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संपादकीय

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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के विकास का प्रारूप तैयार करने वाली सबसे पुरानी संस्था योजना आयोग को खत्म कर उसकी जगह एक नई संस्था खड़ी करने का ऐलान किया है। प्रधानमंत्री का कहना है कि वैश्विक वातावरण के साथ-साथ देश की आर्थिक परिस्थितियां भी बदली हैं। इसी वजह से योजना आयोग की जगह एक नई रचनात्मक संस्था की जरूरत है जो संघीय ढांचे को भी मजबूत करने की दिशा में काम करे। मौजूदा परिवेश में आयोग की हैसियत एक डाकखाने जैसी होकर रह गई है। ऐसा इसलिए कि अमूमन आयोग, मंत्रालयों द्वारा भेजे गए प्रस्तावों में सुधार करके ही योजनाएं बनाने का काम करने लगा है। आयोग का मुख्य लक्ष्य यह रखा गया था कि यह देश के संसाधनों का आकलन करे और उसके अनुरूप योजनाएं बनाए, जो नहीं हो पाया। मोदी ने योजना आयोग को खत्म कर उसके स्थान पर बनने वाली नई संस्था के लिए जिस तरह लोगों से सुझाव मांगे उससे यह स्पष्ट है कि वह इस मामले में न केवल गंभीर हैं, बल्कि जल्द ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि उन्होंने योजना आयोग को खत्म करने की जरूरत लाल किले की प्राचीर से जताई थी। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि योजना आयोग के स्थान पर बनने वाली नई संस्था कब आकार लेगी, लेकिन इस पहल का विरोध शुरू हो गया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मंगलवार को कहा कि ऐसा करना देश पर भारी पड़ेगा। वहीं, योजना आयोग की पूर्व सदस्या सईदा हामिद का मानना है कि योजना आयोग एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने के लिए स्थापित किया गया था। उसे इस तरह से खत्म करने से बेहतर होता कि उसे एक नई दिशा दी जाती। खामियां हर संस्थान में होती हैं। उन्हें सुधारकर उनको बेहतर स्वरूप दे पाना ही प्रबंधन क्षमता का सबूत होता है। नरेंद्र मोदी शायद किसी अमेरिकी थिंकटैंक जैसे मॉडल की बात सोच रहे हैं लेकिन भारत जैसी जटिल व्यवस्थाओं वाले देश में यह मॉडल कितना सफल होगा, यह कहा नहीं जा सकता है। योजना आयोग ही एक ऐसा मंच है जिसमें सभी राज्यों और मंत्रालयों की भागीदारी होती है। इस मंच पर केंद्र और राज्यों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता है और विकास के विभिन्न क्षेत्रवार विषयों पर बातचीत होती है और समस्याओं का समाधान करने की कोशिश की जाती है। सईदा ने यह स्वीकारा कि आयोग को देश में संसाधनों के विकास और रोजगार के अवसर उत्पन्न करने का लक्ष्य हासिल करने में नाकामी मिली लेकिन वह कहती हैं कि यह मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर सतत काम किया जाना चाहिए।
यह बहस आगे भी चलती रहनी चाहिए ताकि सरकार को अपना निर्णय लेने से पूर्व अपना मत पूरी सावधानी से बनाने में मदद मिले। चूंकि छह दशक पुरानी और अपने समय में प्रभावी रही संस्था के स्थान पर एक नई संस्था का निर्माण होना है इसलिए हर स्तर पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है। बेहतर होगा कि इस गंभीर विचार-विमर्श में राजनीति को आड़े न आने दिया जाए। तभी एक नई और बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण होगा। प्रस्तावित संस्था को कुछ इस तरह से काम करना चाहिए जिससे देश के विकास में राज्यों की पूरी भागीदारी हो और संघीय ढांचे को मजबूती भी मिले। राज्य सरकारें योजना आयोग के तौर-तरीकों का विरोध करती रही हैं। वह इस आयोग की रीति-नीति से संतुष्ट नहीं हैं, जो बदलाव की मुख्य वजह है।

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संयुक्त राष्ट्रसंघ विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा हाल में जारी किए गए बहुआयामी गरीबी सूचकांक के कई निष्कर्षों की पुष्टि हो गई है। यह सूचकांक कहता है कि समावेशी विकास का लक्ष्य साधने के लिए हर हाथ को रोजगार की विषयवस्तु पर हर देश को जोर देना होगा। चौंकाने वाली बात यह है कि यही संदेश पचास के दशक से दिया जाता रहा है। सात दशक पहले भी रोजगार के अधिकाधिक अवसर उत्पन्न करने को आर्थिक और सामाजिक विकास का एक बड़ा और महत्वपूर्ण लक्ष्य माना जाता था। अब भी किसी सूचकांक के नतीजों से यही बिंदु सबसे महत्वपूर्ण लगने लगे तो यह कम चौंकाने वाली बात नहीं होगी। बहरहाल, इस जरूरत की पुष्टि एक अन्य रिपोर्ट ने कर दी है, जो गत दिनों नई दिल्ली में जारी हुई। यह रिपोर्ट सतत मानव विकास : अतिसंवेदनशीलता घटाकर लचीलेपन का निर्माण शीर्षक से जारी हुई है। मानव विकास पर यह रिपोर्ट इसलिए अधिक विश्वसनीय है क्योंकि यह सिर्फ मर्दों के विकास की बात नहीं करती, बल्कि महिलाओं, शिशुओं और बुजुर्गों के साथ ही युवा वर्ग के अलग-अलग सर्वेक्षणों पर आधारित है। यह विश्व के उन करोड़ों लोगों के दिलों में हमेशा धड़कने वाली बात कहती है, जिन्होंने हाल के वर्षों में प्राकृतिक और मानव निर्मित विध्वंस देखे हैं। वर्ष 2004 की एशियाई सुनामी हो या अमेरिका में वर्ष 2005 में आए कैटरीना तूफान का विध्वंस, वर्ष 2007-08 का खाद्य, वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्रों में आई मंदी हो या वर्ष 2011 में जापान के फुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र का हादसा, इनसे जूझने के साथ ही मौसम परिवर्तन और वैश्वीकरण से उत्पन्न समस्याओं से दो-चार हो रहे विश्व भर के लोग एक-दूसरे के काफी करीब आ चुके हैं। उनके सामने अब जो चुनौतियां हैं, उनसे भी अंतरराष्ट्रीय समन्वय स्थापित कर विकास की नई पहल करने की समझ लोगों में आई है। कई देशों के कई लोगों को पिछले तीन दशकों में विकास की राह में बड़े कदम उठाए जाने का अनुभव हुआ है लेकिन विकास शब्द ही ऐसा है जो लगातार अनिश्चित अर्थों से घिरा हुआ है। रिपोर्ट कहती है कि विकास से नई राहें खुलती हैं तो नई अनिश्चितताएं भी उत्पन्न होती हैं। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गवार इन अनिश्चितताओं से अधिक जूझ रहे हैं। जिस वर्ग पर इस अनिश्चितता का खतरा सबसे अधिक मंडराता नजर आ रहा है, वह वर्ग हाल में अभाव, कंगाली, भूख के चंगुल से मुक्त हो सका है। वहीं, फिर से पुरानी दशा में लौट जाने का अंदेशा इस वर्ग की नींद उड़ा रहा है। रिपोर्ट कहती है कि आय की गरीबी का तो अंदाजा लगाना भी मुश्किल है क्योंकि आज भी दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो 1.25 डॉलर से कम के दैनिक व्यय पर जीवन गुजार रहे हैं।
दुनिया के 187 देशों में किए गए अध्ययन के आधार पर पेश की गई यह रिपोर्ट भारत को मानव विकास सूचकांक में 135वां स्थान देती है लेकिन इसमें कहा गया है कि भारत में कुछेक ऐसे गुण नजर आते हैं जिनसे महसूस होता है कि यह देश विकास की चुनौतियों से निपटने में कारगर रहेगा। इसके लिए देश में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा प्रणाली में बेहतरी करने और महिलाओं के सम्मान की रक्षा पर अधिक ध्यान देने की सलाह दी गई है। यह बात स्वीकारी गई है कि भारत विभिन्न गंभीर घटनाओं से सबक लेने में सक्षम है। चाहे पिछले वर्ष ओडिशा में आए समुद्री चक्रवात फेलिन से नुकसान न्यूनतम करने में वहां की सरकार को मिली कामयाबी हो या वर्ष 2008 में देश भर में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों के उकसावे के बावजूद भारत सरकार की नियंत्रित प्रतिक्रिया हो, भारत ने शानदार नैतिकता दर्शाई है। हर नागरिक जिम्मेदारी से और एकजुटता के साथ काम करे तो विभिन्न समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। निश्चित तौर पर यह भारतीयों के लिए अच्छी बात है।

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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विधानसभा के निलंबन की स्थिति में रहने पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है तो यह उचित ही है। आम आदमी पार्टी (आप) ने याचिका दायर कर सर्वोच्च अदालत से मांग की थी कि वह उपराज्यपाल को राष्ट्रपति शासन हटाने और विधानसभा भंग करने का निर्देश दे। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पहले कहा था कि वह ऐसा कोई निर्देश नहीं दे सकती, क्योंकि यह उसके अधिकार-क्षेत्र में नहीं है, अलबत्ता उपराज्यपाल चाहें तो विधानसभा भंग कर सकते हैं। इसमें कोई संवैधानिक अड़चन नहीं है। इस बार भी पांच जजों की संविधान पीठ ने कोई निर्देश नहीं दिया है, लेकिन विधानसभा को निलंबित रखने पर सवाल जरूर उठाए हैं। पीठ ने पूछा है कि जब किसी भी दल के पास सरकार बनाने लायक संख्याबल नहीं है या इसके लिए किसी ने दावा पेश नहीं किया है तो विधानसभा को निलंबित रखने का क्या औचित्य है? दूसरी ओर, विधानसभा के निलंबन की हालत में रहने के बावजूद विधायकों को वेतन-भत्ते मिल रहे हैं, जो कि करदाताओं के साथ अन्याय है। यह केवल वित्तीय नहीं, लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार से भी जुड़ा प्रश्न है। केंद्र सरकार को अब अदालत में यह बात स्पष्ट करनी होगी कि वह राजधानी में दोबारा चुनाव कराना चाहती है, या इसके बगैर ही सरकार बनाने का कोई रास्ता खोज रही है? अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद से ही दिल्ली की विधानसभा निलंबित है। जमीनी सच यह है कि राज्य में सरकार बनाने की हैसियत न तो भाजपा की है और न ही आम आदमी पार्टी की। ऐसे में वहां राजनीतिक माहौल बिगड़ता जा रहा है। सतह के नीचे विधायकों पर डोरे डालने और उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देने की कोशिशें चल रही हैं। इसका कुल नतीजा यह हो रहा है कि दिल्ली के नागरिक खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं। राष्ट्रपति शासन किसी भी राज्य के लिए एक मजबूरी वाली चीज ही है। कहने को पिछले वर्ष दिसंबर में चुने गए उम्मीदवार अब भी विधायक हैं, लेकिन विधानसभा के निलंबित होने और कोई चुनी हुई सरकार न होने से उनकी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि जनशिकायतों के निवारण के लिए क्या करें? वह नौकरशाही की मर्जी पर निर्भर हैं। विधायक क्षेत्रीय विकास निधि के काम भी रुके पड़े हैं, शहरी विकास विभाग उनके प्रस्तावों पर कुंडली मार कर बैठा हुआ है। विधायक भाग-दौड़ कर कुछ शिकायतों का निपटारा करा भी लें, तो महंगाई या स्कूलों में बच्चों के दाखिले से जुड़े सवाल कहां उठाएं? जाहिर है, दिल्ली विधानसभा के निलंबित रहने से नीतिगत पंगुता की स्थिति बनी हुई है। यह स्थिति अधिक समय तक बनी रही तो निश्चित तौर पर नुकसान आम जनता को ही सबसे अधिक भुगतना पड़ेगा।
इस मामले की जटिलता को इससे भी समझा जा सकता है कि जल्दी ही दिल्ली विधानसभा की तीन सीटों पर उप-चुनाव करवाने की जरूरत महसूस की जाएगी। यह उप-चुनाव एक भारी विडंबना माना जाएगा, क्योंकि उप-चुनाव करवाया भी गया तो यह विधायक बेहद छोटी अवधि के लिए चुने जाएंगे। विधानसभा निलंबित होने के कारण जिस समय पहले से चुने गए विधायकों के पास काम नहीं है, उस समय तीन अतिरिक्त विधायक क्या करेंगे? उन्हें विधायक के रूप में लगातार देय वेतन, भत्ते और सुविधाएं देश के राजस्व से देनी ही होंगी। यह जनता के धन का दुरुपयोग होगा। चिंता की बात यह भी है कि निलंबित विधानसभा को दोबारा जिंदगी देने के लिए कई पार्टियों ने आपसी तोड़-फोड़ शुरू कर दी है। यह भी सच है कि अगर दिल्ली जैसे एक छोटे से राज्य में सरकार बनाने का प्रयास शुरू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जरूरत पड़ेगी तो वह दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र से लोगों का मोहभंग होने लगेगा।

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जब दुनिया में शांति बहाल करने की कोशिशें जोर पकड़ रही थीं, उसी समय यूक्रेन की सीमा में 295 यात्रियों से भरे मलेशियाई विमान को मिसाइल से मार गिराया गया। उधर, पिछले कई दिनों से फिलिस्तीन की गाजा पट्टी पर हमले कर इजरायल मौत बांट रहा है। इन हिंसक घटनाओं की जितनी निंदा की जाए, उतनी कम है। मलेशिया एयरलाइन्स के लिए मार्च महीने के बाद यह दूसरा दुर्भाग्यपूर्ण झटका रहा। गत 8 मार्च को गायब हुए उस विमान का आज तक पता नहीं चला है जिसमें 227 यात्री सवार थे। अब इसके विमान एमएच-17 को पूर्वी यूक्रेन में रूस से लगी सीमा के पास मार गिराया गया। नतीजतन चालक दल समेत विमान में सवार सभी 295 लोग मारे गए। विमान नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम से कुआलालंपुर जा रहा था। इस वारदात से जुड़े पहलू कम खतरनाक नहीं हैं। कहा जाता है कि निशाने पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का जहाज था। आतंकियों ने गलती से मलेशिया के विमान को गिरा दिया। एयर इंडिया का यात्री विमान भी उसी इलाके से गुजर रहा था। यदि मिसाइल दागने में पांच मिनट की देर हुई होती तो शायद वह उसका निशाना बनता। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विमान भी एक घंटे बाद उसी मार्ग से गुजरने वाला था। यदि विमान को गिराने के पीछे आतंकियों का हाथ था, तो वे विमानन कंपनियां भी नहीं बख्शी जानी चाहिएं, जो पैसा बचाने के लिए यात्रियों की जान से खेलती रहती हैं। जिस इलाके में घटना हुई है, वहां फरवरी से संघर्ष जारी है। वह नो फ्लाई जोन है। इसके बावजूद दूरी और खर्च घटाने की फिराक में विमानन कंपनियां जोखिम उठाती हैं। उन्हें तो उनका सारा पैसा बीमे से मिल जाएगा, लेकिन मारे गए लोगों के परिवारों को तो यह जन्म भर का दर्द मिला है। इस घटना के बाद शक की सुई रूसी विद्रोहियों की तरफ घूमी है तो इसकी कई वजहें हैं। जिस इलाके में विमान को मार गिराया गया वह पिछले कई महीनों से विद्रोहियों का गढ़ है। दूसरे, वह पिछले दिनों यूक्रेन के दो लड़ाकू विमानों को निशाना बना चुके हैं। इसलिए उनकी इस दलील में दम नहीं कि उनके पास तीन हजार मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर किसी विमान को निशाना बनाने की क्षमता नहीं है। क्या यूक्रेन के विद्रोही अतंरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया के डर से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं? मामले की जांच शुरू हो गई है, और सारे तथ्य सामने आने के लिए हमें थोड़ा इंतजार करना होगा लेकिन इस घटना के कई आयाम ऐसे हैं जिन्होंने सारी दुनिया को चिंता में डाल दिया है।
इसका एक बड़ा पहलू घटना के बाद उपजा अंतरराष्ट्रीय तनाव है। रूस पर पहले से यह आरोप है कि वह यूक्रेन के अलगाववादियों की मदद करता आ रहा है। सो, रूस के इस दावे में कोई दम नहीं है कि विद्रोहियों के निशाने पर रूसी राष्ट्रपति का विमान था और मलेशियाई विमान पर धोखे से मिसाइल दाग दी गई। क्रीमिया के बागी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे भला? इस बात में भरोसा पैदा करने के लिए इसे आतंकियों की करतूत बताने की कोशिश की जा रही है। वहीं, यूक्रेन की बाबत रूस के रवैए से खफा अमेरिका ने पहले ही उस पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, अब उसने कुछ और प्रतिबंध लगा दिए हैं। यूरोप के देशों पर भी अमेरिका इस तरह के कदम उठाने का दबाव डाल सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की निंदा करने और उसे हर रूप में अस्वीकार्य करार देने में रूस हमेशा आगे रहा है। लेकिन क्या उसकी यह साख बनी रह सकेगी? यूरोपीय देशों ने इस बात पर भी काफी चिंता जताई है कि रूस पूर्वी यूक्रेन में अलगाववादियों को सैन्य मदद बढ़ा रहा है। अगर यह सच है तो पुतिन को शायद मालूम नहीं कि यह खेल कहां खत्म होगा? इन टकरावों को रोकने के लिए विश्वव्यापी अभियान की जरूरत है।

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राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने वित्त वर्ष 2014-15 के बजट में गांवों को ब्रॉडबैंड सेवाओं से जोड़ने की घोषणा की है, जो वास्तव में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके तहत पूरे देश में ब्रॉडबैंड पहुंचाकर दूरसंचार की क्रांति को दूसरे चरण में ले जाना मुख्य उद्देश्य है जिससे आईटी और आईटीईएस क्षेत्र की कंपनियों को विकास की अगली सीढी तक पहुंचने में सफलता मिलेगी और साथ ही पूरे देश में दूरसंचार संपर्क बेहतर होगा। दूरसंचार और सूचना मंत्रालय ने बजट प्रस्ताव घोषित होने के बाद कहा है कि इस दिशा में उद्योग जगत और अन्य हितधारक पक्षों के साथ ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध करवाने के बारे में चर्चा और विचार-विमर्श का सिलसिला शुरू किया जा चुका है। केंद्रीय बजट में इस काम के लिए एक राष्ट्रीय मिशन स्थापित करने की बात कही गई है। पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने भी वर्ष 2011 के बजट में इस काम के लिए 20 हजार करोड़ रुपए का फंड निर्धारित किया था। इस राशि से राष्ट्रीय ऑप्टिक फाइबर परियोजना पर काम किया जाना था। यह काम पूरा करने के लिए वर्ष 2012 तक की महत्वाकांक्षी समय सीमा तय की गई थी। वहीं, सच्चाई यह है कि काम की रफ्तार इतनी धीमी रही कि जब भी इस परियोजना के बारे में बहस छिड़ती, लोगों को नौ दिन चले अढाई कोसकी गति वाले किसी सुस्त व्यक्ति की याद आने लगती। तत्कालीन सरकार को भी मानना पड़ा था कि वाकई इसे मिशन के तौर पर पूरा करने का प्रयास नहीं किया जा सका। बाद में संप्रग सरकार ने ही इस परियोजना का काम पूरा करने की निर्धारित समय सीमा बढाकर वर्ष 2015 कर दी। नई सरकार ने इस पूरी परियोजना में मूलभूत बदलाव लाकर इसे जल्द से जल्द क्रियान्वित करने की मंशा जताई है। इसका स्वागत ही किया जा सकता है। दूरसंचार और सूचना मंत्रालय का संकेत है कि इस मिशन पर काम शुरू करने से पूर्व फिलहाल काम की रणनीति तय की जा रही है। सरकार इस परियोजना से पूरे देश के केबल टीवी नेटवर्क को भी जोड़ेगी। पूरे देश में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाने के लिए इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है। यह रणनीति पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के प्रयासों से बिल्कुल अलग है। सरकार चाहती है कि इस समय देश में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी सुविधा का प्रयोग करनेवालों की संख्या पांच वर्ष में 6 करोड़ से बढाकर 60 करोड़ की जाए। इसमें से अधिकांश उपयोगकर्ता गांवों के हों। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार गठित होने के बाद लोकसभा और राज्यसभा के पहले संयुक्त सत्र को राष्ट्रपति द्वारा संबोधित किए जाने के बाद राष्ट्रपति को धन्यवाद देने के लिए सदन में लाए गए प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान देश के 60 लाख से अधिक गांवों में ब्रॉडबैंड सुविधा पहुंचाने की मंशा जताई थी। यह एक महत्वाकांक्षी परियोजना है और इसमें देशवासियों के विकास और कल्याण की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।
वास्तव में गांवों में ब्रॉडबैंड संपर्क की सुविधा पहुंचाना उतना ही जरूरी है, जितना गांवों को सड़क यातायात की बेहतरीन सुविधा देना। गांवों में इंटरनेट की सुविधा पहुंचेगी तो निश्चित तौर पर किसानों को भारी फायदा होगा। वह बेहतर कृषि तकनीक के जानकार बनेंगे, जिससे उनकी फसल उत्पादन क्षमता बढेगी और फिर फसलों को बेचने के लिए बेहतर बाजार की जानकारी मिलने से उनके फायदे में भी बढोत्तरी होगी। वहीं, गांवों के लोगों को बेहतर और त्वरित स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में भी यह संपर्क मददगार रहेगा। गांवों में शिक्षा के प्रसार और शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में भी गुणवत्तापूर्ण विकास होगा। देश में ब्रॉडबैंड क्रांति संभव हुई तो प्रमुखत: ग्रामीणों को ऐसी सभी सुविधाएं मुहैया करवाई जा सकेंगी, जो शहरों में रहनेवालों को पहले से मिली हुई हैं।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आलोचक यह कहते सुने जाते हैं कि धीरे धीरे भारतीय जनता पार्टी पर नरेन्द्र मोदी का कब्जा होता जा रहा है और अब वे पार्टी से बड़े हो गए हैं। परन्तु ऐसी बातें या तो विपक्षी दलों के नेता करते हैं या फिर मोदी की बढ़ती ताकत सेर् ईष्या करने वाले लोग ऐसे वक्तव्य देते हैं। जब बुधवार को मोदी के विश्वासपात्र अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया तब यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया। वैसे तो काफी दिनों से भाजपा अध्यक्ष की दौड़ में अमित शाह का नाम सबसे आगे चल रहा था परन्तु बीच बीच में ओम माथुर और जेपी नङ्ढा के नामों का भी जिक्र चल पड़ता था किन्तु जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने शाह के नाम पर मुहर लगा दी तब साफ हो गया कि अमित शाह ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे और वे बन भी गए। इसमें गलत भी क्या है? जब कांग्रेस हर बार एक ही परिवार के सदस्य को अपनी पार्टी का अध्यक्ष चुनती है तो दूसरे किसी दल पर टिप्पणी करने का उसे कहां से अधिकार मिल जाता है? भाजपा अपना अध्यक्ष किसे चुने यह उसका अपना अधिकार है। किसी अन्य दल को विरोध या समर्थन करने का कोई हक नहीं बनता है।
भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों का नेतृत्व सौंपा और उनके नेतृत्व में भाजपा ने देशभर में भारी जीत भी दर्ज कराई। इस अप्रत्याशित विजय में अमित शाह की बड़ी भूमिका रही थी। उन्हें उत्तरप्रदेश का प्रभारी बनाया गया था जहां भाजपा की नैया डावांडोल थी। अमित शाह ने न केवल वहां बूथ स्तर तक संगठन को सुदृढ़ किया बल्कि पूरे प्रदेश में भाजपा का परचम पहराने की सशक्त रणनीति का सृजन कर उस पर अमल करवाने में कामयाब रहे। अस्सी सीटों वाले उत्तरप्रदेश में भाजपा को 71 सीटें मिलेंगी, ऐसा विश्वास तो स्वयं भाजपा नेतृत्व को भी नहीं था परन्तु यह करिश्मा हुआ। इस चमत्कार का श्रेय आज अगर अमित शाह को दिया जा रहा है और उन्हें इसके लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का पुरस्कार भी दिया जा रहा है तो इसमें गलत क्या है? भाजपा के अंदर अगर अमित शाह को अध्यक्ष बनाने के विरोध की सुगबुगाहट होती भी तो उसकी संभावनाएं नरेन्द्र मोदी की अब तक की कार्यशैली को देखकर ही समाप्त हो गईं। वे पार्टी में इतनी ताकत के साथ उभरे हैं कि उनका विरोध करने की किसी की न तो हिम्मत है और न किसी के पास ऐसा कोई समर्थन है। मोदी को संघ का भी आशीर्वाद है तथा निवर्तमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह का समर्थन भी है। दूसरी बात यह भी है कि पार्टी के बाहर और भीतर के सभी हमलों से जूझकर भी वे सशक्त नेता के रूप में उभरे हैं तथा उनका एक दबदबा बना है।
अमित शाह के नाम की कोई खिलाफत करता भी तो उन पर गुजरात में चल रहे सोहराबुद्दीन व तुलसी प्रजापति की फर्जी मुठभेड़ के मामलों को लेकर करता परन्तु विशेष जांच दल (एसआईटी) ने उन्हें क्लीन चिट दे रखी है। जब तक वे न्यायालय द्वारा दोषी करार नहीं दिए जाते हैं तब तक उन पर राजनीतिक उपलब्धियां हासिल करने की रोक भला कैसे लगाई जा सकती है? इधर, भाजपा को उनकी काबिलियत के और भी फायदे उठाने हैं। मसलन आने वाले समय में कई प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होंगे और शाह जैसे रणनीतिकार के नेतृत्व में ही सारे चुनावों की रणनीति तैयार की जाए तो भाजपा उन प्रदेशों में भी अपना डंका बजा सकती है, जहां उसकी सरकारें नहीं हैं। ऐसे में भाजपा का यह कदम सही माना जाएगा, भले ही विपक्ष कितनी भी हायतौबा मचाए।

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गुरुवार को केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपना पहला आम बजट लगातार कर्तल ध्वनि के बीच पेश किया। इस बजट को लोकलुभावन रेवड़ियां बांटने वाला या जनता पर बोझ बनने वाला कहना सरासर अन्याय होगा बल्कि इसे संतुलित और सराहनीय बजट की संज्ञा दी जानी चाहिए। कुछ दिन पहले जब सरकार की तरफ से कड़ी दवा देने की बात कही जा रही थी तो जनता के मन में भारी संशय था कि कहीं मोदी सरकार विकास के लिए आर्थिक मजबूती के नाम पर करों का बोझ लादकर जनता की कमर न तोड़ दे, परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आम चुनावों के समय अपने भाषणों में जो जो प्रमुख वादे किए थे, उन सब मुद्दों को बजट में शामिल कर सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि मोदी सरकार केवल वादे नहीं कर रही, बल्कि उन वादों को पूरा करने का प्रयास भी करने के लिए कटिबध्द है। इस बजट को प्रथम दृष्टया देखने पर लगता है कि यह लीक से हटकर तैयार किया गया है और अगर प्रस्तावों पर समयबध्द तरीके से काम करने में सरकार को सफलता मिली तो यह निश्चय ही देश के विकास के नए आयाम स्थापित करने में मददगार होगा।
अरुण जेटली के बजट में किसानों का काफी ख्याल रखा गया है और उनकी माली हालत सुधारने के लिए अनेक ठोस प्रस्ताव पेश किए गए हैं। छोटे उद्योग धंधों, विदेशी कारोबारियों, युवाओं आदि सबके लिए बजट में काफी उत्साहित करने वाली योजनाएं हैं। एक ओर जहां देश की वित्तीय हालत को दुरुस्त करने के लिए ठोस उपाय किए गए हैं, वहीं दूसरी ओर महंगाई पर लगाम लगाने के भी रास्ते सुझाए गए हैं। सबसे बड़ी बात है कि देशी-विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल बनाने के प्रति सरकार गंभीर दिखाई देती है। यही कारण है कि एफडीआई को भी विशेष तरजीह दी गई है ताकि विदेशी मुद्रा भारत में आए और आर्थिक हालात में सुधार का मार्ग खुले। उद्योग हो या सेवा क्षेत्र, या फिर कृषि अथवा निर्माण, सभी क्षेत्रों को उचित महत्व देकर सरकार ने यह जताने की कोशिश की है कि यह देश का सर्वांगीण विकास चाहती है।
देश के विभिन्न राज्यों में कुल 100 नए शहरों की स्मार्ट सिटी के रूप में स्थापना करना एक विजन के तहत लिया गया निर्णय है, जिसमें रोजगारों का निर्माण और ढांचागत विकास, दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे। सड़कों का निर्माण, नदियों को जोड़ना, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए सस्ते घरों का निर्माण, रीयल स्टेट उद्योग को बढ़ावा, भारी निवेश वाली योजनाओं में पीपीपी मॉडल का उपयोग आदि अनेक सराहनीय प्रस्तावों को बजट में शामिल किया गया है। युवाओं के लिए शैक्षणिक और कैरियर संस्थानों की स्थापना, रक्षा क्षेत्र के खर्च में बढ़ोतरी जैसे प्रस्तावों से युवाओं में एक नई चेतना का संचार होगा। इसके अलावा योजनाओं की मंजूरी में आने वाले अवरोधों को कम करना, नीतियों का सरलीकरण भी देश के विकास में अहम भूमिका निभाएगा। बजट में खिलाड़ियों, वरिष्ठ नागरिकों, विकलांगों, बीमारों, अल्पसंख्यकों सहित सभी वर्गों का ध्यान रखा गया है। जम्मू कश्मीर एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के प्रदेशों को भी विकास की धारा में शामिल करने का प्रयास किया गया है। बजट में हर योजना में तकनीक को बढ़ावा देने के स्पष्ट संकेत हैं।
यह सब करने के साथ साथ आम आदमी को करों में राहत देना कोई आसान काम नहीं था परन्तु वित्तमंत्री ने सरकार की इच्छाशक्ति और समझ दिखाते हुए इस दिशा में कई सराहनीय निर्णय लिए हैं, जिनसे देश का आम आदमी खुश दिखाई दे रहा है। नई सरकार के इस पहले बजट की तारीफ करने में कोई कंजूसी करना उपयुक्त नहीं होगा।

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सोवियत संघ के बिखराव के बाद एक धु्रवीय होती दुनिया का अकेला दारोगा अब अमेरिका ही रह गया है और इसके प्रमाण वह बार-बार प्रस्तुत करता रहता है। आतंकवाद से वैश्विक युद्ध और रासायनिक हथियारों के बहाने से विभिन्न देशों पर हमले करना, उन्हें तोड़ना और फिर बिखरने को छोड़ देना उसका शगल बनता जा रहा है। अपनी यह दादागहरी चलाने को वह जिन सूचनाओं पर निर्भर करता है, वह उसे दुनिया भर में फैले उसके जासूस मुहैया कराते हैं। कभी अमेरिका के लिए जासूसी में संलग्न पूर्व अमेरिकी जासूस एडवर्ड स्नोडेन द्वारा अमेरिकी जासूसी कार्यक्रम के रहस्योद्धाटन के बाद अमेरिका के यूरोपीय घटक देशों समेत कई देशों ने वॉशिंगटन से स्पष्टीकरण मांगा था और उन्होंने अमेरिका के साथ सहयोग जारी रखने के बारे में पुनर्विचार करने की चेतावनी भी दी थी। स्नोडेन का नया रहस्योद्धाटन भारत में एक महीना पहले सत्तासीन हुई भाजपा की अमेरिका द्वारा की गई जासूसी को लेकर है। जासूसी की खबरों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत ने एक शीर्ष अमेरिकी राजनयिक को तलब किया और कहा कि किसी भारतीय संगठन या भारतीय व्यक्ति की निजता का उल्लंघन किया जाना पूरी तरह अस्वीकार्य है। भारत ने यह आश्वासन भी मांगा कि इस प्रकार की कार्रवाई भविष्य में दोहराई नहीं जाएगी।
अमेरिका ने वर्ष 2010 में अपनी नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी (एनएसए) को छह देशों की राजनीतिक पार्टियों पर निगाह रखने को कहा था। उनमें भाजपा के अलावा लेबनान की अमल, बोलिविया की कंटिनेंटल कोऑर्डिनेटर ऑफ वेनेजुएला, मिस्त्र की मुस्लिम ब्रदरहुड, इजिप्शियन नेशनल सैल्वेशन फ्रंट और पाकिस्तान की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी शामिल हैं। देखा जाए तो दुनिया के चार देशों को छोड़कर कोई भी विदेशी सरकार अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के दायरे से बाहर नहीं है। यह चार देश ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड हैं। अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक दस्तावेजों में 193 विदेशी सरकारों और विदेशी दलों तथा लोगों के नाम हैं, जो फॉरेन इंटेलीजेंस सर्विलांस कोर्ट द्वारा मंजूर 2010 के एक प्रमाणपत्र का हिस्सा हैं। अमेरिका जासूसी के लिए कई तरह के तरीके इस्तेमाल करता है जिनमें गुप्त रूप से माइक्रोफोन लगाना (बगिंग) भी शामिल है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों में नजर नहीं आने वाला माइक्रोफोन लगाकर बातचीत को विशेष एंटिना से पकड़ने की कोशिश की जाती है। पिछले दिनों अमेरिका के रक्षा मंत्री चक हेगल ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन पर आरोप लगाया था कि अमेरिकी बहुराष्ट्रीय शीतल पेय कंपनी कोका कोला के जरिये चीन की जासूसी करवाई जा रही है। यह आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं, लेकिन इनका अमेरिका पर कोई असर नहीं पड़ता है। एक वरिष्ठ रिपब्लिकन सांसद ने कहा था कि यूरोपीय नागरिकों को जासूसी के लिए अमेरिका का आभारी होना चाहिए क्योंकि अमेरिकी जासूसी गतिविधियां उन्हें सुरक्षा प्रदान कर रही हैं। दुनिया के ऐसे स्वयंभू दारोगा के खिलाफ जब तक विश्व जनमत एकजुट होकर विरोध नहीं प्रकट करेगा, तब तक वह क्यों किसी की सुनेगा? उसने जर्मनी जैसे ताकतवर सहयोगी देश की चांसलर एंजेला मर्केल तक की बातों की लगभग अनसुनी कर दी। अपने इस अलोकतांत्रिक रवैये को सही साबित करने के लिए अब तक बराक ओबामा ने खुद आगे आकर कोई ऐसी बात नहीं कही है, जिससे अमेरिकी खुफिया ताक-झांक का ठोस कारण समझ में आ सके। यह भी समझने की जरूरत है कि आतंक और हिंसाग्रस्त देशों पर ध्यान केंद्रित करने के स्थान पर अमेरिकी सरकार उन देशों की जासूसी करना ही क्यों चाहती है जिनसे उसके रिश्ते कथित तौर पर दोस्ताना हैं? आखिर ओबामा ही भारत के साथ अमेरिका के रिश्तों को महत्वपूर्ण बताते रहे हैं।

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सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि दहेज विरोधी कानून का ‘नाराज पत्नियां ढाल नहीं बल्कि हथियार के रूप में उपयोग’ कर रही हैं। अतः आदेश दिया गया है कि इस कानून के तहत अब तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी। पुलिस से कहा गया है कि वह तभी अभियुक्त को हिरासत में ले, जब प्रारंभिक पड़ताल में उसके पास कुछ प्रश्नों के संतोषजनक जवाब मिल जाएं। मसलन यह कि क्या गिरफ्तारी की सचमुच जरूरत है? इस गिरफ्तारी से क्या मकसद हासिल होगा? इस बारे में पुलिस को मजिस्ट्रेट के सवालों के ठोस जवाब देने की तैयारी रखनी चाहिए, ताकि मजिस्ट्रेट उसकी दलीलों से संतुष्ट हों और आरोपी को हिरासत में लेने की अनुमति दें। यानी अब इस कानून के तहत गिरफ्तारी पूर्व की तरह आरोप लगाते ही नहीं हो सकेगी। बहरहाल, यह तो निर्विवाद है कि किसी दूसरे कानून की तरह दहेज उत्पीड़न रोकने के लिए बने कानून का भी दुरुपयोग होता है। ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें पत्नियों ने प्रतिशोध की भावना के कारण ससुराल के लगभग हर सदस्य को अभियुक्त बनवा दिया। चूंकि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत दहेज उत्पीड़न से जुड़े मामले संज्ञेय और गैर-जमानती होते हैं, जिसमें एफआईआर दर्ज होते ही पुलिस द्वारा आरोपियों की गिरफ्तारी होती है। इस कानून का कितने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, यह राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों से जाहिर है। इसके मुताबिक वर्ष 2012 में लगभग दो लाख लोग (जिनमें 50 हजार महिलाएं थीं) इस धारा के तहत गिरफ्तार हुए। वर्ष 2012 में 488-ए के तहत दर्ज 93.6 प्रतिशत मामलों में चार्जशीट पेश की गई, मगर सिर्फ 15 प्रतिशत मामलों में आरोपियों को दोषी पाते हुए अदालत ने सजा सुनाई। इन आंकड़ों को सर्वोच्च न्यायालय ने नए दिशा-निर्देश जारी करने के लिए पर्याप्त माना है। वहीं, अदालत ने इस प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया कि किसी महिला द्वारा इस कानून के कथित दुरुपयोग तक जाने की परिस्थितियां क्या होती हैं? स्पष्टतः वह अपने पति या ससुराल वालों के खिलाफ कानून की शरण में तभी जाती है, जब संबंध अत्यंत बिगड़ जाते हैं। जिस समाज में परिवार के भीतर शक्ति-संतुलन महिलाओं के विरुध्द झुका हुआ हो, वहां इन परिस्थितियों की तह में जाए बगैर यह समझ बना पाना कठिन है कि महिला अपने हक में मौजूद किसी कानून का उपयोग कर रही है या दुरुपयोग? वैसे भी बेजां इस्तेमाल की मिसालें तो हर कानून के संदर्भ में दी जा सकती हैं। इस आदेश के साथ कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि गिरफ्तारी के अधिकार से पुलिस में दर्प का भाव आता है। यह पुलिस-भ्रष्टाचार का स्रोत है। न्यायाधीशों ने कहा कि पुलिस आजादी के छह दशक बाद भी अपनी औपनिवेशिक छवि से बाहर नहीं निकल पाई है, जिससे गिरफ्तारी का अधिकार उत्पीड़न एवं दमन का औजार बन जाता है। नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील कोई व्यक्ति इस टिप्पणी से असहमत नहीं हो सकता। फिर भी, यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि अगर वास्तव में ऐसा है, तो फिर हर मामले में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगनी चाहिए। सिर्फ दहेज उत्पीड़न के संदर्भ में ऐसा करने से यह धारणा बन सकती है कि महिलाओं को मिली ढाल को कमजोर किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में एक बड़ा वर्ग है क्योंकि धारा 498ए के दुरुपयोग के मामले बड़ी संख्या में सामने आए हैं। फिर भी यहां यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किसी महिला की शिकायत मिलने के बाद पुलिस की जांच प्रणाली क्या होगी और उसे समयबद्ध किया जाना चाहिए। इस सिलसिले में पति-पत्नी के रिश्तों में कड़वाहट आने की स्थिति में पारिवारिक कोर्टों की तरफ से दी जानेवाली सलाह सेवाओं के आधुनिकीकरण पर भी ध्यान देने की जरूरत महसूस होती है। पारिवारिक अदालतों में आने वाले मामलों के सुलझने की अपेक्षा काफी अधिक होती है लेकिन कई बार पेचीदे मामलों में समझाइश भी काम नहीं आती है और यही वह जगह है जहां से दंपतियों की ट्रैकिंग शुरू की जा सकती है।

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इराक में गृहयुध्द के हालात की खबरें आनी शुरू हुईं तो कच्चे तेल के दाम चढ़ने और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित असर को लेकर हमारे नीति नियामकों में चिंता व्याप गई। इस संकट के मानवीय पहलू पर गंभीरता से नहीं सोचा गया। यह आरोप लगे कि वहां फंसे भारतीयों की मुसीबत पर सरकार का ध्यान जरा देर से गया। अब इराकी आतंकी भारत पर हमला बोलने की घोषणा कर रहे हैं। आखिर उन्हें इसकी हिम्मत कैसे हुई? इराकी आतंकी गिरोह आईएसआईएस के लड़ाकों ने इराक के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर इसे इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया है और इस गिरोह के सरगना बगदादी को खलीफा करार दे दिया गया है। उसने हाल में जारी एक वीडियो में भारत के खिलाफ जंग की धमकी दी है। उसकी भाषा ठीक वैसी ही है जैसी पाकिस्तानी आतंकी हाफिज सईद की भारत के बारे में रही है। यह सभी गिरोह लगातार संकेत देते आए हैं कि उन्हें दुनिया का आगे बढना ठीक नहीं लगता, यह दुनिया को फिर से 18वीं सदी की तरफ मोड़ने की फिराक में हैं। वर्ष 1924 में खिलाफत व्यवस्था के अंत के 90 वर्ष बाद खलीफा और खिलाफत इराक, सीरिया, पाकिस्तान जैसे आतंकवाद प्रभावित देशों में आतंक को नई हवा देने की कोशिश कर रहे हैं। ओसामा बिन लादेन के बाद अल कायदा भले ही कमजोर पड़ चुका हो, लेकिन आईएसआईएस के रूप में आतंक के नए पर्याय से इराक रू-ब-रू है, जो बाकी दुनिया के लिए भी एक बड़ा खतरा है। इसकी धमकी से भारत भले ही भयभीत नहीं है लेकिन यह कहना ही पड़ता है कि अंदरूनी सुरक्षा के मामले के लिए खतरनाक चुनौतियों से निपटने में अब तक नाकाम रही भारत सरकार इस मामले में बैकफुट पर है। इसका कारण है पड़ोसी देशों के साथ इसके संबंधों की जटिलता। आईएसआईएस को यह निश्चित रूप से पता है कि अगर वह वाकई भारत पर आतंकी हमले करवाना चाहेगा तो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई उसे दिल खोलकर सहयोग देगी। वहां के आतंकी मास्टरमाइंड हाफिज सईद से आईएसआईएस को भरपूर लॉजिस्टिक सहयोग मिलेगा। फिर, चीन इसमें अपना फायदा नहीं तलाशे, ऐसा नहीं हो सकता है।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि इराक में कई भारतीय आईएसआईएस के कब्जे वाले इलाकों में फंसे हुए हैं। उनकी जान बचाने के लिए भारत प्रयासों में जुटा हुआ है। बताया जाता है कि इन लोगों की संख्या 94 है लेकिन वहां इससे कहीं अधिक भारतीयों के फंसे होने की आशंका भी जताई जा रही है। इनको इराक से बाहर निकालने के लिए भारत सरकार चरणबद्ध रणनीति पर काम कर रही है। सरकार के सामने तत्काल इराक में फंसे भारतीय नागरिकों की पहचान कर उनकी सटीक संख्या निर्धारित करने और उनकी सुरक्षित घर वापसी की व्यवस्था करने की चुनौती है। इस पर काम चल भी रहा है। सरकार ने इराक में ऐसे किसी भी भारतीय को ठहरने की अनुमति नहीं देने का निर्णय लिया है, जिनके पास वहां रहने के लिए वैध प्रवास दस्तावेज नहीं होंगे। भले ही यह लोग रोजगार की तलाश में अवैध रूप से इराक चले गए थे लेकिन वहां अब बने खतरनाक हालात में ठहरना उनके लिए गलत साबित हो सकता है। यह काम काफी जटिल साबित होने वाला है। चूंकि आईएसआईएस ने इराक और सीरिया के कई शहरों पर अपना कब्जा बना लिया है, उसके पास अरबों डॉलर के वित्तीय संसाधन मौजूद हैं और उसके पास अत्याधुनिक हथियारों का बड़ा जखीरा भी है, इसलिए उससे भारत अपनी कोई भी बात मनवाने में आसानी से सफल नहीं हो सकेगा। उसे पहले इराक में बसे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद ही आई एसआईएस से निपटने की रणनीति बनानी चाहिए।