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संपादकीय

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‘आप’ और ‘मैं’। आपका यहां तात्पर्य आम आदमी पार्टी से है और मैं का अर्थ है अहंकार से। पिछले कुछ दिनों से आम आदमी पार्टी नेगेटिव कारणों से सुर्खियों में है। इस नेगेटिविटी का मूल कारण है दिल्ली विधानसभा चुनावों में कुल 70 सीटों में से 67 सीटों पर विजय। इस भारी भरकम जीत ने नई नई बनी इस पार्टी के दुबले पतले संयोजक अरविंद केजरीवाल को वजनी बना दिया। उनके अहंकार की पराकाष्ठा तो तब हो गई जब उन्होंने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उपस्थित कार्यकर्ताओं से कहा कि वे या तो उन्हें (केजरीवाल को) अपना नेता मान लें या फिर प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव के साथ चले जाएं किन्तु वे (केजरीवाल) किसी भी हालत में प्रशांत और योगेन्द्र के साथ पार्टी में काम नहीं कर सकते। यह ‘मैं’ यानी कि अहंकार के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि प्रशांत और योगेन्द्र कोई मामूली कार्यकर्ता नहीं हैं।

केजरीवाल को केजरीवाल बनाने में और आम आदमी पार्टी को जन्म देने से लेकर इस मुकाम तक लाने में उनकी भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इन दोनों नेताओं का यही कसूर था कि ये बार बार कुछ सवाल उठा रहे थे जिनका जवाब केजरीवाल के पास नहीं था। जब वे कहते थे कि हमारी पार्टी को आरटीआई के तहत आना चाहिए तो केजरीवाल असहज महसूस करते थे। दूसरी पार्टियों से आम आदमी पार्टी अपने आपको अलग बताती थी तो उन्हीं सिद्धांतों की याद दिलाते थे प्रशांत और योगेन्द्र। इसी कारण खुद केजरीवाल और उनके इर्द-गिर्द उन्हें घेरे रखने वाले आप नेताओं की आंख की किरकिरी बन गए प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव। एक कथित ऑडियो स्टिंग ऑपरेशन में तो केजरीवाल इन दोनों संस्थापक नेताओं को अशोभनीय गालियां देते साफ सुनाई दिए। यहां तक कहा गया कि इन्हें (प्रशांत और योगेन्द्र को) तो लात मारकर निकाल दिया जाता अगर दूसरी किसी पार्टी में होते। स्टिंग लीक होने के अगले दिन कुछ ऐसे ही हालात कर इन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकाल बाहर किया गया। ऑडियो रिकॉर्डिंग असली है या छेड़छाड़ की गई है, कहा नहीं जा सकता परन्तु आवाज सुनने वालों को पूरा विश्‍वास है कि वह आवाज केजरीवाल की ही है। उधर, केजरीवाल के समर्थकों ने भी इसका बचाव कुछ इस तरह किया कि फ्रस्ट्रेशन के तहत केजरीवाल ने आक्रोश में आकर ऐसा कह दिया होगा, उनके हालात को समझने की जरूत है। जो कुछ भी हो, इस बार की रिकॉर्डिंग ने केजरीवाल की पोल खोल दी कि वे जिस तरह के व्यक्ति मीडिया कैमरे के सामने दिखाई देते हैं, वास्तव में वैसे व्यक्ति हैं नहीं। उनके दांत खाने के और, दिखाने के और हैं। उनकी पार्टी बिल्कुल नई है परन्तु वह अनेक बीमारियों से प्रारंभ में ही ग्रसित हो गई है। दूसरी राजनीतिक पार्टीयों से वह इस मायने में अलग है कि कम से कम रिकॉर्ड समय में वह बदनामी के ज्यादा से ज्यादा आयाम छू रही है। केजरीवाल की हां में हां नहीं मिलाने वाले व्यक्ति के लिए ‘आप’ में बिल्कुल जगह नहीं है। मेघा पाटकर जैसी जमीनी कार्यकर्ता को दुखी होकर पार्टी छोड़नी पड़ी है क्योंकि जिन विचारों और सिद्धांतों को लेकर यह पार्टी बनी थी, आरोप है कि वे सब पीछे छूट गए हैं और इसमें तानाशाही का साम्राज्य होता जा रहा है। लोकतंत्र को तिलांजलि देकर अहंकार के सहारे आगे बढ़ना नामुमकिन है। पार्टी पतन के रास्ते पर है।

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व केन्द्रीय कानून मंत्री एवं कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने हाल ही में खुलकर कांग्रेस की खस्ता हालत के बारे में बयान दिया है और इसी बयानबाजी में उन्होंने सोनिया गांधी को बेचारी भी कह डाला। दरअसल बेचारगी की हालत कांग्रेस की है क्योंकि लोकसभा चुनावों में हार के बाद से वह निरंतर ढलान की तरफ है। इस हालत में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी अलग-थलग सी पड़ गई लगती हैं। अलग-थलग इसलिए कि कांग्रेस की बद से बदतर होती जा रही हालत के लिए सीधे तौर पर भले ही उन्हें कोई जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा हो परन्तु जिस तरह से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अलग अलग मौकों पर विरोधाभासी बयान देकर कांग्रेस नेतृत्व को मुसीबत में डालते हैं, उससे साफ लगता है कि नेतृत्व की कमान पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कमजोर पड़ी है। इतना ही नहीं, कहा तो यह भी जा रहा है कि स्वयं राहुल गांधी भी पार्टी के चाल-चलन की शैली से नाखुश हैं और इसी कारण वे काफी दिनों से अज्ञातवास पर हैं। हालांकि इन खबरों को पुष्ट नहीं कहा जा सकता परन्तु पिछले कुछ समय से कांग्रेस एक अजीब पेशोपेश में दिखाई दे रही है। एक तरफ, पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होने के बावजूद सोनिया गांधी पहले से ज्यादा सक्रिय दिख रही हैं। उन्होंने संसद में भी सवाल पूछा। भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध करने के लिए राष्ट्रपति भवन तक पैदल मार्च में गईं। इसी प्रकार कोयला घोटाले में फंसे मनमोहनसिंह के बचाव में उनके साथ खड़ी दिखने के लिए मनमोहनसिंह के घर से पैदल मार्च किया। ये सब काम अब राहुल गांधी को करने चाहिए थे क्योंकि निकट भविष्य में उन्हें ही पार्टी की कमान संभलाने की बातें चल रही हैं। पार्टी के दिग्गज नेता खुलकर बयान देने लगे हैं कि अब राहुल को अध्यक्ष बनाने का समय आ गया है और उधर राहुल ऐसे समय में नैपथ्य में क्यों चले गए हैं, यह समझ से परे की बात है। रह रह कर प्रियंका गांधी को भी फ्रंट में लाने की मांग उठती रहती है जिसे फिर दबा दिया जाता है। गांधी परिवार खुद असमंजस की स्थिति में दिखाई देता है, इसीलिए न तो साफ तौर पर इनकार ही किया जाता है और न ही प्रियंका को कोई जिम्मेदारी सौंपी जाती है। ऐसे में कार्यकर्ता समय समय पर अपनी भावना व्यक्त करते रहते हैं और पार्टी के वरिष्ठ नेता यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि प्रियंका गांधी वाड्रा को किस रूप में और कब राजनीति में दायित्व सौंपना है इसका फैसला गांधी परिवार को करना है।

हंसराज भारद्वाज के ताजा बयान से यह स्पष्ट नहीं होता कि वास्तव में वे क्या चाहते हैं परन्तु एक तो उन्होंने यह नाराजगी व्यक्त की है कि पार्टी के वरिष्ठजनों को कान पकड़कर बाहर किया जा रहा है जबकि अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता है। उन्होंने राहुल गांधी को असक्षम बताया है और कहा है कि वह तो मार्केट में ही नहीं हैं तथा सोनिया गांधी के वश की बात नहीं है कि वे अब पार्टी को वापस खड़ी कर सकें। इन बयानों से पार्टी को कोई लाभ होगा या नहीं, पता नहीं परन्तु पार्टी में व्यापक स्तर पर असंतोष व्याप्त है। एक धड़ा राहुल को अध्यक्ष देखना चाहता है तो दूसरा कमजोर हुई कांग्रेस पर वार करने से नहीं चूक रहा क्योंकि बागियों पर नकेल कसने की हालत में पार्टी फिलहाल नहीं है।

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पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर भारत स्थित पाक उच्चायोग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह के शरीक होने से सोशल मीडिया पर मुद्दा खूब गर्माया और लोगों ने मोदी सरकार की जमकर खिंचाई की। जनता में यह नाराजगी थी कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब पाकिस्तान के प्रति संप्रग सरकार द्वारा किसी भी मुद्दे पर थोड़ी सी नरमी दिखाते ही भाजपा द्वारा जमकर सरकार की आलोचना की जाती थी और पाक से दोस्ती का विरोध किया जाता था परन्तु जब से भाजपा की सरकार केन्द्र में बनी है तब से विदेश नीति और कूटनीति की दुहाई देते हुए सरकार वे सब काम कर रही है जिनका भाजपा विपक्ष में रहते हुए विरोध करती थी। यह मामला शायद इतना तूल भी नहीं पकड़ता अगर जनरल वीके सिंह आनन-फानन में ट्वीट कर यह नहीं दर्शाते कि पाक उच्चायोग में आयोजित कार्यक्रम में वे स्वयं भी जाने के इच्छुक नहीं थे परन्तु उन्हें मिले निर्देशानुसार उन्होंने अपनी ड्यूटी पूरी की। मीडिया में ‘ड्यूटी’ शब्द को लेकर तरह तरह के कयास लगाते हुए सवाल उठाए जाने लगे तो सिंह को सफाई देनी पड़ी कि उनका ड्यूटी शब्द से आशय जिम्मेदारी निर्वाह से था। दरअसल वीके सिंह को एक राजनेता की तरह सरकार के पक्ष को रखना चाहिए था जबकि उन्होंने सरकार के लिए और बखेड़ा खड़ा कर दिया। वीके सिंह की कार्यक्रम में कुछ मिनटों की उपस्थिति, और बाद में कर्तव्य पालन की सीमाओं का उल्लेख, उसको परिभाषित करना और अपनी मन की पीड़ा व्यक्त करना कूटनीतिक लिहाज से एक विदेश राज्य मंत्री के हिसाब से सही नहीं माना जा सकता।

यह सब जानते हैं कि भारत-पाक के बीच प्रारंभ से ही रिश्तों में उतार चढ़ाव होते आए हैं और कभी रिश्तों में मधुरता भी आएगी, विश्‍वास के साथ कहा नहीं जा सकता। दोनों ही देश की जनता तो परस्पर अच्छे संबंध चाहती है परन्तु सियासीदां शायद इससे इत्तफाक नहीं रखते और अपनी अपनी रोटियां सेंकते रहते हैं। गत वर्ष जब नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने, उससे पहले तो काफी गर्म माहौल था और पाकिस्तान में यों प्रचारित किया जा रहा था मानो मोदी जैसा कट्टर हिन्दू समर्थक देश का प्रधानमंत्री बनेगा तो शायद दोनों देशों में युद्ध के हालात बन जाएंगे परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके उलट मोदी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति नवाज शरीफ को भारत के दौरे पर आमंत्रित किया। दोनों के बीच की गर्मजोशी से लगा कि अब पड़ौसी दोनों देशों की बीच दोस्ती का नया अध्याय लिखा जाएगा। इसके बाद अचानक फिर फिजां बदली। पाक उच् चायोग ने हुर्रियत नेताओं को बुलाया तो भारत ने दोनों देशों के सचिव स्तर की बैठक रद्द कर दी और पाकिस्तान को यह संदेश दिया गया कि एक तरफ अलगाववाद से दोस्ती और दूसरी तरफ भारत से भी मैत्री का स्वांग नहीं चलेगा। तब से दोनों देशों के बीच तनातनी का ही माहौल है। इस बीच सीमा पर घुसपैठ, गोलीबारी बढ़ी है। संघर्ष विराम का बार बार उल्लंघन हुआ है। इधर कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार बनने के बाद दो आतंकी हमलों को अंजाम दिया गया है ऐसे हालात में पाकिस्तान की तरफ थोड़ी से भी नरमी भरा कदम यहां की जनता को बर्दाश्त नहीं दिखता और सोशल साइट्स पर इसकी निंदा शुरू हो जाती है। ऐसे में सरकार और सरकार के मंत्रियों को जनभावना का खयाल करते हुए सोच समझकर कदम उठाने चाहिएं अन्यथा जनता का कोपभाजन बनना ही पड़ेगा।

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आईटी एक्ट की धारा 66 ए को उच्चत्तम न्यायालय ने असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया है। न्यायालय के इस कदम का स्वागत इसलिए करना चाहिए कि इसका दुरुपयोग किया जा रहा था और प्रभावशाली लोग और सरकारें जनता में इसके जरिए खौफ का वातावरण बनाए रखना चाहती थीं। अब आम आदमी ने राहत की सांस ली है। आईटी की धारा 66ए के तहत सरकारें आनन-फानन में किसी को भी सोशल मीडिया पर किसी भी तथाकथित ‘आपत्तिजनक’ कमेंट के लिए गिरफ्तार कर सकती थी। कोर्ट ने कहा है कि यह धारा भारतीय नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करती थी और अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश की तरह थी। यों तो वर्ष 2000 में ही आईटी कानून बन गया था परन्तु वर्ष 2008 में उसमें संशोधन किए गए थे और वर्ष 2012 में तो बाला साहब ठाकरे की अंतिम यात्रा को लेकर पालघर की शाहीन नामक एक लड़की ने आक्रोश व्यक्त करते हुए एक टिप्पणी की थी और उसकी एक सहेली ने इस टिप्पणी को लाइक कर दिया था। शिव सेना ने इन दोनों लड़कियों को गिरफ्तार करवा दिया था। हाल ही में उत्तर प्रदेश में मंत्री आजम खान के खिलाफ कमेंट करने वाले नाबालिग छात्र को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। इसके पूर्व पश्‍चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर एक कार्टून बनाने वाले अंबिकेश महापात्रा नामक प्रोफेसर को गिरफ्तार कर लिया था। इसी प्रकार पी चिदंबरम के बेटे कार्ती को भ्रष्ट बताने वाले ट्वीट पर बिजनेसमैन रवि श्रीनिवासन की गिरफ्तारी हुई थी। इस प्रकार विभिन्न राज्यों की सरकारों ने धौंस जमाने या जनता में डर पैदा करने के लिए धारा 66ए का गलत इस्तेमाल किया। राजनेताओं को ऐसा लगने लगा है कि पहले तो पांच वर्ष में जनता उन पर टिप्पणी तभी कर पाती थी जब वे वोट मांगने के लिए जनता के पास जाते थे परन्तु अब तो सोशल मीडिया एक ऐसा हथियार लोगों के हाथ लग गया है कि राजनेताओं की जब चाहो खिंचाई कर दी जाती है। नेताओं को अब यह बर्दाश्त नहीं है। नेता नहीं चाहते कि उनके खिलाफ इस प्रकार सोशल मीडिया पर आवाज उठे और उनकी छवि धूमिल हो। इसलिए आईटी एक्ट की धारा 66ए का दुरुपयोग किया जाता रहा।

सोशल मीडिया का एक तरफ आना और दूसरी तरफ जनता का पहले से कहीं ज्यादा जागरूक होना, भले ही संयोगवश साथ साथ हुआ हो परन्तु अब नेताओं को भी समझना होगा कि नागकरिकों के अधिकारों को कुचलकर वे लोकप्रिय प्रशासक नहीं बन सकते। जनता सभ्य समाज का रूप है। उसकी भी अपनी गरिमा है। वह कोई बंधुआ मजदूर नहीं है कि कानूनों का डर दिखाकर उसको प्रताड़ित किया जा सके। धारा 66ए के रद्द किए जाने के बाद भी भारतीय दंड संहिता में अनेक प्रावधान हैं जिनके तहत आईटी संबंधी अपराध करने वालों पर नकेल कसी जा सकती है। अब केवल आनन-फानन में गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। ऐसा नहीं है कि साइबर अपराधी अब बेलगाम हो जाएंगे। उनको सजा दिलाने के पर्याप्त प्रावधान हैं। आईटी की धारा 66ए के रद्द किए जाने का सभी राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है, यह संतोष का विषय माना जा सकता है।

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पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता है। पाकिस्तान दिवस के मौके पर भारत में स्थित पाकिस्तानी दूतावास में यहां के पाक राजदूत अब्दुल बासित ने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं और हुर्रियत के विभिन्न धड़ों के नेताओं को भोज पर आमंत्रित किया। इस बार सरकार की ओर से इस मसले को तूल नहीं दिया गया परन्तु आधिकारिक बयान में विदेश मंत्रालय ने यह जरूर कहा कि कश्मीर के मामले में भारत का रुख जस का तस है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर विवाद को सुलझाने के लिए भारत एवं पाकिस्तान के अलावा किसी मध्यस्थ की न तो आवश्यकता है और न ही भारत ऐसा कभी स्वीकार करेगा। उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान दिवस के मौके पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति नवाज शरीफ को चिट्ठी लिखकर साफ कह दिया है कि आतंक के माहौल में दोनों देशों के बीच बातचीत का वातावरण निर्मित नहीं हो सकता। बात साफ है परन्तु पाकिस्तान को इतनी साफ बात भी समझ में नहीं आती और उसने हाल ही में जम्मू कश्मीर के कठुआ और सांबा में आतंकी वारदातों को अंजाम देकर यह साबित कर दिया है कि वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाला। पाकिस्तान दिवस पर पाक उच्चायोग द्वारा हुर्रियत नेताओं को आमंत्रित करना भारत को उकसाने वाला कदम ही माना जाएगा। इसके पूर्व पाकिस्तानी उच्चायोग ने जब अलगाववादी नेताओं को गले लगाया था तब भारत ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द कर दी थी। फिर से उसी तरह का कदम उठाना एक शरारत से ज्यादा कुछ नहीं है। इधर जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के बयानों से भी अलगाववादियों के हौसले बुलंद हैं तथा भाजपा बैकफुट पर है। बार बार भाजपा पर विपक्षी हमले होते हैं और उस पर सत्ता के लिए सुरक्षा के साथ समझौते के आरोप लगते हैं। ऐसे हालात में पाकिस्तान भी केन्द्र सरकार को उकसाने का काम करता है।

भारत का विदेश मंत्रालय किसी भी हालत में कश्मीर चर्चा पर किसी तीसरे पक्ष को स्वीकार करने को तैयार नहीं और हुर्रियत के अलगाववादी हमेशा से ही पाकिस्तान के प्रवक्ता की तरह बात करते हैं और कहते हैं कि कश्मीर से जुड़े सारे स्टैक होल्डर्स से बातचीत होनी चाहिए। हर बार पाकिस्तान की ओर से दबाव बनाने के तहत हुर्रियत अपनी आवाज बुलंद करने लगती है। भारत को भी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को बातचीत का मुद्दा बनाना चाहिए और वहां के उन नेताओं को भारत बुलाकर दावत देनी चाहिए जो पाकिस्तान विरोधी माने जाते हैं। भारत को भी चाहिए कि पाकिस्तान की कुटिल चालों का उसी की भाषा में जवाब दे। हुर्रियत के नेता कभी भी भारत के पक्षधर नहीं हो सकते। वे कश्मीरियों के भी हितैषी नहीं हो सकते। वे तो वही भाषा तोते की तरह बोलते हैं जो पाकिस्तान रटाकर भेजता है। इस प्रकार के माहौल में सार्थक समाधान ढूंढ पाना असंभव है।

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केन्द्र सरकार ने काले धन से संबंधित विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया जिसमें विदेशों में अवैध रूप से काला धन रखने वालों के लिए 10 वर्ष तक की कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। साथ ही अघोषित संपत्ति की घोषणा करने वालों को रास्ता देने का भी जुगाड़ किया गया है परन्तु ऐसा अवसर केवल एक बार मिलेगा। यह विधेयक पारित होने के बाद कानून बनने पर यह भारत में निवास करने वाले और अघोषित विदेशी आय और आस्तियां रखने वाले सभी व्यक्तियों पर लागू होगा। विधेयक में प्रावधान है कि कानून की शर्तों का पालन करने वाले व्यक्ति पर इसके तहत मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। काफी समय से कालाधन का मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है। भाजपा की मोदी सरकार आने के पूर्व ही उच् चत्तम न्यायालय ने काले धन की जांच करने के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की सलाह तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दी थी परन्तु संप्रग सरकार ने इस मसले को ठंडे बस्ते में डालते हुए चुप्पी साध ली थी। काले धन के मुद्दे ने इतना तूल पकड़ा कि कांग्रेस तो बैकफुट पर आ गई और भाजपा ने इस मुद्दे को लोकसभा चुनाव प्रचार में जमकर भुनाया। मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिली भारी जीत में काले धन के मुद्दे की भी अहम भूमिका रही है। मोदी सरकार बनने के बाद एक बारगी तो इस सरकार ने भी तकनीकी परेशानियों का हवाला देते हुए यह दर्शाने का प्रयास किया था कि नई सरकार विदेशों में छिपे काले धन की जांच भी कराना चाहती है और वापस लाना भी चाहती है परन्तु पुरानी सरकार के साथ जो समझौते विदेशों के साथ हुए हैं उनके कारण मोदी सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। इस प्रकार इस सरकार ने भी पूर्व सरकार जैसा रवैया अख्तियार कर लिया था किन्तु उच्चत्तम न्यायालय द्वारा सरकार को लताड़ लगाए जाने के बाद न्यायालय की निगरानी में एसआईटी का गठन हो गया तथा जांच भी पटरी पर आ गई। एसआईटी के गठन का श्रेय उच्चत्तम न्यायालय को ही जाता है क्योंकि उसने समय सीमा निर्धारित कर दी थी। एक बार जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह कह दिया कि चुनाव प्रचार के दौरान मोदी द्वारा काले धन के बारे में दिए गए बयान तो चुनावी जुमले भर थे, तब यह लगने लगा था कि कांग्रेस की तरह भाजपा सरकार भी काले धन के मामले में गंभीर नहीं है परन्तु प्रधानमंत्री ने इसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी और इस पर विधेयक लाकर इसे साबित भी कर दिया कि वे अपने कथन के प्रति गंभीर हैं। यह कानून बनने पर सीमित अवधि में काला धन रखने वाले रकम की घोषणा कर जुर्माना चुका कर अभियोजन से बच सकेंगे। हर भारतीय के लिए अब अनिवार्य होगा कि वह अपने विदेशी खाते और संपत्ति की जानकारी संबंधित प्राधिकरण को दे अन्यथा जुर्माना और जेल दोनों की सजा हो सकती है। जुर्माना भी भारी लगाए जाने का प्रावधान है। अधिकतम दस साल की सजा का प्रावधान काफी कठोर कदम है। सरकार को इसके साथ साथ काला धन जेनरेट नहीं हो, इस दिशा में भी कड़े प्रबंध करने होंगे। काले धन को बढ़ावा देने में मददगार बैंकों और सरकारी अधिकारियों पर भी शिकंजा कसना जरूरी होगा। कालेधन के जो बड़े बड़े स्रोत हैं उनको नजरंदाज करना भी बेवकूफी होगी। शेयर बाजार से लेकर भवन निर्माण तक पर सरकार को पैनी नजर रखनी होगी और आवश्यक होने पर इनसे सम्बद्ध नीतियों में परिवर्तन भी करना होगा। अगर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा तो काले धन पर भी स्वतः नियंत्रण होगा।

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जम्मू-कश्मीर में चौबीस घंटों में दो आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देकर आतंकियों ने यह दर्शा दिया है कि राज्य में मुफ्ती मोहम्मद सरकार का उनको कोई खौफ नहीं है, बल्कि उन्हें तो यह सरकार अनुकूल अवसर जैसी फीलिंग दे रही है। जम्मू कश्मीर के कठुआ जिले में सेना की वर्दी पहने फिदायीन आतंकवादियों ने पुलिस थाने पर गत शुक्रवार तड़के हमला कर दिया जिसमें तीन सुरक्षा कर्मियों की मौत हो गई। चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि आतंकियों के एक और दस्ते ने आर्मी के कैम्प में घुसने की कोशिश की। हालांकि दोनों ही घटनाओं में भारतीय जवानों ने आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया परन्तु इसकी भारी कीमत भी चुकाई। हमारे सुरक्षाकर्मी भी शहीद हो गए। जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार है जिसके मुखिया मुफ्ती मोहम्मद सईद हैं। पिछले दिनों सरकार बनते ही उन्होंने आतंकवादियों के प्रति काफी नरम रवैया दिखाया था। इतना ही नहीं, उन्होंने खूंखार आतंकी मसरत आलम को जेल से रिहा कर यह संकेत देने का प्रयास किया था कि वे प्रदेश में शांति बहाली के लिए आतंकवादियों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहते हैं ताकि वे विकास की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए आतंकवाद का रास्ता त्याग दें परन्तु मुफ्ती का अनुमान गलत साबित हुआ है बल्कि हाल के दिनों में घाटी में आतंकवाद की घटनाएं बढ़ी हैं।

बढ़ती आतंकी घटनाओं ने यह संकेत दे दिए हैं कि एक तो पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार के लिए चुनौतीभरा समय सामने है । आतंकवादी किसी भी हालत में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए घाटी में अमन का वातावरण तैयार नहीं होने देंगे। दूसरी बात यह भी साफ हो गई है कि आतंकी नरमी के आगे झुकने वाले नहीं है बल्कि वे इसका फायदा उठाकर अपनी स्थिति और मजबूत करने का काम करेंगे। मुफ्ती को लगता था कि वे आतंकवादियों के प्रति नरम रुख अख्यितार कर उन्हेें भारतविरोधी हिंसा त्यागने पर राजी कर लेंगे किंतु इसके उलट उन्होंने हिंसक घटनाओं में बढ़ोत्तरी की । अब मुफ्ती को भी यह स्वीकार करना होगा कि अगर जम्मू कश्मीर से भारतीय सेना को पूरी तरह से हटा लिया जाए तो वहां युद्ध के से हालात बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मुफ्ती ने घाटी में शांतिपूर्ण चुनाव कराने जाने का श्रेय पाकिस्तान और आतंकवादियों की सदाशयता को दिया था । अब ताजा आतंकी घटनाओं पर प्रतिक्रिया के लिए उनकी बोलती बंद है। मसरत आलम की रिहाई के बाद भाजपा ने अपना रुख कड़ा नहीं किया होता तो मुफ्ती सरकार ने अब तक कई खतरनाक आतंकियोें को घाटी में खुला घूमने के लिए छोड़ दिया होता। भाजपा ने कहा कि भारत की सुरक्षा उसके लिए सर्वोपरि है, भले ही जम्मू कश्मीर की सरकार से उन्हें हाथ धोना पड़े। भाजपा का यह कदम सराहनीय था और उसे इस पर दॄढ़ रहना होगा। यदि गठबंधन की सरकार आतंकवाद से समझौता करती दिखे तो भाजपा को तुरन्त सत्ता से तौबा कर लेनी चाहिए और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन का विकल्प तैयार कर देना चाहिए क्योंकि घाटी एक बार हाथ से निकल गई तो फिर आतंक के आगोश में समा जाएगी। आतंकवादियों को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि मुफ्ती सरकार उनके लिए उपजाऊ जमीन का काम करेगी।

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कर्नाटक के तेजतर्रार आईएएस अधिकारी डीके रवि की रहस्यमय मौत के मामले की जांच सीबीआई को नहीं देने के लिए अभी भी राज्य की सिद्दरामैया सरकार अड़ी हुई है जबकि विपक्ष रवि के परिवार के साथ है। मुख्यमंत्री सिद्दरामैया का कहना है कि मामले की जांच सीआईडी कर रही है और मृतक के परिवार वालों को इस एजेन्सी पर भरोसा करना चाहिए। लेकिन परिवार वालों को सीआईडी पर थोड़ा सा भी विश्‍वास नहीं है और इस अविश्‍वास के भी कुछ ठोस कारण हैं। जैसे कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के पहले ही सरकार की ओर से यह कह देना कि रवि ने संभवत: खुदकुशी की होगी। किसी भी हाईप्रोफाइल संदिग्ध मौत के मामले में जांच से भी पहले इतनी जल्दी निर्णय पर पहुंचना कई तरह के सवाल खड़े करता है। मृतक रवि के ससुर ने तो खुले तौर पर एक भवन निर्माता के नाम का भी उल्लेख कर दिया है कि रवि उस निर्माता की अनियमितताओं के खिलाफ सख्ती से खड़े थे और कार्यवाही करना चाहते थे, जबकि सरकार के एक बड़े नेता का शायद उसको वरदहस्त प्राप्त है।

मीडिया के एक हिस्से में राज्य के गृहमंत्री केजे जॉर्ज से भी मामले के तार कहीं-न-कहीं जुड़े होने के संकेत दिए जाने के बाद गृहमंत्री ने इन आशंकाओं का खंडन किया और कहा कि उनका इससे कोई लेना देना नहीं है परन्तु जो हालात निर्मित हुए हैं उनके मद्देनजर राज्य सरकार के लिए भी यही उचित होगा कि रवि की संदिग्ध अवस्था में हुई मौत की जांच सरकार खुद आगे बढ़कर सीबीआई को सौंप दे। इससे सरकार के खिलाफ विपक्ष को एकजुट होने का मौका नहीं मिलेगा और जनता में भी यह संदेश जाएगा कि सरकार इस मामले में कुछ भी छिपाने का प्रयास नहीं कर रही है। डीके रवि एक ईमानदार अधिकारी थे और कोलार पदस्थ रहते हुए उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट के रूप में जिस तरह से विकास कार्य करवाए और लोगों की समस्याओं के समाधान के ईमानदार प्रयास किए उससे वह जिले की जनता के दिलों में राज्य करने लगे थे। बताया जा रहा है कि उन्हें भू-माफियाओं और रेत-माफियाओं से निरन्तर धमकियां मिल रही थीं और दबाव भी बढ़ रहा था। उन्होंने ही अपने ससुर के माध्यम से अपना स्थानांतरण बेंगलूरु में करवा लिया था ताकि चैन से जीवन जीया जा सके। परन्तु यहां भी उन्होंने अपनी ईमानदारी का रास्ता नहीं छोड़ा और भू-माफियाओं की आंख की किरकिरी बने रहे। अतंत: उन्हें अपनी जान गंवा देनी पड़ी। यह मामला शायद अब तक दब भी चुका होता क्योंकि पुलिस ने तो फाइल को खुदकुशी का मामला बताकर बंद करने की तैयारी भी कर ली थी किन्तु मृतक के परिवार द्वारा न्याय की मांग के साथ जब पूरे प्रदेश की जनता खड़ी दिखाई दी तो सरकार और पुलिस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई और विधानसभा के सामने धरने पर बैठे रवि के परिवारवालों से मिलने खुद मुख्यमंत्री को आना पड़ा। मुख्यमंत्री सिद्दरामैया को चाहिए कि अब बिना हीलहुज्जत कराए इस मामले की जांच तुरन्त सीबीआई के हवाले कर दें। उधर केन्द्र सरकार इसके लिए तैयार है। केन्द्र ने कहा कि यदि राज्य सरकार सीबीआई जांच की मांग करती है तो केन्द्र तुरन्त यह सुविधा मुहैया कराने को तैयार है। मुख्यमंत्री को यदि जनता के बीच यह संदेश पहुंचना है कि वह इस अधिकारी की मौत के मामले में किसी को बचाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं और दूध का दूध पानी का पानी करना चाहते हैं तो उन्हें मृतक के परिवार की मांग को स्वीकार कर लेना चाहिए जो कि विपक्ष की भी मांग है।

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पाकिस्तान के लाहौर में 3 दिन पहले हुए बम धमाकों ने एक बार फिर उस संघर्ष को दुनिया की नज़र में ला दिया है जिसका सामना पाकिस्तान की जनता कई दशकों से कर रही है।  पाकिस्तान में कई समुदायों के बीच काफी मतभेद हैं और समय समय पर यह हिंसक रूप ले कर दुनिया के सामने आते रहे हैं। पडोसी मुल्क पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों पर भारत की नज़र हमेशा बनी रहती है परन्तु कई बार पाकिस्तान में चल रहे अंदरूनी कलह के लिए हमारे देश को ज़िम्मेदार भी ठहराया गया है। पाकिस्तान में ताकतवर समूहों के बीच निरंतर चल रही इस लड़ाई में अगर कोई परेशान हो रहा है तो वह पाकिस्तान का आम नागरिक ही है। आंतकवाद के खिलाफ पाकिस्तानी प्रशासन के नरम रवैये के पीछे उसकी अपने अस्तित्व को बचने की मजबूरी छिपी हुई है। पिछले कुछ समय से हो रही आतंकवादी घटनाओं पर अगर ध्यान दिया जाए, तो किसी को भी यह समझने में मुश्किल नहीं आएगी कि पाकिस्तान में लगातार अल्पसंख्यकों पर किसी न किसी रूप में हमले होते रहे हैं। एक लोकतान्त्रिक ढांचे की नींव ही सभी नागरिकों की सुरक्षा और समानता पर रखी जाती है, परन्तु पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसमें आज़ादी के बाद से कई बार सेना द्वारा तख्तपलट किया गया है और हर बार मजबूत तबके ने कमज़ोर जनता को दबाने की कोशिश की है। कई दशकों से हिंसक यातनाओं से परेशान आम जनता भी अब पाकिस्तान जैसे कट्टर देश में अपनी आवाज़ को बुलंद करने की कोशिश करने लगी है। लाहौर में चर्च पर हुए हमलों के बाद लोगों ने काफी प्रदर्शन किए और अपना दुःख जाहिर किया।  परन्तु पाकिस्तान में जब तक हाफिज मुहम्मद सईद और जाकी-उर-रेहमान लखवी जैसे आतंकवादियों को अपनी मनमानी करने का मौका मिलता रहेगा शायद ही देश इन मुसीबतों से बाहर निकल सकेगा। पाकिस्तानी सरकार को अगर देश के विकास के लिए कदम उठाने हैं तो उसे सबसे पहले आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख को साफ़ करना पड़ेगा। हालांकि भारत और पाकिस्तान को आज़ादी एक साथ ही मिली थी परन्तु आज दोनों देशों की आर्थिक स्थिति में ज़मीन आसमान का फर्क है। भारत को पाकिस्तान के मुकाबले कई अधिक समस्याओं से जूझना पड़ा परन्तु सही दिशा में उठाए गए प्रगतिशील प्रशासनिक फैसलों की वजह से आज भारत दुनिया भर में एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरता नज़र आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर के कई देश पाकिस्तान को आतंकवाद का गढ मान चुके हैं और अपने नागरिकों को पर्यटन के तौर पर भी पाकिस्तान जाने के खिलाफ सलाह देते रहे हैं। पाकिस्तान को विकास पथ पर आगे बढ़ने और अपने भविष्य को थोड़ा भी सुधारने की अगर इच्छा है तो उसे कई कड़े कदम उठाने पड़ेंगे। पाकिस्तान की सरकार को सबसे पहले अपनी जनता को यह भरोसा दिलाना पड़ेगा की आतंकवाद से निपटने में वह पूरी तरह सक्षम है और देश भर में शांति बहाल करने की ताकत रखती है। यह एक कदम भी पाकिस्तान सरकार के लिए काफी मुश्किल भरा रहेगा क्योंकि उसे इसके लिए सेना का पूर्ण समर्थन चाहिएगा। पाकिस्तान के इतिहास में झांका जाए तो यह साफ है कि पाकिस्तानी सेना वहां पर छुपे कई आतंकी संगठनों को किसी न किसी रुप में शह देती रही है। यदि पाकिस्तान की सेना आंतकी गतिविधियों के खिलाफ एक निष्पक्ष व मजबूत नीति अपनाती है तो आने वाले समय में पाकिस्तान के अच्छे दिन आने की पूरी सम्भावना है।

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कर्नाटक के युवा आईएएस अधिकारी डी के रवि की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई है। अपनी ईमानदारी के लिए प्रशासनिक महकमे में प्रसिद्ध इस अधिकारी ने आम जनता का तो दिल जीत ही लिया था, साथ ही वर्ष 2009 बैच के 35 वर्षीय अधिकारी रवि ने अपने छोटे से प्रशासनिक जीवन में मानो दुश्मनों की भी लम्बी लाइन खड़ी कर ली थी। उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु से कई सवाल खड़े हो जाते हैं क्योंकि यह इस तरह का पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व भी कई प्रशासनिक अधिकारियों के संघर्ष की खबरें आती रही हैं। दुर्गा शक्ति, अशोक खेमका जैसे अधिकारियों को भी प्रभावशाली लोगों से टकराव की वजह से काफी संघर्ष करना पड़ा। हालांकि अभी तक रवि की मृत्यु को आत्महत्या ही माना जा रहा है परन्तु इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उनको पिछले कुछ अरसे से जान से मारने की धमकियां लगातार मिल रही थींं और उनकी मृत्यु के पीछे किसी का निजी फायदा छुपा हो सकता है। कोलार के लोगों के दिलों में अपनी जगह बना चुके रवि को स्थानीय लोग एक निडर एवं ईमानदार अधिकारी मानते थे और उनकी मृत्यु की खबर से पूरे क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है। कई जगहों पर लोगों ने चक्का जाम करने की भी कोशिश की है। इससे यह भी जाहिर होता है कि वह लोगों से जुड़े अधिकारी थे। उन्होंने कोलार में जिला उपायुक्त के तौर पर अपने कार्यकाल में वहां के रेत खनन माफियाओं को धूल चटाई थी। जब उनका बेंगलूरु के वाणिज्य कर विभाग में तबादला हुआ तो यहां भी उनके तेवर ढीले नहीं पड़े। उन्होंने अपनी सख्त कार्यशैली को यहां भी जारी रखते हुए शहर के 400 से अधिक बिल्डरों को टैक्स की चोरी के सन्दर्भ में नोटिस भेजे थे। ऐसा पहले भी होता रहा है कि जब ईमानदार अधिकारी के आदेशों से किसी भ्रष्ट नेता या कारोबारी को मुसीबत झेलनी पड़ती है तो वह अपनी पूरी ताकत उस अधिकारी को परेशान करने में लगा देता है। अगर आज हम अपने प्रशासनिक अधिकारियों की सुरक्षा और चैन को बरकरार रखने में नाकाम रहेंगे तो आने वाले समय में शायद ही कोई अधिकारी अपनी जान जोखिम में डालकर कठोर फैसले लेने की हिम्मत कर पाएगा। रवि को श्रद्धांजलि देने पहुंचे राज्य के मुख्यमंत्री सिद्दरामैया ने जहां एक तरफ सीआईडी द्वारा इस मामले की जांच कराए जाने की बात कही है, वहीं एक विपक्षी नेता ने तो राज्य सरकार द्वारा इस मामले की जांच को लेकर ढीले रवैय्ये का भी आरोप लगाया है। आम लोग इसे राजनैतिक विफलता मान रहे हैं और राज्य भर में अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन कर अपना आक्रोश जता रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि एक प्रशासनिक अधिकारी को अपनी सही कार्य संस्कृति से भटकाने के लिए अगर भ्रष्ट लोगों द्वारा साम, दाम, दंड, भेद वाली पद्धति अपनाई जाएगी तो इस समाज को ही दोषी माना जाना चाहिए। साथ ही जरूरत है कड़े कानूनों की जो ईमानदार अधिकारियों के लिए एक रक्षा कवच बने। अगर हमें इस देश की प्रशासनिक प्रणाली को सुरक्षित रखना है तो एक मजबूत ढांचे की आवश्कयता है जिसके तहत ईमानदार को सुरक्षा और भ्रष्ट के लिए कड़ी सजा का प्रावधान हो। अगर अधिकारी रवि ने वाकई आत्माहत्या भी की है तो इस बात की भी जांच करने की जरूरत है कि ऐसी कौन सी बात थी जिसने एक अफसर को इतना कठोर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। क्या अधिकारी पर दबाव था? क्या वह अपने काम के बोझ से तनाव में थे? क्या उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता सताए जा रही थी? क्या वह अपने आपको बेबस और लाचार मान चुके थे ? ऐसे कई सवालों का जवाब हमें ढूंढने की आवश्यकता है।