बंद करे
बाजार:

संपादकीय

0 16

राजस्थान के दौसा जिले के किसान गजेन्द्र सिंह की दर्दनाक मौत बुधवार को आम आदमी पार्टी (आप) द्वारा आयोजित किसान रैली में मंच पर बैठे आप के नेताओं और रैली में शामिल आप के हजारों कार्यकर्ताओं की आंखों के सामने जिस तरह से हुई और उसके बाद जो राजनैतिक खेल शुरु हुआ, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि अब राजैनतिक नैतिकता लुप्त होने के कगार पर है तथा देश के नेताओं और नागरिकों में भी संवेदनहीनता बढती जा रही है। अगर ऐसा नहीं होता तो गजेन्द्र सिंह की ऐसी दयनीय मौत नहीं होती। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता गजेन्द्र सिंह ने कोई आनन – फानन में पेड़ पर चढकर आत्महत्या नहीं कर ली। वह राजस्थान का युवा किसान था जो किसानों की दुर्दशा पर दिल्ली सरकार और केन्द्र का ध्यान आकृष्ट करना चाहता था। वह यह जानता था कि आत्महत्या के प्रयास के बिना उसकी आवाज नक्कारखानें में तूती की तरह साबित होगी, इसलिए उसने गले में फंदा लगाया और घंटों तक पेड़ पर चढे हुए चिल्ला चिल्लाकर अपनी बात कहने का प्रयास करता रहा किंतु किसी ने भी उसे प़ेड से उतारने का प्रयास नहीं किया। ‘आप’ के शीर्ष नेता मंच पर बैठे थे जिनमें मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी शामिल थे परन्तु मानो उन्हें इस घटना से कुछ लेना देना नहीं था।

अंततः युवा किसान फांसी के फंदे से झूल गया और उसकी दर्दनाक मौत ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया। हजारों लोगों की उपस्थिति में समय रहते किसी ने भी उसे बचाने का प्रयास नहीं किया। यह घटना अचानक नहीं घटी, सिलसिलेवार सब कुछ होता रहा परन्तु न तो ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों ने और न ही ‘आप’ के कार्यकर्ताओं ने उसे बचाने का काई प्रयास किया। राजनीति के ओछेपन का तो यह स्तर था कि उस युवक की मृत्यु के बाद आप के अग्रणी नेता घटना को ‘षडयंत्र’ करार देने से भी बाज नहीं आए। यहां तक कि एक पत्रकार से नेता बने आशुतोष ने तो पत्रकारों से बातचीत में व्यंग्य से यह भी कहा कि अगली बार ऐसी कोई घटना होगी तो मुख्यमंत्री केजरीवाल को पेड़ पर चढने, टहनियों पर जाकर उसे बचाने के लिए कहा जाएगा, जो आत्महत्या कर रहा होगा। इतना ही नहीं, इस दर्दनाक मृत्यु के बाद भी ‘आप’ नेताओं के भाषण नहीं रुके। वे राजनीतिक लाभ लेने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहते थे। उन्होंने दिल्ली पुलिस और केन्द्र सरकार को जमकर निशाना बनाया। उनको न तो किसानों से कोई लेना देना था और न ही रैली में वे किसानों के लिए कुछ करने वाले थे। हाल में पार्टी की अंदरूनी फूट से बदहाल हुई पार्टी की स्थिति से जनता का ध्यान बंटाने के लिए उन्होंने संभवतः यह रैली की थी। अगर उन्होंने समय रहते ध्यान दिया होता तो एक निर्दोष की जान बचाई जा सकती थी। इस घटना के लिए संवेदनहीनता तो जिम्मेदार है ही, परन्तु राजनीति में और अधिक ओछापन लाने के लिए देश की जनता ‘आप’ नेताओं को शायद ही माफ करे। इसमें कोेई दो राय नहीं हो सकती कि किसान पूरे देश भर में संकट के दौर से गुजर रहे हैैं और आत्महत्या भी कर रहे हैं। हर पार्टी अपने-अपने ढंग से किसान हितैषी बनने का ढोंग कर रही है परन्तु किसानों की वास्तव में सुध लेने वाला कोई नहीं है। ’आप’ में तो राजनीतिक परिपक्वता भी नहीं है और न हीं संवेदनशीलता का कोई अंश दिखाई देता है। इसको कल की घटना ने प्रमाणित भी कर दियाहै।

0 32

हाल के कुछ वर्षों में पाकिस्तान से विश्व भर के कई देशों ने किनारा कर लिया है और लगातार उससे अपने व्यापारिक और आर्थिक सम्बंधों को कम करते जा रहे हैं। विश्व भर में बढ रहे आतंकवाद और साथ ही लगातार मिल रहे सबूतों से पाकिस्तान के तार भी आतंकवाद से जुड़ते नज़र आ रहे हैं। शायद यही कारण है कि पाकिस्तान से रिश्ते कायम रखने में विश्व के अनेक देश आज के समय में कतराते हैं। पाकिस्तान में लगातार अंदरूनी हमले भी होते रहे हैं। पाकिस्तान का दौरा कर रही श्रीलंका की क्रिकेट टीम पर भी भयानक हमला हुआ था। कई सैलानियों पर भी हमले होते रहे हैं जिससे विश्व भर के देशों ने अपने अपने नागरिकों को पाकिस्तान में यात्रा नहीं करने के निर्देश भी दे रखे हैं। पाकिस्तान सरकार हमेशा से अपने आपको आतंकवाद के खिलाफ दर्शाती रही है और पश्चिमी देशों से सहानुभूति बटोरती रही है परन्तु जब अमेरिका पर हुए 9/11 हमले के लिए ज़िम्मेदार खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान की ज़मीन पर पाया गया तो पश्चिमी देशों के होश ही उड़ गए। हालांकि अमेरिका ओसामा को मारने में कामयाब रहा परन्तु साथ ही कई सवाल भी उठे कि पाकिस्तान के शहर में फौजी अड्डे से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर एक बड़े से घर में रह रहे ओसामा की खबर क्या पाकिस्तान सरकार को नहीं थी ? इस घटना के बाद दो बार भारत आ चुके अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पाकिस्तान से दूरी बनाए रखी। पश्चिमी देशों की पाकिस्तान से नाराज़गी का फायदा चीन उठा रहा है। चीन ने अमेरिका द्वारा दरकिनार किए गए पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ इसलिए बढ़ाया है। चीन के राष्ट्रपति ़शी जिनपिंग की इस हफ्ते हुई पाकिस्तान यात्रा में उन्होंने पाकिस्तान के लिए मदद का पिटारा खोल दिया जिसके तहत चीन पाकिस्तान के मूलभूत विकास और आर्थिक सुधारों के लिए एक बहुत बड़ी राशि प्रधान करेगा। चीन एक ऐसी सड़क बनाने में दिलचस्पी दिखा रहा है जिससे पाकिस्तान से चीन का ज़िन्ज्यांग प्रान्त जुड़ जाएगा।  अरब सागर में स्थित पाकिस्तानी बंदरगाह ग्वादर में चीन ने अहम निवेश किया है। अगर चीन पाकिस्तान से सड़क मार्ग से जुड़ जाता है तो वह ग्वादर बंदरगाह का भरपूर इस्तेमाल कर सकेगा। चीनी निवेश से पाकिस्तान की सड़कों के साथ, ऊर्जा क्षेत्र को भी मजबूती मिलेगी और चीन की कोशिश पाकिस्तान के रेल नेटवर्क पर अपनी पकड़ बनाने की भी है। चीन अपनी पकड़ इस क्षेत्र के वैश्‍विक प्रभाव पर बनाना चाहता है। अगर चीन अपनी दो परियोजनाओं में सफल होता है तो इससे वह रूस और यूरोप से जुड़ने के लिए नए रास्ते खोल सकेगा। हालांकि यह बहुत महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं परन्तु अगर चीन इन्हे अंतिम रूप देने में सफल हो जाता है तो विश्व के व्यापार में उसका दबदबा और भी बढ जाएगा। भारत को चीन और पाकिस्तान की इस नई दोस्ती पर पैनी नज़र बनाए रखनी होगी क्योंकि चीन की बढ़ती उदारता से पाकिस्तान का भारत की ओर रुख और आक्रामक हो सकता है। भारत को यह उम्मीद बनाए रखनी है कि चीन पाकिस्तान पर आतंकवाद को काम करने का निरंतर दबाव बनाए रखेगा। अमेरिका को पाकिस्तान के इस नए दोस्त से अपने सैन्य समीकरणों पर पड़ने वाले असर का ख्याल रखना होगा। चीन और पाकिस्तान की दोस्ती से भारत को चौकन्ना रहना अनिवार्य है और देश के नीति निर्माताओं को यह स्पष्ट कर देना होगा कि इस दोस्ती से अगर भारत के हितों पर असर पड़ेगा तो भारत सख्ती से पेश आएगा।

0 40

लम्बी छुट्टी के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की वापसी से पार्टी में एक नई ऊर्जा दिखाई दे रही है। रविवार को नई दिल्ली में आयोजित किसान रैली में पार्टी के अग्रणी नेताओं ने गर्मजोशी से भाग लिया। रैली में सोनिया गांधी और राहुल के भाषण काफी तेजतर्रार थे और साथ ही यह साफ़ नज़र आ रहा था कि कांग्रेस पार्टी अपनी विपक्ष की भूमिका बखूबी निभाना चाहती है। रैली में राहुल ने भी सरकार पर कई सीधे हमले किए। भूमि अधिग्रहण मामले को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया। पहले भी कांग्रेस इस बिल का विरोध करती रही है और इसे गरीबों के लिए नुकसानदायक बताती रही है। कांग्रेस ने भूमि अधिग्रहण मसले को गरीबों और अमीर उद्योगपतियों के बीच की लड़ाई बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। औद्योगीकीकरण और अधिग्रहण जैसे शब्दों से भारत के गरीब आज भी डरते हैं और इसी का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। भारत जैसे विकासशील देश को हकीकत में औद्योगीकीकरण को अपनाना चाहिए क्योंकि देश में खुशहाली और आर्थिक व्यवस्था को सुधारने के लिए उद्योगों पर ज़ोर देना अनिवार्य है। अगर देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी तो अंततः इससे देश के गरीब का जीवन खुशहाल होगा। साथ ही सरकार को सामाजिक योजनाओं को मजबूत करने की भी जरूरत है। सरकार को घेरने के लिए भले ही यह मुद्दा अच्छा हो परन्तु देश के विकास को मद्देनजर रखकर इस मुद्दे पर भरपूर विचार विमर्श की आवश्यकता है। भूमि अधिग्रहण का मामला लोगों के भावनात्मक विचारों से भी जुड़ा हुआ है, जहां एक तरफ फसल की बर्बादी से परेशान किसान इसका समर्थन कर सकता है वहीं दूसरी तरफ पुश्तों से खेती कर रहा किसान भी इसका विरोध करेगा। भूमि अधिग्रहण के मामले के साथ कांग्रेस को कई अन्य मुद्दे भी उठाने पड़ेंगे। हालांकि फिलहाल उसकी सदन में संख्या कम है परन्तु पार्टी से जुड़े इतिहास और कई सालों से सत्ता में रही कांग्रेस को आज मुख्य विपक्षी दल माना जाता है।  पार्टी के आलाकमान को और अधिक सक्रिय होना पड़ेगा और राहुल की अनुपस्थिति में उठे बागी सुरों पर भी लगाम कसनी होगी। पार्टी की भविष्य की रणनीति और पार्टी को मजबूत करने लिए मंथन फिलहाल पार्टी के सबसे अहम कार्यों में से एक होना चाहिए। कांग्रेस पार्टी भाग्यशाली है कि उसके पास कई प्रबल युवा नेता हैं जिनके कंधों पर जिम्मेदारी डालने की आवश्यकता है। पार्टी के नेताओं को आम जनता से ज्यादा से ज्यादा साक्षात्कार करने की आवश्यकता है। राहुल गांधी को भी सार्वजनिक मंच को अपनी ताकत बनाना होगा। संसद और किसान रैली में दिए गए राहुल के वक्तव्य इस दिशा में अच्छा कदम है। कांग्रेस फिर से एक बार एकजुट नज़र आ रही है और पार्टी अन्य स्थानीय और राष्ट्रीय दलों से भी बातचीत में लगी हुई है। संसद में भारतीय जनता पार्टी के विशाल बहुमत से देश में एक आक्रामक विपक्ष की ज़रुरत और भी ज्यादा बढ़ जाती है। कांग्रेस के पास विपक्ष की कमान अपने हाथों में लेने का यह अच्छा मौका है और यह तभी संभव है यदि कांग्रेस लगातार सकारात्मक ऊर्जा के साथ अपना दायित्व निभाए। समय-समय पर अच्छे सुझावों के साथ पार्टी को आगे बढ़ना होगा। किसान रैली में जो हल्की सी लौ नज़र आई थी, क्या पार्टी उससे आत्मविश्‍वास की आग सुलगा सकती है और इसका राजनैतिक फायदा उठाने में सक्षम हो पाती है, यह तो वक्त ही बताएगा।

0 34

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कनाडा यात्रा की सफलता को आंकने के लिए कनाडा द्वारा भारत को परमाणु ऊर्जा के लिए आवश्यक ईंधन यूरेनियम मुहैया करने का फैसला ही काफी है। भारत को अपनी बिजली आपूर्ति की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में कनाडा का यह निर्णय भारत सरकार के मजबूत इरादों को बल देते हुए ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा कदम साबित होगा। देश में मौजूदा स्थिति में उत्पादन की तुलना में खपत बहुत ज्यादा है और इस क्षेत्र में संतुलन बनाने के लिए भारत सरकार अनेक सकारात्मक कदम उठा रही है।  वर्ष 1974 में पोकरण में किए गए परमाणु परीक्षण के बाद कनाडा ने भारत को यूरेनियम देने से इनकार कर दिया था। कनाडा के इस फैसले के बाद, भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन देने वाला यह चौथा देश हो गया है। कनाडा के अलावा रूस, फ्रांस और कजाकिस्तान भारत को यूरेनियम उपलब्ध करा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया भी भारत के साथ इस दिशा में एक साझेदारी करने की कोशिश में है। कनाडा द्वारा इस बार की गई संधि के मुताबिक भारत के समक्ष विशेष शर्तें भी नहीं रखी गईं हैं और साथ ही कनाडा ने साफ़ कर दिया है कि भारत किस रूप से उनके द्वारा दिए गए यूरेनियम का इस्तेमाल करता है वह पूरी तरह भारत का एकाधिकार है। भारत ने कुछ अरसे से परमाणु संधियों को ठंडे बस्ते में इस कारण से डाल रखा था क्योंकि वह किसी भी रूप से जल्दबाजी करते हुए अपनी स्थिति को कमजोर नहीं करना चाहता था और साथ ही किसी भी तरह की शर्तों को मंजूरी नहीं देना चाहता था। इसका यह मतलब भी नहीं है कि भारत अपनी परमाणु इकाइयों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा नज़र रखे जाने से किनारा करने की कोशिश कर रहा हो। देश में मौजूद 21 में से 14 रियेक्टरों पर अंतरराष्ट्रीय मुआयने की मंज़ूरी भारत ने दी है और शायद इसी निर्णय की वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भारत की परमाणु ऊर्जा योजनाओं में अपना भरोसा जताया है। कनाडा ने भारत को लगभग 3000 टन यूरेनियम प्रदान करने का आश्वासन दिया है जिससे भारत के परमाणु संयंत्रों के लिए अगले 5 साल तक आवश्यक ईंधन की आपूर्ति हो सकेगी। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के बाद अनेक देशों ने भारत से साझेदारी में दिलचस्पी दिखाई है। भारत के ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा का मौजूदा हिस्सा लगभग 3 से 4 प्रतिशत है जिसे भारत सरकार वर्ष 2024 तक बढाकर 18 से 20 प्रतिशत करना चाहती है। कनाडा के साथ हुई साझेदारी से ऑस्ट्रेलिया को भी एक समान्तर समझौते पर आम सहमति बनाने में काफी आसानी होगी। ऑस्ट्रेलिया पिछले कुछ अरसे से लगातार भारत के प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत तो कर रहा था परन्तु साथ ही भारत के साथ परमाणु सरोकार से हिचकिचा रहा था। काफी लम्बे विचार विमर्श के बावजूद ऑस्ट्रेलिया अभी तक पूर्ण रूप से अपना मन बनाने में नाकाम था। हाल ही में दुनिया भर में भारत के बढ़ते रुतबे और प्रधानमंत्री के बेबाक रवैये से प्रभावित होकर ऑस्ट्रेलिया ने इस दिशा में अपने रुख को थोड़ा नरम किया है। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के अन्य किसी भी देश के संशय को दूर करने में कनाडा के साथ हुई इस साझेदारी से भारत सफल रहा है और ऐसा भी संभव है कि इस ताकतवर समूह के अन्य देश भी भारत के साथ व्यापार करने के लिए आगे आएं। भारत अब परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में नए युग की शुरुआत पर पहुंच चुका है।

0 25

बिहार में आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र कई पार्टियां अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रही हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड जैसे प्रदेशों में लोकसभा चुनावों में भाजपा के अच्छे प्रदर्शन से परेशान स्थानीय नेताओं ने एक अनोखी तरकीब सोची है जिसके तहत अपनी राजनीतिक सफलता की आस में वर्षों से उनके लिए प्रतिद्वंद्वी मानी जा रही अन्य स्थानीय पार्टियों से हाथ मिलाकर नए दल का ढांचा तैयार कर रहे हैं जिसका मूल लक्ष्य भारतीय जनता पार्टी को परास्त करना ही है। सत्तर के दशक में बनी जनता पार्टी जिस तरह कांग्रेस के विकल्प के रूप में सामने आई थी, क्या मौजूदा समाजवादी जनता परिवार किसी भी रूप से उस जनता पार्टी के पदचिन्हों पर चल सकेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। राम मनोहर लोहिया की राजनैतिक विरासत को अपनाने वाले परिवार ने मुलायम सिंह यादव को अपने दल का मुखिया चुना है। भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया है और साल के अंत में होने वाले बिहार चुनावों में धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे अहम रहेंगे। भाजपा की स्थिति इस समय ज्यादा मज़बूत है और नवनिर्मित समाजवादी जनता परिवार को इसे पछाड़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।

भाजपा ने अपने आपको विकास समर्थक पार्टी के रूप में ढालने में सफलता प्राप्त की है। सुशासन को पार्टी का ध्येय बनाकर और नरेंद्र मोदी को पार्टी का चेहरा बनाकर 10 महीने पहले हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा शानदार जीत दर्ज़ करने में कामयाब रही है। युवा मतदातों को लुभाने के लिए जातिवाद या वोट बैंक की राजनीति के बदले विकास की राजनीति पर ज़ोर देने की आवश्यकता है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में बिहार और उत्तर प्रदेश में भाजपा की मजबूत स्थिति और साथ ही इस वर्ष के अंत तक बिहार में होने वाले चुनावों के साथ-साथ वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में अपने अपने गढ को मजबूत बनाए रखने की आस में ही नए परिवार का गठन हुआ है। जनता परिवार आपसी समन्वय का प्रतीक है जिसके साथ नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह जैसे बड़े नेताओं के राजनीतिक सपने जुड़े हुए हैं। जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने विकास और भ्रष्टाचार मुक्त बिहार का सपना प्रदेश की जनता को दिखाया था और कुछ हद तक उसे साकार करने में सफल भी रहे थे। परंतु आगे चलकर उन्होंने पद त्याग कर मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। कुछ अंतराल के बाद फिर से काबिज हुए। उनकी छवि इससे कम हुई। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रशासन पर भी मिली जुली राय है और उनके द्वारा किए जा रहे अनेक प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठते रहे हैं। बिहार में नीतीश की पार्टी जनतादल (यू) भाजपा से अलग होने के बाद अपनी छवि को सुधारने की लगातार कोशिश में जुटी हुई है। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने साफ़ कर दिया है कि बिहार में सरकार बनाने के लिए उनकी पार्टी पूरी तरह ज़ोर लगाएगी। उधर जनता परिवार में साझेदारी कर रही सभी पार्टियों के स्वयं के हितों में टकराव आने वाले समय में इस नई साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकते हैं। भाजपा से मुकाबले से पहले जनता परिवार को अपने आपसी मतभेदों का मुकम्मल निदान ढूंढ़ना होगा।

0 33

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है। हिलेरी क्लिटंन ने डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से अपने नामांकन की पुष्टि कर दी है। हिलेरी क्लिटंन को अमेरिका में एक संघर्ष पूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ेगा और उनका चुनाव अभियान उनके पति बिल क्लिटंन के अभियान से पूर्ण रूप से अलग होगा क्योंकि अमेरिका एक अलग दौर से गुजर रहा है। मौजूदा स्थिति में अमेरिकी जनता का विश्‍वास हासिल करनेे में क्लिटंन की पार्टी को काफी संघर्ष करना पड़ेगा क्योंकि जनता का रुख उनके प्रतिद्वंद्वी समूह के समर्थन में नज़र आ रहा है। हिलेरी क्लिटंन हालांकि अमेरिका की राज्य सचिव रही हैं परन्तु इस चुनाव में विदेश नीति से अधिक अमेरिका की घरेलू समस्याओं पर उनका ज्यादा ध्यान रहेगा और उन्हें अधिक तैयारियां करनी पड़ेगी। इस चुनाव की अनोखी बात यह है कि इस बार अमेरिका में वोट देने वालों में बहुमत महिलाओं का है और हिलेरी को शायद इसका कुछ हद तक फायदा मिल सकेगा। अगर हिलेरी राष्ट्रपति चुनी जाती हैं तो वह ओवल ऑफिस में कदम रखने वाली दूसरी सबसे बुजुर्ग व्यक्ति होंगी और अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति होंगी। वर्ष 2016 के चुनाव अमेरिका के लिए ऐतिहासिक साबित होंगे।

क्लिटंन के लिए ओबामा सरकार द्वारा विफलताओं को भुनाना भी मुश्किल होगा क्योंकि ओबामा खुद उसी डमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति हैं जिस पार्टी से क्लिटंन ने नामांकन भरा है। अभी तक अमेरिका के इतिहास में सिर्फ एक ही उम्मीदवार अपनी ही पार्टी के प्रिसिडेन्ट के उत्तराधिकारी बनने में सफल रहे हैं। रोनाल्ड रीगन के बाद जॉर्ज बुश ने सत्ता संभाली थी। जब रीगन ने सत्ता छोड़ी थी तब उनकी लोकप्रियता काफी थी परन्तु ओबामा की स्थिति फिलहाल अमेरिका में काफी कमजोर है और क्लिटंन द्वारा ओबामा सरकार की उपलब्धियों से अपने मतदाताओं को लुभाना भी एक कठिन चुनौती है। क्लिटंन अपने चुनाव अभियान को अगर भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अभियान से प्रेरित होकर बनाती हैं तो शायद उन्हें सफलता मिलने का मौका प्राप्त हो सकता है। उन्हें अमेरिका की जनता को यह आश्‍वासन देना होगा कि वे (हिलेरी) ‘वह ओबामा’ हैं जिन्होंने प्रारंभ में बदलाव लाने का आश्‍वासन दिया था। फर्क इतना है कि मैं उन आश्‍वासनों को पूरा भी करूंगी। मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा के पिछले कुछ वर्षों में अनेक निर्णय ऐसे रहे हैं कि उनकी लोकप्रियता निरन्तर घटती रही और उन्हें एक विकास समर्थक नेता नहीं माना जा रहा है। अगर हम इसे भारत से तुलना करके देखें तो शायद उनकी स्थिति काफी कुछ मनमोहनसिंह जैसी है जो खुद तो विद्वान थे मगर सत्ताकाल में कुछ खास जादू नहीं दिखा पाए। क्लिटंन को मोदी की तरह ही विचारों को कार्य में बदलने की कोशिश करनी होगी और साथ ही उन्हें यह उम्मीद भी कायम रखनी होगी कि अमेरिका का मतदाता आज भी उनके साथ है। पूरे आत्मविश्‍वास के साथ इस रेस में कूदी क्लिटंन को यह ध्यान रखना होगा कि उनका चुनाव अभियान अमेरिका के आंतरिक विकास पर आधारित और विदेशी नीति से हटकर हो। आज के समय में अमेरिका की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और अभी हिलेरी के पास कुछ समय बाकी है कि वह सही रणनीति अपनाकर विजय प्राप्त कर सकें।

0 40

लगभग छह महीने की कसरत के बाद, पूर्व में रहे जनता परिवार से कालांतर में बने छह दलों का विलय हो गया है और समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायमसिंह यादव को नवगठित दल का अध्यक्ष बनाया गया है। हालांकि अभी इस नई पार्टी का नामकरण नहीं हुआ है और न ही चुनाव चिन्ह या झंडे के संबंध में फैसला किया गया है परन्तु यह महत्वपूर्ण है कि अपने अपने राज्यों में निजी हितों के बावजूद भी राष्ट्रीय स्तर पर इन सभी घटकों ने परस्पर विलय कर एक पार्टी बनाने का निर्णय लिया है। मुलायमसिंह यादव की समाजवादी पार्टी, देवेगौड़ा का जनता दल (एस), लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल, शरद यादव का जनता दल (यू), ओमप्रकाश चोटाला का इंडियन नेशनल लोकदल तथा कमल मोरारका की समाजवादी जनता पार्टी इस नई बनने वाली पार्टी में विलय होने वाले घटक हैं। हालांकि काफी समय से इनके विलय की अटकलें लगाई जा रही थीं परन्तु संगठित पार्टी का मुखिया कौन होगा, शायद इस पर सुई अटक रही थी और इसी घालमेल में समय बीतता जा रहा था। समय के साथ साथ भारतीय जनता पार्टी मजबूत होती दिख रही थी तो सभी ने अपने सामूहिक हितों के मद्देनजर हाथ मिलाया। जो घटक इस समय साथ आए हैं, ये सब किसी समय में एक साथ हुआ करते थे। उस समय इनके समक्ष कांग्रेस एक चुनौती के रूप में उपस्थित थी। आज कांग्रेस हासिये पर ही नहीं, बल्कि दयनीय स्थिति में है। वह राजनीतिक रूप से बाहर भाजपा से और पार्टी के अंदर गुटबाजी से जूझ रही है। दशकों पूर्व जनता दल ने कांग्रेस से मुकाबला करने के लिए भाजपा और वामपंथी दलों का सहयोग लिया था परन्तु अब उन्हें मुकाबला भाजपा से करना है। कांग्रेस कोई मदद भी करे तो क्या मदद करे, फिलहाल वह खुद ही पस्त है। कांग्रेस को खुद को जनता परिवार की मदद की जरूरत है। उधर भाजपा न केवल केन्द्र में सत्तासीन हुई है बल्कि राज्यों में भी उसका अच्छा-खासा विस्तार हुआ है।

बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार के साथ आने से भाजपा के चेहरे पर भी चिंता की सलवटें आना स्वाभाविक है। इतना ही नहीं, पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक वर्गों के साथ आने से नया गठबंधन काफी मजबूत दिखाई देता है। इस परिदृश्य में बिहार में भाजपा को अब नए समीकरण तलाशने होंगे। उत्तर प्रदेश में चौटाला, देवेगौड़ा या लालू यादव के सामूहिक रहने से भी खास असर नहीं होगा, वहां मुलायम सिंह का अपना खास वजूद है। दक्षिण में, विशेषकर कर्नाटक में खुद देवेगौड़ा का दल ही कमजोर है और समूह में शामिल बाकी पांच दलों का यहां कोई प्रभाव नहीं है। लोकसभा में भी इन पार्टियों का फिलहाल संख्या बल काफी कम है इसलिए एक साथ आने से वहां भी खास फर्क नहीं पड़ेगा। खास बात यह है कि ये दल कितने समय तक संगठित रहेंगे, इस पर देशभर की नजर रहेगी। सभी नेताओं के अपने अपने क्षेत्रीय हित हैं और सबके सब अहंकार से भरे हैं। इनके अहंकार के टकराव की स्थिति नहीं बने, इसके लिए इन्हें समय समय पर अपने कुछ सिद्धांतों और हितों का समझौता भी करना होगा। फिलहाल बिहार चुनाव इस नए दल की परीक्षा की घड़ी साबित होगा।

0 43

आत्मचिंतन करने के लिए अज्ञातवास पर गए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अभी तक लौटे नहीं हैं और उनके लौटने की कोई आधिकारिक निश्‍चित तिथि स्वयं कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी भी नहीं बता पा रही हैं। उनके लगभग दो माह के अज्ञातवास का वास्तविक कारण क्या है, किसी को पता नहीं परन्तु अटकलें लगाने वालों का मुंह बंद नहीं किया जा सकता। कहा जाता है कि वे नाराज होकर परिदृश्य से परे हो गए हैं तथा अपनी शर्तों पर लौटना चाहते हैं। इस बीच रह-रहकर पार्टी के वरिष्ठ नेता ऐसे बयान दे देते हैं कि लगता है कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों में सौंपी जाए, इस पर पूरी पार्टी एकमत नहीं है। हालांकि दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अपने ताजा बयान पर स्पष्टीकरण दिया है परन्तु जो कुछ उन्होंने कहा, उससे यह उजागर होता है कि वे सोनिया गांधी के नेतृत्व को बेहतर मानती हैं परन्तु राहुल को कमान संभलाने के खिलाफ भी नहीं हैं। जैसे ही उनके वक्तव्य के कारण कांग्रेस में हलचल पैदा हुई, उन्होंने तुरन्त मीडिया के सामने आकर कहा कि राहुल गांधी की क्षमता पर कोई शक नहीं है परन्तु हाल ही में जिस तरह से विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर सोनिया गांधी ने सक्रियता दिखाई और पार्टी में नए सिरे से जान फूंकी, यह उन्हीं के वश की बात थी।

शीला दीक्षित ने पूर्व भी कई बार कांग्रेस के नेताओं के ऐसे बयान आए जो यह संकेत देते हैं कि पार्टी में सब कुछ ठीकठाक नहीं है। नेतृत्व के मामले में भी दो गुट बन गए लगते हैं जिनमें एक सोनिया गांधी के नेतृत्व में ही पार्टी को आगे बढ़ाना चाहता है तो दूसरा धड़ा अविलम्ब राहुल को कमान सौंपने के पक्ष में है। यों भी लगता है कि इसमें एक खेमा बुजुर्गों का है तो दूसरा युवा पीढ़ी का है। हालांकि कोई भी कांग्रेसी राहुल को अक्षम या अयोग्य बताने की गुस्ताखी नहीं करता बल्कि उनकी तारीफों के पुल बांधने के साथ साथ सोनिया गांधी के नेतृत्व की हिमायत करता है। शायद सोनिया भी पार्टी के अधिकांश लोगों का दिल टटोलना चाहती हैं कि पूरी पार्टी का राहुल गांधी को समर्थन मिल पाएगा या नहीं। उन्हें डर है कि कहीं पार्टी बिखराव के रास्ते पर आगे न बढ़ जाए।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भले ही राहुल एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी हैं, युवाओं को आकर्षित करने में सक्षम हैं परन्तु अभी तक उन्होंने जो भी निर्णय लिए उनसे पार्टी को कोई खास लाभ नहीं पहुंचा। लगातार उनके नेतृत्व में पार्टी ढलान की तरफ है। चुनावों में हार और लोकप्रियता का ग्राफ नीचे की ओर खिसक रहा है। दिल्ली विधानसभा के चुनाव ने तो पार्टी की साख को बट्टा ही लगा दिया। एक के बाद एक प्रदेश हाथ से खिसक रहे हैं। पार्टी इस समय संकट के दौर से गुजर रही है और राहुल गांधी दो महीने से गायब हैं तथा उनकी अनुपस्थिति एक पहेली बन गई है। कांग्रेस को ही यह तय करना है कि उन्हें पार्टी की कमान सौंपी जाए या नहीं, परन्तु अच्छा यह होगा कि न तो उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें नेतृत्व सौंपा जाए और न ही पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की इच्छा के विरुद्ध पार्टी पर उनको थोपा जाए। निर्णय कांग्रेस को खुद को करना है।

0 47

छत्तीसगढ़ राज्य में नक्सलवाद नियंत्रण में आने के बजाय बेकाबू हो रहा है। हाल ही में तीन दिनों में नक्सलियों ने तीन हमले कर एक दर्जन से ज्यादा जवानों की जान ले ली है। मई 2013 में इसी राज्य की भीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर जो हमला हुआ था, उसकी यादें ताजा हो गई हैं। उस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और महेन्द्र कर्मा सहित कांगे्रस के 30 नेताओं ने जान गंवा दी थी। उस समय केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने राज्य की रमनसिंह सरकार को घेरने की भरपूर कोशिश की थी और रमन सरकार ने भी केन्द्र से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने का आरोप लगाया था। उस हमले के तत्काल बाद देश की राजनीति में ऐसा भूचाल आ गया था कि लगता था नेतागण अब देश से नक्सलवाद को खत्म करके ही दम लेंगे। विपक्षी दल हों या सत्ता पक्ष, हर कोई नक्सलियों से कड़ाई से निपटने की बात कह रहा था मगर दो वर्ष भी अभी नहीं बीते हैं, इस ताजा हमले से यह संकेत मिल रहे हैं कि नक्सलियों ने पहले से भी ज्यादा ताकत जुटा ली है। यही कारण है कि शहीद जवानों के शव वापस प्राप्त करने में भी सुरक्षा बलों को पसीना छूट गया। इस काम में भी चौबीस घंटे से ज्यादा का समय लगा। ताजा हमलों ने यह संदेश भी स्पष्ट दे दिया है कि हथियारों और रणनीति के मामले में वे हमारे जवानों पर भी भारी पड़ रहे हैं। हालांकि जवानों की अपनी सुरक्षा के प्रति लापरवाही भी उनकी जान-माल की दुश्मन बन जाती है। दूसरी बात नक्सलियों के साथ कठोरता से निपटने की स्थायी नीति क्यों नहीं अपनाई जाती? एक बार उनके सफाये का अभियान चलाया जाता है और फिर कुछ समय बाद पुलिस और अर्धसैनिक बल सुस्ताने लगते हैं। नक्सलियों से निपटने का अभियान सघन क्यों नहीं किया जाता? यह पहले ही साफ हो चुका है कि वे न तो वार्ता के लिए सरकार के साथ एक टेबल पर बैठने को तैयार हैं और न ही सरेंडर करने की मंशा रखते हैं। ऐसे में यह विश्‍वास क्यों किया जाता है कि एक न एक दिन वे शांति के रास्ते पर आ जाएंगे?

अब केन्द्र हो या राज्य सरकार देश के जो-जो क्षेत्र नक्सल प्रभावित हैं वहां एक ठोस रणनीति बनाने के लिए गंभीर बनें। कम से कम छत्तीसगढ़ और केन्द्र में एक ही पार्टी की सरकार है तो फिर समन्वय के साथ क्यों नहीं नक्सलवाद से सीधी लड़ाई लड़ी जाती? रह-रहकर नक्सली सुरक्षा बलों पर हमले करते हैं। एक हमले के बाद एक अरसे तक वे शिथिल दिखाई पड़ते हैं परन्तु इस दौरान वे हथियार जुटाने और अपनी शक्ति मजबूत करने का काम करते हैं। केन्द्र बार-बार कहता रहा है कि कोई भी राज्य अर्द्ध सैनिक बलों की मांग करेगा उसे पर्याप्त बल उपलब्ध कराए जाएंगे, फिर क्यों ऐसी घटनाएं घटती हैं? लगता है या तो स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच आवश्यक समन्वय नहीं है या फिर राजनीति ढुलमुल रणनीति के कारण बार-बार नक्सली हमारे सुरक्षा बलों पर भारी पड़ते हैं। ऐसी घटनाओं से हमारे जवानों का मनोबल भी गिरता है। राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ नक्सलवाद से एक ही बार में निर्णायक संघर्ष के लिए निर्णय लेना चाहिए अन्यथा हम ऐसे ही जवानों को शहादत के लिए बाध्य करते रहेंगे।

0 42

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में ऐतिहासिक मानी जाएगी। रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने में अभी तक हुई अनेक मुलाकातों में मोदी की यह यात्रा सबसे अहम होगी। इस यात्रा के दौरान किए गए सफल समझौतों में राफेल लड़ाकू विमान का सौदा है जिसके तहत भारत अगले 2 वर्षों में फ्रांस से 36 आधुनिक लड़ाकू विमान हासिल कर सकेगा। यह सही है कि लड़ाकू विमान फ्रांस में बनाए जाएंगे परन्तु इसे हम इस यात्रा की सफलता को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। भारतीय वायु सेना को मजबूत करने के लिए पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच लगातार वार्ता जारी रही है। इस समझौते को अंतिम रूप दिए जाने से भारतीय वायु सेना और मजबूत हो जाएगी। अगर सरकार अपने पुराने प्रस्ताव पर अड़ी रहती तो शायद यह सफलता नहीं मिल सकती थी। इन 36 विमानों के बाद भी वायु सेना को और अधिक विमानों की जरूरत पड़ेगी क्योंकि उसके मौजूदा विमान अब अपने जीवनकाल के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं। पिछली सरकार इस समझौते को काफी लम्बे अरसे तक ठंडे बस्ते में डाल चुकी थी। यह एक सरकार का दूसरी सरकार के बीच किया गया समझौता है इसमें किसी भी रूप से भ्रष्टाचार की आशंका नहीं रह जाती है। हालांकि प्रथम 36 विमान फ्रांस में बनाए जाएंगे परन्तु इस साझेदारी में यह भी साफ़ कर दिया गया है कि आगामी ऑर्डरों में भारत के मेक इन इंडिया योजना को भरपूर समर्थन दिया जाएगा। ऐसा लगता है जैसे फ्रांस ने नरेंद्र मोदी की इस यात्रा को सफल बनाने में पूर्ण समर्थन किया है। एयरबस के कारखाने में उनका दौरा महज एक प्रतीकात्मक दौरा नहीं था क्योंकि एयरबस बनाने वाले संघ ने यह साफ़ कर दिया है कि एयरबस द्वारा भारत में की जा रही आउटसोर्सिंग को 5 गुना बड़ा दिया जाएगा। गौर करने वाली बात यह भी है कि अधिकतम भारतीय विमानन कंपनियों की पहली पसंद एयरबस ही है। भारत और फ्रांस अपने रिश्तों को मजबूत करने के लिए 2 सेक्टरों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं और वह हैं रक्षा और परमाणु ऊर्जा विभाग।

मोदी की इस यात्रा से परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भी क्रांति आने की आस लगाई जा रही है और वर्षों से अधर में लटकी परियोजनाओं को हरी झंडी मिलने की भी उम्मीद जताई जा रही है। विश्व भर में परमाणु ऊर्जा प्रणाली का सबसे अधिक सफल उपयोग फ्रांस ही करता है और इस क्षेत्र के तजुर्बे से भारत को लाभ होगा क्योंकि भारत अभी ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां देश के विद्युत उत्पादन और खपत में इतना बड़ा अंतर है कि परमाणु ऊर्जा ही भविष्य के लिए योग्य विकल्प साबित होगी। भारत और अमेरिका के बीच असैनिक परमाणु समझौता भी पिछली सरकार के सुस्त रवैये से नाकाम रहा। मोदी भारत को एक विकसित देश बनाने की कोशिश कर रहे हैं और अगर वह फ्रांस से भारत के रिश्ते मजबूत करने में सफल रहे तो शायद उनके सपने भी सफलता की सीढियां चढते जाएंगे। साथ ही मोदी को यह भी ध्यान रखना होगा कि विकास की इस दौड़ में वह अपने देश के हितों से किसी भी रूप का समझौता नहीं कर सकते हैं। अगर देश को पूर्ण रूप से विकसित बनाना है तो अपने देश को स्वावलम्बी बनाने के साथ साथ सही साझेदारों से मजबूत रिश्ते भी अनिवार्य हैं।