिनों के बाद विलम्बित भुगतान करता है तो इससे उस छोटे व्यापारी के लिए कभी-कभी मुसीबत खड़ी हो जाती है क्योंकि कई बार उन्हें आगे थोक व्यापारियों को भुगतान करना होता है। कई बार नकदी लेन-देन की राशि करोड़ों में भी चली जाती है। अनेक विशेषज्ञों द्वारा लगाए गए अनुमानों के मुताबिक देश के सर्वाधिक नगदी लेन-देन ज़मीनों के खरीद फरोख्त में होते हैं। देश के रियल एस्टेट क्षेत्र में देखा गया है कि कई बार ज़मीन या फ्लैट के खरीददार सम्पति के मूल्य का बड़ा हिस्सा नकद राशि के द्वारा भुगतान करते हैं और बाकी का चेक के माध्यम से। इससे कर की चोरी भी होती है और साथ ही खरीदी गई सम्पति का मूल्य भी कम दिखाया जाता है। सरकार समय समय पर नकदी लेन-देन के खिलाफ कई तरह के अभियान चलाती रहती है। सरकार का यह भी अनुमान है कि देश के काले धन की समस्या का समाधान देश भर में होने वाले नगदी लेन-देन पर नकेल कसने से ही मिल सकेगा। इसी दिशा में सरकार द्वारा चलाए जा रहे नए अभियान के तहत क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड उपभोक्ताओं के लिए सरकार अनोखी योजना ला रही है और किसी भी तरह के खुदरा लेन-देन में अगर इन तकनीकी साधनों का इस्तेमाल करते हुए अगर कोई उपभोक्ता राशि का भुगतान करता है तो सरकार उनके लिए कर में प्रावधान के साथ-साथ कई अन्य प्रोत्साहन ऑफर भी उपलब्ध कराएगी।  सरकार ने एक प्रारूप तैयार कर लिया है जिसमें पेट्रोल स्टेशनों एवं रेल टिकट बनाने के लिए अगर कार्ड द्वारा भुगतान किया जाए तो इनसे किसी भी तरह का बैंक शुल्क नहीं लगेगा। साथ ही सरकार यह भी कोशिश कर रही है कि 1 लाख से अधिक लेन-देन को सिर्फ बैंक के इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया जाए। धीरे-धीरे अनेक योजनाओं के माध्यम से सरकार काले धन पर अपनी पकड़ बनाती नज़र आ रही है। काले धन पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है कि सरकार नागरिकों के सभी लेन-देनों का किसी न किसी रूप से सत्यापन कर सके। सरकार को भविष्य में वित्तीय विभाग और कर विभागों को आधार से भी जोड़ना होगा। नगदी अर्थव्यवस्था देश की प्रगति के लिए बहुत बड़ी बाधक है।  सरकार को निजी क्षेत्र से भी धीरे-धीरे नगदी लेन-देन को खत्म करने के लिए योजनाओं की शुरुआत करनी पड़ेगी। सरकार काले धन पर अपने रुख से साफ़ कर चुकी है कि भविष्य में और अधिक कड़े कदम को उठा कर देश के विकास के लिए अर्थवस्था में स्थिरता लाने में अपनी कोशिश जारी रखेगी।