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संपादकीय

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पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार ने कालेधन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद विदेशी बैंकों में कालाधन छिपाने वालों के नाम नहीं बताने का जो कारण दिया था, वही कारण नरेंद्र मोदी की सरकार ने भी कोर्ट को बताया है। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि इस कारण के होते हुए कोई भी सरकार कालाधन स्विस बैंकों में छिपाने वालों के नाम सार्वजनिक नहीं कर सकती है। इसके बावजूद लोगों में निराशा है। यह समझने वाली बात भी है। इस निराशा और वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा अदालत में दी गई दलील पर उपजे सवालों को खारिज नहीं किया जा सकता। यह संतोष की बात है कि जेटली ने इन सवालों को खारिज किया भी नहीं। उन्होंने सारे सवालों का जवाब फेसबुक जैसे सार्वजनिक मंच पर देने का निर्णय लिया। उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखी है। उन्होंने दोहरा कराधान रोकने के लिए विभिन्न देशों के साथ की गई संधि के खिलाफ कदम उठाने से होने वाले नुकसान का अंदाजा भी देशवासियों को करवाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की पूर्ववर्ती सरकार की मंशा यह थी कि करचोरी करनेवाले, अवैध धन कमाने वालों की पहचान न तो अदालत में उजागर की जाए और न ही आम जनता के सामने उन्हें बेनकाब किया जाए। वहीं, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंघन (राजग) की सरकार यह चाहती है कि देश को कई दशक पीछे ले जानेवालों को उचित प्रक्रिया पूरी करने के बाद बेनकाब किया जाए। उन्होंने कहा है कि कर विभाग इस मामले की विस्तृत जांच कर रहा है। इसमें विभाग को विदेशी बैंकों के सहयोग का भरोसा भी दिलाया गया है। जांच के बाद विभाग की तरफ से कालाधन जमा करनेवालों के खिलाफ अदालत में अलग-अलग मामले दर्ज करवाए जाएंगे। निश्‍चित तौर पर अगर कालाधन इकट्ठा करने वालों के खिलाफ यह प्रक्रिया इसी प्रकार से शुरू की गई तो किसी को इससे कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। वहीं, अगर प्रक्रिया पूरी करने से पहले ही वित्त मंत्रालय अदालत में या अदालत से बाहर करचोरों के नाम किसी भी तरह से उजागर करता है तो यह विभिन्न देशों के साथ विश्‍वासघात करने जैसी बात होगी।
उधर, वित्त मंत्रालय के तहत आनेवाले आयकर विभाग के अधिकारी कालेधन के मामले में सक्रियता के साथ काम करते हुए नजर आ रहे हैं। विभाग की एक टीम ने 15 अक्टूबर को स्विट्जरलैंड जाकर वहां के एचएसबीसी बैंक के शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत की है। वहां इन अधिकारियों ने एक स्वतंत्र जांच की है और स्विस बैंक से आश्‍वासन प्राप्त किया है कि उन भारतीयों के नामों की सूची भारत को उपलब्ध करवाई जाएगी जिनके खाते स्विस बैंक में मौजूद हैं। बहरहाल, बैंक खातों में जमा की गई रकम के गैर कानूनी होने के संबंध में विस्तृत सबूत उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भारतीय पक्ष की होगी। इसी प्रकार, भारत को इस बारे में कोई भी सूचना या जानकारी मिलती है तो उसका सत्यापन स्विस बैंक से करवाया जा सकेगा। अब भारत और स्विट्जरलैंड के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर करने पर बातचीत चल रही है, जिससे दोनों पक्ष स्विस बैंक में भारतीय खाताधारकों के धन की वैधता के बारे में अपने-आप जांच-पड़ताल शुरू कर सकेंगे। यह निश्‍चित रूप से कालेधन के खिलाफ जंग में मील का एक पत्थर साबित हो सकता है। अरुण जेटली की इस बात में दम दिखता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार स्विस बैंक के खाताधारकों के नाम उजागर कर दिए जाने से उनको स्विट्जरलैंड सरकार पर अपने खातों की जानकारी भारत को नहीं देने का दबाव बनाने का मौका मिल जाएगा। उन्हें कानून के तहत अपना बचाव करने का मौका मिल जाएगा। जरूरी है कि सरकार को अपना काम पूरा करने दिया जाए।

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भूमंडलीकरण और आर्थिक विकास की प्रक्रिया ने इधर समाज में आवाजाही बढ़ाई है, जिससे नागरिकों में एक नया रिश्ता बना है लेकिन मन की दूरियां मिटने के बजाय और बढ़ गई हैं। यही बात पूर्वोत्तर राज्यों के छात्रों के साथ अन्य राज्यों में होनेवाले दुर्व्यवहार में सामने आती है। नई दिल्ली में इस वर्ष जनवरी में पूर्वोत्तर के एक छात्र नीडो तानिया की हत्या के बाद से इस प्रकार के मामले रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। बेंगलूर में कन्नड़ भाषा में बात न करने पर मणिपुर के तीन छात्रों की स्थानीय लोगों ने बेदर्दी से पिटाई कर दी, जबकि अगले ही दिन गुड़गांव के सिकंदरपुर में नगालैंड के दो छात्रों के साथ मारपीट की गई। पिछले महीने दिल्ली के लाजपत नगर इलाके में एक लड़की और दो लड़कों के साथ ऐसा ही हुआ था। इसके ठीक एक दिन बाद नई दिल्ली के मुनिरका इलाके में एक पूर्वोत्तर की युवती की बेरहमी से हत्या कर दी गई। दिल्ली-एनसीआर हो या बेंगलूर, हर जगह पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों को निशाना बनाया जा रहा है। दो वर्ष पहले बेंगलूर में ही शरारती तत्वों की अफवाह से डरकर पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों में दहशत फैल गई थी। वह हजारों की तादाद में शहर छोड़कर भागने लगे थे। यह ऐसी समस्या है, जिसका समाधान कानून से नहीं, नजरिया बदलने से निकलेगा। कानून तो अपना काम करेगा ही, पर जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज, दोनों ही स्तरों पर लोगों को आपस में जोड़ने की पहल शुरू हो। हालांकि पूर्वोत्तर के छात्रों के पलायन के बाद कर्नाटक और असम की सरकारों ने आपस में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कदम उठाए थे और दोनों हिस्सों के लोग एक-दूसरे के साथ घुलने-मिलने भी लगे हैं लेकिन नवीनतम घटना से स्पष्ट है कि हाल की घटना यह किसी निहायत आपराधिक सोच वाले व्यक्ति द्वारा अंजाम दी गई है। यह स्वागत योग्य है कि शहर के अधिकांश लोग इस घटना की निंदा करते सुने जा रहे हैं। चूंकि यह मामला भाषा से जोड़ दिया गया है और कर्नाटकवासी अपनी भाषा से प्रेम करते हैं इसलिए एक वर्ग यह कहता सुना जा रहा है कि मामला संदिग्ध है। इस वर्ग के लिए यह समझना जरूरी है कि नस्लभेद के कई स्वरूप होते हैं। इनमें रंगभेद, जातिभेद, भाषा-भेद और क्षेत्रवाद जैसे अन्य कई प्रकार के भेदभाव बरते जाते हैं। यह सभी भेद-भाव नितांत निंदनीय हैं और समाज को बांटने वाली मानसिकता की उपज होते हैं।
सच यह है कि अलग-अलग संस्कृतियों के बीच मेलजोल की रट लगाते हुए हमारे समाज में अभी तक शायद विविधता का सम्मान एक संस्कार नहीं बन पाया है। खासतौर पर मणिपुर, नगालैंड या अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों से पढ़ाई-लिखाई या रोजी-रोजगार के लिए महानगरों का रुख करने वाले युवाओं को किस तरह का व्यवहार झेलना पड़ता है, यह सब जानते हैं। अक्सर ऐसी खबरें आती रही हैं कि किसी राज्य में दूसरे राज्य के लोगों को प्रताड़ित करने के लिए उनकी अलग भाषा-संस्कृति को आधार बनाया गया। इस तरह के दुराग्रहों के निशाने पर सबसे ज्यादा पूर्वोत्तर के लोग रहे हैं। कुछ समय पहले एक सर्वेक्षण में तथ्य उजागर हुए कि दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भेदभाव होता है, उनके रहन-सहन या कुछ अलग तरह के पहनावे आदि को लेकर ताने कसे जाते हैं, मखौल उड़ाने वाली टिप्पणियां की जाती हैं। ऐसे व्यवहार पर वे आमतौर पर चुप ही रह जाते हैं, लेकिन अगर कभी आपत्ति जताते हैं तो उनके साथ मार-पीट की जाती है। ऐसी हरकतों का मूल कारण यह है कि पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों को तो स्थानीय चाल-चलन के बारे में पर्याप्त जानकारी होती है लेकिन अन्य राज्यों के लोगों को वहां से आकर अपने राज्य में बसे लोगों की संस्कृति के बारे में बहुत ही कम जानकारी होती है। पूर्वोत्तर के बारे में उत्तर या दक्षिण भारत में यह धारणा है कि यह राज्य अलगाववादी हैं। यह धारणा अब गलत साबित हो चुकी है।

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लगभग तीन महीने पहले इबोला के विषाणुओं के जानलेवा संक्रमण और गंभीर खतरे को देखते हुए विश्‍व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे महामारी बताते हुए वैश्‍विक स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा की थी। इस घातक बीमारी की रोकथाम की तमाम कोशिशों के बावजूद इस वर्ष अब तक इबोला की चपेट में आकर दुनिया के अलग-अलग देशों में जान गंवाने वाले लोगों की तादाद चार हजार से ऊपर पहुंच चुकी है। भारत के लिए फिलहाल यह राहत की बात है कि यहां अभी तक इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है। इसके बावजूद सावधानी बरतने की जरूरत हमारे लिए भी है। हमारे देश में चिकित्सा तंत्र की जो हालत है उसमें मामूली-सी चूक या लापरवाही भी महंगी पड़ सकती है। जरूरत इस बात की है कि दूसरे देशों से भारत में प्रवेश के तमाम रास्तों पर गहन जांच की व्यवस्था कर बचाव के इंतजाम जरूर किए जाएं। दुनिया के सबसे विकसित देशों का चिकित्सा तंत्र भी इस रोग के सामने लाचार नजर आ रहा है और अब भी यह बीमारी लाइलाज है। न तो इसके विषाणुओं की रोकथाम हो पा रही है और न ही इसके संक्रमण से बीमारी की चपेट में आने वालों के इलाज में सफलता मिल रही है। इबोला के विषाणु सबसे पहले वर्ष 1976 में सूडान और कांगो में पाए गए थे और उसके बाद पूरे उप-सहारा रेगिस्तान के उष्णकटिबंधीय इलाकों में भी इसके विषाणु फैल गए थे। तब से कोई भी वर्ष ऐसा नहीं गुजरा जब इसका असर देखने में न आया हो। तब से लगभग हर वर्ष कम से कम एक हजार लोग इसकी जद में आते रहे हैं। जब भी इबोला का कहर चर्चा में आ जाता है, सारे विकसित देश अपने यहां इससे निपटने के तमाम इंतजाम करते हैं, हवाईअड्डों समेत सभी प्रवेश मार्गों पर लोगों की गहन स्वास्थ्य जांच की जाती है। लेकिन एक खास समय तक कहर बरपाने के बाद इस बीमारी का जोर कम हो जाता है और इसके बाद फिर सब कुछ पहले की तरह आश्‍वस्ति-भाव से चलने लगता है। शायद यही बेफिक्री इबोला के बेलगाम हो जाने की एक बड़ी वजह है। हाल में डब्ल्यूएचओ ने जो नए आंकड़े इबोला के बारे में जारी किए हैं, वह खासे चौंकानेवाले हैं। इस आंकड़े में कहा गया है कि इबोला दुनिया में नियंत्रित होने के बजाय अपने पैर पसारता जा रहा है। हर हफ्ते दुनिया के विभिन्न देशों में 10 हजार लोग इस विषाणु के संक्रमण का शिकार हो रहे हैं। इनकी विस्तृत जांच के बाद इनमें इबोला विषाणु की उपस्थिति की जानकारी मिल रही है।
बंदर, चमगादड़ और सूअर के खून या शरीर के तरल पदार्थ से फैलने वाले इबोला वायरस की चपेट में अगर कोई इंसान आ जाता है तो उसके बाद इस पर काबू पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर प्रभावित व्यक्ति को पूरी तरह से अलग-थलग न रखा जाए और उसकी देखरेख में लगे लोग उच्चस्तर के सुरक्षा इंतजामों से लैस न हों तो यह तुरंत आसपास के दूसरे लोगों में फैल सकता है। इसका खतरा ज्यादा घातक इसलिए है कि अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज या टीका नहीं खोजा जा सका है। इसकी जद में आए व्यक्ति को पहले बुखार आता है, फिर यह सिर और मांसपेशियों के दर्द के अलावा यकृत और गुर्दे तक को बुरी तरह अपनी चपेट में ले लेता है। इसमें पहले भीतरी और फिर बाहरी रक्तस्राव के बाद मरीज के बचने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है। यही नहीं, इस रोग से प्रभावित व्यक्ति की अगर मौत हो जाती है और उसके शरीर को सुरक्षित तरीके से पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता है तो आसपास इसके वायरस की जद में दूसरे लोग भी आ सकते हैं। इस बार अफ्रीकी देश गिनी के दूरदराज वाले इलाके जेरेकोर से शुरू हुआ इबोला वायरस का संक्रमण सिएरा लियोन, लाइबेरिया और नाइजीरिया तक सिमटा है लेकिन अगर पूरी सावधानी नहीं बरती गई तो कहीं भी एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

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हाल के समय में अर्थतंत्र के मोर्चे पर भारत को एक खुशखबरी और जनस्वास्थ्य के मामले में संतोषजनक खबर मिली है। खुशखबरी तो यह कि महंगाई की दर पिछले पांच वर्षों के न्यूनतम स्तर पर आ चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के लिए खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़े राहत का पैगाम लेकर आए हैं। संतोष की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की तरफ से हर वर्ष जारी किए जाने वाले वैश्‍विक भूख सूचकांक में इस बार भारत की हालत थोड़ी सुधरी है। दोनों का एक-दूसरे से कितना संबंध है, यह तो तत्काल नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह जरूर है कि आर्थिक मोर्चे और जनस्वास्थ्य के क्षेत्रों में उठाए गए अब तक के कदमों का असर नजर आने लगा है। यह बहस बाद की बात है कि यह पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का असर है या मौजूदा सरकार की नीतियों का। दोनों मसलों पर आंकड़ों की बाजीगरी का संदेह भी तत्काल नहीं जताया जा सकता है। अभी की स्थिति में जमीनी सच यह है कि सितंबर की थोक महंगाई दर अक्टूबर 2009 के बाद से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। यही नहीं, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक भी जनवरी 2012 के बाद सबसे नीचे पहुंच चुका है। इस त्यौहारी मौसम में यह सबके लिए राहत की बात है। सो, इन आंकड़ों में राजनीतिक उठा-पटक के संकेत तलाशने को पीड़ापसंद मानसिकता ही कहा जाएगा। यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है कि जिस समय लोगों को महंगाई की मार से निजात मिलने की उम्मीद जग रही है, उसी समय देश में भुखमरी घटने की जानकारी मिली है। चूंकि यह रिपोर्ट एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने जारी की है, इसलिए यह नहीं हो सकता है कि इसने दुनिया भर में भूख का निर्धारण करने के लिए पूर्ववर्ती संप्रग सरकार की तरह गरीबी निर्धारण वाला छिछला नजरिया अपनाया होगा। यह कोई सरकारी संगठन नहीं है और न ही इसे आंकड़ों से खिलवाड़ करने का कोई राजनीतिक फायदा हासिल करने की चाह होगी। इसकी ईमानदारी इस बात से ही जाहिर है कि भारत को 76 देशों की सूची में 55वें स्थान पर रखते हुए भी ध्यान दिलाया गया है कि यह अब भी ज्यादा शोचनीय स्थिति वाले देशों की कतार में है। वहीं, देश के लिए संतोषजनक यह है कि इसी सूची में भारत पिछले वर्ष 63वें स्थान पर था तो आठ स्थानों का इजाफा यों ही नहीं हुआ होगा और जमीनी स्तर पर काफी काम हुआ होगा।
महंगाई की बात पर लौटें तो इस वर्ष कमोबेश सभी रोजमर्रा की जरूरत वाली वस्तुओं के दाम बढ़ने के बजाय स्थिर हैं। पेट्रोल और डीजल के दामों में होने वाली कमी अप्रत्याशित तो है लेकिन इससे लंबी अवधि में दूरगामी लाभ मिलने की उम्मीद जरूर बंधती है। लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी के बड़े-बड़े दावों पर यकीन कर उन्हें केंद्र की सत्ता सौंपने वाली जनता की उम्मीदों को पंख लग गए थे। मोदी सत्ता में आने के बाद जब छोटी-छोटी पहल करने लगे तो उन्हें इससे बड़ी निराशा होने लगी। जब मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर सख्त फैसले लेने की घोषणा की तो उनकी जोरदार आलोचना तक हुई लेकिन मोदी के विदेश दौरों से दुनिया भर में भारत की आर्थिक सुस्ती और यहां पूंजी निवेश करने पर होने वाले लाभ की निश्‍चितता के बारे में लोगों की सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। देश की साख में सुधार भी हो रहा है। यह सब कुछ आंकड़ों की बाजीगारी होगी यह कहने का अभी कोई कारण सामने नहीं आया है। बहरहाल, देश में अपेक्षित पूंजी निवेश आने और उसके परिणामों के नजर आने में निश्‍चित तौर पर वक्त लगेगा। रोजगार निर्माण से पहले तो काफी काम नए सिरे से शुरू करना होगा। फिर भी, अच्छे दिनों के वादे पर सत्ता में आई इस सरकार के लिए चीजें सही पटरी पर चलती दिख रही हैं।

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इस तूफान का धर्म था तबाही मचाना और आंध्र प्रदेश व ओडिशा के साथ ही केंद्र सरकार का धर्म था इसके तांडव से अपने नागरिकों की जान बचाना। दोनों ने अपना-अपना धर्म निभाया। यह संभव इसलिए हो सका कि समुद्री चक्रवात हुदहुद के बारे में मौसम विभाग ने बिल्कुल सटीक चेतावनी दी और राहत-बचाव के कार्य में तीनों सरकारों ने कोताही नहीं बरती। अगर मौसम विभाग अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा की गई भविष्यवाणी पर विश्‍वास करता तो लोगों में घबराहट बढती और राहत कार्य में भी दिक्कतें उत्पन्न हो सकती थीं। ऐसा न कर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अपनी ही गणनाओं पर अधिक भरोसा किया और उपग्रह मानचित्रों का विश्‍लेषण बिल्कुल शत-प्रतिशत सही किया गया। इससे ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटवर्ती इलाकों से लाखों लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों की तरफ भेजना संभव हुआ। तूफान की चपेट में आने से संपत्ति का नुकसान चाहे जितना भी हुआ हो, जान का नुकसान न्यूनतम रहा। तूफान की ताकत के बारे में मौसम विभाग लगातार अपडेट्स देता रहा। इससे भी उन स्थानों के लोगों को भ्रम से बचाया जा सका जो हुदहुद की चपेट में आने वाले थे। वास्तव में अंतरिक्ष में बड़ी छलांग लगाने को ही नहीं, बल्कि मौसम की सटीक भविष्यवाणी का यह मामला भी नए भारत की छवि दिखाता है। एक दशक से कम समय पहले भी इस प्रकार की आपदा में सैकड़ों नहीं, हजारों लोग मारे जाते थे। अब यह विश्‍वास जागा है कि ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से निजात पाने में भारत हमेशा सक्षम होगा। आखिरकार हम लगातार दो वर्ष में दो तूफानों का सफलता के साथ सामना कर चुके हैं। दोनों बार हमने देखा कि इनके बारे में सटीक चेतावनी देने से हजारों लोगों की जान बचाने में सफलता मिली। पिछले वर्ष ओडिशा सरकार ने अपने कुशल आपदा प्रबंधन के जरिए देश के दर्ज इतिहास में फैलिन जैसे सबसे ताकतवर तूफान में एक भी मौत नहीं होने दी थी। वहीं, हुदहुद से आंध्र प्रदेश और ओडिशा में हुई मौतों की संख्या र्सिु 24 बताई गई है। बड़े स्तर पर जनहानि रोकने में हम सफल रहे। कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका में आए विध्वंसकारी समुद्री चक्रवाती तूफान कैटरीना ने वहां जान और माल दोनों को इससे कहीं अधिक नुकसान पहुंचाया था।
जो भी हो, बीते तीन-चार वर्षों से भारत, चीन अमेरिका, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, फिलिपींस और श्रीलंका में जिस तरह से तूफान, बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, बवंडर और कोहरे के जो भयावह मंजर देखने में आ रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में प्रकृति से किया गया कोई न कोई अन्याय तो जरूर अंतर्निहित है। श्रीलंका में आए समुद्री तूफान से तीन लाख 25 हजार लोग बेघर हुए थे और करीब 50 लोग मारे गए थे। इसकी भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां की थल, जल और वायु सेना के 28 हजार जवानों को राहत कार्य में लगाना पड़ा था। ऐसे ही समुद्री तूफान से ऑस्ट्रेलिया में और भी भयानक हालात बने थे। करीब 40 लाख लोग बेघर हुए थे। ब्रिस्बेन शहर में ऐसी कोई बस्ती शेष नहीं रही थी, जो जलमग्न न हो गई हो। पानी से घिरे लोगों को हेलीकॉप्टर से निकालना पड़ा था, फिर भी सौ लोग मारे गए थे। हुदहुद तूफान के बाद यह तो मानना पड़ेगा कि हम विज्ञान और तकनीकी रूप से इतने सक्षम हो गए हैं किसी भी आपदा का सामना कर सकते हैं। अगर कोई चाहे तो उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में आपदा राहत की तैयारी की कमी की तरफ उंगली उठाकर इस संतोष पर सवाल खड़ा कर सकता है लेकिन इस बात में शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि ओडिशा और आंध्र प्रदेश में सूचना और तैयारियों का अपेक्षित तालमेल बनाने में सफलता मिली। उम्मीद की जा सकती है कि फैलिन और हुदहुद तूफानों से रक्षा और बचाव की कार्रवाई के बाद भारत में आपदा प्रबंधन और परिपक्व होता जाएगा।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महत्वाकांक्षी योजना सांसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) का शुभाररंभ कर दिया है। इस योजना से हर वर्ष देश के 800 गांवों का समेकित विकास हो सकेगा। यानी इन गांवों में जीवन का हर पहलू बेहतर विकसित होगा। सांसद अपनी निधि से आज भी गांवों का विकास कराते हैं, लेकिन यह टुकड़ों में होता है और व्यक्तिगत लाभ वाले काम अधिक होते हैं। इससे गांवों में विकास नजर नहीं आता है। विकास के नाम पर वही हैंडपंप, सबमर्सिबल पंप, खरंजा सड़कें, नालियां ही बनाई जाती हैं। गांवों में सबमर्सिबल पंपसेट्स लगवाने की कहानी यह होती है कि इन पर किसी-न-किसी दबंग का कब्जा होता है। वह उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है। सांसद द्वारा सबके लिए उपलब्ध कराई गई सुविधा व्यक्ति विशेष की संपत्ति बन जाती है। प्रत्येक सांसद को अपने-अपने क्षेत्र में विकास कार्य करने के लिए सांसद क्षेत्रीय विकास निधि से करोड़ों रुपए मिलते हैं। इस फंड से सांसद के प्रस्ताव पर विकास का काम होता है। काम का ठेका भी सांसद की पसंद के व्यक्ति को दिया जाता है। अधिकांश सांसद स्कूल भवन बनाने के लिए धन देना पसंद करते हैं। इससे योजना में गड़बड़झाला होता है। कई बार सांसद निधि से होने वाले काम की जांच में पाया गया कि सांसद और स्कूल संचालक की मिलीभगत से घोटाला हो जाता है। धन सिर्फ कागज पर दिया जाता है और जमीन पर कोई काम नहीं होता और न ही दिखता है। एक क्षेत्र का सांसद दूसरे क्षेत्र के स्कूलों को पैसा देता है। अधिकारियों का हाल यह है कि वे सांसद निधि से कराए जाने वाले कार्यों की सूची मीडिया को देने से बचते हैं। किस सांसद ने अपने फंड से क्या काम करवाया और कहां करवाया, यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है। हैरत की बात है कि सांसद निधि से पैसा खर्च तो हो रहा है लेकिन विकास नहीं होता।
सो, नई योजना एक नया प्रयोग मानी जा सकती है। एक ग्राम का चयन करके उसका विकास करना बड़ी बात होगी। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रयास की समीक्षा खुद करने जा रहे हैं तो उम्मीद की जा सकती है कि सांसद अपना पुराना रवैया छोड़कर जमीनी काम में दिलचस्पी लेंगे। यानी, एक संसदीय क्षेत्र का एक गांव तो विकसित होगा। यह कहा जा सकेगा कि यह विकसित गांव है। वैसे, कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि यह कोई नई योजना नहीं है। उत्तर प्रदेश में आदर्श ग्राम योजना चल रही है। कई राज्यों में अंबेडकर ग्राम योजना और गांधी ग्राम योजना का प्रयोग हो चुका है। उत्तर प्रदेश में तो अभी लोहिया ग्राम योजना क्रियान्वित की ही जा रही है। लेकिन यह देखना जरूरी है कि इसके बाद भी गांवों का संपूर्ण विकास नहीं हुआ है। आधे-अधूरे और गुणवत्ताहीन काम गांवों पर दाग बन जाते हैं। बहरहाल, सांसद आदर्श ग्राम योजना में एक समस्या गांव के चयन की होगी। प्रधानमंत्री ने इस योजना का शुभारंभ करते हुए इसका संकेत भी दिया, जब उन्होंने सांसदों से अपने मूल गांव या ससुराल वाले गांव से हटकर दूसरे किसी गांव का विकास करने की बात कही। चूंकि भाजपा सांसदों को हर गांव से जोरदार समर्थन मिला है, तो हर कोई उन पर अपना हक जताएगा। समस्या यह होगी कि सांसद कैसे किसी गांव का चयन करे? इसके बावजूद यह जरूरी होगा कि इस योजना के क्रियान्वयन में अधिकतम पारदर्शिता हो। इस योजना की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से की थी। उसके साथ ही सांसदों को अलग-अलग ग्राम पंचायतों के फोन भी आने लगे थे इस अनुरोध के साथ कि फलां गांव को विकास कार्य के लिए चुना जाए। यह योजना जय प्रकाश नारायण की जयंती पर शुरू की गई। जेपी भी गांवों के समग्र विकास की वकालत किया करते थे। आशा की जानी चाहिए कि अब गांवों के भी अच्छे दिन आएंगे।

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भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई को इस वर्ष शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। किसी पाकिस्तानी और भारतीय को संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार के लिए चुने जाने का यह पहला मौका है। यह पल दोनों ही देशों के लिए गौरव का है, लेकिन विडंबना यह रही कि इस घोषणा के समय भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे पर मोर्टार दाग रही हैं। दोनों देशों के नागरिकों को संयुक्त रूप से मिलने वाले इस शांति के नोबेल पुरस्कार की घोषणा ने एक बार फिर साबित किया है कि समाजनीति राजनीति से कहीं महान और व्यापक होती है। जेपी के आंदोलन के ठीक बाद हुए चुनाव में उस आंदोलन से उपजे कई युवा राजनीति में चले गए थे। कैलाश सत्यार्थी की भी जेपी आंदोलन में खासी भूमिका रही थी, लेकिन उन्होंने राजनीति के बजाय समाजनीति को प्राथमिकता देते हुए अपना कार्यक्षेत्र चुना। सत्यार्थी का मानना है कि राजनीति के जरिये सामाजिक परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि समाजनीति के जरिये समाज में बदलाव आता है। जनता की उपेक्षा करके नहीं बल्कि जनता को साथ लेकर ही राज और समाज में सकारात्मक बदलाव होगा। अपने तीन दशक के संघर्ष में कैलाश सत्यार्थी ने बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने एवं उनके पुनर्वास के लिए एक लंबा संघर्ष किया है। बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से सत्यार्थी अब तक 80 हजार बंधुआ बाल मजदूरों को मुक्त करा चुके हैं। बाल मजदूरी के विरोध में उनके प्रयास वैश्विक स्तर पर जारी हैं। पिछले वर्ष उन्होंने 108 देशों मे 14 हजार संगठनों के सहयोग से बाल मजदूरी विरोधी विश्व यात्रा आयोजित की थी। सत्यार्थी के प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर भी काम किए जाने की जरूरत है। बाल मजदूरी के खिलाफ कानून मात्र से काम नहीं चलेगा। जरूरी है कि उस वजह का निदान किया जाए जो बच्चे को मजदूरी करने के लिए विवश करती है। कई बार बाल मजदूरों को मुक्त कराने के बाद उनके पुनर्वास के लिए पर्याप्त काम नहीं हो पाता है तो ऐसे बच्चे फिर से मजदूरी करने को विवश हो जाते हैं।

पाकिस्तान का गौरव बनी मलाला यूसुफजई भी संघर्षों की एक मिसाल हैं। 17 वर्ष की इस मानवाधिकार कार्यकर्ता ने 13 वर्ष की उम्र से ही तालिबानी हिंसा और उसके बच्चों की शिक्षा पर होने वाले बुरे प्रभाव को अपनी कविताओं के माध्यम से मुद्दा बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद तालिबानियों ने वर्ष 2012 में उन्हें गोलियों का शिकार बनाया। इस सब के बाद भी मलाला की हिम्मत नहीं टूटी और उनका संघर्ष जारी है। मलाला आज पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि विश्व भर के लिए हिम्मत और संघर्ष की एक मिसाल है। कैलाश और मलाला दोनों को ही अब तक कई पुरस्कार मिल चुके हैं। उन पुरस्कारों के क्रम में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। दोनों ही देशों की सरकारों को चाहिए कि इनके संघर्षों को सरकारी मदद देकर इनकी मुहिम को आगे बढ़ाएं। भारतीय और पाकिस्तानी नागरिकों की यह संयुक्त उपलब्धि साबित करती है कि दोनों ही देशों की अवाम शांति की पक्षधर है। वहीं, राजनीतिक परिदृश्य कुछ ऐसा बना हुआ है मानो युध्द से ही दोनों देशों के बीच लंबित विवादों का निपटारा किया जा सकता है। कैलाश और मलाला की यह साझी उपलब्धि दोनों देशों की राजनीतिक ताकतों को एक बार फिर संदेश दे रही है कि वह शांति का मार्ग अपनाएं और इस खुशी के मौके पर बंदूकें छोड़ साझा जश्न मनाएं। अब यह माहौल बनना चाहिए कि मलाला भारत आकर अपने मिशन को आगे बढा सकें ताकि स्कूलों से दूर रहने वाले भातरीय बच्चों को शिक्षा मिले और सत्यार्थी पाकिस्तान जाकर काम करें ताकि उस देश की निहायत ढीली पड़ चुकी सामाजिक बुनावट में भी वहां के बच्चों को उनका जायज अधिकार मिले।

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इंटरनेट खरीददारी का चलन इस कदर बढ़ चुका है कि लोग बाजार जाकर खरीददारी करने से बचने लगे हैं। एक क्लिक में पूरा बाजार स्क्रीन पर छा जाता है। ई-कॉमर्स के इस बूम ने जहां लोगों को सहूलियत दी है तो मुसीबत भी कम नहीं हैं और धोखाधड़ी की शिकायतों की भरमार भी होने लगी है। सोमवार को देश की सबसे बड़ी ऑनलाइन शॉपिंग साइट फ्लिपकार्ट अपने बंपर सेल के ऑफर के चलते संकट में आ गई। नेट पर कंपनी ने बिग बिलियन डे सेल लगाकर कई उत्पादों पर अप्रत्याशित छूट की पेशकश की। लाजिमी था कि इंटरनेट ग्राहकों की फौज ई-शॉपिंग में कूद पड़ती। लेकिन, साइट पर बड़ी संख्या में खरीददारों की संख्या बढ़ते ही कंपनी ने अपना खेल खेलना आरंभ कर दिया। वेबसाइट में तकनीकी गड़बड़ियों के नाम पर भाव ऊपर-नीचे होने लगे। विज्ञापनों के मुताबिक ऑफर दिखाई देने बंद हो गए। और तो और, कई लोगों के अधिक छूट में की गई बुकिंग के ऑर्डर तक बाद में कैंसिल कर दिए गए। कुल मिलाकर महासेल के तहत किए गए भारी छूट के दावों पर वेबसाइट खरी नहीं उतरी। ऐसे छूट, दावों और धोखाधड़ी का यह पहला मामला नहीं है। अक्सर इंटरनेट शॉपिंग में गड़बड़ियों की शिकायत ग्राहकों द्वारा की जाती रही है। कई बार प्रोडक्ट में कमी, ऑर्डर से हटकर डेलिवरी, पैसा लेकर डेलिवरी न देना और सेवा पर असंतोष होने पर पैसे नहीं लौटाने जैसी शिकायतें मिलती हैं। अब इन मामलों को सरकार ने भी गंभीरता से लिया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ मिली शिकायतों की सरकार जांच करवाएगी और ई-कॉमर्स क्षेत्र के लिए विशेष नीति तैयार करने पर भी विचार होगा।

फ्लिपकार्ट के मुताबिक उसे इस मेगा सेल से 600 करोड़ रुपए से अधिक की बिक्री हुई है। हालांकि ई-कॉमर्स के लिए यह ऐतिहासिक दिन था लेकिन देखने वाली बात यह है कि इसे लेकर सरकार ने आज तक कोई भी एक स्पष्ट नीति लागू नहीं की है। यह कंपनियां जब चाहें तब मनमानी कर लेती हैं। छोटे व्यापारियों ने इस पर काफी चिंता जताई है। उनका मानना है कि इस तरह की छूट से खुदरा बाजार बुरी तरह प्रभावित होता है। यह सही है कि इंटरनेट यूजर्स को ई-कॉमर्स आकर्षित करता है। खास तौर से युवाओं को। उन्हें लगता है कि इंटरनेट खरीददारी बेहद विश्वसनीय होती है। हर उत्पाद सामान्य बाजार की अपेक्षा बेहतर होता है, लेकिन यह एक भ्रम है। इससे भी ज्यादा भ्रम की बात है कि स्मार्ट कंज्यूमर बनने के चक्कर में लोग ऐसी कंपनियों के लालच में आ जाते हैं और फिजूलखर्ची करते फिरते हैं। ई-कॉमर्स को खुला छोड़ना गलत होगा। उस पर अन्य परंपरागत बाजारों की तरह ही लगाम लगानी जरूरी है। वहीं, डील करने से पहले ग्राहकों को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। नहीं तो ऑंनलाइन बाजार में मची भगदड़ से नुकसान के अलावा उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। हमारे यहां उपभोक्ताओं को जागरूक और उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिहाज से समाज और सरकारी तंत्र दोनों विफल हैं। विडंबना ही है कि इस बाबत फिलहाल कोई ऐसा दिशा-निर्देश नहीं है, जिसके तहत कारोबार के इस तौर-तरीके का नियमन किया जा सके। ऐसी कंपनियां खुद को भले ही सिर्फ कमीशन एजेंट के रूप में पेश करें, इनके बेलगाम और आक्रामक प्रचार के साथ-साथ बहुत सारी चीजों पर रियायत एक ऐसा पहलू है, जो सामान्य ग्राहकों को भी आकर्षित करता है। यही वजह है कि ज्यों-ज्यों इंटरनेट उपभोक्ताओं का बाजार बढ़ा है, ऑनलाइन खरीदारी भी नई ऊंचाइयां छू रही है लेकिन इसका सीधा असर सामान्य खुदरा कारोबार पर पड़ा है। बड़ी पूंजी वाली कंपनियां शून्य मुनाफे पर अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करती हैं, फिर उपभोक्ताओं के सामने विकल्पहीन स्थितियां पैदा कर अकूत फायदा कमाने लगती हैं।

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कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की जमानत याचिका खारिज किए जाने का अगर कोई वृहत्तर संदेश है तो वह यह कि देश की अदालतें भ्रष्टाचार के मामलों में अब पहले से कहीं अधिक गंभीरता के साथ विचार करेंगी। अगर किसी राजनेता या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति के जमानत लेने के बाद गायब होने का अंदेशा नहीं हो तो पहले आम तौर पर अदालतों से उसे जमानत हासिल करने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। ऐसे व्यक्ति को अगर सजा मिली होती थी तो सजा पर भी स्थगनादेश हासिल करना आसान हुआ करता था। अब, सुप्रीम कोर्ट द्वारा भ्रष्टाचार को मानवाधिकार हनन और संगठित आर्थिक अपराध के रूप में परिभाषित कर दिए जाने के बाद यह सबकुछ कठिनतर हो जाएगा और यही जयललिता के मामले में देखने को मिला है। वहीं, आय से अधिक संपत्ति के मामले में अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम ्(अन्नाद्रमुक) प्रमुख जयललिता को सजा सुनाए जाने के बाद तमिलनाडु में विरोध और हिंसा का जो सिलसिला चल पड़ा है, वह स्पष्ट करता है कि अदालत के एक जनहितैषी रुख के बारे में कुछ निहित स्वार्थी तत्व जनता को जागरूक नहीं होने देना चाहते हैं। सत्तारूढ़ दल होने के कारण यह अन्नाद्रमुक की खास तौर पर और सामान्य तौर पर राज्य की अच्छी तस्वीर तो हरगिज पेश नहीं करता। आखिर 18 वर्ष लंबी चली सुनवाई के बाद भ्रष्टाचार के मामले में जयललिता को चार वर्ष जेल और 100 करोड़ रुपए जुर्माने की सजा सुनायी गई है। किसी भी मामले को समझने के लिए इतना वक्त काफी होता है। लंबी चली जांच और अदालती प्रक्रिया के बाद आए फैसले का कानून के शासन में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को सम्मान करना चाहिए। विशेष अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसलों के बाद भी जयललिता को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प मिला है। वह इस विकल्प का उपयोग भी कर रही हैं। लोगों को धैर्य बनाए रखना ही चाहिए। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर या फिर जनजीवन अस्त-व्यस्त कर लोग जो उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं, वह किसी भी हालत में जायज नहीं है। उच्च न्यायालय से जमानत याचिका खारिज होने के बाद जया समर्थकों की निराशा समझी जा सकती है, लेकिन देश और व्यवस्था संविधान सम्मत कानूनों से चलते हैं, न कि भावनाओं से। देश के नामी वकील राम जेठमलानी जयललिता की पैरवी कर रहे हैं। उच्च न्यायालय के बाद अब सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय से इस बाबत कब और क्या फैसला आता है, उसका सभी को इंतजार और सम्मान करना चाहिए।

जयललिता के प्रति प्रेम और समर्थन के चलते अन्नाद्रमुक कार्यकर्ता और समर्थक जो कर रहे हैं, वह सर्वथा अनुचित और अस्वीकार्य है। भावनाएं भड़कने की आशंका के चलते ही इस मामले की सुनवाई पड़ोसी राज्य कर्नाटक में हो रही है, लेकिन भावनाओं का विवेकहीन प्रदर्शन फिर भी समस्याएं पैदा कर रहा है। न सिर्फ तमिलनाडु में रह रहे कर्नाटक के मूल निवासियों और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है, जयललिता को सजा सुनाने वाले जज के विरुध्द भी प्रदर्शन किए जा रहे हैं। असंदिग्ध निष्ठा के चलते मुख्यमंत्री बनाए गए पन्नीरसेल्वम को लोगों से हिंसा से दूर रहने की अपील करने में भी कई दिन लग गए। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर से ही सही, मुख्यमंत्री द्वारा की गई अपील पर अन्नाद्रमुक कार्यकर्ता और समर्थक अमल करेंगे। जयललिता तमिलनाडु की लोकप्रिय राजनेता हैं। अपने मुख्यमंत्रीकाल में उन्होंने कई जनहितकारी कदम उठाए हैं। राज्य के विकास के सपने भी दिखाए हैं। बेहतर होगा कि उन्हें कानूनी राहत के लिए अदालती कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए ही उनके चुनावी एजेंडे पर अमल भी जारी रखा जाए।

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गिनती के आतंकियों के साथ सीरिया तथा इराक के एक बड़े भूभाग पर कब्जा जमाए बैठा इस्लामिक स्टेट उसके विरुध्द विश्व मत के एकजुट नहीं हो पाने का फायदा उठाकर अपने खतरनाक मंसूबों को विस्तार देता जा रहा है। एक ओर जहां रविवार को उसे पाकिस्तानी तालिबान का समर्थन मिला, वहीं ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम के राज हासिल करने की साजिश का भी खुलासा हुआ। वहीं, आईएस पर हमले शुरू करने के बावजूद अमेरिका अभी भी ऐसा कोई सख्त कदम नहीं उठा पाया है जिससे उसकी कारगुजारियों पर लगाम कसी जा सके। अगर इस बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से सवाल पूछा जाए तो क्या वह उसी तरह से अपना चेहरा सपाट बनाए रखकर यह कह सकेंगे कि उनका नाम बराक हुसैन ओबामा है? शायद नहीं, यह तो उन्होंने सिर्फ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा से पहले कही थी। अगर आईएस के प्रसंग में उन्होंने यही जवाब दे दिया तो बात बिगड़ सकती है और वह अमेरिका में ही संदिग्ध व्यक्ति बन सकते हैं। इसके बावजूद यह स्पष्ट है कि इराक और सीरिया के हालात से जूझने में अमेरिका भारी कशमकश के दौर से गुजर रहा है। इसके साफ कारण भी हैं। वह अब पहले की तरह से विश्व का दादा नहीं रह गया है। उसकी आर्थिक सेहत पर भी काफी सवालिया निशान लगे हुए हैं। वह चीन से आर्थिक उठा-पटक में भी नाकाम नजर आ रहा है। सो, वहां के लोगों के मन में यह बात घर कर चुकी है कि सीरिया और इराक के चक्कर में अमेरिका अपना खाना खराब नहीं करे। अमेरिका ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले के बाद जो तेवर दिखाए थे, उसका भारी खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है। वह अब अकेला आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध छेड़ने को तैयार नहीं है। वह दुनिया में शांति का ठेका लेने से पहले यह देखना चाहता है कि क्या अन्य देश भी उसके साथ आने को तैयार हैं? सो, आईएस की पाशविक हरकतों को वह चुपचाप देख रहा है। उसे यह पता है कि आईएस को पाकिस्तानी सेना से मदद मिल रही है और पाकिस्तानी नागरिक बड़ी संख्या में इस आतंकी गिरोह में शामिल हो चुके हैं। इसके बावजूद वह पाकिस्तान जैसी नाचीज के खिलाफ भी एक उंगली नहीं उठा रहा है। उसने पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को तो मार डाला लेकिन उसे वहां बिठाकर पालने वालों से कुछ नहीं कहा। यह अभियान भी बराक ओबामा के कार्यकाल में ही हुआ था। अब ओबामा को यह तक नजर नहीं आ रहा है कि पाकिस्तान किस प्रकार से भारतीय नियंत्रण रेखा पर हेकड़ी दिखा रहा है। पाक को अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कोई फिक्र हो ऐसा नहीं लगता है।

भारतीय सीमा के अंदर गैर-जरूरी ढंग से मौत बांटती पाकिस्तानी सेना की हरकतों पर अमेरिका ने चिंता तो जरूर जताई है लेकिन इससे होगा क्या? क्या पाकिस्तान उसकी चिंता से चिंतित होकर फौरन से पेशतर भारतीय सीमा पर गोलीबारी बंद कर देगा? यह संभव नहीं है। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार अमेरिका की मदद से ही संगठित हुए आईएस के आतंकी अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के सिर पर सलवटें पड़ते देखकर हथियार छोड़ने वाले नहीं हैं। इन दोनों हालात के लिए अमेरिकी की कूढमगज कूटनीति जिम्मेदार है। अब अमेरिका चाहता है कि आईएस से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के निर्णय के तहत कोई संयुक्त सैन्य कार्रवाई की जाए और भारतीय सीमा पर हो रही पाकिस्तान की गोलीबारी से भारत खुद निपटे। इसमें एक फांस यह भी है कि अमेरिका हमेशा से खुद को औरों से अधिक पाक-साफ मानने के कारण आईएस के खिलाफ जमीनी हमलों और पाकिस्तान के खिलाफ भारत की हवाई कार्रवाई का विरोध करेगा। फिर यह मकड़जाल काटने के लिए आगे कौन बढे?