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संपादकीय

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सियाचीन ग्लेशियर (हिमनदी) से बचाए गए लांस नायक हनुमंतप्पा कोप्पड़ की हालत गंभीर बनी हुई है। हनुमंतप्पा को सोमवार को पैतीस फ़ीट बर्फ के नीचे से बचाया गया था। राहत कार्य के दौरान सियाचीन का तापमान -४५ डिग्री सेल्सियस का करीब रहा है। हिमस्खलन की वजह से बर्फीली पहाड़ियों के बीच बर्फ की तीस से चालीस फ़ीट की परत के नीचे फसे जवानों को निकलने के लिए भारतीय सेना द्वारा राहत अभियान के दौरान हनुमंतप्पा बेहोशी की हालत में बाहर निकाले गए। उनके दोनों फेंफड़ों में निमोनिया की परेशानी है और साथ ही उनकी दोनों किडनियां भी काम नहीं कर रही हैं। उनका इलाज कर रहे चिकित्सकों को चिंता है हनुमंतप्पा की हालत में सुधार नहीं आ रहा है। हिमस्खलन में फसे अन्य ९ जवान शहीद हो चुके हैं। सियाचीन देश की सेना के लिए सबसे कठिन स्थान है और सेना अब तक ८९० सैनिकों को सियाचीन में खो चुकी है। सैकड़ों सैनिक शीतदंश की वजह से विकलांग भी हुए हैं। सियाचीन पर अपना कब्ज़ा बनाए रखने के लिए भारतीय सेना को प्रतिदिन लगभग चार करोड़ रुपयों की लागत आती है।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग ने हनुमंतप्पा का इलाज कर रहे चिकित्सकों से मिलकर उनकी स्थिति में सुधार की अपेक्षा की। देश प्रेम और देश की रक्षा का जुनून ही हमारे जवानों को सियाचीन जैसे कठिन स्थानों पर सेवा देने के लिए प्रेरित करता है। लांस नायक हनुमंतप्पा ने सियाचीन में अपने कार्यकाल से पहले भी कई बार संग्रह के इलाकों में अपनी सेवाएं प्रदान की थी। हनुमनथप्पा के स्वस्थ में सुधार के लिए देश की जनता भी लगातार प्रार्थना कर रही है। बुधवार को उत्तर प्रदेश की एक गृहणी ने हनुमंतप्पा के लिए अपनी किडनी दान देने का प्रस्ताव रखा। साथ ही मुंबई के एक पूर्व अर्ध सैनिक ने अपने किसी भी अंग को हनुमंतप्पा के लिए उपयोग करने की मांग की है। भारतीय सेना से सियाचिन को छीनने की कोशिश पाकिस्तान कई बार कर चुका है। यह हिमनदी कुल ७५ किलोमीटर के वर्ग क्षेत्र में फैली हुई है और सेना द्वारा लगातार इस क्षेत्र में तैनात जवानों के लिए मुश्किल हालातों में सुरक्षित रहने के लिए लगातार प्रशिक्षण कराए जाते हैं परंतु यह भी सच है कि किसी भी तरह के प्रशिक्षण के बावजूद ३५ फ़ीट बर्फ के नीचे इतने दिनों तक ज़िंदा रह पाने का देश प्रेम के अलावा और कोई कोई विश्लेषण हो ही नहीं सकता।

भारतीय सेना की गिनती आज विश्व की शीर्ष सेनाओं में सिर्फ भारतीय सैनिकों के जज्बे और हिम्मत की वजह से की जा सकती है और भारत की भी ज़िम्मेदारी है कि अपने जवानों की रक्षा पर और अधिक ध्यान दे। देश के जवान शरहद पर अपनी जाति और धर्म भूल कर देश की रक्षा में जुटे रहते हैं और देश की जनता की भी जिम्मेदारी है कि सुरक्षित देश को विकास पथ पर निरंतर चलने में हम सफल रहे और देश के जवानों के बलिदान का महत्त्व समझते हुए एक बेहतर देश का निर्माण करें। देश के बेहतरी के लिए हम सब को साथ मिलकर काम करना होगा और देश के विकास में भागीदार बनना होगा।

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प्रधानमंत्री की पांच दिवसीय अमेरिका यात्रा पूरी हुई। भारत लौटते समय उन्होंने ट्विट किया है कि उनकी इस यात्रा का असर भविष्य में दिखेगा। उनकी यह यात्रा कई अर्थों में महत्वपूर्ण है।अमेरिका में मोदी जहां कहीं भी गये वहां उनका गर्मजोशी से स्वागत हुआ। अमेरिका की प्रमुख कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ उनकी मुलाकात वहॉं सुर्खियों में रही। डिजिटल इंडिया की उनकी परिकल्पना को साकार करने के लिए कई उत्साहवर्धक संकेत मिले। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के साथ सोमवार को उनकी मुलाकात हुई। इस मुलाकात में अपेक्षा के अनुरूप ही आतंकवाद और कट्टरपंथियों से निपटने की सहमति बनी। अमेरिका और भारत इस बात के लिए भी राजी हुए कि दोनों देश जलवायु परिवर्तन के संबंध में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे तथा जलवायु में हो रहे बदलावों को लेकर पेरिस में होने जा रहे वैश्‍विक सम्मेलन में भारतीय नेतृत्व आने वाले दशकों में उठाये जाने वाले कदमों की रूप-रेखा तैयार करेगा। संयुक्त राष्ट्र की स्थाई सदस्यता के लिए भारत के दावे को अमेरिका ने अपना समर्थन दिया है। इसके लिए मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रति आभार जताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इस यात्रा के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन तथा फ्रांस के राष्ट्रपति से भी मुलाकात की। यही है मोदी की वर्तमान अमेरिका यात्रा का लब्बोलुआब। प्रधानमंत्री की इस बार की अमेरिका यात्रा का दूरगामी प्रभाव प़ड़ेगा इसमें केई संदेह नहीं।
संयुक्त-राष्ट्र में शांति पर हुई बैठक में मोदी ने जिस आत्मविश्‍वास के साथ अपनी बात रखी उससे आम भारतीयों को गर्व हुआ होगा। मोदी ने बहुत खूबसूरती और मजबूती के साथ वहांं भारत का पक्ष रखा। उन्होंने रेखांकित किया कि संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में आज भी भारतीय सैनिकों की तादाद ज्यादा है। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के समय में तो 25 लाख भारतीय सैनिक शांति सेना की ओर से लड़े थे जिनमें से 24 हजार सैनिक शहीद हो गए जबकि लगभग आधे सैनिक लापता हो गये। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के किसी भी शांति-अभियान में भारत की सहभागिता का भरोसा दिलाते हुए वादा किया कि भारत की ओर से प्रत्येक अभियान में 850 अतिरिक्त सैनिक शामिल रहेंगे। भारत, शांति सेना को केवल सैनिकों की मदद ही नहीं करेगा बल्कि आई.टी., इलेक्ट्रोनिक्स, बिजली आदि के पेशेवरों, डॉक्टरों और इंजीनियरों की सहायता भी उपलब्ध कराएगा ताकि सेना, मार्ग में आने वाली अन्य चुनौतियोंं का सामना करने की स्थिति में रहे। उन्होंने महिला सेना की तीन इकाइयॉं तैनात करने का भी आश्‍वासन दिया। बाद में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने भी संयुक्त-राष्ट्र की शांति सेना में महिला सैनिकों की आवश्यकता निरुपित की। अपने संबोधन में प्रधान मंत्री मोदी ने शांति-सेना के आधुनिकीकरण पर ध्यान दिए जाने की जरुऱत बताई।
इन सबसे पृथक, संयुक्त-राष्ट्र में भारत की स्थाई सदस्यता का मसला उनकी इस यात्रा के कारण फिर से सुर्खियों में रहा। अमेरिका के समर्थन के बाद भी भारत के लिए यह मुकाम हासिल करना मुश्किलों भरा है। इसके लिए भारत को संयुक्त-राष्ट्र की एकीकृत समिति के सदस्यों की सहमति जुटानी है। इस एकीकृत समिति में संयुक्त राष्ट्र के सभी स्थाई सदस्यों के अलावा पाकिस्तान सरीखे राष्ट्र भी हैं। चीन और रुस तो भारत की स्थाई सदस्यता की राह में अवरोध ही होंगे जो संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यों की संख्या विस्तार के पक्ष में पहले से ही नहीं हैं। देखना है कि भारत इन अवरोधों से कैसे पार पाता है?

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बिहार में समाजवादी गठबंधन जिसमें मुलायमसिंह की समाजवादी, शरद पवार की राकांपा एवं पप्पू यादव आदि हैं, ने मुख्यमंत्री प्रत्याशी के रूप में तारिक अनवर के नाम की घोषणा कर, बड़ा धमाका किया है। बिहार में इससे पहले जनतादल (यू) एवं राजद वाले महागठबंधन ने ही मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार का नाम सार्वजनिक किया था। नीतीश कुमार अभी बिहार के मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस इसी गठबंधन में है। सपा भी पहले इसी गठबंधन में थी। टिकट बंटवारे में कम सीटें मिलने के कारण सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव नाराज हुए और बिहार में सपा के नेतृत्व में छोटे-बड़े कई राजनीतिक दलों का गठबंधन खड़ा कर लिया। राकांपा ने पहले ही महागठबंधन से पल्ला झाड़ लिया था। महागठबंधन ने उसे महज तीन सीटों की पेशकश की थी। अब वह मुलायम के गठबंधन में है। पप्पू यादव की नवगठित जन-अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) सहित तीन ऐसी हीं पार्टियां भी सपानीत गठबंधन में शामिल हुई हैं। यह गठबंधन खुद को वास्तविक धर्मनिर्पेक्ष गठबंधन बताने में लग गया है। मुलायम पूछ रहे हैं कि भाजपा के सहारे बिहार पर वर्षों राज करने वाले नीतीश, खुद को किस मुँह से धर्मनिरपेक्ष कह सकते हैं?
राजनीतिक हलके में इस धमाके का एक अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि बिहार में चुनाव अब मतों के ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रहा है। इससे पहले रामविलास पासवान ने बिहार के लिए मुसलमान मुख्यमंत्री की बात उठाई थी मगर अब वे भाजपानीत राजग में हैं। वे जानते हैं कि वहॉं इस तरह की बात पसंद नहीं की जाएगी। मुलायम सिंह यादव यह भलीभॉंति समझते हैं कि बिहार में उनका जनाधार नहीं है। इसी कारण तारिक को अपने गठबंधन का चेहरा बनाया। इससे राजद खेमे में खलबली मच गई है। नीतीश के जवाब में तारिक को आगे कर उन्होंने मुस्लिम मतों का रुझान भी अपनी ओर मोड़ने का प्रयास किया है। बिहार में माना जाता है कि मुस्लिम लालू के साथ हैं। तारिक के सामने आने से इन मतों का समीकरण कितना बदलेगा इसका पता तो मतदान के बाद ही चलेगा लेकिन बिहार में तारिक को अपना कद कुछ और पुख्ता करने का अवसर जरुर मिल गया है। कटिहार और उसके आस-पास के क्षेत्रों में उनका व्यापक जनाधार है। एमआईएम के प्रमुक ओबैसी उनके ही जनाधार में सेंधमारी करने पर आमादा हैं। तारिक अपने परम्परागत जनाधार को इस आक्रामक मुस्लिम नेता के प्रभाव में आने से बचा लेने का प्रयास करने की स्थिति में अवश्य आ गये हैं।
तारिक अनवर समय देख कर राजनीतिक फैसले लेने वाले नेता हैं। सोनिया गांधी को विदेशी मूल का बताते हुए उन्होंने शरद पवार और पी. ए. संगमा के साथ मिल कर राकांपा का गठन किया। ऐसा न करते तो वे कहॉं होते कहना कठिन है। कांग्रेस ने अपने अनेक कद्दावर नेताओं को गुमनामी के अंधेरे में समाते देखा है। तारिक अनवर ने पत्रकारिता की है। उनके द्वारा निकाली जाने वाली पत्रिका युवक धारा ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई थी। वे युवा कांग्रेस तथा कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। कांग्रेस के अल्पसंख्यक सेल का चेयरमैन होने का भी उन्हें अवसर मिला है। बिहार प्रदेश कांग्रेस तथा बिहार प्रदेश 20 सूत्री कार्यान्वयन समिति के भी वे अध्यक्ष रहे हैं। 1980 में वे पहली बार कटिहार से सांसद चुने गये थे, तब से वे वहॉं से पांच बार सांसद चुने जा चुके हैं। इन तथ्यों के आलोक में इतना जरुर कहा जा सकता है कि मुलायम ने तारिक के ़रूप में एक बड़ी चुनौती सभी प्रतिद्वन्द्वियों के सामने रख दी है। सह और मात के खेल मेंे कौन कितने पानी में है इसका पता तो चुनाव के बाद ही चलेगा।

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मंगलवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अमेरिका रवाना हुए। बुधवार की सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी आयरलैण्ड की यात्रा पर निकले। वहीं से वे अमेरिका के लिए उड़ान भरेंगे। मोदी की आयरलैण्ड और अमेरिका की यात्रा का कार्यक्रम पहले से तय था। वे अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र के सत्तरवें अधिवेशन के अवसर पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र सतत विकास शिखर सम्मेलन को संबोधित करेंगे। संयुक्त राष्ट्र की महासभा में भारत की ओर से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बोलेंगी। संप्रति, मोदी और सुषमा स्वाराज के विदेशी कार्यक्रम पूर्व-निर्धारित और स्पष्ट हैं। हां, राहुल गांधी के अचानक अमेरिका रवाना होने के कारणों को समझने के लिए तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। राहुल की इस अमेरिका यात्रा को लेकर आम कांग्रेसियों में संशय की इस स्थिति का एक मात्र कारण यही है कि बिहार के चुनाव प्रचार अभियान में वही कांग्रेस के स्टार कंपैनर की भूमिका में थे। कांग्रेस मुख्यालय से भी उनकी अमेरिका यात्रा का सही ढंग से खुलासा नहीं हुआ है।
प्रधानमंत्री मोदी जिस किसी भी देश की यात्रा पर जाते हैं तो अपने साथ मेक इन इंडिया का संदेश भी लेकर जाते हैं। अब तो उनके साथ डिजिटल इंडिया का सपना भी जुड़ गया है। मोदी के मेक इन इंडिया की आलोचना भले ही माकपा नेता सीताराम येचुरी यह कह कर करें कि इससे भारत में एफडीआई आकर्षित नहीं हुई मगर, यह भी सच है जो सपना मोदी देख रहे हैं और देश को दिखला रहे हैं वह आधारहीन नहीं है। एक बार मोदी अपने सपनों के साथ फिर होंगे अमेरिका में। वहां ,अन्य कार्यक्रमों के अलावा मोदी फेसबुक, गूगल, एड़ॉब, आदि के मुख्यालयों में जाएंगे। वे वहां टेस्ला कार निर्माण की प्रक्रिया भी समझने का प्रयास करेंगे। यह कार परम्परागत इंधनों के बिना चलती है। इसी तरह की धुआँ रहित, गूगल कार का भी वे वहां मुआयना करेंगे। आम कार्यक्रमों से अलग मोदी की ये व्यस्तताएँ यह बताने के लिए काफी है कि मोदी इस बार अपने डिजिटल इंडिया वाले सपने के साथ अमेरिका पहुँचेंगे, इस सपने का हस्र चाहे जो हो। अमेरिका यात्रा से पहले मोदी का आयरलैण्ड जाना शायद विपक्ष को रास न आये। भारत में विपक्ष का मतलब पिछले चार दशकों से विरोध की राजनीति करने वाला ही है। महज विरोध के लिए विरोध। अकारण विरोध। अड़ंगेबाजी के लिए विरोध। पहले यह काम भाजपा करती थी अब कांग्रेस कर रही है। फिलवक्त,यह एक महत्वपूर्ण सच्चाई है कि आयरलैण्ड से भारत बहुत कुछ सीख सकता है। मोदी ने देशवासियों को जो सपना दिखाया कि हर सिर पर एक छत होगी, इस संदर्भ में भारत को आयरलैण्ड से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। वैश्‍विक राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते हैं कि हाल के दिनों में आयरलैण्ड ने प्रोपर्टी के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। बैंकिंग के क्षेत्र में उसकी तरक्की ने विश्‍व के समृद्ध देशों को भी चमत्कृत किया है। वहां बेरोजगारी की समस्या थी जिसमें लगातार कमी आ रही है। अपनी इन उपलब्धियों के कारण आयरलैण्ड वैश्‍विक स्तर पर अर्थशास्त्रियों का ध्यान अपनी नयी अर्थव्यवस्था की ओर आकर्षित कर रहा है। भारत में भी अभी इसी तरह की प्रगति की जरुरत है। इन तमाम बातों के लिए लोक-सभा चुनाव-प्रचार के दौरान, मोदी ने देशवासियों के बीच उम्मीद भी जगाई थी। अब वे आयरलैण्ड गये हैं तो ऐसा माना जा सकता है कि वे भी इस देश की इन नवीनतम खूबियों से परिचित जरुर होंगे तथा वहां से भारत की विकास यात्रा को तेज करने तथा भारत की जनता की रोजमर्रा की जिन्दगी को सरल,सुखद और साधन सम्पन्न बनाने के कुछ सूत्र अपने दिमाग में संजो कर जरुर लाएंगे।

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अचानक अवसान हुआ जगमोहन डालमिया का। उनके अवसान से क्रिकेट जगत में एक शून्यता पैदा हो गई है जिसे भरा नहीं जासकेगा, ऐसा डालमिया को जानने और मानने वाले कह रहे हैं किन्तु अध्यक्ष पद को भरा जाना बीसीसीआई की सांवैधानिक जरुरत है। बीसीसीआई या ऐसा कोई भी संगठन भावनाओं से नहीं, संविधान के नियमों से चलता है। उसी से संचालित और अनुशासित होता है। बीसीसीआई के संविधान में अध्यक्ष क ी मृत्यु के पन्द्रह दिनों के अन्दर विशेष आम सभा बुलाने का प्रावधान है। इसी प्रावधान के क ारण अभी से नये अध्यक्ष को लेकर विचार मंथन आरम्भ हो गया है। बीसीसीआई के सामने अभी यही यक्ष प्रश्‍न है कि उसक ा अगला अध्यक्ष कौन होगा ?
क्रिकेट की राजनीति समझने वालों का ख्याल है कि फिलहाल बीसीसीआई के लिए अंतरिम अध्यक्ष की संभावना बहुत कम है। किसी कारणवश अगर अंतरिम अध्यक्ष बनाये जाने की जरुरत पड़ी तो यह मौका वरीयता के आधार पर पूर्व क्षेत्र के उपाध्यक्ष गौतम ऱॉय को मिल सकता है। जानकार बताते हैं कि बीसीसीआई मेंं अंतरिम अध्यक्ष के प्रश्‍न पर कोई विचार नहीं हो रहा है। जरुरत हुई तो इस संदर्भ में बीसीसीआई के सचिव अनुराग ठाकुर सभी सदस्यों से सम्पर्क साध कर उनसे राय ले सकते हैं। अभी संभावना यही है कि बीसीसीआई विशेष आम सभा (एस.जी.बी.एम.) बुलाने के लिए कानून विदों की राय लेें। बीसीसीआई विश्‍व में क्रिकेट की सबसे धनी संस्था है। आईसीसी भी इसका लोहा मानती है। वहॉं होने वाली प्रत्येक गतिविधि के प्रति वैश्‍विक उत्सुकता रहती है। इस उत्सुकता के कारण अभी जो बातें प्रकाश में आ रही हैं उनके मुताबिक नये अध्यक्ष के चुनाव में बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार और डीडीसीए के अध्यक्ष केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। बीसीसीआई में अभी तीन महत्वपूर्ण खेमे हैं जिन्हें पवार गुट, जेटली गुट और श्रीनिवासन गुट कहा जा सकता है। आईपीएल के चेयरमैन तथा उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव राजीव शुक्ला भी यह पद पाने की लालसा रखने वालों में एक हो सकते हैं किन्तु वे अपना पत्ता तब ही खोलेंगे जब उन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा हो। वे शांतिपूर्वक, सुरक्षित खेल खेलने में माहिर माने जाते हैं। उनके हक में यह बात जाती है कि शरद पवार,अरुण जेटली और एम. श्रीनिवासन तीनों से उनके अच्छे संबध हैं। उन्हें, अगर इन तीनों से समर्थन मिलने के आसार बनते दिखाई पड़ जाएं तो अध्यक्ष पद के लिए वे अपना नाम आगे कर सकते हैं। इस संभावना के साथ एक बात यह भी कही जा रही है कि बीसीसीआई में शरद पवार को मानने वाले और उन्हें महत्व देने वाले सदस्य भी बड़ी संख्या में हैं। ऐसा भी हो सकता है कि ये लोग अध्यक्ष पद की दावेदारी के लिए शरद पवार को ही मना लें। आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले को उजागर करने तथा इस प्रसंग में न्यायालय में याचिका प्रस्तुत करने वाले आदित्य वर्मा शरद पवार की कार्यशैली के प्रशंसक हैं। उनका मानना है कि बीसीसीआई में व्याप्त गंदगी को दूर करने के लिए शरद पवार को आगे आना चाहिए। आदित्य वर्मा के बारे में आम राय यही है कि वे एम.श्रीनिवासन के धुर विरोधी हैं। है न अजीब स्थिति कि एक ओर तो बीसीसीआई अपना कुशल प्रशासक खोने के सदमें में है और दूसरी ओर उसे उनका ही स्थानापन्न तलाशना है। देखना है कि अगले पन्द्रह दिनों में क्या कुछ होता है और क्या कुछ सामने आता है।

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देश में इन दिनों नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सार्वजनिक रुचि का विषय बन गये हैं। अंग्रेजों द्वारा वे द्वितीय विश्‍व युद्ध के समय युद्ध-अपराधी घोषित किए गये थे।18 अगस्त 1945 को ताईहोकू की विमान-यात्रा करते हुए उन्हें अन्तिम बार देखा गया था। वह विमान दुर्घटना ग्रस्त हो गया था। तब से ही आधिकारिक तौर पर यह माना जाता रहा है कि इसी विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई थी। मगर, नेताजी से लगाव रखने वालों ने उनकी मौत की खबर को अफवाह माना। महात्मा गांधी को भी लगता रहा कि नेता जी जीवित हैं। गॉंधी ने उनके परिजनों को नेताजी का श्राद्ध नहीं करने की सलाह भी दी थी। बाद में अपने एक लेख में गॉंधी ने कहा था कि उन्हें जो लगता था वह बेबुनियाद था। तबसे ही नेताजी की मौत रहस्य के घेरे में है। बीच-बीच में नेताजी के देखे जाने के संबंध में खबरें भी छपती रही हैं। इस समय उनकी फाइलों को सार्वजनिक करने का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है।
यह बात सच है कि नेताजी को लेकर प. बंगाल के लोग संवेदनशील हैं। लोक सभा चुनावों के प्रचार के दौरान प.बंगाल के लोगों से मोदी ने वादा किया था कि वे नेताजी की मौत के रहस्यों से पर्दा उठाएंगे। पहले से ही भाजपा सहित कई कांग्रेस विरोधी दलों का आरोप रहा है कि नेताजी की मौत के कारणों के उद्भेदन में गॉंधी और नेहरु ने कोई रुचि नहीं दिखाई। इन दिनों कथित रूप से नेहरु का लिखा एक पत्र भी वायरल हुआ है। यह पत्र इंगलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री को संबोधित है जिसमें नेहरु ने सुभाष चन्द्र बोस के,स्तालीन के सहयोग से रुस में होने की बात बताई है तथा याद दिलाया है कि सुभाष युद्ध अपराधी भी हैं। यह बात भी कांग्रेस के इतिहास का हिस्सा है कि वर्ष 1939 में कांग्रेस से नाराज होकर नेताजी ने आजाद हिन्द फौज की स्थापना की थी। अजाद हिन्द फौज ने द्वितीय विश्‍व युद्ध के समय जापान के साथ मिल कर ब्रिटिश-इंडियन आर्मी का मुकाबला किया था। उनके कांग्रेस विरोधी तेवर के कारण ही यह बात प्रचारित हो पाई कि उनकी गुमशुदगी का रहस्य कांग्रेस सरकार विदेशी संबंधों की सुरक्षा के नाम पर बरकरार रखना चाहती है। किन्तु अब केन्द्र में भाजपा की सरकार है। मोदी सरकार ने नेताजी की मौत से पर्दा उठाने की दिशा में अब तक कुछ खास निर्णय नहीं लिया। अगले वर्ष प.बंगाल में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं। ममता बनर्जी को लगा कि केन्द्र ऐसा कुछ करे इससे पहले वे इसका श्रेय ले लें। इसलिए पं. बंगाल पुलिस के लॉकर में बंद नेताजी से संबंधित 64 फाइलें उन्होंने सार्वजनिक करा दीं। केन्द्र सरकार के पास भी नेताजी से संबंधित 133 फाइलें हैं किंतु, केन्द्र सरकार के लिए इन फाइलों को सार्वजनिक करना आसान नहीं होगा। इन फाइलों का संबंध विदेश विभाग से भी है। वेंकैया नायडू ने कहा है कि फाइलों के अध्ययन के बिना उनको सार्वजनिक किये जाने के संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता। विधान सभा चुनावों के दौरान प.बंगाल में नेताजी की फाइलों को लेकर राजनीति गर्मा सकती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने कोलकाता में नेताजी के रिश्तेदारों से भेंट की थी तथा अब अगले महीने प्रधानमंत्री आवास पर नेताजी के पचास परिजनों की मेहमाननवाजी करेंगे। हालांकि देखना होगा कि केन्द्र सरकार नेताजी से संबंधित फाइलें सार्वजनिक कर पाती है या नहीं। अगर वह ऐसा करने की स्थिति में न भी हो तो मोदी के पास ममता के तुरुप के पत्ते का जवाब होगा । वे प. बंगाल की जनता से कह सकेंगे कि वे नेताजी के प्रति संवेदनशील थे, हैं और आगे भी रहेंगे। नेताजी के परिजनों से मिलना उनकी इस बात की गवाही देने के लिए काफी होगा। बहरहाल, केन्द्र के पास उपलब्ध फाइलों का सार्वजनिक करना विदेश नीति को कहां कितना प्रभावित कर सकता, यह भी देखने वाली बात होगी परंतु नेताजी की फाइलें कांग्रेस को मुश्किल में अवश्य डालेगी।

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अमेरिका के टेक्सास राज्य में रहने वाला अहमद मोहम्मद इन दिनों सोशल मीडिया पर छाया हुआ है।14 वर्षीय किशोर अहमद को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ह्वाइट हाउस आने का न्योता दिया है। फेस बुक के सीईओ मार्क जुकेरबर्ग ने भी उससे मिलने की इच्छा जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिटंन ने उसे प्रेरित करते हुए जिज्ञासु बने रहने की सलाह दी है। नासा के एक इंजीनियर ने कहा है कि अहमद उसे दो साल बाद कॉल करे क्योंकि उसके जैसे जिज्ञासुओं की नासा को जरुरत है। पूरे विश्‍व से अहमद के समर्थन और प्रोत्साहन के संदेश आ रहे हैं।…और यह सब हुआ है पिछले चार-पॉंच दिनों में।
साधारण सी लगने वाली एक असाधारण घटना ने अहमद को यह वैश्‍विक उछाल दी है। घटना इरविंग शहर की है जहॉं अहमद मैक ऑर्थर हाई स्कूल में पढ़ता है। आधुनिक तकनीक में उसकी रुचि है। वह अपने खाली समय में घर में भी कुछ-कुछ प्रयोगधर्मा काम करता रहता है। इसी रुचि के कारण उसने एक डिजिटल-घड़ी,सर्किटों के सहयोग और विद्युत के तारों के संजाल से एक ब्रीफकेस में बनाई और अतिउत्साह में इसे अपने विज्ञान के शिक्षक को दिखाने के लिए स्कूल ले गया। विज्ञान शिक्षक ने उसके इस निर्माण को सराहा और स्कूल में किसी और को न दिखाने की चेतावनी दी। किन्तु अंग्रेजी क ी कक्षा में उस घड़ी से ’बिप’ जैसी ध्वनि आई और शिक्षिका ने उसकी तलाशी ली। शिक्षिका को लगा कि यह ब्रीफकेस जैसी चीज बम हो सकती है। अहमद को प्राचार्य के सामने पेश किया गया। प्राचार्य ने पुलिस को बुला लिया और पुलिस अहमद को बाल सुधार गृह में ले ग़ई जहॉं उससे तीन दिनों तक गहन पूछताछ होती रही। इस बीच उसकी गिरफ्तारी की घटना, कारण सहित सोशल मीडिया पर वायरल हुई। दुनिया भर से अहमद के समर्थन में आवाजें उठने लगीं। ओबामा सहित अगली पॉंत के लोग उसके समर्थन में बोलने लगे। अहमद पुलिस गिरफ्त से बाहर आया। यही है अहमद के रातों रात मीडिया का हीरो बन जाने की दास्तान। मगर, इस दास्तान में पैवस्त है असहजता-असामान्यता की एक दूसरी दास्तान भी, जिस पर बहस का सिलसिला चल रहा है कि क्या अमेरिका में ट्वीन-टावर उड़ाये जाने की दहशत अब-तक बरकरार है? ओसामा बिन लादेन के खात्मे के बाद भी हर दाढ़ी वाले शख्स में उन्हें ओसामा नजर आता है। अमेरिका में ऐसी अनेक घटनाएँ घटित हो चुकी हैं जिनमें किसी सिख को मुसलमान समझ कर बुरी तरह प्रताड़ित किया गया। इन घटनाओं से अमेरिका में रहने वाले मुसलमान असुरक्षा की भावना का शिकार हो रहे हैं। अहमद के साथ जो कुछ भी हुआ वह अमेरिकी पुलिस की कार्यप्रणाली की खामियों को भी उजागर करता है। किन्तु ओबामा द्वारा अहमद के लिए किए गए ट्वीट से यह भी पता चलता है कि अमेरिका खुद को महान राष्ट्र बताने में क्यों नहीं हिचकता? अपने इस ट्वीट से ओबामा ने अमेरिका को वैश्‍विक आलोचना का शिकार होने से बचा लिया। भले ही इस पूरे प्रसंग को एक साधारण घटना निरुपित करने में अमेरिका सफल हो जाए मगर यह हकीकत है कि इस घटना ने मुसलमानों के प्रति आम अमेरिकियों के नफरत और अविश्‍वास को उजागर कर दिया है। महज अहमद नाम होने से ही वहॉं एक मासूम सा किशोर दहशतगर्द समझ लिया जाता है और बिना पुख्ता जॉंच के ही उसे मानसिक यंत्रणा का शिकार होना पड़ता है।
सवाल उठता है कि क्या अमेरिका मुसलमानों को लेकर मास फोबिया का शिकार हो गया है? अहमद वाली घटना को विश्‍व में इस्लामो-फोबिया की संज्ञा दी जा रही है। इस स्थिति से अमेरिका को उबरना होगा़। अमेरिकियों को समझना होगा कि आम मुसलमान उग्रवादी नहीं है। इस्लामी स्टेट की अवधारणा से भी उसका सीधा सरोकार नहीं है। वह तो महज आम इंसान है।

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भारत का पड़ोसी देश नेपाल 20 सितंबर को अपना नया संविधान अंगीकार कर लेगा। इसके बाद नेपाल विश्‍व का एक धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक गणराज्य बन जाएगा। नेपाल को अपने नये संविधान के लिए लम्बी जद्दोज़हद से गुजरना पड़ा है। हाल तक वहॉं के सभी हिन्दूवादी संगठन नेपाल को हन्दू-राष्ट्र बनाये रखने की जिद पड़ अड़े थे। अंततः संविधान के स्वरूप निर्धारण के लिए संविधान-सभा ने मतदान का सहारा लिया। हिन्दूवादी संगठनों को मुँह की खानी पड़ी। इनके पक्ष में महज दस प्रतिशत मत पड़े। इस तरह धर्म-निरपेक्ष संविधान प्रबल बहुमत के साथ स्वीकार्य बन गया। इससे पहले नेपाल में जो संविधान लागू था उसमें राजा विष्णु का अवतार था तथा वहॉं हिन्दू राजशाही थी। इस संविधान को तिलांजलि देकर नेपाल की जनता ने एक वैश्‍विक इतिहास रच लिया है।
निरस्त किया गया नेपाल का संविधान, जिसमें हिन्दू-राष्ट्र और हिन्दू राजशाही की घोषणा है, 1962 में लागू हुआ था। माओवादियों के कारण हुए राजशाही के पतन के बाद से ही नये संविधान के लिए नेपाल में राजनीतिक कश्मोकश की स्थिति वर्ष 2008 में ही बनी।्रआंदोलन भी हुए। अब भी हो रहे हैं और आगे भी होने के आसार हैं। राजशाही के खात्मे के बाद ही नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने की पहचान भी मिटा दी गई। तब से लेकर अब-तक नेपाल राजनीतिक उथल-पुथल और उहापोह का शिकार होता रहा। नरेश को सत्तात्युत किये जाने के बाद शासन की बागडोर माओवादी नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ने अपने हाथों में ले ली। बंदूक छोड़ चुके माओवादियों को नेपाल की सेना में शामिल करने का जब उन्होंने प्रयास किया तो उन्हें व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा। प्रचंड को,सत्ता छोड़नी पड़ी। वर्ष 2009 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दे दिया। बेशक,इसके बाद भी नेपाल को निर्वाचित सरकार ने ही चलाया किन्तु नये संवधान का प्रारूप भी तैयार होता रहा। संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द के विरोध में वहॉं हन्दूवादी संगठनों ने जोर-आजमाईश शुरु कर दी थी। संविधान सभा में भी में भी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने संविधान से धर्म-निरपेक्ष शब्द हटाने तथा नेपाल के हिन्दू-राष्ट्र वाले स्वरूप को बनये रखने की मांग रखीजिसके कारण संविधान-सभा को मतदान कराना पड़ा। इससे तुरंत पहले नेपाल के तराई क्षेत्र में भी मधेशियों का उपद्रव होता रहा। नेपाल के मैदानी भू-भाग को तराई कहा जाता है। इसी तराई क्षेत्र में नेपाल के अधिकांश संसाधन हैं। अभी नेपाल में जिस नये संविधान को अंगीकृत किया जाने वाला है उसमें नेपाल में सात राज्यों का प्रावधान किया गया है। मधेशी चाहते हैं कि तराई वाले क्षेत्र को मिला कर एक या दो राज्य का रूप दे दिया जाए अन्यथा नेपाल में प्रत्येक राज्य में पहा़ड़ियों का वर्चस्व हो जाएगा। काठमांडू से चलने वाली सरकार में वे अपना हक और हिस्सा चाहते हैं मगर उनकी इस मॉंग का विरोध भी हो रहा है। विरोधियों का मानना है कि ऐसा होने से नेपाल के सारे संसाधन मधेशी राज्य में रह जाएंगे। संसाधनों का केन्द्रीकरण हो जाएगा। स्वाभाविक है कि नेपाल की मधेशी पार्टियां भी संविधान का विरोध कर रही हैं क्योंकि यह संविधान नेपाल को,सात ऐसे राज्यों का संघ राष्ट्र घोषित करेगा जिसमें मधेशियों का एक भी राज्य नहीं है। अर्थ यह है कि नये संविधान को अंगीकार करने के बाद भी,नेपाल में हिन्दूवादियों और मधेशियों के नित नए विरोध और नित नए आंदोलन सामने आते रहने के आसार बन रहे हैं। अच्छी बात यह है कि वहॉं अब संविधान सम्मत सरकार आने वाली है। नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला नई सरकार आते ही उसे अपना पदभार सौंप देने के लिए राजी हैं।भारत विश्‍व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते पड़ोस में हो रहे इस परिवर्तन का स्वगत करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले ही कह चुके हैं कि भारत नेपाल के बड़े भाई जैसा है। अब भी यह ब़ड़ा भाई उसके दुख-सुख में साथ देता रहेगा।

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अभी देश में विश्‍व हिन्दी सम्मेलन की आलोचना का दौर चल रहा है। अब-तक जिन लेखकों को इसमें तरजीह दी जाती थी उन्हें पूछा-तक नहीं गया। सो, लानत मलानत हो रही है। भला क्यों? क्या हिन्दी केवल साहित्य रचने वालों की समिधा बन कर रहे या अपनी वैश्‍विक छवि बनाने की दिशा में अग्रसर हो, अधिक से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा बने? जब पूर्व प्रधानमंंंंंंंंंंंत्री इंंंंंंंदिरा गॉंधी ने विश्‍व हिन्दी सम्मेलन की परिकल्पना की थी तब भी इस आयोजन का उद्देश्य यही था। हॉं, इसबार प्रयास का स्वभाव कुछ बदला हुआ अवश्य था।़ इस आयोजन मेें भाषा के रूप में हिन्दी के प्रसार पर ध्यान केन्द्रित था। साहित्य, भाषा का एक हिस्सा भर ही तो है। अभी जरूरत है कि हिन्दी विज्ञान की भी भाषा बने। इसमें अभियंंंंात्रिक पुस्तकें भी शामिल हों, इसमें चिकित्सा की स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध हों। हिन्दी समर्थ भाषा बने, महज साहित्य की भाषा नहीं। इसी नजरिये से भोपाल में हाल ही यह विश्‍व हिन्दी सम्मेलन संंचालित हुआ और इसी उद्वेश्य से पहली बार इंदिरा गांधी की पहल पर 10 जनवरी 1975 को नागपुर में पहला विश्‍व-हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ था। उद्देश्य यही था कि हिन्दी जन-जन तक पहुँचे, अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बने। तब से ही भारत सरकार के सभी विदेशी कार्यालयों में 10 जनवरी को विश्‍व हिन्दी दिवस मनाने की परम्परा शुरु हुई। दरअसल आलोचक इन तथ्यों को नजर अंदाज कर रहे हैं। वर्ष-2006 में मनमोहन सिंह की सरकार ने 10 जनवरी को विश्‍व हिन्दी दिवस मनाने का आधिकारिक ऐलान किया था।
भोपाल में आयोजित विश्‍व-हिन्दी सम्मेलन की यह कह कर आलोचना हो रही है कि इसका उद्घाटन राजनेता (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी) और समापन अभिनेता (अमिताभ बच्चन) से कराया गया जिनका हिन्दी के लिए कोई योगदान नहीं रहा है। आलोचकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि मोदी ने अपनी धाराप्रवाह हिन्दी के कारण वैश्‍विक धूम मचाने में कामयाबी हासिल की है तथा सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन के संवादों को गैर हिन्दीभाषी भी बहुत शौक से बोलते हैं। अभी इस तरह के प्रयासों की बड़ी जरुरत है कि हिन्दी को वैश्‍विक स्वीकार्यता हासिल हो सके। साहित्यकारों के लिए 14 सितम्बर को मनाया जाने वाला हिन्दी-दिवस तो है ही। करते रहें साहित्यिक आयोजन। कौन रोकता है उन्हें? 14 सितम्बर ही तो हिन्दी का जन्म दिवस है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने मान लिया था कि देवनागरी में लिखी जाने वाली हिन्दी राज भाषा होगी। यही कारण है कि इस दिन हिन्दी दिवस मनाया जाता है।
आलोचकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नागपुर में भूतपूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर 10 जनवरी 1975 को पहली बार विश्‍व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ था। उसके बाद मौरिशस में दो बार, नई दिल्ली, त्रिनिडाड, टोबेगो, लंदन, सूरीनाम और न्यूयॉर्क में भी विश्‍व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन हुए। इन आयोजनों में साहित्यकारों का ही वर्चस्व था किन्तु उन आयोजनों से हासिल क्या हुआ? जरुरी यह है कि लानत-मलानत से उबर कर हिन्दी प्रेमी अपनी भाषा के परिमार्जन और उत्थान की ओर ध्यान दें।

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तमिलनाडु सरकार द्वारा पहली बार निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए वैश्विक निवेश सम्मेलन का दो दिवसीय आयोजन चेन्नई में किया गया। इस सम्मलेन को मिली सफलता से राज्य की आर्थिक तस्वीर बदलेगी। चेन्नई के ट्रेड सेंटर में आयोजित इस सम्मलेन में 98 विश्वस्तरीय कम्पनियों द्वारा राज्य में लगभग 2 लाख 42 हज़ार करोड़ रुपयों के निवेश का भरोसा दिया गया है और उम्मीद लगाई जा रही है कि इससे साढे चार लाख लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान किए जा सकेंगे। चेन्नई में आयोजित सम्मलेन में सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपए के निवेश को आमंत्रित करने का लक्ष्य बनाया था और निश्चित रूप से इस आयोजन की सफलता से राज्य की मुख्यमंत्री जे. जयललिता का मनोबल बढा है और भविष्य में राज्य के विकास के लिए वह कई नई योजनाओं की घोषणा भी कर सकती हैं। सम्मलेन की सफलता ऐसे समय में आई है जब विश्वभर में वैश्विक गतिविधियों में मंदी का माहौल है। चीन के मौजूदा आर्थिक संकट की वजह से विश्व के बाज़ारों पर भी असर पड़ रहा है।
देश में भी राष्ट्रीय स्तर पर उद्योग जगत मोदी सरकार से अभी तक मांग कर रहा है कि उद्योग संबन्धी कानूनों में सरलता लाई जाए और निवेशकों के लिए एक आकर्षक वातावरण भी तैयार किया जाए ताकि देश में निवेश बढ सके और विकास के कार्यों को मजबूती मिल सके। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के लिए यह आयोजन एक बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आया है क्योंकि वर्ष 1991 से 2001 के बीच हुए निवेश की तुलना में कहीं अधिक निवेश इस आयोजन के माध्यम से जयललिता आकर्षित करने में सफल रहीं हैं। जब जयललिता मुख्यमंत्री बनी थीं तब राज्य के अनेक कारखाने बंद होने के कगार पर थे क्योंकि राज्य में बिजली का बहुत बड़ा संकट था जो लगभग तीन वर्षों तक रहा। नोकिया और फॉक्सकॉन्न जैसी बड़ी कम्पनियों द्वारा तमिलनाडु में अपनी इकाइयों को बंद करने के फैसले ने परेशानियों को और बढा दिया था। इन सभी बाधाओं के बावजूद जयललिता द्वारा की गई इस सकारात्मक कोशिश ने निश्चित रूप से निवेशकों को भरोसा दिलाया है कि तमिलनाडु में निवेश के अच्छे अवसर मौजूद हैं और 98 एमओयू पर हस्ताक्षर भी हुए हैं।
जयललिता और राज्य के प्रशासन को अब आगे की रणनीति बनाते हुए इस सम्मलेन में निवेशकों द्वारा दिखाए गए भरोसे को बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे और साथ ही यह भी देखना होगा कि निवेशकों को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जिसके पास श्रम की बहुत बड़ी ताकत है और कौशल विकास के साथ ही आवश्यक प्रशिक्षण देने पर इस श्रम शक्ति का सही उपयोग हो सकेगा। राज्य की मुख्यमंत्री को खुद निवेशकों के लाभ का ध्यान रखना होगा और इस आयोजन में हुए समझौतों पर नज़र बनाए रखनी होगी ताकि बिना रुकावट राज्य में एक नई औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो सके।