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बाजार:

संपादकीय

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देश भर में तेज गर्मी का प्रकोप जारी है और इसी के साथ साथ देश में बिजली संकट फिर एक बार उजागर होता नज़र आ रहा है। भारत के उत्तरी राज्यों के कई हिस्सों में 3-4 घंटों तक की बिजली कटौती हो रही है। देश की राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में भी कटौती से लोग काफी परेशान हैं। देश में कई ऐसी बिजली विक्रेता कम्पनियां हैं जिनकी हालत काफी खस्ता है। बिजली विक्रेता कंपनियों को विनियमित दरों के मुताबिक ही जनता से सेवा का भुगतान लेना होता है परन्तु उनकी लागत कई बार बढ जाती है।

मानसून में हुई देरी की वजह से कई जलाशयों के सूखने से जलविद्युत स्टेशनों को भी बिजली के उत्पादन में भारी कटौती करनी पड़ती है। भारत को अतीत में भी कुछ ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ा है जहां देश के अनेक बिजलीघरों में निरंतर बिजली बनाते रहने के लिए उनकी भट्टियों में केवल एक से डेढ सप्ताह का कोयला ही बचा था। अगर विश्व की उभरती आर्थिक ताकत बिजली के संकट के इतने करीब आती है तो यह निश्चित तौर पर चिंता का विषय है। तीन साल पहले ऐसी ही एक घटना में देश के उत्तरी बिजली ग्रिड के नाकाम हो जाने से लगभग 65 करोड़ लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा था। इस समस्या को पूरी तरह से नियंत्रित करने के लिए अधिकारियों को 2 दिन लग गए थे। गर्मियों के मौसम में देश के कई क्षेत्रों में पारा चालीस डिग्री से ऊपर रहता है और ऐसे में बिजली की किल्लत से लोगों की परेशानी और अधिक बढ जाती है। बिजली पानी की तरह निर्मल होती है और जिस तरह नदी ऊंचे प्रदेेशों से निचले क्षेत्रों की ओर बढ़ती है उसी तरह बिजली भी अधिक वोल्टेज वाले क्षेत्र से कम वोल्टेज वाले क्षेत्र की ओर आकर्षित होती है। बिजली ग्रिड इसके नियंत्रित वितरण में मदद करते हैं और देश के सभी राज्यों को एक नियमित कोटा आवंटित किया जाता है और प्रत्येक राज्य को उसी कोटे के मुताबिक बिजली का उपयोग करना होता है।

सभी राज्यों से इस कार्यप्रणाली का सख्ती से पालन करना होता है। वर्ष 2012 में जब देश में अनेक राज्यों ने गर्मी के मौसम के दौरान ग्रिड के मापदंडों की नज़रअंदाजी की तो उत्तर भारत का पूरा बिजली का जाल एक साथ ढह गया था। इस घटना के बाद आधिकारिक तौर पर अनेक कदम उठाए गए हैं और सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि भविष्य में ऐसी घटना नहीं हो। देश के कुछ राज्यों ने नियंत्रित ढांचे के अनुसार काम करते हुए और अपने अपने क्षेत्रों में बिजली के उत्पादन को लगातार बढ़ाते हुए आवश्यकता से अधिक बिजली का उत्पादन किया है। देश के थर्मल बिजली घरानों में भी कोयले की आवश्यक मात्रा के भण्डारण पर भी ध्यान दिया जा रहा है। देश को अब जरूरत है एक उत्तम नेटवर्क की जिससे पूरे देश में आवश्यक बिजली का उत्पादन हो सके और हमारा देश ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलम्बी हो सके। भारत के नागरिकों को चौबीसों घंटे बिना कटौती के बिजली प्रदान करना देश की सरकार की मुख्य योजनाओं में से एक ध्येय होना चाहिए।

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केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार को एक साल पूरा हो गया है और इस एक वर्ष की अपनी उपलब्धियां जनता को बताने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने 26 मर्ई से 31 मई तक जनकल्याण पर्व मनाने का फैसला किया है ताकि विपक्षी दलों द्वारा जनता तक निर्मित की जा रही विपरीत धारणा को ध्वस्त किया जा सके। जन कल्याण पर्व के अंतर्गत देशभर में दो सौ से ज्यादा रैलियों का तथा 5 हजार जनसभाओं का आयोजन किया जाएगा। इन आयोजनों का उद्देश्य यही है कि इनके माध्यम से पार्टी अपनी सरकार की एक वर्ष की उपलब्धियां जन जन तक पहुंचाए। परन्तु सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह उद्देश्य प्राप्त करने में पार्टी सफल हो पाती है या नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा उनकी सरकार से आम जनता ने बहुत बड़ी बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं किन्तु वे उम्मीदें पूरी नहीं होने से पार्टी के समर्थकों तक में बेचैनी व्याप्त हुई है। विपक्षी दलों ने, विशेषकर कांग्रेस ने जनता की इस बेचैनी को बढ़ाया भी है। परन्तु कम समय में अनगिनत उम्मीदें पूरी करना संभव नहीं है। अगर किसानों की जमीन अधिग्रहण के मुद्दे को लें तो विपक्ष ने इस मामले में अब तक बाजी मार ली है और देशभर में जनता को वह यह विश्‍वास दिलाने में कामयाब हुआ है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक किसान विरोधी है। यही कारण है कि विधेयक बीच रास्ते में अटक गया है। इसके अलावा महंगाई में भी कोई भारी कमी नहीं हुई कि जनता मोदी का गुणगान करने में जुट जाए। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मोदी सरकार ने पिछले एक वर्ष में कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है। केन्द्र सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी तमाम योजनाओं के अब तक के नतीजे जनता तक पहुंचाने में सफल हो पाती है या नहीं। मोदी की बहुत सी योजनाएं ऐसी हैं, जिनके नतीजे तत्काल नहीं आ सकते परन्तु जनता को यह विश्‍वास कैसे दिलाया जाए कि वह इन परिणामों का धैर्यपूर्वक इंतजार करे, यही सबसे बड़ी चुनौती है।

बिहार विधान सभा के चुनाव सामने हैं और इन चुनावों के पहले कम से कम वहां की जनता को विश्‍वास में लेना जरूरी है जितनी योजनाएं अब तक शुरू की गई हैं, वे जनहित की योजनाएं हैं फिर भी विपक्ष जनता को गुमराह कर रहा है क्योंकि मोदी की अभिनव सोच तक पूर्व की सरकारें पहुंच नहीं पाईं और अब घबराहट में हैं कि यदि इसी प्रकार जन धन, बीमा जैसी योजनाओं ने आम जनता को आकर्षित कर मोदी का मुरीद बना दिया तो आने वाले कई वर्षों तक अन्य पार्टियों का राजनीतिक भविष्य अंधकार में भटक कर रह जाएगा। भारत ही नहीं, विदेशों में भी मोदी ने अपनी छाप छोड़ी है और अनेक देशों को न केवल अपना मित्र बना लिया है बल्कि उनके साथ व्यापारिक समझौते भी इस प्रकार से किए हैं जिनके दूरगामी सुखद परिणाम सामने आएंगे। फिर भी, केन्द्र सरकार को अपनी कार्यशैली की व्याख्या अवश्य करनी चाहिए कि अच्छी योजनाओं की शुरुआत करने तथा अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन करने के बावजूद आम जनता पूरे उत्साह के साथ इस सरकार के साथ क्यों नहीं दिखाई देती? पूर्व में जो उम्मीदें बंधी थीं, वे टूटने की आशंकाएं क्यों निर्मित हुई हैं? अगर कुछ खामियां हैं तो उन्हें अभी से दूर कर तंत्र को दुरुस्त कर लेना समझदारी होगी।

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ओसामा बिन लादेन पर अमेरिका द्वारा किए गोपनीय हमले के बारे में हाल ही में एक लेखक द्वारा कुछ दावे किए गए थे जिससे अमेरिका के इस मुख्य अभियान पर कई सवाल उठे। इस विषय पर अपना तर्क रखते हुए अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने इस अभियान से जुड़े कई अहम दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दिया। इन दस्तावेजों में कुछ हैरतअंगेज सच हैं जिनसे पाकिस्तान सरकार फिर एक बार आतंकवाद को समर्थन देने के आरोपों में फंस गई है। जारी किए गए दस्तावेज अनेक पहलुओं पर रोशनी डालते हैं। एक दस्तावेज के मुताबिक ओसामा बिन लादेन ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से साझेदारी के लिए हाथ बढ़ाया था और साथ ही यह पेशकश की थी कि अगर पाकिस्तानी सेना लादेन और उसके साथियों की ओर नरम रुख अपनाएगी तो ओसामा ने पाकिस्तानी सेना पर तहरीक-ए-तालिबान द्वारा हो रहे हमलों पर अंकुश का आश्वासन दिया था। हालांकि पाकिस्तानी सेना को लश्कर ए तोयबा जैसे आतंकवादी संगठनों से जोड़ा जाता रहा और साथ ही तालिबान के शुरुआती दिनों में उसे पाकिस्तानी सेना का भरपूर समर्थन मिला। पाकिस्तानी प्रशासन आतंकवाद को अपने पड़ोेसी देशों पर कहर बरसाने के लिए इस्तेमाल करता रहा है। समय के साथ इन संगठन की ताकत बढी है और पाकिस्तान को ही इसका नतीजा भुगतना पड़ रहा है। कुछ समय पहले सेना के स्कूल पर हुए निर्मम हमले से साफ़ होता है कि पाकिस्तानी सेना और प्रशासन की इन आतंकवादी गुटों पर पकड़ ढीली होती जा रही है और इसके अंजाम पाकिस्तान के लिए बहुत बुरे साबित होंगे।  वहीं दूसरी तरफ अरब देशों पर भी आतंकवाद का खतरा लगातार विकराल रूप ले रहा है। इस्लामिक स्टेट संगठन ने इराक के शहर रमादी पर कब्ज़ा कर लिया है और अमेरिका के नेतृत्व में उस पर लगातार हो रहे हमलों के बावजूद धीरे-धीरे अपना क्षेत्रफल बढ़ाने में आईएसआईएस कामयाब रहा है। इस कामयाबी से इराकी सेना की लाचारी सामने आती है और इराक में दो समुदायों के बीच चल रही अंदरूनी तकरार का फायदा भी आतंकवादी संगठन उठा रहे हैं।  अमेरिका और मित्र देशों की सेनाओं द्वारा लगातार हवाई हमले किए जा रहे हैं परन्तु ज़मीनी स्तर पर इराकी सेना इसका फायदा नहीं उठा पा रही है। इराक और सीरिया में आईएस के बढ़ते दबदबे से खाड़ी के अन्य देशों पर आतंकवाद का खतरा और अधिक हो गया है। आतंकवाद अब क्षेत्र विशेष पर सिमटकर नहीं रह गया है बल्कि इंटरनेट और सोशल मीडिया की मदद से विश्व भर में अपना जाल फैलाने में सफल होता नज़र आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बीमारी का सामना सख्ती और बड़े अभियान से करना पड़ेगा जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनाकर कड़ी कार्रवाई करना अनिवार्य हो गया है। अगर विश्वभर में शान्ति की आशा और भविष्य में खुशहाली की उम्मीद हमें बरकरार रखनी है तो आंतकवाद की तरफ आकर्षित हो रहे युवाओं की समस्याओं को भी समझना पड़ेगा और साथ ही एक विश्वस्तरीय आतंकवाद विरोधी संगठन की भी आवश्यकता है जो किसी भी देश में कार्रवाई करने में सक्षम हो।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार कई अनोखी योजनाओं से देश की जनता को आकर्षित कर रही है। ऐसी ही एक योजना में सरकार देश भर में मौजूद स्वर्ण सम्पत्ति का उपयोग करने की कोशिश कर रही है। इस योजना के तहत देश में संगृहीत स्वर्ण धातु का इस्तेमाल देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने में उपयोग करना चाहती है सरकार। फरवरी में बजट के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस मुद्रीकरण योजना की घोषणा की थी और उम्मीद जताई थी कि देश की जनता इसका भरपूर लाभ उठाएगी। देश को एक निश्चित मात्रा में आरक्षित स्वर्ण निधि का संग्रह करना होता है और देश की आर्थिक व्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ता है।

भारत में स्वर्ण के प्रति नागरिकों का खास जुड़ाव है। हमारे देश में सोने को एक सुरक्षित निवेश माना जाता है और सदियों से देश भर में लोग सोने को शुभ मानते हैं। घर में शादी हो, कोई त्यौहार हो या कोई ख़ुशी का मौका, देश में सोने की ख़रीदारी को अनेक शुभ कार्यों से जोड़ा जाता है। विश्व भर में स्वर्णाभूषण का सबसे बड़ा बाजार भारत है। वित्तीय वर्ष 2014-15 में भारत ने लगभग 900 टन सोने का आयात किया था जिसमें से करीब 675 टन का उपयोग आभूषण उद्योग ने किया। देश भर में स्वर्णाभूषणों की सर्वाधिक खपत शादियों के दौरान होती है। भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी उम्र में 25 वर्ष से कम होने की वजह से अगले दशक में 15 करोड़ से अधिक शादियों के होने की उम्मीद है और प्रति वर्ष शादियों के लिए सोने की अनुमानित मांग 500 टन प्रति वर्ष के आंकड़े को छू सकती है।

सरकार की इस नई योजना से निजी स्तर पर ख़रीदे गए सोने को पुनरावृत्त करने में सरकार सफल रहेगी। देश भर के घरानों और मंदिरों में करीब 22000 टन से भी अधिक मूल्य के सोने का भण्डार है। 3000 टन से अधिक सोना देश के प्रमुख धार्मिक संस्थानों के पास होने की संभावना है। अगर सरकार आम जनता और अन्य संस्थाओं को इस योजना के तहत सोने के निवेश के लिए तैयार करने में सफल रहती है तो इससे देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिलेगी और साथ ही अगर इस योजना से सरकार 100 से 200 टन सोने को जमा करती है तो सोने के आयात में कम से कम 10 से 20 प्रतिशत प्रति वर्ष की कमी आएगी। सोने की चमक देश की अर्थव्यवस्था पर दिखेगी। भारत वासियों के मुख्य निवेश वास्तविक सम्पति में ही होता है चाहे वह जमीन जायदाद हो या स्वर्णाभूषण। देश में सोने की खरीद को एक तरह की आर्थिक सुरक्षा से भी जोड़ा जाता है और किसी भी व्यक्ति को जरूरत के समय में सोने से आवश्यक आर्थिक सहायता की उम्मीद रहती है। कई बार ऐसे समय में गलत व्यक्ति या संस्था के पास अपनी पूंजी रखने की गलती कर बैठते हैं लोग। अगर एक निश्चित प्रारूप के अनुसार इस योजना को लागू किया जाए तो लोगों के पास जरूरत के समय में अपने सोने को सरकार के सुरक्षित हाथों में सौंपने से हिचकिचाहट नहीं होगी। इस योजना की सही सफलता बैंकों द्वारा दी जा रही दरों पर निर्भर करेगी। आकर्षक प्रस्ताव से सरकार घरों में व्यर्थ पड़े सोने को देश निर्माण के अहम कार्य के लिए उपयोग करने में सफल रहेगी।

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भारत को पाकिस्तान से सटी अपनी सीमा पर निरंतर चौकसी बनाए रखनी पड़ती है। देश के रक्षा मंत्री ने कुछ दिन पूर्व कहा था कि देश की सेना और सभी शस्त्र बल देश की रक्षा के लिए मुस्तैदी से सीमा पर तैनात हैं परन्तु भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सीएजी) द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि मौजूदा स्थिति में अगर युद्ध के आसार बनते हैं तो देश की सेना के पास उपलब्ध गोला बारूद से सिर्फ 20 दिन की लड़ाई ही लड़ी जा सकेगी। इसका मतलब है कि 20 दिन के युद्ध के बाद देश की सेना लाचार हो जाएगी। भारत जैसे देश के लिए इस कमी को दुरुस्त करना बहुत अनिवार्य है। देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इस बात का संज्ञान लेते हुए कहा है कि इस दिशा में रक्षा मंत्रालय कार्यरत है और इस कमी को जल्द ही ठीक कर लिया जाएगा और साथ ही यह आश्वासन भी दिया है कि भविष्य में ऐसी स्थिति नहीं पैदा होने दी जाएगी। भारत एक बड़ा देश है जिसकी सरहद हज़ारों किलोमीटर लम्बी है। ऐसे में अगर देश की सुरक्षा सम्बन्धी मामलों को नज़रअंदाज़ किया जाए तो यह बड़ी भूल साबित हो सकती है। भारत के पड़ोसी देश भी लगातार घुसपैठ करते ही रहते हैं चाहे वह चीन हो या पाकिस्तान। रविवार को एक वार्ता के दौरान पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने माना कि वर्ष 1999 में हुए कारगिल संघर्ष को पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ अब तक की सबसे सफल कोशिश माना जाना चाहिए। कारगिल युद्ध के दौरान मुशर्रफ पाकिस्तान के सेना प्रमुख थे। मुशर्रफ़ ने यह भी कह दिया कि पाकिस्तान ने 4-5 जगहों पर घुसपैठ की थी और भारत को बहुत बड़ा झटका दिया था।  आज भी पाकिस्तान समय-समय पर ऐसी नापाक कोशिशें कर भारत में अशांति फ़ैलाने की जुर्रत करता ही रहता है। हिमालय हमारे देश के लिए एक प्राकृतिक सरहद तो है ही परन्तु बर्फ से भरे इस विशाल क्षेत्र में लगातार पहरा देना आसान काम नहीं है। कारगिल युद्ध के दौरान सियाचिन जैसे मुख्य स्थानों पर तैनात जवानों के लिए आवश्यक सामग्री की कमी भी सामने आई। इसके बाद सियाचिन और अन्य ऐसे स्थानों में मौजूद सुरक्षाकर्मियों के लिए विशेष पोशाक, हथियार और अन्य संसाधनों को उपलब्ध कराया गया। सीएजी की रिपोर्ट पर ध्यान देने के साथ साथ रक्षा मंत्रालय को हमारी सेना के आधुनिकरण पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उच्च दर्जे के साधनों से हमारी सेना के जवानों का मनोबल बढ़ेगा और किसी भी तरह की अनुचित घटना का सामना करने के लिए सेना पूरी तरह तैयार रहेगी। हाल ही में भारतीय सेना द्वारा यमन और नेपाल में किए गए बचाव कार्यों को विश्व भर से बहुत सराहना मिली थी। हमारी सेना को विश्व के अग्रणी रक्षा संगठनों में गिना जाता है और सरकार को सुनिश्चित करना पड़ेगा कि सेना के उत्साह में किसी भी तरह की कमी नहीं आए। देश की सेना का मनोबल ही सबसे अहम मनोवैज्ञानिक कारक होता है और इससे देश के रक्षा कवच की ताकत का अंदाजा हो जाता है। सरकार विश्व के अनेक देशों से रक्षा समझौते भी कर रही है चाहे वह लड़ाकू विमानों की खरीद हो या फिर उन्नत दर्जे के नवीनतम हथियार क्यों न हो। देश को हमेशा इतना सतर्क तो रहना ही होगा कि सीमा पर फिर कोई कारगिल जैसा धोखा न झेलना पड़े। हालांकि भारत ने इसका मुंहतोड़ जवाब दिया किन्तु दुश्मन के हौसले हमारी ताकत देखकर ही पस्त हो जाने चाहिएं, लड़ाई की भला जुर्रत ही वह क्यों करे।

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भारत विश्व के अग्रणी विकासशील देशों में गिना जाता है परन्तु आज भी देश के कुछ कानून काफी पुराने हैं। भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के साथ साथ कई पुराने कानूनों को बदलने की जरूरत है। हाल ही में संसद द्वारा बाल मज़दूरी से संबंधित एक संशोधन पारित किया गया। इस नए संशोधन के मुताबिक बाल मजदूर कानून के तहत दोषी पाए गए लोगों के लिए तय की गई सजा को बढा दिया गया है परन्तु साथ ही 14 वर्ष की आयु से छोटे बच्चों को अपने पारिवारिक व्यवसाय में हाथ बंटाने से नहीं रोका है। इसकी वजह से अगर कोई बच्चा स्कूल में पढ़ने जाता है तो साथ ही घर लौटने के बाद उसको व्यवसाय में मेहनत करनी पड़ सकती है। देश भर में सूक्ष्म और घरेलू उद्योगों की संख्या बहुत बड़ी है और सरकार को यह समझना होगा कि पारिवारिक व्यवसाय का मतलब बीड़ी बनाना, लोहार, कसीदाकारी जैसे काम भी हो सकते हैं जिनमें बारीकी पर ध्यान दिया जाता हो। अगर छोटे बच्चे ऐसे कामों में अपना ध्यान लगाएंगे तो शिक्षा में पीछे रह जाएंगे। साथ ही कई ऐसे घरेलू उद्योग हैं जिनसे बच्चों और युवाओं की सेहत पर असर पड़ता है। देखने वाली बात यह भी है कि बाल मजदूरी के खिलाफ कानून की मौजूदगी के बावजूद देश में बाल मजदूरी के आंकड़ों में बहुत कमी नहीं आई है। विश्व के मुकाबले हमारे देश में बाल मजदूरी को रोकने के लिए सबसे अधिक कानून हैं और साथ ही विश्व के सबसे अधिक बाल मजदूर भी भारत में ही हैं। शायद इसका कारण है कि मौजूदा कानून में कई खामियां हैं जिसकी वजह से सरकार इस सम्बन्ध में किसी भी किस्म का ठोस कदम नहीं उठा पा रही है। इस समस्या से अगर सरकार को निजात पाना है तो इसका एक ही तरीका है। सरकार को बिना किसी भी तरह के अपवाद के 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी तरह के व्यवसाय का हिस्सा बनने से रोकना होगा। इसके साथ ही यह भी चिंतन करना होगा कि छोटे-छोटे बच्चों को बाल मजदूरी कराना कहीं गरीब परिवारों की मजबूरी तो नहीं? आगर हां, तो इस समस्या का निदान भी ढूंढना होगा।

इसी तरह मुंबई के केईएम अस्पताल में पिछले 42 वर्षों से भर्ती अरुणा शानबाग की सोमवार को हुई मृत्यु ने भी देश के कानूनों के सुधार पर जोर डाला है। अरुणा वर्ष 1973 से मुंबई के अस्पताल में कोमा की अवस्था में भर्ती थी। अस्पताल के एक कर्मचारी द्वारा यौन शोषण का शिकार हुई अरुणा घटना के सदमे से कभी उबर नहीं सकी। अरुणा के मित्रों द्वारा देश की सर्वोच्च अदालत में एक याचिका दायर की गई और इस याचिका के तहत अरुणा के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की गई परन्तु यह याचिका ख़ारिज कर दी गई थी। परन्तु उच्चतम न्यायालय ने इस मामले के मद्देनज़र देश में कोमा की अवस्था में मौजूद मरीज़ों को जीवन रक्षक प्रणाली पर से हटाने के माध्यम से इच्छा मृत्यु को मंजूरी दे दी है। इसी तरह कई अनेक कानून आज भी देश में लागू हैं जिन पर पुनर्विचार होना आवश्यक है। जब यह कानून बनाए गए थे तब देश की स्थिति आज की स्थिति से मेल नहीं खाती थी। ऐसे में समय समय पर देश के कानूनों में भी बदलाव होना चाहिए। हमें निरंतर पारदर्शी प्रणाली से लोक हित के लिए कदम बढ़ाने पड़ेंगे और तभी देश के सच्चे विकास का सपना पूरा हो सकेगा। कानून के प्रावधानों की वजह से अगर कोई अपराधी बच जाता है या फिर किसी निर्दोष को सजा होती है तो हमारे देश की क़ानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के नेताओं ने माना कि अगर भारत और चीन के रिश्तों को मजबूत करना है तो इसके लिए दोनों देशों को एक दूसरे के हितों का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ना होगा। दोनों देशों को अपने अपने देश के विकास और सुरक्षा सम्बन्धी मामलों पर एक निश्चित सहमति बनानी होगी ताकि आपसी मतभेद खत्म हो सकें। दोनों देशों की चिंताएं, आंकांक्षाएं, लक्ष्य और हितों में काफी समानता है। अगर आपसी सहमति बनाने में दोनों देश सफल हो जाते हैं तो यह क्षेत्र के विकास के लिए बहुत अच्छी खबर साबित होगी। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंध तभी मजबूत होंगे जब दोनों देश एक दूसरे की चिंताओं का समाधान ढूंढने की कोशिश में आपसी सहयोग करेंगे। विश्व के दो सबसे प्रगतिशील देशों के बीच अच्छे रिश्तों से दोनों देशों के उद्योगों को भी समर्थन मिलेगा और बेहतर नीतियों से अच्छा समन्वय बन सकेगा। चीन के प्रधानमंत्री ले केकियांग का मानना है कि विश्व में दोनों देशों का अपना स्थान है और भारत और चीन अच्छे और कुशल पड़ोसी के रूप में विकसित हो सकते हैं और इसका पारस्परिक लाभ दोनों देशों को मिलेगा। अगर दोनों देश एक दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखेंगे तो इसका फायदा दूसरों को मिलेगा।  जहां एक तरफ चीनी प्रतिनिधिमंडल में निवेशकों का उत्साह नज़र आया वहीं दूसरी और भारतीय प्रतिनिधिमंडल में प्रशासनिक अधिकारियों और उद्योगपतियों के साथ साथ विशेषज्ञों का समूह भी मौजूद था जो रक्षा से लेकर आर्थिक विषयों पर चीन के प्रश्‍नों का सरल जवाब दे सके। इस सम्मलेन में दोनों देशों के बड़े बड़े सलाहकार शामिल हुए और आपसी बातचीत से कई मुद्दों पर सहमति बनाए जाने की उम्मीद दिखी। चीन के रिश्तों को मजबूती देने के लिए नरेंद्र मोदी ने कुछ अहम कदम उठाए हैं और साथ ही उन्होंने साफ़ कर दिया कि चीन को दूरदर्शिता दिखाते हुए कुछ ऐसे मुद्दों पर ध्यान देना पड़ेगा जो दोनों देशों के रिश्तों में खटास डाल रहे हैं। उनका इशारा हाल ही में चीन द्वारा पाकिस्तान में 46 अरब डॉलर के निवेश को मंजूरी और बार बार भारत की सीमा पर चीनी सेना द्वारा हो रही घुसपैठ की तरफ था। नरेंद्र मोदी को चीन की ताक़त का अंदाज़ा है और उन्होंने चीन को साफ़ शब्दों में यह नसीहत भी दे डाली कि दोनों देशों में आतंकवाद का स्रोत एक ही है। उन्होंने चीनी महकमे को यह भी आश्वासन दिलाया कि अगर चीन भारत के हितों की रक्षा करेगा तो भारत भी एक अच्छे मित्र के रूप में चीन का समर्थन करेगा। अगर चीन को विश्व में अपना दबदबा बढ़ाना है तो उसे भारत की जरूरत पड़ेगी और शायद इसी कूटनीति का लाभ भारत को मिलेगा। भारत और चीन के बीच सदियों से रहे सीमा विवाद से किसी भी देश को फायदा नहीं हुआ और अगर इस मुद्दे पर एक आम सहमति बनती है तो यह दोनों देशों के सुधरते रिश्तों का प्रतीक होगा। साथ ही दोनों देशों के पास मानव संसाधन की कमी नहीं है और आपसी साझेदारी से दोनों देश विश्व के विकसित देशों को पछाड़ने में सफल रहेंगे। नरेन्द्र मोदी ने चीन के साथ बराबरी का रिश्ता कायम करने पर जोर दिया है। उन्होंने चीन को यह संदेश दे दिया कि भारत की भलमनसाहत को उसकी कमजोरी न समझा जाए बल्कि दोनों देशों के बीच मधुर संबंधों का लाभ दोनों को बराबर होगा, न किसी को ज्यादा, न किसी को कम।

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दिल्ली में हाल ही में एक महिला के साथ पुलिस के हैड कांस्टेबल के दुर्व्यवहार की घटना के बाद जन साधारण की धारणा बनी है कि पुलिस को तो अपने दायित्व का निर्वहन ठीक से करना ही चाहिए, साथ ही जनता को भी अपने व्यवहार पर गौर करना चाहिए कि कहीं वह अव्यवहारिक तो नहीं हो रही है। गत दिनों एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी जिसमें एक पुलिस कांस्टेबल एक महिला पर बेरहमी से ईंट से प्रहार करता दिखाई दे रहा है। यह वीडियो इतना वायरल हुआ कि महिला को सहानुभूति मिलने के साथ ही पुलिस को भी हरकत में आना पड़ा। पुलिस ने न केवल कांस्टेबल को हिरासत में लेकर उसके खिलाफ मामला दर्ज किया बल्कि उसे नौकरी से बर्खास्त भी कर दिया। यदि वायरल हुए वीडियो पर गौर करें तो यह पुलिस का जनता के प्रति जो सामान्य क्रूर रवैया है उसे प्रदर्शित करता है। यह तो सब जानते हैं कि पुलिस किसी को भी संदेह के दायरे में आते ही उठा लेती है, प्रताड़ित करती है, कई बार तो हिरासत में मौत के मामले सामने आते हैं। पुलिस पर झूठी पुलिस मुठभेड़ में हत्या कर देने के आरोप भी लगते हैं और इन्हीं सबके कारण पुलिस की छवि एक क्रूरता भरी एजेंसी की बनी हुई है। जिस महिला ने कांस्टेबल के खिलाफ शिकायत की है उसका कहना है कि मांगी गई रिश्‍वत नहीं देने के कारण पुलिसकर्मी ने उस पर ईंट से हमला कर दिया। महिला अपने दो बच्चों को स्कूल से लेकर स्कूटर पर अपने घर जा रही थी। यातायात पुलिस हो अथवा कानून व्यवस्था के लिए तैनात पुलिसकर्मी, उन पर रिश्‍वत का आरोप लगेगा तो सहज ही विश्‍वास भी हो जाएगा क्योंकि पुलिस ने आपने आचरण के कारण ऐसी छवि बनने दी है। इस मामले में पुलिस उच्चाधिकारियों ने फुर्ती दिखाई और विभाग की तरफ से जनता से क्षमा याचना की तथा पुलिसकर्मी पर तुरन्त आवश्यक कार्रवाई की।

उधर इस मामले का दूसरा पक्ष भी बाद में एक ऑडियो रिकॉर्डिंग से सामने आया कि महिला से कांस्टेबल ने ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने को कहा था। महिला ने पुलिसकर्मी को उकसाया जिसके कारण कांस्टेबल ने ईंट से महिला पर प्रहार किया और केवल उस हिस्से को वीडियो में जारी किया गया, जिससे पुलिस के प्रति जनता में आक्रोश बढ़ा। बाद में न्यायालय ने भी महिला के व्यवहार को अशोभनीय बताया। न्यायालय तो यहां तक टिप्पणी की कि नागरिकों को टीवी चैनलों के समक्ष स्टार बनकर वक्तव्य देने के बजाय अपने स्वयं के दायित्वों पर भी गौर करना चाहिए । दरअसल आजकल चैनलों और सोशल मीडिया पर कोई मामला गर्माता है तो उसकी सच्चाई जानने का प्रयास करने के बजाय राजनीतिक पार्टियां, प्रशासन, संगठन आदि उसको अपने अपने पक्ष में भुनाने की होड़ में शामिल हो जाते हैं। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने भी महिला को आनन फानन में उसकी ‘बहादुरी’ के लिए सम्मानित कर दिया परन्तु देश में कानून का पालन नहीं करने वाले नागरिक को क्या सम्मानित करना उचित है? जनता के प्रति पुलिस के क्रूर एवं अभद्र व्यवहार को कहीं भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। पुलिस को जनता के साथ उचित व्यवहार के लिए प्रशिक्षण शिविर और कार्यशाला आयोजित करनी चाहिए परन्तु जनता को भी देश के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन का संकल्प लेना चाहिए अन्यथा गलत परंपराओं की शुरुआत होने के परिणाम भी घातक ही होंगे।

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संसद के इस सत्र में बहुचर्चित भूमि अधिग्रहण विधेयक पारित नहीं हो सका। राज्यसभा में भाजपा और उसके सहयोगी दलों का बहुमत नहीं होने के कारण भूमि अधिग्रहण बिल का यह हश्र हुआ। मोदी सरकार ने दो बार प्रयास किए परन्तु प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के अड़ियल रुख के कारण विधेयक कानून बनने से रह गया। विपक्षी दल प्रारंभ से ही इसका कड़ा विरोध कर रहे थे, विशेषकर कांग्रेस ने तो इसके विरोध को ही कांग्रेस की संजीवनी के रूप में इस्तेमाल किया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्‍न बना लिया और पूरा एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया ताकि बिल न पास हो सके। इतना ही नहीं, दोनों सदनों में चर्चा के दौरान कांग्रेस ने सदन की कार्यवाही चलने देने में जितना संभव था, उतना व्यवधान डाला। अंततः सरकार ने इस विधेयक को संसद की संयुक्त समिति को भेजने का निर्णय लेकर इस अध्याय का फिलहाल पटाक्षेप कर दिया। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि संयुक्त संसदीय समिति इसमें कितने संशोधन करेगी और कब तक यह काम पूरा हो जाएगा। उन संशोधनों और परिवर्तनों से सरकार सहमत होगी यह भी अभी कहना मुश्किल है। जब सरकार पहली बार यह विधेयक लाई थी तब विपक्ष ने जो संशोधन सुझाए थे, उनमें से अधिकांश को स्वीकार कर लिया गया था फिर भी कांग्रेस अंत तक इस विधेयक के खिलाफ आवाज उठाती रही और इसे कानून बनने देने से रोकने में कामयाब भी हो गई। इतना ही नहीं, कांग्रेस देशभर में किसानों तक यह संदेश पहुंचाने में भी कामयाब रही कि मोदी सरकार द्वारा लाया जा रहा भूमि अधिग्रहण बिल किसान विरोधी है। इसे दबी जुबान से सरकार भी मान रही है कि कांग्रेस ने किसानों को जितना अपने पक्ष में कर लिया उतना सरकार किसानों को नहीं समझा पाई। कांग्रेस  चाहती थी कि वर्ष 2013 में भूमि अधिग्रहण के संबंध में जो कानून वह लाई थी वही लागू किया जाए। हालांकि कांग्रेस के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि अगर वह कानून एक आदर्श कानून था तो उन्हीं की पार्टी के कुछ मंत्रियों और उनकी पार्टी द्वारा शासित राज्यों में उस बिल को लागू करने के लिए सहमति क्यों नहीं दी? सही में देखा जाए तो कांग्रेस द्वारा लाए गए कानून की अनुपालना की जाए तो भूमि अधिग्रहण संभव ही नहीं होगा और अगर भूमि का अधिग्रहण नहीं होगा तो विकास के लिए विभिन्न योजनाओं हेतु भूमि कहां से आएगी? यह सही है कि किसानों के हितों की अनदेखी न हो, उनके साथ अन्याय न हो परन्तु भूमि का अधिग्रहण ही न हो, यह कैसे तर्कसंगत हो सकता है? कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सदन में आक्रामकता तो दिखा रहे थे परन्तु उनकी बहस किसी भी मायने में तार्किक नहीं थी। उनकी भाषा में भी परिपक्वता नहीं बल्कि ओछापन था। अगर सदन में विपक्ष का रवैया ऐसा होगा तो सत्तापक्ष जहां लोकसभा में  भारी बहुमत में है, वहां वह कांग्रेस को बोलने ही नहीं देगा। यह लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं है। कांग्रेस के वरिष्ठजनों को चाहिए कि राहुल गांधी को चर्चा में परिपक्वता लाने की सलाह दें। शायद कांग्रेस को डर है कि भूमि अधिग्रहण को नहीं रोका गया तो मोदी की विभिन्न योजनाएं क्रियान्वित होने का रास्ता साफ हो जाएगा और कांग्रेस के लिए सत्ता का रास्ता और कठिन होगा।

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सोमवार को जब आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने जयललिता को बाइज्जत बरी किया तो मानो पूरे तमिलनाडु में एक ख़ुशी की लहर दौड़ गई। पूरे राज्य में अन्नाद्रमुक के सदस्य और जयललिता के समर्थकों द्वारा मिठाइयां बाटीं गईं और जगह-जगह पर जश्न का माहौल था। सड़कों पर पटाखे फोड़े गए, अनेक मंदिरों में जयललिता के लिए पूजा अर्चना हुई और समर्थकों की ख़ुशी उनके नाच गाने से भी नज़र आई। इस मामले में जयललिता को मिली राहत से उनके फिर से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ़ हो गया है। जब कर्नाटक की निचली अदालत ने जयललिता के खिलाफ फैसला सुनाया था तो उन्होंने मुख्यमंत्री का पदभार उनके भरोसेमंद ओ पनीरसेल्वम को सौंपा था। 

तमिलनाडु देश के बड़े और प्रमुख राज्यों में से एक है। जब से जयललिता ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा था, राज्य के सभी विकास कार्य मंद पड़ गए थे। पनीरसेल्वम राज्य के मुख्यमंत्री तो बने परंतु एक सच्चे सिपहसालार का दायित्व निभाते हुए उन्होंने चेन्नई की मेट्रो परियोजना का उद्घाटन सिर्फ इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि जयललिता जल्द ही निर्दोष साबित होकर लौटेंगी। पनीरसेल्वम ने तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी निवेशकों के लिए सम्मेलन की तिथि अनेक बार आगे बढाई। जयललिता की एक अच्छी प्रशासक की छवि है और साथ ही तमिलनाडु एक ऐसा प्रदेश है जहां के प्रशासनिक अधिकारियों के काम करने की शैली भी सकारात्मक है। अब जिस उत्साह और भरोसे के साथ जयललिता लौटी हैं तो राज्य के विकास कार्यों में गति की उम्मीद की जा सकती है। जयललिता को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी भी माना जाता है और इसका फायदा भी आने वाले दिनों में तमिलनाडु की जनता को होना चाहिए। पूर्व में भी कुछ प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्र के रुख से जयललिता सहमत दिखी हैं। आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक से गठजोड़ की उम्मीद भी करेगी क्योंकि इससे भाजपा को तमिलनाडु में अपना अस्तित्व बनाने का अच्छा मौका मिलेगा। जयललिता को राजनीति की माहिर माना जाता है जो अपनी बात मनवाने में सफल रहती हैं। अगले चुनावों से पहले तमिलनाडु की जनता के लिए जयललिता कई नई परियोजनाएं भी आरम्भ कर सकती हैं। राज्य में मौजूदा राजनैतिक समीकरण उनके पक्ष में हैं और इसका फायदा उठाने में जयललिता कोई कसर नहीं छोड़ेंगी। अन्नाद्रमुक की पूरी राजनीति जयललिता के भरोसे ही चलती है और पार्टी को जयललिता की वापसी से भरपूर सफलता मिलेगी। एक बहुत बड़ी चुनौती से सफलतापूर्वक लौटी जयललिता अब अपने समर्थकों के नए उत्साह से और अधिक आश्वस्त रहेंगी कि अगले चुनावों में उनकी पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी। साथ ही लम्बे समय से ठंडे बस्ते में पड़ी परियोजनाओं को अब लागू करके इसका चुनावी फायदा भी मिलेगा। इसी के साथ करुणानिधि की पार्टी द्रमुक में चल रहे अंतरकलह का फायदा भी जयललिता की पार्टी को मिलेगा। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से पहले जयललिता ने कई लोकलुभावन योजनाओं के उद्घाटन किया था। इससे राज्य का आर्थिक रूप से असहाय तबका पहले ही जयललिता का मुरीद हो गया था। कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा जयललिता की रिहाई उनके लिए फिर एक बार मुख्यमंत्री बनने की राह की पहली सीढी साबित हो सकती है।