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बाजार:

संपादकीय

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विदेश सचिव सुजाता सिंह की सेवा निवृत्ति में अभी छह सात माह का वक्त बाकी था परन्तु सरकार ने उनका त्यागपत्र लेकर उनके स्थान पर अमेरिका में राजदूत पद का दायित्व निभा रहे एस जयशंकर को नियुक्त कर दिया है और उन्होंने कार्यभार भी संभाल लिया है। इधर सुजाता सिंह ने भी कहा है कि उन्होंने समय-पूर्व सेवा निवृत्ति चाही थी। इस बदलाव को सहज लेना चाहिए क्योंकि यह प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है कि वे विदेश सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर किसको रखना चाहते हैं और किसको हटाना चाहते हैं परन्तु इस मुद्दे को भी मीडिया के एस हिस्से ने सुर्खियों में ला दिया और विवादित बनाने का प्रयास किया। दरअसल जयशंकर 31 जनवरी को रिटायर होने वाले थे और सरकार उनको सेवा विस्तार देना चाहती थी इसलिए उन्हें रिटायरमेंट के पहले ही विदेश सचिव का दायित्व सौंपना था और ऐसा ही किया गया। इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जाना उचित नहीं है। कहा तो यह भी जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी सुजाता सिंह को हटाना चाहते थे परन्तु वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव में वे ऐसा नहीं कर पाए थे। यह भी कहा गया कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सुजाता सिंह को विदेश सचिव पद से हटाना नहीं चाहती थीं और उन्हें हटाने से वह खुश नहीं हैं। यह सब व्यर्थ के विवाद पैदा करने के प्रयस हैं जो निरर्थक हैं। कांग्रेस ने इस मसले को गरमाने की कोशिश की और इसे देवयानी खोब्रागडे मामले से जोड़कर यह दिखाने का प्रयास किया मानो सुजाता सिंह को देवयानी प्रकरण की सजा दी गई हो। यह सच है कि देवयानी मामले में अमेरिका और भारतीय राजनयिकों ने प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाते हुए अड़ियल रुख अपना लिया था जिसके कारण एक समय तो ऐसा आया था कि अमेरिका से संबंध सामान्य से भी बदतर होने को थे परन्तु एस जयशंकर ने उस समय न केवल विवाद को सुलझाया बल्कि संबंधों में फिर से प्रगाढता लाकर ऐसा कुछ किया कि मोदी का अमेरिका दौरा और ओबामा की भारत यात्रा इतने अनुकूल माहौल में संभव हो सकी। जयशंकर को विदेश सचिव बनाने में इस प्रयास की भी बड़ी भूमिका रही होगी। अब भारत और अमेरिका के बीच जो समझौते ओबामा की यात्रा के दौरान हुए हैं उनको आगे बढ़ाने में जयशंकर का विदेश सचिव बनना अहम भूमिका निभाएगा क्योंकि इसकी जमीन उन्हीं के द्वारा तैयार की गई है।

अमेरिका के बाद मोदी चीन के साथ संबंधों को बेहतर बनाना चाहते हैं और इसी कड़ी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चीन की यात्रा पर जा रही हैं। निकट भविष्य में प्रधानमंत्री भी चीन जा सकते हैं क्योंकि वे विदेश नीति में संतुलन के हिमायती हैं और किसी एक देश से प्रगाढता कर दूसरे से रिश्तों को बिगाड़ने की नासमझी मोदी कतई नहीं करने वाले हैं। जयशंकर पूर्व में चीन के राजदूत के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं और भारत-चीन के बीच कई तरह की राजनयिक समस्याओं को सुलझाने मेंं भी सफल रहे हैं। उन्हें चीनी भाषा भी आती है, इसका भी थोड़ा-बहुत लाभ तो मिलता ही है। बहरहाल, शासकीय-प्रशासकीय पदों का दायित्व सरकार का सर्वोच्च नेता अपनी समझ और आवश्यकताओं के अनुसार करता है तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं है। विदेश मामलों में तो इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि दो देशों के बीच संबंध सुदृढ़ करने में किन को विशेषज्ञता प्राप्त है, उन्हें अहम दायित्व मिले। इसमें सुषमा स्वराज या नरेन्द्र मोदी के नाम को घसीटना समझदारी नहीं है।

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इसी गणतंत्र दिवस पर कर्नल मुनिन्द्रनाथ राय को युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था। उस दिन उनके गांव में जश्न का माहौल था। उनके वृद्ध पिता की आंखों में खुशी के आंसू थे कि उनके पुत्र को राष्ट्र ने बहादुरी का सम्मान प्रदान किया है परन्तु उनकी यह खुशी ज्यादा समय तक टिकी नहीं रह सकी। चौबीस घंटे भी नहीं बीते कि कर्नल एम एन राय के शहीद होने के समाचार ने उनके परिवार और देश को शोक में डुबो दिया। कर्नल को आतंकवादियों ने धोखे से मार दिया परन्तु अंतिम क्षणों में शहीद होते होते भी राय ने दोनों आतंकवादियों को ढेर कर दिया। कश्मीर के पुलवामा क्षेत्र में त्राल इलाके में गत लगभग दो वर्षों से वे तैनात थे और अपने इस छोटे से कार्यकाल में भी उन्होंने त्राल एरिया के रहवासियों के जीवन को बदलने की कई तरह से पहल की थी। युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए उन्होंने समय समय पर फुटबाल और क्रिकेट मैच आयोजित किए और उनके प्रयासों से स्थानीय लोगों में सेना के प्रति सोच में बदलाव आया। यही कारण था कि हाल ही में जम्मू-कश्मीर में हुए विधानसभा चुनावों में त्राल में भारी मतदान हुआ। इतना ही नहीं, देश के सेनाध्यक्ष ने कर्नल राय की बहादुरी और मानवीय पहलुओं के उदाहरण देते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने प्रदेश में आई गत बाढ़ विभिषिका के समय नागरिकों को मौत के मुंह से बचाया। उनकी बहादुरी के किस्से उनके हर उच्चाधिकारी को स्मरण हैं। कर्नल को अंतिम विदाई देने के वक्त भी ऑफिसरों ने कहा कि अगर चाहते तो कर्नल राय टुकड़ी का नेतृत्व स्वयं करने के बजाय किसी और को भी भेज सकते थे परन्तु जैसे ही उन्हें एक घर में दो आतंकवादियों के घुसे होने की खबर मिली वैसे ही वे स्वयं उनका मुकाबला करने निकल पड़े। उन्होंने आतंकवादियों को घेर भी लिया परन्तु बाद में आतंकी युवकों के पिता ने यह कहकर उन्हें नहीं मारने की विनती की कि वे आत्म समर्पण करना चाहते हैं। राय ने उस वृद्ध पर विश्वास कर लिया और उसी पल आतंकियों ने बातों में लगे कर्नल पर हमला कर दिया। राय के साथ राष्ट्रीय राइफल्स के हैड कांस्टेबल संजीव कुमार सिंह भी शहीद हो गए। धोखे से इस प्रकार कर्नल को मौत के घाट उतारने की इस घटना से घाटी के लोगों को यह अहसास तो होगा ही कि ऐसी घटनाएं ही सेना और स्थानीय लोगों के बीच विश्वास की डोर को कमजोर करती हैं।

कर्नल राय जैसे सेनाधिकारियों के प्रयासों के चलते ही घाटी में जनता और सेना के बीच की दूरियां पहले से कम हुई हैं क्योंकि तरह तरह के सामाजिक सेवा के कामों की पहल, खेल कूद प्रतियोगिताएं आदि होती रही हैं और शायद इसी कारण घाटी में हाल के वर्षों में आतंकवादी हिंसा की घटनाओं में काफी कमी आई है। अब तो घाटी में हिंसक प्रदर्शन और सेना के जवानों पर पथराव की घटनाएं भी नगण्य के बराबर हो गई हैं। पहले घाटी के लोग सेना को अपना कट्टर दुश्मन समझते थे परन्तु अब स्थिति में काफी सुधार हुआ है। युवा समझने लगे हैं कि राजनीतिक हितों के चलते राजनीतिक दल उन्हें बरगलाकर अपना हित साधते हैं। यही कारण है कि इस बार जम्मू कश्मीर में मतदान ने कीर्तिमान स्थापित किए। लोग घरों से बाहर निकले, मतदान किया, लोकतंत्र को मजबूत किया। अगर घाटी के लोग आतंकवाद के खात्मे में सेना का सहयोग करने लगें और केन्द्र तथा राज्य सरकार भी पूरे मन से घाटी के विकास में रुचि लें, युवाओं को रोजगार देने का बंदोबस्त करें, उनका विश्वास जीतें तो शायद न वहां सेना की तैनाती की जरूरत होगी और न हमें कर्नल एम एन राय जैसे बहादुर बेटों को गंवाना पड़ेगा।

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अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने तीन दिवसीय दौरे पर भारत आए। जिस गर्मजोशी से उनका आगमन के समय स्वागत हुआ उसी आदर-सम्मान के साथ उनकी विदाई भी हो गई। उनकी इस यात्रा को अगर एक वाक्य में बताया जाए तो ना तो वे यहां लुटने आए थे और ना ही इस देश को लूटने आए थे। उन्होंने दोनों देशों के हितों के मद्देनजर अनेक महत्वपूर्ण समझौते किए जिनकी सराहना की जानी चाहिए। ओबामा ने जिस तरह से अमेरिका को भारत के सर्वश्रेष्ठ साझेदार के तौर पर पेश किया उस पर किसी प्रकार का शक करना न्यायोचित नहीं होगा। उनके उद्‌बोधनों का अपने-अपने तरीके से अर्थ निकाला जा रहा है और वर्तमान सरकार विरोधी एक तबका ओबामा के कथन में से भी खामियां ढूंढकर उनका दुष्प्रचार करने में लगा है। ये वे लोग हैं जो मोदी और ओबामा की मित्रता को पचा नहीं पा रहे हैं। ओबामा के धर्म के आधार पर बंटवारे वाले व्याख्यान की इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश की जा रही है कि मानो उन्होंने मोदी सरकार के कार्यकाल में हाल ही में उठ खड़े हुए धर्मांतरण या घर वापसी के मुद्दे पर कुछ कहा हो। अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो कुछ कहा उसका यह तात्पर्य कतई नहीं हो सकता कि भारत में धार्मिक आजादी को लेकर किसी तरह का खतरा पैदा हो रहा है। घर वापसी जैसे आयोजनों को विपक्षी दल तथा मीडिया का एक बड़ा भाग भाजपा और मोदी सरकार का मूल एजेंडा बताकर प्रचारित कर रहा है जो सच्चाई से बहुत दूर है। अमेरिकी राष्ट्रपति अपने सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में दिए गए व्याख्यान में दोनों देशों की स्थितियों की तुलना करते हुए यह कह रहे थे कि दोनों देशों की चुनौतियां भी एक समान हैं। इसी कड़ी में उन्होंने उदाहरण देते हुए यह कहा कि अश्वेत होने के कारण अमेरिका में उन्हें भी खुद को भेदभाव का सामना करना पड़ा था। आज भी अमेरिका के ऐसे हालात नहीं बन सके हैं कि वह नस्लवाद से पूरी तरह मुक्त हो चुका हो। ओबामा ने यह कहने की कोशिश की कि दोनों ही लोकतांत्रिक देशों में स्वेच्छा से किसी भी धर्म को अपनाने या छोड़ने का मौलिक अधिकार नागरिकों को प्राप्त है। उन्होंने यह बात भी कही कि हर व्यक्ति को उत्पीड़न, डर या भेदभाव के बिना अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। उनके कथन को धर्म परिवर्तन और घर वापसी जैसे शब्दों से जोड़कर देखने वालों के दिमागी दिवालियापन का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। जो लोग कुछ समय से बार-बार घर वापसी के मुद्दे को गरमा कर वर्तमान केन्द्र सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि वे धर्मांतरण पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं। अगर धर्मांतरण ही नहीं होगा तो घर वापसी के कार्यक्रम क्योंकर आयोजित होंगे? स्पष्ट है कि ये लोग समस्या की जड़ में जाकर समाधान खोजने का प्रयास नहीं करना चाहते बल्कि संभवतः इनका अपना एक राजनैतिक एजेंडा है। ये लोग अमेरिकी राष्ट्रपति के संबोधन की मनमानी व्याख्या कर रहे हैं जबकि उनके भाषण को सही परिप्रेक्ष्य में लिया जाना चाहिए और उसी के आधार पर निष्कर्ष निकालना चाहिए।

दरअसल ओबामा ने तीन दिवसीय यात्रा में जो भी बातें कहीं और दोनों देशों के बीच जिस प्रकार की प्रगाढ़ता दिखाई वह अमेरिका ही नहीं भारतवासियों को भी अचंभित करने वाली थी। किसी ने भी ऐसी अपेक्षा नहीं की थी कि इन दो बड़े देशों का शीर्ष नेतृत्व इस तरह से एक दूसरे को गले लगाएगा। यही कारण है कि तरह-तरह की अनावश्यक शंकाओं को जन्म देकर यात्रा के महत्व को कम करने की कुचेष्टा की जा रही है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तीन दिवसीय यात्रा निश्चय ही ऐतिहासिक रही और इसमें भारतवासियों के प्रति ओबामा की आत्मीयता कुछ इस ढंग से परिलक्षित हुई कि देशवासियों के दिल में उन्होंने गहरी पैठ बना ली। तीन दिनों में उनका सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में मंगलवार को दिया गया भाषण प्रभावशाली था और पूरे भाषण में ऐसा लगा कि उन्होंने जो कुछ भी कहा वह दिल से निकले विचारों का प्रतीक था। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने भारत के सामाजिक ताने-बाने की शक्ति को पहचाना और देशवासियों को आगाह भी किया कि वे सचेत रहें और धर्म के आधार पर सामाजिक ताने-बाने को बिखरने न दें। उन्होंने भारत और अमेरिका की अनेक समानताओं और चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए इन दोनों देशों को स्वाभाविक साझेदार तो बताया लेकिन यह भी कहा कि यह दोनों देश सर्वश्रेष्ठ साझेदार बनकर एक उदाहरण पेश कर सकते हैं। उन्होंने हिन्दी में नमस्ते, धन्यवाद आदि का अपने भाषण में प्रयोग कर लोगों का दिल जीता। इतना ही नहीं, ओबामा ने अमेरिका में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए भाषण का जिक्र करते हुए अमेरिकी लोगों को ब्रदर्स एंड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका का उल्लेख करते हुए कहा कि वे (ओबामा) भी भारतवासियों को आज ब्रदर्स एंड सिस्टर्स के रुप में संबोधित करना चाहते हैं। उन्होंने भारत के बॉलीवुड स्टार शाहरुख खान, धावक मिल्खा सिंह, बाक्सर मैरीकॉम और समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी का नाम लेकर उन पर गर्व जताया। उन्होंने विशाल नामक उस 16 वर्षीय युवक की भी भरपूर प्रशंसा की जिससे पांच वर्ष पूर्व वे अपनी प्रथम भारत यात्रा पर हुमायूं के मकबरे पर मिले थे। विशाल एक मजदूर का बेटा है जो पढ़ लिखकर सेना में जाना चाहता है, उसे उन्होंने अपनी पहली मुलाकात में प्रोत्साहित किया था और आज भी उसको भूले नहीं। इसी प्रकार उन्होंने अपनी एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना करते हुए कहा कि मोदी अगर चाय वाले के बेटे हैं तो वे खुद (ओबामा) एक रसोइये के पोते हैं। उन्होंने अमेरिका और भारत में सशक्त लोकतंत्र की तारीफ करते हुए कहा कि दोनों ही देशों में लोकतंत्र इतना मजबूत है कि धर्म, जाति, नाम और संप्रदाय से ऊपर उठकर एक रसोइये का पोता राष्ट्रपति और चाय वाले का बेटा प्रधानमंत्री बनने में सक्षम है। उन्होंने सिरीफोर्ट के अपने व्याख्यान में भारत की विविधता में एकता की भी भरपूर सराहना की। यहां के लोगों को मेहनती एवं प्रतिभावान बताया और यह भी कहा कि दोनों देश एक दूसरे के हितों का ध्यान रखते हुए अपने-अपने भले के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने इस सच्चाई को भी नहीं छुपाया कि अमेरिका के पास बड़ी अर्थव्यवस्था और हथियार हैं जिनके लिए भारत एक बड़ा बाजार है, परन्तु भारत के पास भी युवा शक्ति और काबिलियत है। इन सब शक्तियों को शामिल करके दोनों देश तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। ओबामा के भाषण में स्पष्टवादिता थी और दुनिया को एक सीधा संदेश भी था कि वे किसी अन्य देश या समूह को प्रभावित करने, घेरने, कमजोर करने के लिए भारत से मित्रता नहीं बढ़ा रहे हैं बल्कि इन दोनों देशों के विकास को गति देने और क्षेत्र में शांति, सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए यह कदम उठा रहे हैं। ओबामा ने मोदी को यह विश्वास भी दिलाया कि वे भारत को परमाणु एवं मिसाइल तकनीक रखने वाले ग्रुप की सदस्यता दिलाने का प्रयास करेंगे। अगर ऐसा होता है तो हमें उन देशों से भी तकनीक मिल सकेगी। कुल मिलाकर ओबामा की भारत यात्रा लम्बे समय तक भारतवासियों के लिए अविस्मरणीय रहेगी।

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असैन्य परमाणु करार पर अमेरिका और भारत के बीच गत लगभग सात वर्षों से जो गतिरोध बना हुआ था वह रविवार को खत्म हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुई बातचीत में अब तक आ रही बाधाओं को दूर कर लिया गया। कुछ हद तक इस बात के संकेत सुबह ही मिल गए थे जब भारत आने के बाद ओबामा ने पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में यह कह दिया था कि वे कई महत्वपूर्ण घोषणाएं करने वाले हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मोदी ने जिस गर्म जोशी से ओबामा का स्वागत किया और ओबामा ने जिस रूप में प्रतिक्रिया दी उससे यह आभास होने लगा था कि भारत और अमेरिका के बीच एक नई उर्जा का संचार हो रहा है और इसके परिणाम सुखद ही होंगे। ओबामा ने हिन्दी भाषा में बोलकर भारतीयों का दिल जीतने की कोशिश की और “साथ साथ’ चलने का वादा किया। वे बॉडी लेंग्वेज से भी मोदी के “साथ साथ’ चलते दिखाई दिए। शाम होते होते तस्वीर साफ हो गई और शिखर वार्ता में दोनों देशों ने असैन्य परमाणु करार पर पुरानी सरकार के समय से चली आ रही बाधा को हटा दिया। इसे एक बड़ी सफलता माना जाएगा जो दोनों देशों के हित में है। अमेरिका और अन्य देशों द्वारा सप्लाई किए गए ईंधन पर नजर रखने की अमेरिका की मांग और जवाबदेही से जुड़े उपबंध के मुद्दे को दोनों नेताओं ने कैसे हल किया, इसकी तो अभी जानकारी नहीं मिली है परन्तु समाधान होने से अब यह समझौता पूरी तरह से लागू हो सकेगा।

प्रसन्नता की बात यह भी है कि दोनों देशों ने कहा है कि वे अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकी के अन्य क्षेत्रों में भी परस्पर सहयोग की संभावना तलाशेंगे। आतंकवाद के मामले में दोनों देशों ने पूर्व में भी साझा लड़ाई लड़ने की प्रतिबद्धता दर्शाई थी और आज उन्होंने अपने संकल्प को दोहराया है कि वे एक व्यापक वैश्विक रणनीति बनाकर आतंकवाद से नए दृष्टिकोण के साथ लड़ेंगे। ऐसा होने पर पाकिस्तान पर भी नए सिरे से दबाव बनेगा। पाकिस्तान आतंकवादियों को बढ़ावा भी दे और अमेरिका से सहायता भी लेता रहे, इस स्थिति में परिवर्तन आएगा। अब वह अमेरिका से ज्यादा मदद की उम्मीद तब तक नहीं कर सकेगा जब तक कि वह आतंकवादियों में बिना भेद किए उनसे लड़ाई करने का स्पष्ट संदेश नहीं दे देगा। एशिया प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए साझा प्रयास करने एवं जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर मिलकर काम करने का निर्णय लिया गया है, यह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण फैसला है। दोनों देश एक दूसरे के लिए महत्वपूर्ण हैं और दोनों के साथ आने से परस्पर हितों को साधा जाना अब सरल होगा। भारत को अपने “मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम पर जोर देना है जिसमें अमेरिका से तकनीकी सहयोग अपेक्षित होगा वहीं अमेरिका को भारत में एक बहुत बड़ा बाजार दिखाई देता है। इसलिए दोनों के हित जुड़े हैं। दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के मामले में भी गंभीर चिंतन मंथन हुआ है जिसका असर आने वाले समय में दिखाई देने की संभावना है। ओबामा अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति हैं जो गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हुए हैं और दूसरी बार भारत आए हैं। बहरहाल, भारत और अमेरिका की दोस्ती के इस नए अध्याय लिखे जाने पर दुनियाभर की नजरें टिकी हैं परन्तु यह भी सच्चाई है कि पूरे विश्व में आज जो हालात हैं उनके मद्देनजर इन दोनों देशों की मित्रता विशेष रूप से दक्षिण एशिया क्षेत्र में शांति और स्थिरता लाने में मददगार होगी।

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बराक ओबामा के भारत आने से पहले ही पाकिस्तान में एक घटना घटी है। भारत विरोधी आतंकी हाफिज सईद के संगठनों से संबंधित सारे एकाउंट पाकिस्तानी सरकार ने जब्त कर लिए हैं। इन आतंकियों के विदेश दौरे पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इन घटनाओं ने एशिया में बदलती अमेरिकी रणनीति का खुलासा किया है। इससे पहले विदेश मंत्री जॉन कैरी के दबाव में पाकिस्तानी सरकार ने हाफिज सईद के संगठन को प्रतिबंधित कर चुका है। बराक ओबामा के भारत दौरे से पहले भारतीय भूमि पर पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा साजिशी हमले की आशंका थी। इस पर भी अमेरिका ने गंभीर चेतावनी पाकिस्तान को दी थी। अमेरिका ने अब मुंबई हमलों के जिम्मेवार जकीउर रहमान लखवी को भारत को सौंपने की सलाह दी है। सवाल है कि क्या अमेरिका की एशिया नीति में बदलाव आ रहा है? क्योंकि पाकिस्तानी नजरिए से ही अमेरिका भी आतंकी संगठनों को अच्छे और बुरे के तौर पर देखता रहा है। भारत विरोधी आतंकी संगठनों को अमेरिका आजतक बुरे की सूची में डालने से परहेज करता रहा। अगर बुरे की सूची में डाला भी तो मन मसोस कर, क्योंकि पाकिस्तान एशिया में अमेरिका की भौगोलिक रणनीति का मुख्य हिस्सेदार रहा है। इस कारण भारत की धरती पर हुए आतंकी हमलों को लेकर अमेरिका कभी गंभीर नहीं रहा।

अमेरिका ने एक लंबी लड़ाई अफगानिस्तान में लड़ी। इस लड़ाई की आधार भूमि पाकिस्तान थी। चाहे वो लड़ाई सोवियत रूस के खिलाफ थी या वर्तमान में तालिबान और अलकायदा के खिलाफ, लड़ाई का परिणाम एक ही निकला। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चूना लगा। अमेरिका को रक्षा बजट प्रतिवर्ष 800 बिलियन डालर हो गया, जो किसी जमाने में 100 बिलियन डालर के आसपास ही सीमित था। वर्ष 2001 में अफगानिस्तान में शुरू हुई एक नई लड़ाई से पहले यही रक्षा बजट 200 बिलियन डालर के आसपास था। यही नहीं, वार अगेंस्ट टेरर के नाम पर अमेरिका ने अब अरबों डालर पाकिस्तान को दिए, लेकिन पाकिस्तान इसी पैसे से जेहादियों को संरक्षण देता रहा। अमेरिका को बेवकूफ बनाता रहा।

विचारकों का एक वर्ग मानता है कि अमेरिका अपने रक्षा उद्योग को फायदा देने के लिए विश्व में युद्ध की स्थिति पैदा करता है ताकि अमेरिकी उद्योग जगत के उत्पादनों की मांग बढ़े। इराक युद्ध में सिर्फ अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री को ही फायदा नहीं हुआ, बल्कि पेट्रोलियम समेत कई कंपनियों को भारी लाभ हुआ लेकिन अफगानिस्तान के युद्ध में अमेरिका को नुकसान हुआ। वर्ष 2001 में छिड़े अफगानिस्तान युद्ध के बाद अमेरिकी रक्षा उद्योग को बेशक फायदा हुआ लेकिन अमेरिकी सरकार की माली हालत ठीक नहीं रही। क्योंकि अफगानिस्तान की लड़ाई में अमेरिकी सरकारों को सीधे कुछ हासिल नहीं हुआ। अफगानिस्तान इराक की तरह हथियार खरीदने वाला मुल्क नहीं था और न ही अफगानिस्तान में अन्य संसाधनों की दोहन की स्थिति बनी थी। इराक ने अमेरिका से युद्धकाल में भारी हथियार खरीदे। इसके बदले में लगभग 100 अरब डालर रुपये का भुगतान इराक की सरकार ने अमेरिकी कंपनियों को किया, लेकिन अफगानिस्तान की सरकार हथियार से लेकर सेना तक सबकुछ अमेरिकी सरकार पर निर्भर थी। आज अफगानिस्तान को नाटो सैनिकों की वापसी के बाद अपनी सेना को वेतन देने के लिए भी अपने पैसे नहीं है।

अमेरिकी की परेशानी जबरजस्त है। अभी तक जेहाद का स्वरूप स्थानीय था। जेहाद की लड़ाई इस्लामिक भूमि पर ल़ड़ी जा रही थी। अब यह लड़ाई पश्चिम की भूमि पर लड़ी जा रही है। पहले जेहादी अफगानिस्तान, पाकिस्तान समेत अफ्रीका के कई मुल्कों में तैयार किए जाते थे। ये ज्यादातर गरीब बेरोजगार मुस्लिम थे। इन बेरोजगारों को पैसे देकर जेहाद में जेहादी संगठन शामिल करवा रहे थे। इन जेहादी संगठनों को अपने हितों में भी अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने इस्तेमाल किया। कई मुल्कों की सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की। किसी जमाने में जेहादियों ने अमेरिका के कहने पर अफगानिस्तान में नजीबुल्लाह की सरकार को अस्थिर किया क्योंकि नजीब सोवियत कैंप के थे। कुछ समय पहले तक सीरिया में असद सरकार को अमेरिका समर्थित जेहादी अस्थिर कर रहे थे। लीबिया में कर्नल गद्दाफी को अपदस्थ करने के लिए कट्टरपंथियों को अमेरिका ने समर्थन दिया। आज लीबिया को उसी हाल में छोड़ दिया है। लेकिन हालात बदल गए। अब जेहाद पश्चिम की धरती पर सीधे हो रहा है। इसके लिए जेहादी पेशावर, काबुल और कंधार से नहीं जा रहे हैं। पश्चिम में पैदा हुए मुस्लिम युवक जेहादी बन गए हैं। फ्रांस की घटना इसका उदाहरण है। अफ्रीकन मूल के तीन मुस्लिम जो फ्रांस में पैदा हुए उन्होंने फ्रांस की हालत खराब कर दी। फ्रांस यूरोप का वह देश है जहां सबसे ज्यादा मुस्लिम हैं। इसके बाद जर्मनी है जहां पर चालीस लाख मुस्लिम आबादी है। ब्रिटेन भी उन मुल्को में है जहां पर मुस्लिम अच्छी संख्या में हैं। इन तीनों मुल्कों के सैंकड़ों जेहादी पश्चिम की विलासिता की जिंदगी छोड़ सीरिया में जेहाद के लिए पहुंचे हैं। यही कुछ हालात अमेरिका को भी देखने पड़ सकते हैं। जेहाद यहां स्थानीय पैदा हुए जेहादी कर सकते हैं।

अमेरिका को पता है कि भारत का जेहाद से लड़ने का लंबे समय का अनुभव है। किसी जमाने में मध्यपूर्व और पश्चिम एशिया में सोवियत रूस को पीछे करने के लिए पश्चिमी मुल्कों ने पाकिस्तान का जोरदार समर्थन किया। पाकिस्तन को बफर जोन बनाया। उस समय टारगेट सोवियत रूस था। पश्चिमी मुल्कों ने भारत की समस्या नहीं सुनी। भारत की मूल समस्या पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद था। भारत की समस्या पश्चिम समर्थित पाकिस्तानी सैन्य हुक्मरान थे। इस कड़ी में अयूब खान से लेकर परवेज मुशर्रफ तक शामिल रहे। जनरल जिया इस कड़ी में महत्वपूर्ण अंग थे। अब जब जेहादी संगठन लंदन और पेरिस में स्थानीय युवाओं से जेहाद करवा रहे हैं तो अमेरिका को भारत की याद आयी है। आज जब जेहाद पश्चिम की धरती पर हैं तो भारत को अमेरिका बफर जोन बनाना चाहता है। भारत इतना नादान नहीं है कि ऐसा होने दे।

संजीव पांडेय
संपर्क : 09417005113

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भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को लेकर उच्चत्तम न्यायालय ने जो फैसला सुनाया है वह अभूतपूर्व है। इस एक फैसले ने देश की जनता में और क्रिकेट प्रेमियों में एक आशा की किरण जगाई है कि अब स्वच्छ भारत अभियान के साथ ही क्रिकेट की धांधलियों की भी सफाई होगी तथा लंबे समय से बोर्ड नेतृत्व द्वारा अपने ही चहेतों में जो फायदे की रेवड़ियां बांटने का काम चल रहा था वह बंद हो जाएगा। अनगिनत लोगों की जो अवैध दुकानें चल रही थीं वे बंद होने वाली हैं। उच्चत्तम न्यायालय ने विस्तृत फैसला देते हुए बीसीसीआई में गहराई तक फैले भ्रष्टाचार और शीर्ष नेतृत्व की मनमानी उजागर कर दी। उच्चत्तम न्यायालय ने भारतीय क्रिकेट के सबसे ज्यादा कद्दावर व्यक्ति एन श्रीनिवासन पर ऐसी पाबंदियां लगा दी हैं कि उनका सारा कारोबार ही गड़बड़ झाले में पड़ जाएगा। श्रीनिवासन बीसीसीआई का अगला चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। तीन सेवा निवृत्त न्यायाधीशों की समिति बोर्ड के नियमों की जांच करके उनमें संशोधन का प्रारूप देगी। कोर्ट ने संविधान में उस संशोधन को गैर कानूनी करार दिया है जिसके तहत इसके अधिकारियों को बोर्ड के साथ व्यावसायिक लेन देन की अनुमति थी। भ्रष्टाचार और बंदरबांट का सबसे बड़ा क्षेत्र यही था। इसी के चलते श्रीनिवासन बोर्ड में पदाधिकारी रहते हुए चेन्नई सुपर किंग्स (सीएसके) टीम के मालिक भी बने हुए थे। इसी प्रकार कृष्णमाचारी श्रीकांत मुख्य चयनकर्ता भी थे और सीएसके के ब्रांड एम्बेसडर होने के सारे व्यावसायिक लाभ भी प्राप्त कर रहे थे। महेन्द्र सिंह धोनी श्रीनिवासन की कंपनी इंडिया सीमेंट्‌स के डाइरेक्टर बने हुए थे, साथ ही सीएसके और भारतीय टीम के कप्तान भी थे। इस प्रकार ये सारी हस्तियां बोर्ड के जरिए दोहरा लाभ प्राप्त कर रही थीं। यही कारण भी था कि श्रीनिवासन के खिलाफ कोई मुंह नहीं खोलता था क्योंकि उनसे इन लोगों के सीधे आर्थिक हित जुड़े थे।

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे बड़ी बात तो यह कही कि बोर्ड एक सार्वजनिक प्रतिष्ठान है। इसके अधिकारी हमेशा यह कहा करते थे कि यह निजी कंपनी की तरह रजिस्टर्ड है इसलिए सार्वजनिक संस्थान के नियम कानून इस पर लागू नहीं होते थे। यही कारण था कि सूचना के अधिकार के दायरे से भी बीसीसीआई बचा हुआ था। अब बोर्ड को एक सार्वजनिक प्रतिष्ठान की तरह काम करना होगा। अब इससे जुड़े पदाधिकारियों की मनमानी और आर्थिक धांधलियों पर भी नियंत्रण लग सकेगा। क्रिकेट का खेल भारत में बहुत ज्यादा लोकप्रिय है इसलिए जनता लाख गड़बड़ियों के बावजूद भी यह नहीं चाहती कि इस खेल पर किसी प्रकार की आंच आए। इस खेल में पैसा भी बारिश की तरफ बरसता है और इससे जुड़े लोग चांदी काटते हैं। बोर्ड के नेतृत्व पर अंगुली उठाने की कोई हिम्मत नहीं करता है चाहे वह इस बोर्ड में ईमानदार कर्मचारी या अधिकारी ही क्यों न हो। पहली बार ऐसा लग रहा है कि श्रीनिवासन की नकेल कसी गई है। पूर्व में भी अदालतों के फैसले आए परन्तु श्रीनिवासन का बाल भी बांका नहीं हुआ। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने यह साबित कर दिया कि “सुप्रीम’ वही (सुप्रीम कोर्ट) है। इतना ही नहीं, श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन और राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुन्द्रा भी सट्टेबाजी के दोषी पाए गए हैं। मयप्पन और राज कुंद्रा को कितनी और क्या सजा मिलनी चाहिए यह भी अब बोर्ड तय नहीं करेगा बल्कि उच्चत्तम न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीशों की तीन सदस्यी कमेटी निर्णय करेगी। कोर्ट का यह निर्णय देश और क्रिकेट के हित में है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरियाणा प्रदेश से “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की गुरुवार को शुरुआत कर दी है। इस कदम की जितनी सराहना की जाए, उतनी कम है। प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया एवं प्रधानमंत्री जन धन योजनाएं भी अच्छी हैं परन्तु उनमें सरकार की भागीदारी और जिम्मेदारी ज्यादा दिखाई देती है परन्तु “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की पूरी सफलता सामाजिक जागरूकता और सामाजिक सहयोग पर निर्भर है। जिस देश में बेटियों को बोझ समझा जाता हो और भ्रूण हत्या के जरिए बेटियों को जन्म नहीं लेने दिया जाता है उस देश में बेटियों के लिए ऐसा कार्यक्रम लाना प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि ही कहा जाएगा। इस अभियान की शुरुआत भी हरियाणा से की गई है जहां लड़के-लड़की के लिंगानुपात में काफी असंतुलन है। इसी कारण आज न चाहते हुए भी हरियाणा में बड़ी संख्या में युवक बिना शादी के रहने को बाध्य हैं क्योंकि विवाह के लिए लड़कियां ही नहीं हैं।

हरियाणा के 12 जिलों में स्थिति ज्यादा दयनीय है जहां यह अनुपात सामान्य से काफी कम है। यह स्थिति हरियाणा की है परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि अन्य प्रदेशों में बेटियों के अनुकूल परिस्थितियां हैं। अधिकांश जगह लड़कियों को आज भी बोझ माना जाता है और उन्हें उचित शिक्षा भी नहीं दी जाती। इसके भी दो कारण हैं। एक तो ऐसी धारणा बनी हुई है कि बेटी पराया धन है। उसकी पढ़ाई लिखाई पर खर्चा करने से क्या फायदा, वह तो ससुराल चली जाएगी। दूसरी बात, पढ़ाई तथा अन्य सुख सुविधाओं में बेटे को प्राथमिकता दी जाती है, बेटी को बराबर का दर्जा कम घरों में ही मिल पाता है। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि एक बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम भी नहीं है कि बेटे-बेटी दोनों की पढ़ाई का बोझ उठा सके। ऐसे में बेटी को नजरंदाज कर दिया जाता है। अब प्रधानमंत्री ने बीड़ा उठाया है तो देश की जनता में अवश्य जागरूकता पैदा होगी क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की सोच और उनकी कार्य शैली ने देश की जनता को इस कदर प्रभावित किया है कि वह उनके हर अभियान को फिलहाल गंभीरता से लेने की चेष्टा कर रही है। जनता को मोदी पर विश्वास है और शायद इसी विश्वास के कारण जनता स्वयं इस अभियान में जुड़ेगी। इस अभियान के अंतर्गत देश के 100 जिलों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा क्योंकि यहां लिंगानुपात चिंताजनक मुकाम पर पहुंच गया है। समूचे समाज की मानसिकता में परिवर्तन से ही इस अभियान के अच्छे परिणाम आ सकते हैं। यह कार्य केवल सरकार के प्रयासों से भी सफल नहीं हो सकता और कानून बना देने से भी इसके अपेक्षित परिणाम नहीं आ सकते। बेटियों के मामले में हर वर्ग, हर समुदाय, हर वर्ण की सोच बदलेगी तभी भ्रूण हत्या बंद होगी और बेटियों को बचाया जा सकेगा। जब बेटियां बचेंगी तो उन्हें पढ़ाने की दिशा में भी काम होगा। बेटियां पढ़ेंगी तो वे अपनी शिक्षा से दो परिवारों को रोशन करेंगी। अपना मायका और फिर अपना ससुराल उनका कार्य क्षेत्र होगा। शिक्षित बेटियां शिक्षित महिलाओं के रूप में एक नए स्वस्थ समाज की संरचना में अग्रणी भूमिका निभाएंगी। उनके द्वारा जिन संतानों की शिक्षा दीक्षा होगी उससे सुसंस्कारित समाज का नवनिर्माण होगा। यह विडम्बना ही है कि आजादी के बाद छह दशकों में देश ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति की और इस प्रगति में महिलाओं का भी योगदान कम नहीं रहा है फिर भी उनके प्रति उचित आदर, सम्मान का अभाव अभी भी बरकरार है। इस सोच को पूरी तरह से बदलने की जरूरत है।

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अमेरिका और ब्रिटेन ने पाकिस्तान से कहा है कि वह 26/11 मुंबई हमले के मास्टर माइंड लश्कर आतंकी जकीउर्रहमान लखवी को भारत को सौंप दे या पश्चिमी देशों को सौंप दे ताकि इस मामले की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र सुनवाई हो पाए। मुंबई हमले में अनेक देशों के नागरिक मारे गए थे। यह बात पूरी दुनिया जानती है कि कट्टर आतंकवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और सजा दिया जाना पाकिस्तान में संभव नहीं है क्योंकि पाकिस्तानी सत्ता में अथवा वहां की सेना में इन आतंकवादियों के हम दर्द बैठे हैं जिनका वरदहस्त इन पर होता है। वहां आतंक के सरगनाओं को तो जेल में भी सारी सुविधाएं मिलती हैं। दुनिया को दिखाने के लिए पाकिस्तान सरकार कार्रवाई के नाम पर बस खानापूर्ति करती है। मुंबई हमले का षड़यंत्र रचने के लिए वर्ष 2009 में रावलपिंडी की आतंक विरोधी अदालत में लखवी सहित सात अभियुक्तों पर मुकदमा चला था। एक वर्ष बाद यह मुकदमा इस्लामाबाद स्थानांतरित कर दिया गया। गत वर्ष जज ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सुनवाई रोक दी थी। इतना ही नहीं, हाल ही में गत 18 दिसंबर को तो पर्याप्त सबूत न होने के कारण लखवी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया गया था। यह तो भारत के कड़े रुख और विरोध दर्शाने पर एक अन्य मामले में उसे रिहा होने से पहले ही गिरफ्तार कर फिर से जेल भेज दिया गया था, अन्यथा वह तो जेल से बाहर आने वाला था। जेल में भी उसे सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां तक कि लखवी की पत्नी को भी जेल में पति के साथ रहने की अनुमति मिल जाती है और वह एक बच्चे की मां भी बन जाती है।

गौरतलब है कि दुर्दान्त आतंकवादियों को जिस देश में इस तरह से पनाह दी जाती हो उसके खिलाफ उसी देश में निष्पक्ष मुकदमा चलाकर उसे सजा दी जाएगी, यह भरोसा करना ही बेमानी होगा। लखवी केवल मुंबई हमलों का मास्टर माइंड नहीं है बल्कि चेचेन्या, इराक, बोस्निया में भी आतंकी वारदातों में शामिल होने के उस पर आरोप हैं। मुंबई हमले में योजना तैयार करने, उसे क्रियान्वित कराने और आतंकियों को प्रशिक्षण देने की प्रमुख भूमिका लखवी ने ही निभाई थी। इसकी पुष्टि मुंबई हमले में पकड़े गए आतंकवादी अब्दुल कसाब के बयानों से भी हो गई थी, जिसे बाद में फांसी दे दी गई थी।

पाकिस्तान आतंकियों का शरणगाह ही नहीं है बल्कि भारत के खिलाफ तो आतंकवाद को वह बढ़ावा और प्रशिक्षण भी देता है परन्तु पाकिस्तान की पेशावर स्थित सैनिक स्कूल में आतंकियों द्वारा की गई घृणित हत्याओं के बाद पूरी दुनिया में पाकिस्तान की खासी किरकिरी हुई और पाक सेना भी काफी आक्रोश में है। पाक सेना प्रमुख राहिल शरीफ आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के पक्ष में हैं। अमेरिका ने भी पाक पर दबाव बनाया है कि वह अब केवल कार्रवाई का ड्रामा करने के बजाय वास्तव में आतंकवाद से लड़ाई लड़े। इसी दबाव के क्रम में अमेरिका ने लखवी के प्रत्यर्पण की सलाह भी दे दी है। ब्रिटेन ने भी अमेरिका के सुर में सुर मिलाया है। इतना सहज ही पाकिस्तान लखवी को भारत को सौंप देगा, ऐसा नहीं लगता परन्तु अब आतंकवाद पर वहां भी शिकंजा जरूर कसा जाएगा। बहरहाल, इतना ही कहा जा सकता है कि अगर लखवी भारत को सौंपा जाता है तो भारत का भी पाकिस्तान के प्रति भरोसा बढ़ेगा और शांतिवार्ता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ने की स्थितियां बनेंगी।

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देश की प्रथम महिला पुलिस प्रशासनिक अधिकारी रहीं किरण बेदी के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होते ही दिल्ली की चुनावी राजनीति में खलबली मच गई और जब सोमवार की देर रात उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में भाजपा ने प्रोजेक्ट किया तो तूफान आने की सी स्थिति बन गई। पांच दिन पहले ही बेदी ने भाजपा में कदम रखा था और उन्हें स्वयं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तथा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने समारोह पूर्वक पार्टी में शामिल किया था, तभी यह अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट किया जाएगा ताकि आम आदमी पार्टी के प्रमुख तथा 49 दिनों तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल की बोलती बंद की जा सके। दिल्ली के पिछली बार हुए विधानसभा चुनावों में भी कुछ दिनों तक यह हवा गर्म रही कि किरण बेदी भाजपा में शामिल होंगी और उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया जाएगा परन्तु ऐसा हुआ नहीं। हो सकता है कि बेदी ने राजनीति में कदम रखने का पूरा मन उस समय नहीं बनाया हो या फिर भाजपा ने उनकी जरूरत नहीं समझी हो। परन्तु भाजपा ने डॉ. हर्षवर्धन जैसे ईमानदार छवि के नेता के नेतृत्व में चुनाव लड़कर सबसे बड़ी पार्टी होने का खिताब तो जीत लिया किन्तु सरकार नहीं बना सकी। अब भाजपा पुनः वह स्थिति पैदा नहीं होने देना चाहती। हाल के महीनों में कई सर्वेक्षण आए हैं जिनमें फिर से त्रिशंकु विधानसभा की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं और दिल्ली की जनता में अरविंद केजरीवाल अभी भी मुख्यमंत्री पद के सबसे पसंदीदा उम्मीदवार बने हुए हैं। ऐसे में उनको कड़ी टक्कर देने के लिए किरण बेदी से उपयुक्त कोई चेहरा नहीं हो सकता था। अमित शाह ने बहुत सोची समझी रणनीति के तहत यह दांव खेला है।

अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने काफी दिनों से अच्छा फील्ड वर्क किया है और अपनी चुनावी जमीन को खासा मजबूत किया है। उनकी चूलें हिलाने के लिए बेदी से बढ़िया कोई चेहरा नहीं हो सकता इसलिए उनके नेतृत्व में दिल्ली का चुनाव लड़ा जाएगा। उनका नाम आते ही पार्टी के कई पुराने नेता स्तब्ध रह गए। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि वर्षों तक जिन्होंने पार्टी रूपी पौधे में मेहनत के पसीने का सिंचन किया और जब फल देने का समय आया तो किरण बेदी आ गईं। दो-तीन दिन तक नाराजगी की सुगबुगाहट रही परन्तु जैसे ही अमित शाह ने उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात कही वैसे ही आग में ठंडा पानी पड़ गया और पार्टी में एकजुटता के संदेश देने का प्रयास हुआ। उधर ज्यादा खलबली “आप’ में मची है। केजरीवाल और उनके साथी बार बार कह रहे थे और चुनौती भी दे रहे थे कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री चेहरा क्यों नहीं आगे लाती है? अब आप की यह चुनौती उनको खुद को भारी पड़ने वाली है। केजरीवाल मूलतः भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला चेहरा माने गए और इसी का उन्हें लाभ मिला। अब उन्हीं की साथी रही तथा अन्ना आंदोलन में अग्रणी रही किरण बेदी के चुनावी मैदान में उतर जाने से जनता को एक और विकल्प मिल गया है जिससे तुलना कर निर्णय लेने में आसानी होगी। दिल्ली भाजपा को दिल से अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दिल्ली जीतने का प्रयास करना होगा। यह उनके लिए सरकार बनाने का स्वर्णिम अवसर होगा। इधर आप पार्टी को अब दोगुनी ताकत से काम करना पड़ेगा क्योंकि अब उन्हें सवाल ही नहीं करन बल्कि बेदी के सवालों के जवाब भी देने होंगे।