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संपादकीय

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गुजरात में चल रहे पटेल समुदाय के लोगों द्वारा अन्य पिछ़डी जातियों में सम्मिलित होने की मांग के साथ किए जा रहे आंदोलन ने मंगलवार शाम को हिंसक रूप ले लिया। अहमदाबाद में पट्टेदार समाज द्वारा आयोजित विशाल रैली के बाद इस आंदोलन के मुख्य आयोजक हार्दिक पटेल को पुलिस ने हिरासत में लिया था और बाद में छो़ड भी दिया। भी़ड को हटाने के लिए लाठी चार्ज किया गया था। जल्द ही हार्दिक समर्थकों तक यह बात पहुंच गई और अहमदाबाद सहित अन्य शहरों में लोग चौराहों पर इकट्टा होने लगे और सार्वजनिक सम्पति को हानि पहंुचाने लगे। बुधवार तक सौ से अधिक बसों को जलाकर राख कर दिया गया और साथ ही भारतीय रेल की संपत्ति को भी बर्बाद करने की कोशिश की गई। अहमदाबाद में रेलवे लाइन पर जमा हुई भी़ड ने कई जगहों से पटरियों को उखा़ड दिया और इस मार्ग पर रेल यातायात बुरी तरह बाधित हुआ है। राज्य के अनेक शहरों से हिंसा की वारदातें सामने आई और मंगलवार देर रात मेहसाना स्थित राज्य के गृहमंत्री रजनी पटेल के घर पर भी आगजनी की वारदात को अंजाम दिया गया। बुधवार को यह हिंसा और ़फैल गई और राज्य भर में जगह जगह पर तनाव की स्थिति बरकरार थी। अहमदाबाद सहित अनेक शहरों में पुलिस द्वारा कफ्र्यू लगा दिया गया और बुधवार शाम तक इस हिंसा में तीन लोगों की जान चली गई। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने राज्य की जनता से शांति की अपील की है। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक सन्देश जारी किया जिसमंे उन्होंने गुजरात की जनता से गुजराती में बात करते हुए वार्ता और विचार विमर्श से समस्या के हल निकालने की बात की। उन्होंने राज्य की जनता से हिंसक आंदोलन को बंद करने को कहा। वहीं दूसरी और लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने गुजरात की हिंसा पर चुटकी लेते हुए नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल का म़जाक भी उ़डाया। इस पूरे आंदोलन के दौरान हार्दिक पटेल ने बार बार समुदाय के लोगों के बीच भ़डकाऊ बयान दिए और मंगलवार को भी पुलिस के खिलाफ लोगों को भ़डकाने में कोई कसर नहीं छो़डी। उन्हें मंगलवार शाम इसलिए हिरासत में लिया गया था क्योंकि उन्होंने रैली के आयोजन के लिए आवश्यक अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं समझी। गुजरात में मंगलवार शाम से हो रही हिंसा में बहुत नुकसान किया गया है और साथ ही रेलवे सेवाओं को टप्प करने की भी कोशिश की गई है। ऐसा करने से अगर आंदोलनकारी यह सोच रहे हैं कि वे सरकार पर दबाव बनाने में सफल रहेंगे तो यह उनकी गलत धारणा है। साथ ही इस आंदोलन के सारथी हार्दिक पटेल को अपनी ि़जम्मेदारी समझते हुए समुदाय के लोगों को हिंसा का मार्ग अपनाने के लिए उत्तेजित नहीं करना चाहिए।

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भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाकारों की बैठक पर शंका के बादल मंडराने लगे हैं। पाकिस्तान के भारतीय राजदूत द्वारा कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को आमंत्रण भेजे जाने से भारत सरकार गुस्से में है। भारत सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सा़फ कर दिया कि भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच होने वाली बैठक का मुद्दा सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ दोनों देशों के बीच हो रही बातचीत को आगे ब़ढाने का सिलसिला है। सरकार के एक अन्य मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने भी यह कहा है कि पाकिस्तान अगर आतंकवाद और दोनों देशों के रिश्तों को साथ साथ लेकर चलना चाहता है तो ऐसा नहीं होगा। भारतीय प्रशासन ने सा़फ तौर पर पाकिस्तान द्वारा कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को आमंत्रण दिए जाने को स्वीकार नहीं करते हुए अपना विरोध जाता दिया है। पाकिस्तान भी अपने रुख पर अ़डा हुआ है और अपने पक्ष में यह कह रहा है कि कश्मीर के नेताओं को किसी नई पहल के तहत आमंत्रित नहीं किया गया है बल्कि यह सिर्फ एक औपचारिक आमंत्रण है जो हर बार दिया जाता है। भारत अपनी तरफ से बार बार दोस्ती और अमन की कोशिश करता है परन्तु पाकिस्तान की ओर से किसी ना किसी तरह उसे नाकाम करने की मंशा रहती है। भारत सरकार द्वारा कुछ महीनों पहले सरकार में मंत्री और सेना के भूतपूर्व अध्यक्ष जनरल वी के सिंह को पाकिस्तान भेजा गया था और उससे पहले भी मोदी सरकार द्वारा किसी न किसी रूप से पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ ब़ढाया गया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवा़ज शरीफ पर पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों का दबाव है और पाकिस्तानी सेना या खुफिया एजेंसी आईएसआई भी नहीं चाहती कि दोनों देशों के बीच रिश्तों में किसी भी तरह का सुधार आए। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत कम़जोर है और भारत से अच्छे रिश्ते रखने से व्यापार में वृद्धि हो सकती है जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सहारा मिल सकता है। साथ ही पाकिस्तान में आंतरिक हिंसा की घटनाएं भी दिन प्रतिदिन ब़ढती जा रही हैैं और पाकिस्तानी सरकार का अपने ही देश में नियंत्रण नहीं है। ऐसे में भारत को यह समझना होगा कि बार बार शांति वार्ता और बेहतर रिश्तों की कोशिश के बावजूद जब पाकिस्तान संघर्ष विराम तो़डने से बा़ज नहीं आता तो पाकिस्तान से भविष्य में भी सौहार्द की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। भारत अब विश्व की ब़डी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन चुका है और सरकार को भी यह समझना होगा कि भारत से ज्यादा पाकिस्तान को भारत से अच्छे रिश्ते बनाने से फायदा है। भारत को पाकिस्तान सीमा पर पूरी चौकसी बरतते हुए घुसपैठ की किसी भी कोशिश का करारा जवाब देते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पाकिस्तान अपने किसी भी नापाक इरादे को अंजाम तक पहंुचाने में सफल न हो। जिस तरह अमेरिका विश्व के अनेक देशों पर राष्ट्रीय प्रतिबन्ध लगाने के बाद किसी भी तरह के व्यापारिक रिश्तों को भी तो़ड लेता है उसी तरह भारत को भी पाकिस्तान पर आर्थिक दबाव बनाने की जरूरत है। अगर पाकिस्तानी एनएसए हुर्रियत और अन्य कश्मीरी नेताओं से मिलने के लिए इतनी उत्सुकता दिखा रहे हैंै तो भारत सरकार को भी बिना झुके इस वार्ता को रद्द करने का ऐलान कर देना चाहिए।

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सार्वजनिक बैंकों को बेहतर बनाने और उनमंे नई ऊर्जा लाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा एक नई योजना पेश की जा रही है जिसका नाम इन्द्रधनुष रखा गया है। सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से सरकार सार्वजनिक बैंकों को निजी क्षेत्र के बैंकों से क़डा मुकाबला करने के लिए तैयार कर सकेगी। केंद्र सरकार द्वारा पहले भी कई बार सार्वजनिक बैंकों को आर्थिक सहायता दी जाती रही है। हालांकि सरकार आमतौर पर सिर्फ आर्थिक सहायता ही प्रदान करती है, लेकिन इस बार सरकार की इन्द्रधनुष योजना के तहत सरकार बैंकों के लिए सुधारों को लागू करने की कोशिश कर रही है। इस नई योजना के अंतर्गत सरकार बैंकों की मुख्य चुनौतियों का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही है। सरकार बैंकों की कार्यवाही में कम़जोर कि़डयों को पहचानकर उन्हें सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी। सरकार इस नई योजना के तहत, सार्वजनिक बैंकों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को निजी क्षेत्र से भी चुन सकेगी। इससे पहले सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत अधिकारी ही बैंकों के प्रमुख पदों के लिए होने वाली परीक्षाओं में बैठ सकते थे। इस कदम से निजी क्षेत्र से भी प्रतिभावान उम्मीदवारों को चुना जा सकेगा। सरकार इन्द्रधनुष योजना में मुख्यतः बैंकों के दैनिक कार्यों को मजबूती देने की कोशिश करेगी जिनमंे भर्ती, गैर निष्पादित परिसंपत्ति के मामलांे पर ध्यान, बैंकों की जवाबदेही, आम शासन कार्य जैसे विभाग भी शामिल होंगे। भारतीय रि़जर्व बैंक द्वारा नियुक्त की गयी पी. जे. नायक समिति द्वारा प्रस्तावित बदलावों को भी इन्द्रधनुष योजना के तहत लागू करने की कोशिश की जा रही है। सार्वजनिक बैंकों को सरकार से आर्थिक समर्थन के लिए अपनी कार्य कुशलता को बेहतर बनाना होगा और बैंकों के वित्तीय प्रदर्शन के अनुसार ही सरकार द्वारा बैंकों को आर्थिक मजबूती मुहैया कराई जाएगी। इससे पहले सरकार द्वारा बैंकों को दी जा रही आर्थिक मदद की किसी भी तरह की समीक्षा नहीं होती थी और बैंकों के बुरे प्रदर्शन पर भी उन्हें अपनी कार्य शैली में बिना कोई बदलाव किए समय समय पर और आर्थिक सहायता मिल जाती थी। अगर सरकार बैंकों को अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित करने में सफल रहती है तो इससे भी देश की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा। सरकार एक नए बैंक बोर्ड विभाग बनाने की भी योजना बना रही है जिसे देश के सार्वजनिक बैंकों के प्रदर्शन पर ध्यान देने का मुख्य कार्य दिया जाएगा। सरकार ने बैंकों के विनिवेश के बारे में अपने पत्ते नहीं खोले हैं और देखना होगा कि बैंकों को मजबूत करने के इन नए कदमों को लागू करने के बाद भी क्या इन्हंे विनिवेश की दिशा में ब़ढाया जाएगा। भारत की आर्थिक स्थिति अब मजबूत हो रही है और अगर ऐसे में सरकार सार्वजनिक बैंकों को मजबूत कर पाती है तो निश्चित रूप से इसका लाभ देश की आम जनता को मिलेगा।

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पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान द्वारा सीमा पार से लगातार गोलीबारी की जा रही है और पाकिस्तान सीमा के पास सटे गांवों को निशाना बनाते हुए आम नागरिकों के घरों पर भी गोले बरसाए जा रहे हैं। अगस्त महीने के पहले हफ्ते से शुरू हुई गोलाबारी को पाकिस्तान ने जारी रखा है। अगस्त 23 को दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक होनी है। कुछ ही दिनों पहले पंजाब के गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले के तार भी पाकिस्तान से जुड़ते नज़र आ रहे हैं। इसी बीच उधमपुर में पाकिस्तान से आए आतंकी नवेद और उसके साथियों ने सीमा सुरक्षा बल की एक बस पर अंधाधुंध फायरिंग की थी जिसमें दो जवान शहीद हो गए। इस हमले के बाद गांव के दो युवाओं ने बहादुरी बताते हुए नवेद को धर दबोचा। नवेद ने पाकिस्तान से आने की बात कबूली और साथ ही पाकिस्तान में उसके घर का पता भी अधिकारियों और मीडिया को बताया। एक टीवी पत्रकार ने नवेद के पिता से फ़ोन पर बात भी की थी। इन नई परिस्थितियों की वजह से यह साफ़ हो गया है की पाकिस्तान द्वारा लगातार भारत में उत्पात मचाने की कोशिश जारी रहती है।
पाकिस्तान सीमा पार से लगातार गोलाबारी कर भारतीय अधिकारियों का ध्यान भटकाने की कोशिश करता नज़र आ रहा है। अगस्त 23 को होने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच की बैठक में भारतीय दल द्वारा पाकिस्तान की ओर से हो रही घुसपैठ और पकड़े गए आतंकी नवेद का मामला उठाया जाना निश्चित है। ऐसे में पाकिस्तान गोलीबारी कर आम नागरिकों को निशाना बना रहा है और चाहता है कि इस बैठक में भारतीय अधिकारियों द्वारा ज्यादा ज़ोर गोलीबारी बंद रखने की मांग को लेकर रहे और मुख्य मुद्दे से भारतीय दल भटक जाए। पाकिस्तान अपनी काली करतूत को गोलीबारी की आड़ में छुपाना चाह रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अरब देश की यात्रा के दौरान दुबई में अपने वक्तव्य में भी पाकिस्तान को खूब खरी खोटी सुनाई है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को आंतकवाद का समर्थन बंद करना होगा और साथ ही यह भी कहा कि अच्छा तालिबान, बुरा तालिबान जैसे बयानों से कुछ नहीं होगा और पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।
फिलहाल राष्ट्रीय सलाहकारों की बैठक से ज्यादा उम्मीद नहीं लगाई जानी चाहिए क्योंकि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आता है और भारत द्वारा पेश किए गए अधिकतम प्रस्तावों को नकार देता है। पाकिस्तान बार बार भारत को भड़काने की कोशिश करता रहता है। भारतीय दल को इस बैठक में साफ़ कर देना चाहिए कि भारत पाकिस्तान के रिश्ते तभी बेहतर होंगे जब पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों का समर्थन करना छोड़ देगा। भारत को पाकिस्तान के इन छद्म हमलों का करारा जवाब देना चाहिए। भारत के पास अनेक सबूत हैं जिनसे साफ़ होता है कि भारत में हो रहे सभी आतंकी हमलों की तैयारियां पाकिस्तान में ही की जाती हैं।

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भारत इतिहास की सैंकड़ों सदियों से ही आर्थिक स्थिति में एक मजबूत राज्य रहा है। कई इतिहासकारों ने अपनी किताबों में भारत की आर्थिक ताकत का बखान किया है। 17वीं सदी की शुरुआत में भारत को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत माना जाता था इसलिए कई यूरोपीय देश भारत की तरफ आकर्षित हुए थे। मुग़ल साम्राज्य के समय भारत के राजख़ज़ानों में विश्व भर की तुलना में एक चौथाई वित्तीय संपत्ति मौजूद थी। अंग्रेजी शासन के दौरान अंग्रेज़ों ने भारतीय अर्थव्यवस्था का निंदनीय शोषण किया था और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी भारत पर इंग्लैंड की आर्थिक व्यवस्था को संभालने का भार पड़ा था। 17वीं सदी का यह महाशक्तिशाली देश अंग्रेजी हुकूमत के आफत भरे दौर से गुजरने के बात एक गरीब देश कहा जाने लगा।
देश की आज़ादी के बाद भी वर्ष 1980 तक इसकी अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट आती रही। धीरे धीरे भारत की अर्थव्यवस्था में सुधार आने लगा। हालांकि आज़ादी के 68 वर्षों के बाद भी अभी तक भारत अंग्रेज़ों द्वारा किए गए आर्थिक शोषण से उबरने में विफल रहा है। आज भारत की आबादी विश्व की आबादी के 17 प्रतिशत से भी अधिक का आंकड़ा पार कर चुकी है और कुछ ही वर्षों में भारत विश्व का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। पिछले वर्ष हुए आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को विशाल बहुमत मिला था और उम्मीद लगाई जा रही थी कि यह सरकार आर्थिक सुधारों के लिए आवश्यक कदम उठाएगी और निश्चित रूप से भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में यह सरकार सफल रहेगी। पिछली सरकार को आर्थिक सुधारों को लागू नहीं कर पाने और अनेक घोटालों में लिप्त होने के आरोप लगाकर भाजपा ने आम चुनावों में अपनी रणनीति को इन्हीं मुद्दों के इर्दगिर्द रखा था।
इधर, पिछले हफ्ते ख़त्म हुए मानसून सत्र में कोई ठोस काम नहीं हो पाया और विपक्ष और सरकार के बीच लगातार हो रही रस्साकस्सी की वजह से सरकार अहम बिलों को संसद में पारित नहीं कर पाई। सरकार और विपक्षी दलों ने अपने दलीय हितों के लिए देश की आर्थिक स्थिति को नज़रअंदाज़ किया जिसका खामियाज़ा देश को भुगतना पड़ेगा। काफी अरसे से संसद में जीएसटी बिल फंसा हुआ है। इस बिल के पारित हो जाने से देश की अर्थव्यवस्था में सुधार आने की उम्मीद है। भारत के राजनेताओं को अब विचार करना होगा कि आपसी भेदभाव से देश की प्रगति को बाधित करना किस हद तक सही है ?
साथ ही भारत को अपने गौरवशाली इतिहास की ओर फिर एक बार ले जाने के लिए सरकार को भी कड़े आर्थिक सुधारों को लागू करते हुए चुनावी राजनीकि से बचना होगा। किसी वर्ग को अगर असंतुष्टि होती है तो सरकार को सार्वजनिक तौर पर विस्तृत रूप से अपने आर्थिक सुधारों के कारण भी उजागर करने होंगे। भारत को फिर एक बार आर्थिक महाशक्ति बनाने का समय आ गया है। और इसके लिए सरकार को सशक्त कदम उठाने होंगे।

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भारतीय मूल के अनेक लोगों के हाथों में विश्व की बड़ी कंपनियों की कमान है। इसी सूची में गूगल के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में नियुक्त सुन्दर पिचाई शामिल हो गए हैं। विश्व की कई बड़ी कंपनियों में अहम भूमिका निभाते इन प्रवासी भारतियों की सूची दिन प्रतिदिन लम्बी होती जा रही है। विश्व की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के वर्त्तमान प्रमुख भारतीय मूल के सत्या नाडेला हैं। साथ ही पेप्सिको की इंद्रा नूई, अडोब के शांतनु नारायण, नोकिया के राजीव सूरी, मास्टर कार्ड के अजय बंगा और देउत्स्चे बैंक के अंशु जैन जैसे व्यक्तियों ने विश्व कॉर्पोरेट जगत में भारत का नाम रोशन किया है। इनमें से अधिकतर लोगों ने छोटे शहरों या गावों से आकर और कड़ी मेहनत करके आईआईटी तथा आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से डिग्री हासिल कर अपने कार्य जीवन की शुरुआत की।
हालांकि भारतीय, बड़ी कंपनियों के अच्छे पदों पर हैं परंतु मौजूदा तकनीकी क्रांति में यह भी देखा जा सकता है कि विश्व के अग्रणी नए उद्यमियों में भारतीयों का नाम नहीं आ रहा है। जहां एक तरफ चीन के उद्यमियों द्वारा लगातार सुर्खियां बटोरी जा रही हैैं वहीं दूसरी तरह भारत के कुशल और प्रतिभावान युवाओं को अवसरों की कमी की वजह से बड़ी कंपनियों में नौकरी हासिल करके खुश रहना पड़ रहा है। व्हाट्सप्प, ट्विटर, यूट्यूब जैसी कम्पनियां हाल के कुछ वर्षों में विश्व बाजार में अपनी जगह बनाने में सफल हो सकी हैं। भारत में मूलभूत सुविधाओं की कमी की वजह से कई प्रतिभावान युवाओं को अपनी काबिलियत के अनुसार अवसर नहीं मिलते और उन्हें उपलब्ध अवसरों के मुताबिक ही खुद को तंत्र में ढालना पड़ता है।
पश्चिमी देशों में कॉलेजों में ही प्रयोग और प्रशिक्षण के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। साथ ही प्रतिभावान युवाओं को कॉलेज में ही नए प्रयोग करने का मौका मिलता है और साथ ही सफल कोशिश करने पर निवेश के अवसर भी प्रदान कराए जाते हैं। हमारे देश में भी कुछ शानदार मिसालें हैं, जिनमें एचसीएल के शिव नादर, एयरटेल के सुनील मित्तल को गिना जा सकता है। हालांकि हमारे देश के लोग अपने जज्बे की वजह से शीर्ष पर पहुंचे हैं परन्तु शुरुआती दौर में उन्हें विश्व के अन्य लोगों के मुकाबले अधिक संघर्ष भी करना पड़ा है।
हमारे देश के युवा उद्यमियों में फ्लिपकार्ट के बंसल बंधुओं का और स्नैपडील के कुणाल भल का नाम शीर्ष पर है। इन्होंने देश भर में काफी नाम कमाया है हालांकि विश्व स्तर पर इनकी कंपनियों का प्रभाव काफी काम है। भारत को अन्वेषकों का ध्यान रखना होगा और कोशिश करनी होगी कि उन्हें आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें ताकि वे विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा में अपनी पकड़ बनाने में सफल रह सकेंगे। हमारे युवाओं में कौशल और प्रतिभा की कमी नहीं है, उन्हें चाहिए उनकी कोशिशों को पंख देने की सुविधाएं। अगर हम हमारे युवाओं को आवश्यक सुविधाएं देने में सफल रहेंगे तभी जाकर उन्हें आस्मां छुने का मौका मिलेगा।

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देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रिय योजना स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत देश के स्वच्छ शहरों की सूची जारी कर दी गई है। इस सूची के तहत 476 शहरों का मूल्यांकन किया गया यह ढूंढने के लिए कि देश के इन शहरों में से सबसे साफ़ सुथरा कौन सा है? कर्नाटक की शान माना जाने वाला शहर मैसूर को इस सूची में पहला स्थान मिला है। देश के प्रथम 10 साफ़ शहरों में से सात शहर देश के दक्षिणी क्षेत्र के हैं। नई दिल्ली नगर निगम क्षेत्र, जिसके अधिकार क्षेत्र में राष्ट्रपति भवन और प्रधान मंत्री आवास और साथ ही अधिकांश संसद और मंत्रियों के निवास हैं, ने भी इस सूची के प्रथम 10 पायदानों में जगह बनाई है। देश के सभी राज्यों की राजधानियों की सूची में बेंगलूरु प्रथम स्थान पर है।
पूरे देश में आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा मूल्यांकन किया गया है। शोधकर्ताओं ने अपशिष्ट निपटान, नालों की स्थिति, पेय जल की गुणवत्ता और शहर में सार्वजनिक शौचालयों की उपलब्धि जैसे मापदंडों के अनुसार शहरों का मूल्यांकन किया है। इस सूची से यह तो साफ़ हो गया है कि देश के उत्तरी शहरों से दक्षिण के शहरों में साफ़ सफाई को ज्यादा अहमियत दी जाती है। तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली और केरल के तिरुवनंतपुरम को उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों से बेहतर बताया गया है। ऐसा नहीं है कि दक्षिण के शहरों की तुलना में आर्थिक रूप से उत्तर भारत के शहर कमज़ोर हैं बल्कि दक्षिण में व्यक्तिगत स्वछता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।
दक्षिण में आम जनता उत्तर भारत की तुलना में सार्वजनिक सुविधाओं के बारे में अधिक जागरूक है और साथ ही यहां के नागरिक सामाजिक सरोकार का भी ध्यान रखते हैं। अगर देश के आम नागरिक सकारात्मक रूप से प्रेरित हों तो देश के सभी शहर स्वछता की सूची में अव्वल आने के लिए कोशिश करते नज़र आएंगे। कुछ वर्षों पूर्व देश के सबसे गंदे शहरों में सूरत को गिनना आसान था। वर्ष-1994 में आई महामारी के बाद सूरत के लोगों को शहर के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा जागरूक किया गया। इस कोशिश की सफलता से ही आज देश के साफ़ शहरों में सूरत को गिना जा सकता है।
इस सूची से अधिकारियों को अपने शहरों की स्थिति जानने का मौका मिलेगा और वह सकारात्मक सुधार करें तो अपने शहर को साफ़ बनाने में सफल रहेंगे। नगरपालिकाओं के अधिकारियों को यह ध्यान देना होगा कि उनके क्षेत्र में सफाई को लेकर किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं? शहरों के महापौरों को कचरे के प्रबंधन और अन्य मूलभत सुविधाओं पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही देश की जनता को सार्वजनिक स्थलों की स्वछता का ध्यान रखते हुए किसी भी तरह के कचरे को फेंकने के लिए कचरा पेटी ढूंढकर उसका इस्तेमाल करना होगा। प्रशासन को भी शहर में अतिरिक्त कचरा पेटियों की आपूर्ति करनी होगी। देश भर के सभी पर्यटन स्थलों की स्वच्छता के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे। अगर चौतरफा कार्यवाही होगी तो निश्चित रूप से जल्द ही स्वच्छ भारत का सपना साकार हो सकेगा।

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बिहार विधानसभा चुनाव में बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नितीश कुमार के लिए एक मुश्किल चुनौती के रूप में भारतीय जनता पार्टी के लोकप्रिय चेहरे और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नज़र आ रहे हैं्। गया में हुई परिवर्तन रैली में नरेंद्र मोदी ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड पर सीधे प्रहार करते हुए पिछले 25 वर्षों में बिहार में रही खस्ता हालत का ज़िम्मेदार इन्हीं दोनों पार्टियों को बताया। बिहार मूल के प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों पर पहले मोदी ने गर्व जताते हुए कहा कि देश के किसी भी राज्य में बिहार से गए अधिकारी मिल जायेंगे लेकिन साथ ही बिहार की ख़राब हालात के लिए दोनों पार्टियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि छोटे से सिक्किम को भी बिहार से ज्यादा बिजली की आवश्यकता होती है। नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर बिहार की जनता को अपने प्रदेश पर लगे ’बीमारू प्रदेश’ के कलंक को हटाना है तो उन्हें आगामी विधान सभा चुनाव में भाजपा को बहुमत दिलाना होगा।
नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के इस चुनावी हमले का सामना करते हुए नरेंद्र मोदी को गलत ठहराया और कहा कि बिहार देश की विकास दर से आगे है। नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के भाषण में खामियां गिनाते हुए उसे बिहार पर टिप्पणी का रूप देने की भी कोशिश की है। ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया पर भी नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच घमासान मचा हुआ है। एक तरफ नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा रहे हैं कि उनकी सरकार सिर्फ ट्विटर पर ही काम करती है और दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के खिलाफ ट्विटर पर ही खुद भी बयानबाज़ी करते नज़र आ रहे हैं।
नीतीश ने अपने ऊपर मोदी द्वारा की गई डीएनए वाली टिप्पणी को अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास जारी रखा है परन्तु इसका कोई खासलाभ होगा, ऐसा लगता नहीं है। भाजपा भी अब स्पष्ट कर रही है कि मोदी ने बिहारियों के डीएनए की बात ही नहीं कि बल्कि नीतीश के स्वभाव के डीएनए का जिक्र किया था। किसी एक व्यक्ति को पूरा बिहार नहीं माना जा सकता।
बिहार में जीत हासिल करना भाजपा के लिए आवश्यक है क्योंकि बिहार में जीत दर्ज करने से भाजपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और आने वाले चुनावों में इसका असर देखने को मिलेगा। अगर भाजपा बिहार में सफल प्रदर्शन करने में नाकाम रहती है तो आने वाले दिनों में तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे अहिन्दी भाषी प्रदेशों में होने वाले चुनावों में भाजपा पर दबाव और बढ जाएगा। गया में हुए अपने कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने एक नई शुरुआत करते हुए धर्म और जाति की राजनीति पर अपने व्यक्तव्य को केंद्रित करने के बजाए विकास पर ध्यान दिया है। अब बिहार की जनता को यह निर्णय करना होगा कि किस पार्टी के वायदों पर वह भरोसा करे? किसे चुनेगा बिहार यह तो चुनाव के परिणामों के आने के बाद ही पता चलेगा परन्तु आशा है कि इस चुनाव का निर्णायक कारण प्रदेश का विकास ही होगा।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के सभी राज्यों को आश्‍वासन दिया है कि नगा अलगाववादी संगठन के साथ हुए समझौते में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाएगा और सभी से सलाह के बाद ही इस समझौते को अंतिम रूप दिया जाएगा। इस समझौते से भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में लम्बे अरसे से चल रहे तनाव से छुटकारा मिल सकेगा और शांति बहाल हो सकेगी। पूर्वोत्तर क्षेत्रों में कांग्रेस पार्टी की पकड़ मजबूत है और इसी का फायदा उठाते हुए इस समझौते में खामियां ढूंढने में कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता जुट गए हैं। इस समझौते ने पूर्वोत्तर के लिए एक सुनहरा अवसर प्रदान किया है जिससे क्षेत्र के विकास की नई शुरुआत हो सकेगी।

इस समझौते को अभी संसद में पेश किया जाना बाकी है। इस समझौते के शुरुआती प्रारूप में नागालैंड की सीमा में किसी भी तरह के बदलाव को शामिल नहीं किया गया है। अलगाववादी संगठन एनएससीएन (आई-एम) की प्रमुख मांग एक अलग राज्य की हुआ करती थी जिसे उसने कुछ वर्षों पहले अपनी मांगों की सूची में से हटा दिया था। एनएससीएन (आई-एम) उस क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली संगठन रहा है और वर्ष-1997 के बाद से इस संगठन के साथ संघर्ष विराम जारी है। जून में नगा अलगाववादी संगठन के एक अन्य घटक ने मणिपुर के चंदेल में सेना के एक काफिले पर घात लगाकर हमला किया था जिसमें सेना के 18 जवान शहीद हुए थे। इस घटक ने सीमा के पार म्यांमार में अपने अड्डे बना रखे थे। भारतीय सेना ने इसके बाद म्यांमार में घुसकर अलगाववादियों के अड्डों पर कड़ी कार्रवाई की थी और इसमें 100 से अधिक अलगाववादियों के मारे जाने की अपुष्ट खबरें सामने आई थीं।

मोदी सरकार की दोहरी रणनीति से यह साफ़ हो गया है कि पूर्वोत्तर में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शान्ति बहाल करने के लिए काफी गंभीरता दिखाई जा रही है। मोदी सरकार ने साफ़ कर दिया है कि अगर शान्ति और विचार विमर्श के ज़रिए पूर्वोत्तर में किसी तरह की मांग की जाएगी तो उस दिशा में सरकार से कार्यवाही की उम्मीद की जा सकती है और साथ ही अगर किसी भी तरह की हिंसा का सहारा लिया जाएगा तो निश्चित रूप से सरकार द्वारा ऐसे किसी भी मंसूबे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। देश के सभी राजनैतिक दलों को यह भी समझना होगा कि पार्टी के हितों को किनारे रख कर देश के हितों की रक्षा करना अधिक अनिवार्य है और किसी भी तरह के राजनैतिक कारण को अहमियत देने के बदले देश की सुरक्षा और गौरव का सम्मान करना चाहिए। मोदी सरकार की इस कोशिश को सफल बनाने के लिए सभी राजनैतिक दलों को एकजुट होकर क्षेत्र के विकास पर ध्यान देना होगा। कांग्रेस को चाहिए कि देशहित में हुए इस समजौते में राजनीतिक स्वार्थ का ओछापन घुसेड़ने की कोशिश न करें।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के सभी राज्यों को आश्‍वासन दिया है कि नगा अलगाववादी संगठन के साथ हुए समझौते में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाएगा और सभी से सलाह के बाद ही इस समझौते को अंतिम रूप दिया जाएगा। इस समझौते से भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में लम्बे अरसे से चल रहे तनाव से छुटकारा मिल सकेगा और शांति बहाल हो सकेगी। पूर्वोत्तर क्षेत्रों में कांग्रेस पार्टी की पकड़ मजबूत है और इसी का फायदा उठाते हुए इस समझौते में खामियां ढूंढने में कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता जुट गए हैं। इस समझौते ने पूर्वोत्तर के लिए एक सुनहरा अवसर प्रदान किया है जिससे क्षेत्र के विकास की नई शुरुआत हो सकेगी।
इस समझौते को अभी संसद में पेश किया जाना बाकी है। इस समझौते के शुरुआती प्रारूप में नागालैंड की सीमा में किसी भी तरह के बदलाव को शामिल नहीं किया गया है। अलगाववादी संगठन एनएससीएन (आई-एम) की प्रमुख मांग एक अलग राज्य की हुआ करती थी जिसे उसने कुछ वर्षों पहले अपनी मांगों की सूची में से हटा दिया था। एनएससीएन (आई-एम) उस क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली संगठन रहा है और वर्ष-1997 के बाद से इस संगठन के साथ संघर्ष विराम जारी है। जून में नगा अलगाववादी संगठन के एक अन्य घटक ने मणिपुर के चंदेल में सेना के एक काफिले पर घात लगाकर हमला किया था जिसमें सेना के 18 जवान शहीद हुए थे। इस घटक ने सीमा के पार म्यांमार में अपने अड्डे बना रखे थे। भारतीय सेना ने इसके बाद म्यांमार में घुसकर अलगाववादियों के अड्डों पर कड़ी कार्रवाई की थी और इसमें 100 से अधिक अलगाववादियों के मारे जाने की अपुष्ट खबरें सामने आई थीं।
मोदी सरकार की दोहरी रणनीति से यह साफ़ हो गया है कि पूर्वोत्तर में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शान्ति बहाल करने के लिए काफी गंभीरता दिखाई जा रही है। मोदी सरकार ने साफ़ कर दिया है कि अगर शान्ति और विचार विमर्श के ज़रिए पूर्वोत्तर में किसी तरह की मांग की जाएगी तो उस दिशा में सरकार से कार्यवाही की उम्मीद की जा सकती है और साथ ही अगर किसी भी तरह की हिंसा का सहारा लिया जाएगा तो निश्चित रूप से सरकार द्वारा ऐसे किसी भी मंसूबे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। देश के सभी राजनैतिक दलों को यह भी समझना होगा कि पार्टी के हितों को किनारे रख कर देश के हितों की रक्षा करना अधिक अनिवार्य है और किसी भी तरह के राजनैतिक कारण को अहमियत देने के बदले देश की सुरक्षा और गौरव का सम्मान करना चाहिए। मोदी सरकार की इस कोशिश को सफल बनाने के लिए सभी राजनैतिक दलों को एकजुट होकर क्षेत्र के विकास पर ध्यान देना होगा। कांग्रेस को चाहिए कि देशहित में हुए इस समजौते में राजनीतिक स्वार्थ का ओछापन घुसेड़ने की कोशिश न करें।