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संपादकीय

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काले धन का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार के गले की फांस बन गया लगता है। ऐसा लग रहा है कि वह इस मुद्दे से बच निकलना चाहती है परन्तु यह इतना आसान भी नहीं है। थकी हारी विपक्षी पार्टी कांग्रेस को मानो बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल गया है कि अब मोदी सरकार विदेशी बैंकों में छिपे काले धन को लाकर जनता में क्यों नहीं बांटती? कांग्रेसी प्रवक्ता भाजपा सरकार पर चुटकियां भी ले रहे हैं कि देश की जनता इंतजार कर रही है कि कब नरेन्द्र मोदी उनके (जनता के) बैंक खातों में लाखों रुपए जमा करवाएंगे। दरअसल इस मुद्दे ने पूरा सियासी रंग अख्तियार कर लिया है और इसके लिए स्वयं भाजपा जिम्मेदार है।
कुछ माह पूर्व हुए लोकसभा चुनावों में सभी चुनावी सभाओं में मोदी ने अपने भाषण में साफ साफ कहा था कि अगर दिल्ली में भाजपा की सरकार बनती है तो विदेशों में छिपाकर रखा गया काला धन वापस लाया जाएगा और कानून को ठेंगा दिखाकर काला धन जमा करने वालों के नाम सार्वजनिक किए जाएंगे। यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना था और पूर्व संप्रग सरकार की इस मामले में काफी किरकिरी भी हुई थी। काले धन के मुद्दे को योग गुरु बाबा रामदेव, समाजसेवी अन्ना हजारे ने विशेष रूप से उठाया था और बाबा रामदेव ने तो गांव-गांव, शहर-शहर अपने शिविरों के माध्यम से जनता को जागरूक किया था। इतना ही नहीं, उन्होंने साफ साफ कहा था कि मोदी की सरकार आएगी तो विदेशी बैंकों में जमा काला धन भी वापस देश लाया आएगा। इस आंदोलन ने भाजपा को काफी लाभ पहुंचाया। जो लोग संप्रग सरकार की नीतियों से आजिज आ चुके थे और बढ़ती महंगाई से त्रस्त थे, उन्हें लगा कि यदि अरबों का काला धन देश में आएगा तो निश्‍चय ही उसका बहुत बड़ा लाभ आम जनता को किसी न किसी रूप में मिलेगा। शायद इसीलिए मतदाताओं ने मोदी के वादे पर विश्‍वास करके भाजपा की सरकार केन्द्र में बनवाई और मोदी को प्रधानमंत्री बनने का मौका दिया।
सरकार बनने के बाद अब यह मुद्दा फिर से गरमाया क्योंकि केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि विदेशी खाताधारकों के नामों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता क्योंकि पूर्व सरकार ने विदेशों के साथ ऐसे अनुबंध कर रखे हैं जिनके कारण वर्तमान सरकार के भी हाथ बंधे हुए हैं। जेटली के इस वक्तव्य से जनता में यह संदेश गया कि मोदी सरकार की नीयत में भी कोई खोट है और वह भी इस मुद्दे से पल्ला झाड़ना चाहती है। सरकार के रुख को देखकर मीडिया ने इस मुद्दे को हाथों हाथ लिया और इस सरकार की भी खासी किरकिरी हुई। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर पहुंचा जहां न्यायालय ने सरकार को लताड़ लगाई कि किसी देश से समझौते की बात को बाधा बताकर सरकार खाताधारकों के नाम बताने से बचने की कोशिश न करे और तुरंत ऐसे खाताधारकों की सूची सुप्रीम कोर्ट को सौंपे। सरकार को ऐसा ही करना पड़ा। अब आगे की कार्रवाई न्यायालय की निगरानी में गठित विशेष टीम करेगी।
अब उन खाताधारकों के नाम कब उजागर होते हैं और होते भी हैं या नहीं, कम से कम इस जिम्मेदारी से तो सरकार बच ही गई है। यदि काला धन (अगर खातों में बचा होगा) वापस आता है तो इसका श्रेय भले ही कोर्ट को मिले और मोदी सरकार श्रेय से वंचित रह जाए परंतु विलंब होने के कारणों का ठीकरा भी मोदी सरकार के सिर तो नहीं फूटेगा। हालांकि सरकार की उस दलील में दम था कि जब तक यह साबित न हो कि खाताधारक ने कानून का उल्लंघन किया है तब तक उसका नाम कैसे उजागर किया जा सकता है परन्तु जब सियासी तूफान उठ खड़ा हो तो ऐसे में तर्कयुक्त बात भी कौन सुनता है? काला धन हमारे देश में इतना व्यापक रूप किन कारणों से ले चुका है इस पर गौर करने की जरूरत है।

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भारत में सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा देखा जाए तो यह विश्‍वभर में एक अजूबा ही है और यहां सड़कों पर हो रही दुर्घटनाओं में जितनी संख्या में जानें जाती हैं वह तो दुनियाभर में सबसे ज्यादा हैं। लगभग डेढ़ लाख लोग प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं और इनमें से 63 प्रतिशत मौतें राष्ट्रीय और राजमार्गों पर होती हैं। घायलों की संख्या तो अनगिनत है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने सर्वाधिक सड़क दुर्घटनाओं वाले 10 देशों की पहचान की है, उनमें भी भारत सबसे ऊपर है।
सड़क सुरक्षा के जानकारों का मानना है कि हाईवेज पर अधिकांश दुर्घटनाएं वाहन चालकों द्वारा यातायात नियमों के उल्लंघन करने अथवा शराब पीकर गाड़ी चलाने से होती हैं। हाईवेज पर निर्धारित लेन से जंप कर दूसरी लेन में जाने, तेज वाहन चलाने या फिर नशे में गाड़ी चलाने से भयंकर दुर्घटनाएं होती हैं और दूसरी बात यह है कि ऐसी दुर्घटनाओं में बुरी तरह से घायल व्यक्ति को तुरन्त अस्पताल पहुंचाने का प्रयास करने के बजाय वाहन चालक उसे मरणासन्न अवस्था में छोड़कर भाग जाते हैं। दूसरे लोग भी घायल व्यक्ति की इसलिए मदद नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उन्हें पुलिस और न्यायालय के सामने बार बार पेश होना पड़ता है और अनेक अप्रत्याशित सवालों का जवाब देना पड़ता है। कानूनी झमेलों में फंसने के डर से आम आदमी भी घायल की मदद नहीं करता और उसे सड़क पर तड़पता छोड़कर अपना रास्ता नाप लेता है।
इस मुद्दे पर उच् चतम न्यायालय ने के. स्कंदन समिति गठित की थी जिसने अपनी सिफारिशें सरकार को दी हैं और उनमें से यह प्रमुख है कि सड़क दुर्घटनाओं में घायल व्यक्ति को इलाज के लिए निकटवर्ती अस्पताल ले जाने वाले व्यक्ति पर न तो पहचान उजागर करने का दबाव डाला जाना चाहिए और न ही उस पर कोई कानूनी कार्यवाही में साक्ष्य आदि के लिए जिम्मेदारी डाली जानी चाहिए। उन्हें अदालतों में भी तलब नहीं किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, समिति ने सिफारिश की है कि सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति का इलाज करने से इंकार करने वाले चिकित्सक और अस्पताल पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। सभी अस्पतालों को सख्त निर्देश होने चाहिएं कि गंभीर रूप से घायलों को तुरंत भर्ती कर उपयुक्त इलाज का प्रयास किया जाए तथा अस्पताल लाने वाले व्यक्ति को रोककर नहीं रखा जाए। समिति ने स्पष्ट किया है कि यह नियम केवल सरकारी नहीं बल्कि निजी अस्पतालों पर भी लागू होगा।
जानकारी मिली है कि स्वास्थ्य मंत्रालय बहुत जल्द ही इस संबंध में देश के सभी अस्पतालों को दिशा निर्देश जारी करने वाला है। यदि अस्पतालों ने इन निर्देशों को दरकिनार करने की कोशिश की तो उनके लाइसेंस भी रद्द किए जा सकते हैं। सरकार ने इस समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। इस समिति ने यह ऐतिहासिक सिफारिश की है। दूसरी तरफ केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी आगामी शीतकालीन सत्र में एक नया सड़क यातायात अधिनियम पेश करने जा रहे हैं जो वर्तमान मोटर वाहन कानून का स्थान लेगा। इस अधिनियम में सड़क पर नशे की हालत में वाहन चलाने वालों के खिलाफ बेहद कठोर कानून होगा। इतना ही नहीं, राजमार्गों पर जो शराब की दुकानें संचालित होती हैं, उनको भी बंद किया जा सकता है। इसके अलावा मोबाइल पर बात करते हुए तथा बिना लाइसेंस वाहन चलाने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाएगा। भारी जुर्माने का भी प्रावधान किया जा रहा है। देखना यह है कि नए कानून और दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन करवाने में सरकार कितनी सफल होती है। यदि सख्त कानून यातायात पुलिस की अधिक कमाई का जरिया नहीं बनते हैं तथा कड़ाई से इनका पालन होता है तो निश्‍चय ही सड़क दुर्घटनाओं की संख्या पर लगाम लग सकेगी।

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लोकसभा चुनावों में भारी हार के बाद अब विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र और हरियाणा भी कांग्रेस के हाथ से निकल गए। लगातार चुनावों में बड़ी शिकस्त अब कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बन रही है। नेतृत्व के खिलाफ बगावत के स्वर मुखर होने लगे हैं। पहले दबी जुबान से गांधी परिवार के खिलाफ कोई आवाज उठाने की हिम्मत करता था, अब सोनिया के खासमखास रहे पी चिदंबरम जैसे अग्रिम पंक्ति के कांग्रेस नेता ने जब यह कह दिया कि कांग्रेस का नेतृत्व कोई गैर गांधी परिवार का सदस्य भी कर सकता है तो इससे नेतृत्व की नींद उड़ना स्वाभाविक था।
चिदंबरम ने कहा कि कांग्रेस का मनोबल इस समय काफी गिरा हुआ है जिसे सुधारने के लिए पार्टी नेतृत्व को तुरंत इस पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी पार्टी का नेतृत्व करने के लिए एक सही नेता हैं और उन्होंने राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर कमान सौंपी यह भी अनुचित नहीं है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य में गांधी परिवार के अलावा कोई नेता नेतृत्व नहीं संभाल सकता। नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का भी कोई नेता कांग्रेस अध्यक्ष बन सकता है। हालांकि चिदंबरम ने सीधे सीधे राहुल गांधी पर कोई आरोप नहीं लगाया है परन्तु पार्टी के इतने वरिष्ठ नेता के इस बयान से खलबली मचना स्वाभाविक है।
चिदंबरम के बयान पर स्वयं सोनिया अथवा राहुल गांधी ने चुप्पी साध रखी है और इक्का-दुक्का नेताओं ने सफाई देने का प्रयास किया है परन्तु इस बयान में छिपे स्वर आने वाले समय में और अधिक बगावती हो जाएं तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि अब जम्मू-कश्मीर तथा झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं और इन चुनावों का बिगुल बज चुका है। इतने कम समय में कांग्रेस ताकतवर बनकर उभर जाए, ऐसे चमत्कार की संभावनाएं कम ही हैं। बल्कि इन प्रदेशों में भाजपा और अधिक मजबूती से उभरेगी ऐसे आसार ज्यादा नजर आ रहे हैं और इसका कारण है अभी भी नरेन्द्र मोदी की हवा का बरकरार रहना तथा उनकी सरकार के पांच माह के कार्यकाल में कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों का फैसला लिया जाना। हाल ही में जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ में केन्द्र सरकार का सहयोगात्मक रवैया और प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अब तक प्रदेश का दो बार दौरा किया जाना, भाजपा के मतों में बढ़ोतरी कराने का काम करेंगे। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ सत्ता में कांग्रेस भी भागीदार है इसलिए सत्ता विरोधी लहर का खामियाजा नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ साथ कांग्रेस को भी भुगतान पड़ेगा। झारखंड में जेएमएम की सरकार के साथ कांग्रेस का गठबंधन है और वहां भी वैसी ही स्थितियां हैं।
कांग्रेस सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी राजनीतिक पार्टी है जिस पर अधिकांश समय तक नेहरू-गांधी परिवार का ही कब्जा रहा है। देश में शासन भी कांग्रेस का ही सर्वाधिक काल तक रहा है। इस पार्टी के लोग नेहरू-गांधी परिवार से आगे तक सोच भी नहीं पाते हैं। कुएं के मेंढक की तरह उनकी सोच सीमित रह गई है और सत्ता का स्वाद सबसे ज्यादा इसी दल के नेताओं ने चखा है इसलिए बिना सत्ता के इनमें तिलमिलाहट भी पैदा होना स्वाभाविक है। जब जब भी इक्का-दुक्का लोगों ने सच कहने की कोशिश की और नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाई, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया फिर चाहे वह पूर्व सांसद गुफरान-ए-आजम हों या जगमीत सिंह बराड़ हों। कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कुछ वर्ष पूर्व तक यह लगता था कि राहुल गांधी के रूप में उन्हें पार्टी की नैया का एक अच्छा खेवनहार मिल जाएगा परन्तु उनके नेतृत्व में चुनावों में लगातार हार ने सबको निराश कर दिया। अब पार्टी को नई सोच, नए तरीके और नए जोश के साथ फिर से उठ खड़े होने की हिम्मत दिखानी होगी, अन्यथा आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी का कोई नामलेवा भी नहीं बचेगा।

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हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में मनोहर लाल खट्टर ने शपथ ग्रहण कर ली है। उनका मुख्यमंत्री बनता अप्रत्याशित नहीं था। जब भाजपा को प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिल गया और भाजपा नेतृत्व ने यह संकेत दे दिया कि वह किसी गैर जाट की ही मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी करेगा तभी लगभग तय हो गया था कि मनोहर लाल खट्टर को ही यह दायित्व सौंपा जाएगा। खट्टर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ न केवल उन्होंने काम किया है बल्कि उनके साथ निकटता भी है। संघ ने भी उनके नाम को आगे बढ़ाया होगा। साथ ही वर्तमान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भी वे करीबी रहे हैं। उनकी ईमानदार नेता की छवि है। वे अविवाहित हैं इसलिए परिवारवाद के आरोपोें से भविष्य में बचे रहने की पूरी संभावना है। वे बड़बोले नहीं हैं। अच्छे वक्ता होने के साथ साथ कितना बोलना है, इसमें भी वे माहिर हैं। वे पंजाबी खत्री समुदाय से हैं। इस समुदाय ने भाजपा को चुनावों में भरपूर समर्थन दिया है और जाट समुदाय इस बार इंडियन लोकदल के साथ रहा है। भाजपा ने इसीलिए शायद गैर जाट को नेतृत्व सौंपने का मन बनाया होगा हालांकि भाजपा इससे साफ तौर पर इनकार कर रही है कि मुख्यमंत्री के चयन में उन्होंने कोई जातिवादी समीकरण को ध्यान में रखकर निर्णय लिया है।
जो भी हो, लगभग 18 वर्षों से हरियाणा में जाट जाति के ही मुख्यमंत्री राज करते आए हैं और भाजपा ने तो हरियाणा बनने के बाद पहली बार अपने बूते पर सरकार बनाई है। भाजपा के प्रदेश कैडर में ही नहीं, समस्त कार्यकर्ताओं में भी भारी उत्साह नजर आ रहा है। यह स्वाभाविक भी है। कोई भले ही स्वीकार करे या न करे परन्तु मोदी के व्यक्तित्व का करिश्मा और अमित शाह की चुनावी रणनीति ने ही भाजपा को हरियाणा में यह अद्वितीय जीत दिलाई है।
अब मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर पर विभिन्न समुदायों तथा वोटरों की उम्मीदों पर खरा उतरने की जिम्मेदारी है। चौटाला परिवार और कांग्रेस शासन के समय के कथित भ्रष्टाचार से त्रस्त राज्य की जनता ने मोदी के आश्‍वासन पर भाजपा को वोट दिया है कि भाजपा सरकार राज्य को भ्रष्टाचार से मुक्त करेगी। नई सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भ्रष्टाचार पर लगाम कसना है और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मामले दर्ज कर निष्पक्ष जांच कराकर यह संदेश देने की है कि यह सरकार भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेगी तथा अपराधी कितना भी बड़ा हो, उसको नहीं बख्सेगी। इसके अलावा कानून व्यवस्था, बिजली-पानी, रोजगार आदि मुद्दों पर भी सरकार को ध्यान देना होगा। विशेषकर किसानों और छोटे व्यापारियों की जरूरतों और उनकी समस्याओं पर ध्यान देना पड़ेगा। हालांकि हरियाणा एक संपन्न और विकसित राज्य है परन्तु यहां संधाधनों के बंटवारे में संतुलन नहीं है। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करते रसूखदार लोगों की पांचों अंगुलियों घी में रहती हैं और आम आदमी अभावों में जीवन जीता है। इसलिए अमीर गरीब के बीच एक बड़ी खाई है, जिसे पाटना भी एक बड़ी चुनौती है। प्रदेश की जनता को यह विश्‍वास जगा है कि मोदी के निर्देशन में प्रदेश भाजपा सरकार बिना किसी जाति-संप्रदाय के भेदभाव के आम जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए काम करेगी और जिस प्रकार से देश में योजनाएं लायी जा रही हैं वैसे ही हरियाणा में भी चहुंमुखी विकास की ओर ध्यान दिया जाएगा। मनोहर लाल खट्टर जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे, फिलहाल तो यह आशा की ही जानी चाहिए।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दीपावली के दिन आधा समय सियाचीन में तैनात भारतीय सेना के जवानों के साथ तो आधा दिन कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों के साथ बिताया। देश के सबसे बड़े त्यौहार के दिन यदि प्रधानमंत्री ने अपने समय का इस तरह से सदुपयोग किया तो इसकी सर्वत्र सराहना होनी चाहिए थी। दरअसल देश की जनता में इसका एक बेहतरीन संदेश गया परन्तु विपक्षी दलों ने इसमें भी राजनीति खोजने की कोशिश की जिससे यह लगा कि देश की राजनीति कितनी दूषित हो चुकी है। हर कार्य को संकीर्णता से देखा जा रहा है। एक प्रधानमंत्री बाढ़ पीड़ितों का दु:खदर्द बांटने का प्रयास करता है तो विपक्ष उसकी भी यह कहकर निंदा करता है कि चुनावों को ध्यान में रखकर मोदी ने ऐसा किया। सही मायने में देखा जाए तो मोदी के ऐसे लोकप्रिय कदम जनता में उनकी लोकप्रियता को बढा रहे हैं, यह विपक्ष को गवारा नहीं है। कांगे्रस को तो मानो आदत ही पड़ गई है कि वह मोदी के हर कदम में मीन-मेख निकाले या फिर यह कहे कि उनका हर कदम संप्रग सरकार की नकल है। इससे ऐसा झलकता है कि कांग्रेस केवल विरोध करने के लिए विरोध करती है। उधर, कश्मीर के अलगाववादियों ने कहा कि प्रधानमंत्री अपनी संस्कृति हम पर लादना चाहते हैं, इस बयान का समूचे विपक्ष को विरोध करना चाहिए था किंतु जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के अलावा किसी ने भी अलगाववादियों के नजरिए का विरोध नहीं किया। अच्छा होता अगर सभी राजनीतिक दल एक साथ मिलकर अलगाववादियों की सोच की निंदा करते। संप्रग का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस यह क्यों नहीं सोचती कि अगर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हीं की नीतियों और कार्यशैली का अनुशरण कर रहे हैं तो फिर कांग्रेस की सरकार को देश की जनता ने क्यों नकार दिया, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को वह लोकप्रियता क्यों नहीं मिली जो आज मोदी को मिल रही है?
प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू कश्मीर के बाढ पीड़ितों के बीच पहुंचकर यह संदेश दिया कि उनकी आशाओं का दीप यह सरकार बुझने नहीं देगी। यह सच है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा से जो हानि होती है, केवल कोई सरकार उसकी भरपाई नहीं कर सकती परन्तु देश का मुखिया अगर पीड़ितों के आंसू पोंछने के लिए स्वयं पहुंच जाता है तो पीड़ितों की आंखों में एक नई आशा का संचार होता है और उसके हौसलों में इतनी ताकत आ जाती है कि वह खुद भी फिर से खड़ा होने की हिम्मत कर लेते हैं । मोदी ने पीड़ितों के बीच पहुंचकर यही संदेश दिया कि वे अपने आपको अकेला न समझें। मोदी की इस विजिट में राजनीति देखने वालों की सोच पर तरस आना स्वाभाविक है।
सत्तापक्ष हो या विपक्ष, अपने राजनीतिक स्वार्थों की भी एक सीमा तय करें तो उचित होगा। राष्ट्रहित के मुद्दों में राजनीतिक स्वार्थ को धकेलकर राजनीति की गरिमा को कम करना अच्छे लोकतंत्र की निशानी नहीं है। मोदी के अनेक कदम ऐसे हैं जो जनता को सीधे प्रधानमंत्री से जोड़ते हैं और उनमें राष्ट्र की भलाई छिपी दिखाई देती है। उदाहरण के रूप में मोदी के स्वच्छता अभियान को ही लें। इसमें भी विपक्ष द्वारा टीका टिप्पणी से लगता है कि देश हित के मुद्दों पर भी विपक्ष सहयोग नहीं करना चाहता। यदि विपक्ष ऐसे मुद्दों पर अपनी संकीर्णता प्रदर्शित करेगा तो यह विपक्ष के लिए ही घातक होगा। विपक्षी दल अपनी ओछी सोच के चलते अपनी ही साख को और गिरा लेंगे। अच्छा है कि वे प्रधानमंत्री के अच्छे कामों का समर्थन करें और हर कदम में राजनीतिक संकीर्णता का परिचय न दें।

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दिवाली आई और चली गई। परन्तु इस बार थोड़ा अंतर दिखाई दिया। इस बार आशाओं से भरी दिवाली दिखी। लोगों की आंखों में एक उम्मीद दिखाई दी कि मानो अब अच्छे दिन आने वाले हैं। इसलिए नहीं कि यह प्रधानमंत्री का लोकसभा चुनावों के समय का लोकप्रिय नारा है बल्कि इसलिए उम्मीद की किरण जगी है क्योंकि केन्द की सत्ता में जो नई सरकार आई है उसके शुरुआती कदमों से लग रहा है कि आने वाला समय कुछ सुख, समृद्धि और सुकून देने वाला होगा। अगर ऐसा होता है तो वास्तव में इस बार की दिवाली को शुभ दिवाली माना जाएगा।
देश की अर्थव्यवस्था को हाल के वर्षों में मानो ग्रहण लग गया था। संप्रग सरकार के मुखिया पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह महंगाई को रोकने में न केवल लाचार दिखाई दिए थे बल्कि वे लाचार नेतृत्व भी साबित हुए जो बार बार महंगाई पर नियंत्रण की बात तो करते रहे परंतु नियंत्रण रत्ती भर भी नहीं कर सके। बल्कि यहां तक कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकसभा चुनाव में संप्रग सरकार की लुटिया डुबोने के कारणों में से एक प्रमुख कारण भी महंगाई का निरंतर बढते चले जाना था। ऐसा नहीं है कि नई सरकार आने के बाद सभी प्रकार की वस्तुएं अचानक कोड़ियों के भाव मिलने लगी हों परन्तु यह संकेत जरूर मिलने लगे हैं कि महंगाई पर न केवल लगाम लगी है बल्कि महंगाई दर में गिरावट भी आई है। हाल ही में पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी होने से भी यह संकेत मिले हैं कि आने वाले समय में सभी क्षेत्रों में महंगाई पर असर पड़ेगा और उसे ढलान की ओर आना होगा।
नई सरकार आने के बाद शेयर बाजारों में चमक लौटने लगी है। रोजमर्रा की वस्तुएं भी पहले के मुकाबले सस्ती हुई हैं और इससे आस जगी है कि घरों का बजट अब बिगड़ने नहीं पाएगा। लोगों को लगने लगा है कि दिवाली के दीपकों का प्रकाश उनके घरों को भी महंगाई रूपी अंधेरे को भगाकर सुकून से जगमग कर देगा। भले ही तुरंत सब कुछ सस्ता नहीं हुआ हो परन्तु नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता में एक विश्‍वास पैदा हुआ है कि उनके नेतृत्व में अवश्य ही जनहित की ऐसी योजनाएं क्रियान्वित होंगी जिनसे आम आदमी के पास खर्च करने के लिए पैसा होगा। नई सरकार ने जो पांच महीने में नीतियां बनाई हैं तथा योजनाओं की घोषणा की है उनसे एक उल्लास और उमंग का वातावरण बनने लगा है। अब जनता को दिखाई दे रहा है कि जैसे ही विदेशी निवेश का आगमन होगा वैसे ही भारी संख्या में रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकेंगे और आम आदमी की जेब में भी खर्च करने को कुछ होगा।
भारत सरकार को यह देखना होगा कि सरकारी नीतियां कुछ इस तरह क्रियान्वित हों कि जनता की जेब में पैसा आए, लोगों की आमदनी बढे, साथ ही धन के उचित वितरण की व्यवस्था हो। महंगाई पर लगाम लगाने के नए तरीके खोजने होंगे। मोदी सरकार द्वारा जो भी अब तक कदम उठाए गए हैं उनके परिणाम दिखाई देने लगे हैं और उन्हीं परिणामों के मद्देनजर हाल ही में हुए महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में भाजपा को जनता का भारी समर्थन मिला है।
देशभर की जनता में एक नई उर्जा का संचार हुआ है। शायद मोदी के रूप में उन्हें संकट से उबारने वाला कोई मसीहा दिखाई दिया हो। डूबते को तिनके का सहारा की तर्ज पर जनता ने मोदी को देश का नेतृत्व सौंपा और अब अगर उनकी तरफ एक आशा की किरण के रूप में जनता टकटकी लगाए देख रही है तो यह कोई अप्रत्याशित भी नहीं है। आशा की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी अपना हर निर्णय देश की अर्थ व्यवस्था को सुदृढ बनाने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए लेंगे क्योंकि जब तक देश में आंतरिक रूप से आर्थिक हालात नहीं सुधरेंगे तब तक देश वास्तविक रूप से मजबूत कतई नहीं हो सकेगा।

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पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार ने कालेधन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद विदेशी बैंकों में कालाधन छिपाने वालों के नाम नहीं बताने का जो कारण दिया था, वही कारण नरेंद्र मोदी की सरकार ने भी कोर्ट को बताया है। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि इस कारण के होते हुए कोई भी सरकार कालाधन स्विस बैंकों में छिपाने वालों के नाम सार्वजनिक नहीं कर सकती है। इसके बावजूद लोगों में निराशा है। यह समझने वाली बात भी है। इस निराशा और वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा अदालत में दी गई दलील पर उपजे सवालों को खारिज नहीं किया जा सकता। यह संतोष की बात है कि जेटली ने इन सवालों को खारिज किया भी नहीं। उन्होंने सारे सवालों का जवाब फेसबुक जैसे सार्वजनिक मंच पर देने का निर्णय लिया। उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखी है। उन्होंने दोहरा कराधान रोकने के लिए विभिन्न देशों के साथ की गई संधि के खिलाफ कदम उठाने से होने वाले नुकसान का अंदाजा भी देशवासियों को करवाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की पूर्ववर्ती सरकार की मंशा यह थी कि करचोरी करनेवाले, अवैध धन कमाने वालों की पहचान न तो अदालत में उजागर की जाए और न ही आम जनता के सामने उन्हें बेनकाब किया जाए। वहीं, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंघन (राजग) की सरकार यह चाहती है कि देश को कई दशक पीछे ले जानेवालों को उचित प्रक्रिया पूरी करने के बाद बेनकाब किया जाए। उन्होंने कहा है कि कर विभाग इस मामले की विस्तृत जांच कर रहा है। इसमें विभाग को विदेशी बैंकों के सहयोग का भरोसा भी दिलाया गया है। जांच के बाद विभाग की तरफ से कालाधन जमा करनेवालों के खिलाफ अदालत में अलग-अलग मामले दर्ज करवाए जाएंगे। निश्‍चित तौर पर अगर कालाधन इकट्ठा करने वालों के खिलाफ यह प्रक्रिया इसी प्रकार से शुरू की गई तो किसी को इससे कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। वहीं, अगर प्रक्रिया पूरी करने से पहले ही वित्त मंत्रालय अदालत में या अदालत से बाहर करचोरों के नाम किसी भी तरह से उजागर करता है तो यह विभिन्न देशों के साथ विश्‍वासघात करने जैसी बात होगी।
उधर, वित्त मंत्रालय के तहत आनेवाले आयकर विभाग के अधिकारी कालेधन के मामले में सक्रियता के साथ काम करते हुए नजर आ रहे हैं। विभाग की एक टीम ने 15 अक्टूबर को स्विट्जरलैंड जाकर वहां के एचएसबीसी बैंक के शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत की है। वहां इन अधिकारियों ने एक स्वतंत्र जांच की है और स्विस बैंक से आश्‍वासन प्राप्त किया है कि उन भारतीयों के नामों की सूची भारत को उपलब्ध करवाई जाएगी जिनके खाते स्विस बैंक में मौजूद हैं। बहरहाल, बैंक खातों में जमा की गई रकम के गैर कानूनी होने के संबंध में विस्तृत सबूत उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भारतीय पक्ष की होगी। इसी प्रकार, भारत को इस बारे में कोई भी सूचना या जानकारी मिलती है तो उसका सत्यापन स्विस बैंक से करवाया जा सकेगा। अब भारत और स्विट्जरलैंड के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर करने पर बातचीत चल रही है, जिससे दोनों पक्ष स्विस बैंक में भारतीय खाताधारकों के धन की वैधता के बारे में अपने-आप जांच-पड़ताल शुरू कर सकेंगे। यह निश्‍चित रूप से कालेधन के खिलाफ जंग में मील का एक पत्थर साबित हो सकता है। अरुण जेटली की इस बात में दम दिखता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार स्विस बैंक के खाताधारकों के नाम उजागर कर दिए जाने से उनको स्विट्जरलैंड सरकार पर अपने खातों की जानकारी भारत को नहीं देने का दबाव बनाने का मौका मिल जाएगा। उन्हें कानून के तहत अपना बचाव करने का मौका मिल जाएगा। जरूरी है कि सरकार को अपना काम पूरा करने दिया जाए।

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भूमंडलीकरण और आर्थिक विकास की प्रक्रिया ने इधर समाज में आवाजाही बढ़ाई है, जिससे नागरिकों में एक नया रिश्ता बना है लेकिन मन की दूरियां मिटने के बजाय और बढ़ गई हैं। यही बात पूर्वोत्तर राज्यों के छात्रों के साथ अन्य राज्यों में होनेवाले दुर्व्यवहार में सामने आती है। नई दिल्ली में इस वर्ष जनवरी में पूर्वोत्तर के एक छात्र नीडो तानिया की हत्या के बाद से इस प्रकार के मामले रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। बेंगलूर में कन्नड़ भाषा में बात न करने पर मणिपुर के तीन छात्रों की स्थानीय लोगों ने बेदर्दी से पिटाई कर दी, जबकि अगले ही दिन गुड़गांव के सिकंदरपुर में नगालैंड के दो छात्रों के साथ मारपीट की गई। पिछले महीने दिल्ली के लाजपत नगर इलाके में एक लड़की और दो लड़कों के साथ ऐसा ही हुआ था। इसके ठीक एक दिन बाद नई दिल्ली के मुनिरका इलाके में एक पूर्वोत्तर की युवती की बेरहमी से हत्या कर दी गई। दिल्ली-एनसीआर हो या बेंगलूर, हर जगह पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों को निशाना बनाया जा रहा है। दो वर्ष पहले बेंगलूर में ही शरारती तत्वों की अफवाह से डरकर पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों में दहशत फैल गई थी। वह हजारों की तादाद में शहर छोड़कर भागने लगे थे। यह ऐसी समस्या है, जिसका समाधान कानून से नहीं, नजरिया बदलने से निकलेगा। कानून तो अपना काम करेगा ही, पर जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज, दोनों ही स्तरों पर लोगों को आपस में जोड़ने की पहल शुरू हो। हालांकि पूर्वोत्तर के छात्रों के पलायन के बाद कर्नाटक और असम की सरकारों ने आपस में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कदम उठाए थे और दोनों हिस्सों के लोग एक-दूसरे के साथ घुलने-मिलने भी लगे हैं लेकिन नवीनतम घटना से स्पष्ट है कि हाल की घटना यह किसी निहायत आपराधिक सोच वाले व्यक्ति द्वारा अंजाम दी गई है। यह स्वागत योग्य है कि शहर के अधिकांश लोग इस घटना की निंदा करते सुने जा रहे हैं। चूंकि यह मामला भाषा से जोड़ दिया गया है और कर्नाटकवासी अपनी भाषा से प्रेम करते हैं इसलिए एक वर्ग यह कहता सुना जा रहा है कि मामला संदिग्ध है। इस वर्ग के लिए यह समझना जरूरी है कि नस्लभेद के कई स्वरूप होते हैं। इनमें रंगभेद, जातिभेद, भाषा-भेद और क्षेत्रवाद जैसे अन्य कई प्रकार के भेदभाव बरते जाते हैं। यह सभी भेद-भाव नितांत निंदनीय हैं और समाज को बांटने वाली मानसिकता की उपज होते हैं।
सच यह है कि अलग-अलग संस्कृतियों के बीच मेलजोल की रट लगाते हुए हमारे समाज में अभी तक शायद विविधता का सम्मान एक संस्कार नहीं बन पाया है। खासतौर पर मणिपुर, नगालैंड या अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों से पढ़ाई-लिखाई या रोजी-रोजगार के लिए महानगरों का रुख करने वाले युवाओं को किस तरह का व्यवहार झेलना पड़ता है, यह सब जानते हैं। अक्सर ऐसी खबरें आती रही हैं कि किसी राज्य में दूसरे राज्य के लोगों को प्रताड़ित करने के लिए उनकी अलग भाषा-संस्कृति को आधार बनाया गया। इस तरह के दुराग्रहों के निशाने पर सबसे ज्यादा पूर्वोत्तर के लोग रहे हैं। कुछ समय पहले एक सर्वेक्षण में तथ्य उजागर हुए कि दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भेदभाव होता है, उनके रहन-सहन या कुछ अलग तरह के पहनावे आदि को लेकर ताने कसे जाते हैं, मखौल उड़ाने वाली टिप्पणियां की जाती हैं। ऐसे व्यवहार पर वे आमतौर पर चुप ही रह जाते हैं, लेकिन अगर कभी आपत्ति जताते हैं तो उनके साथ मार-पीट की जाती है। ऐसी हरकतों का मूल कारण यह है कि पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों को तो स्थानीय चाल-चलन के बारे में पर्याप्त जानकारी होती है लेकिन अन्य राज्यों के लोगों को वहां से आकर अपने राज्य में बसे लोगों की संस्कृति के बारे में बहुत ही कम जानकारी होती है। पूर्वोत्तर के बारे में उत्तर या दक्षिण भारत में यह धारणा है कि यह राज्य अलगाववादी हैं। यह धारणा अब गलत साबित हो चुकी है।

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लगभग तीन महीने पहले इबोला के विषाणुओं के जानलेवा संक्रमण और गंभीर खतरे को देखते हुए विश्‍व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे महामारी बताते हुए वैश्‍विक स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा की थी। इस घातक बीमारी की रोकथाम की तमाम कोशिशों के बावजूद इस वर्ष अब तक इबोला की चपेट में आकर दुनिया के अलग-अलग देशों में जान गंवाने वाले लोगों की तादाद चार हजार से ऊपर पहुंच चुकी है। भारत के लिए फिलहाल यह राहत की बात है कि यहां अभी तक इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है। इसके बावजूद सावधानी बरतने की जरूरत हमारे लिए भी है। हमारे देश में चिकित्सा तंत्र की जो हालत है उसमें मामूली-सी चूक या लापरवाही भी महंगी पड़ सकती है। जरूरत इस बात की है कि दूसरे देशों से भारत में प्रवेश के तमाम रास्तों पर गहन जांच की व्यवस्था कर बचाव के इंतजाम जरूर किए जाएं। दुनिया के सबसे विकसित देशों का चिकित्सा तंत्र भी इस रोग के सामने लाचार नजर आ रहा है और अब भी यह बीमारी लाइलाज है। न तो इसके विषाणुओं की रोकथाम हो पा रही है और न ही इसके संक्रमण से बीमारी की चपेट में आने वालों के इलाज में सफलता मिल रही है। इबोला के विषाणु सबसे पहले वर्ष 1976 में सूडान और कांगो में पाए गए थे और उसके बाद पूरे उप-सहारा रेगिस्तान के उष्णकटिबंधीय इलाकों में भी इसके विषाणु फैल गए थे। तब से कोई भी वर्ष ऐसा नहीं गुजरा जब इसका असर देखने में न आया हो। तब से लगभग हर वर्ष कम से कम एक हजार लोग इसकी जद में आते रहे हैं। जब भी इबोला का कहर चर्चा में आ जाता है, सारे विकसित देश अपने यहां इससे निपटने के तमाम इंतजाम करते हैं, हवाईअड्डों समेत सभी प्रवेश मार्गों पर लोगों की गहन स्वास्थ्य जांच की जाती है। लेकिन एक खास समय तक कहर बरपाने के बाद इस बीमारी का जोर कम हो जाता है और इसके बाद फिर सब कुछ पहले की तरह आश्‍वस्ति-भाव से चलने लगता है। शायद यही बेफिक्री इबोला के बेलगाम हो जाने की एक बड़ी वजह है। हाल में डब्ल्यूएचओ ने जो नए आंकड़े इबोला के बारे में जारी किए हैं, वह खासे चौंकानेवाले हैं। इस आंकड़े में कहा गया है कि इबोला दुनिया में नियंत्रित होने के बजाय अपने पैर पसारता जा रहा है। हर हफ्ते दुनिया के विभिन्न देशों में 10 हजार लोग इस विषाणु के संक्रमण का शिकार हो रहे हैं। इनकी विस्तृत जांच के बाद इनमें इबोला विषाणु की उपस्थिति की जानकारी मिल रही है।
बंदर, चमगादड़ और सूअर के खून या शरीर के तरल पदार्थ से फैलने वाले इबोला वायरस की चपेट में अगर कोई इंसान आ जाता है तो उसके बाद इस पर काबू पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर प्रभावित व्यक्ति को पूरी तरह से अलग-थलग न रखा जाए और उसकी देखरेख में लगे लोग उच्चस्तर के सुरक्षा इंतजामों से लैस न हों तो यह तुरंत आसपास के दूसरे लोगों में फैल सकता है। इसका खतरा ज्यादा घातक इसलिए है कि अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज या टीका नहीं खोजा जा सका है। इसकी जद में आए व्यक्ति को पहले बुखार आता है, फिर यह सिर और मांसपेशियों के दर्द के अलावा यकृत और गुर्दे तक को बुरी तरह अपनी चपेट में ले लेता है। इसमें पहले भीतरी और फिर बाहरी रक्तस्राव के बाद मरीज के बचने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है। यही नहीं, इस रोग से प्रभावित व्यक्ति की अगर मौत हो जाती है और उसके शरीर को सुरक्षित तरीके से पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता है तो आसपास इसके वायरस की जद में दूसरे लोग भी आ सकते हैं। इस बार अफ्रीकी देश गिनी के दूरदराज वाले इलाके जेरेकोर से शुरू हुआ इबोला वायरस का संक्रमण सिएरा लियोन, लाइबेरिया और नाइजीरिया तक सिमटा है लेकिन अगर पूरी सावधानी नहीं बरती गई तो कहीं भी एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

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हाल के समय में अर्थतंत्र के मोर्चे पर भारत को एक खुशखबरी और जनस्वास्थ्य के मामले में संतोषजनक खबर मिली है। खुशखबरी तो यह कि महंगाई की दर पिछले पांच वर्षों के न्यूनतम स्तर पर आ चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के लिए खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़े राहत का पैगाम लेकर आए हैं। संतोष की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की तरफ से हर वर्ष जारी किए जाने वाले वैश्‍विक भूख सूचकांक में इस बार भारत की हालत थोड़ी सुधरी है। दोनों का एक-दूसरे से कितना संबंध है, यह तो तत्काल नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह जरूर है कि आर्थिक मोर्चे और जनस्वास्थ्य के क्षेत्रों में उठाए गए अब तक के कदमों का असर नजर आने लगा है। यह बहस बाद की बात है कि यह पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का असर है या मौजूदा सरकार की नीतियों का। दोनों मसलों पर आंकड़ों की बाजीगरी का संदेह भी तत्काल नहीं जताया जा सकता है। अभी की स्थिति में जमीनी सच यह है कि सितंबर की थोक महंगाई दर अक्टूबर 2009 के बाद से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। यही नहीं, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक भी जनवरी 2012 के बाद सबसे नीचे पहुंच चुका है। इस त्यौहारी मौसम में यह सबके लिए राहत की बात है। सो, इन आंकड़ों में राजनीतिक उठा-पटक के संकेत तलाशने को पीड़ापसंद मानसिकता ही कहा जाएगा। यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है कि जिस समय लोगों को महंगाई की मार से निजात मिलने की उम्मीद जग रही है, उसी समय देश में भुखमरी घटने की जानकारी मिली है। चूंकि यह रिपोर्ट एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने जारी की है, इसलिए यह नहीं हो सकता है कि इसने दुनिया भर में भूख का निर्धारण करने के लिए पूर्ववर्ती संप्रग सरकार की तरह गरीबी निर्धारण वाला छिछला नजरिया अपनाया होगा। यह कोई सरकारी संगठन नहीं है और न ही इसे आंकड़ों से खिलवाड़ करने का कोई राजनीतिक फायदा हासिल करने की चाह होगी। इसकी ईमानदारी इस बात से ही जाहिर है कि भारत को 76 देशों की सूची में 55वें स्थान पर रखते हुए भी ध्यान दिलाया गया है कि यह अब भी ज्यादा शोचनीय स्थिति वाले देशों की कतार में है। वहीं, देश के लिए संतोषजनक यह है कि इसी सूची में भारत पिछले वर्ष 63वें स्थान पर था तो आठ स्थानों का इजाफा यों ही नहीं हुआ होगा और जमीनी स्तर पर काफी काम हुआ होगा।
महंगाई की बात पर लौटें तो इस वर्ष कमोबेश सभी रोजमर्रा की जरूरत वाली वस्तुओं के दाम बढ़ने के बजाय स्थिर हैं। पेट्रोल और डीजल के दामों में होने वाली कमी अप्रत्याशित तो है लेकिन इससे लंबी अवधि में दूरगामी लाभ मिलने की उम्मीद जरूर बंधती है। लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी के बड़े-बड़े दावों पर यकीन कर उन्हें केंद्र की सत्ता सौंपने वाली जनता की उम्मीदों को पंख लग गए थे। मोदी सत्ता में आने के बाद जब छोटी-छोटी पहल करने लगे तो उन्हें इससे बड़ी निराशा होने लगी। जब मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर सख्त फैसले लेने की घोषणा की तो उनकी जोरदार आलोचना तक हुई लेकिन मोदी के विदेश दौरों से दुनिया भर में भारत की आर्थिक सुस्ती और यहां पूंजी निवेश करने पर होने वाले लाभ की निश्‍चितता के बारे में लोगों की सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। देश की साख में सुधार भी हो रहा है। यह सब कुछ आंकड़ों की बाजीगारी होगी यह कहने का अभी कोई कारण सामने नहीं आया है। बहरहाल, देश में अपेक्षित पूंजी निवेश आने और उसके परिणामों के नजर आने में निश्‍चित तौर पर वक्त लगेगा। रोजगार निर्माण से पहले तो काफी काम नए सिरे से शुरू करना होगा। फिर भी, अच्छे दिनों के वादे पर सत्ता में आई इस सरकार के लिए चीजें सही पटरी पर चलती दिख रही हैं।