हल्का बस्ता, खुशहाल बचपन
क्या वजह है कि कई बच्चे स्कूल जाते समय रोते हैं?
फ़िनलैंड, डेनमार्क, नीदरलैंड, जापान और जर्मनी जैसे देशों ने प्रारंभिक शिक्षा में बहुत सुधार किए हैं
केरल सरकार स्कूली बस्ते का बोझ कम करने और 'बैकबेंचर्स' की धारणा को बदलने के लिए जो पहल कर रही है, वह अनूठी है। इसकी बहुत जरूरत है। विद्यार्थियों के हित के लिए ऐसे कदम उठाने के बारे में कम ही सरकारें सोचती हैं। भारत की शिक्षा पद्धति और स्कूलों के माहौल में सुधार लाने के लिए बड़े स्तर पर कोशिशें होनी चाहिएं। इन दोनों बिंदुओं को बच्चों के नजरिए से देखना होगा। क्या वजह है कि कई बच्चे स्कूल जाते समय रोते हैं? वे छुट्टी की घंटी बजते ही ऐसे क्यों भागते हैं, जैसे किसी कैदखाने से निकलकर भागे हों? बच्चे अपने खिलौनों से बहुत प्यार करते हैं। वे उन्हें संभालकर रखते हैं। वे स्कूली किताबों से क्यों दूर रहना चाहते हैं? जवाब है- पढ़ाई अरुचिकर है। अगर स्कूली किताबें शिक्षक पढ़ेंगे तो वे उन्हें बहुत आसान लगेंगी, क्योंकि उनका बौद्धिक स्तर ऊंचा होता है। जब बच्चे उन्हें पढ़ेंगे तो वे उन्हें मुश्किल लगेंगी, क्योंकि लेखकों ने बच्चों की तरह सोचा ही नहीं था! अक्सर लोग सोशल मीडिया पर अपने स्कूली दिनों के अनुभव साझा करते हैं। वे अपने स्कूल से जुड़ीं मधुर यादों को संजोकर रखते हैं। उनसे पूछा जाए, 'आपने जो किताबें पढ़ीं, रात-रातभर जागकर अगले दिन परीक्षाएं दीं, क्या एक बार फिर उन्हीं घटनाओं का सामना करना चाहेंगे?' तो ज्यादातर लोग तौबा कर लेंगे। स्कूलों का माहौल ऐसा होना चाहिए कि बच्चा रोने-धोने के बजाय बहुत खुश होकर वहां जाना चाहे। उसे स्कूली किताबें रुचिकर लगें। उसका बचपन खुशहाल होना चाहिए। भारत की आजादी के बाद सरकार को इन बातों की ओर तुरंत ध्यान देना चाहिए था।
फ़िनलैंड, डेनमार्क, नीदरलैंड, जापान और जर्मनी जैसे देशों ने प्रारंभिक शिक्षा में बहुत सुधार किए हैं। वहां बच्चों पर अकादमिक दबाव कम डाला जाता है। उन्हें आत्मविश्वासी और अनुशासित बनाने पर जोर दिया जाता है। नीदरलैंड में हर बच्चे की सीखने की गति का सम्मान किया जाता है। जापान में सामाजिक व्यवहार पर खास ध्यान दिया जाता है। वहां बच्चों को शारीरिक दंड देने, सबके सामने अपमानित करने की घटनाएं नहीं होतीं, जबकि हमारे देश में इन घटनाओं के वीडियो वायरल होते रहते हैं। हाल के वर्षों में कई शिक्षकों पर अपने छात्रों को बेदर्दी से पीटने, घायल करने और जान लेने तक के आरोप लगे हैं। कुछ शिक्षक अपने घर-परिवार का गुस्सा स्कूल में बच्चों पर उतारते हैं। वे किसी बच्चे को सबके सामने खरी-खोटी सुनाते हैं या उसकी पिटाई कर देते हैं। कुछ समय बाद वे तो इसे भूल जाते हैं, लेकिन बच्चे ऐसी घटनाओं को जीवनभर नहीं भूल पाते। कुछ बच्चों का स्वभाव बहुत संवेदनशील होता है। वे अपमान बर्दाश्त न कर पाने के कारण गलत कदम उठा लेते हैं। किसी स्कूल में बच्चे लगातार ऐसे माहौल को झेलेंगे तो उनका कितना बौद्धिक और नैतिक विकास होगा? कई शिक्षकों को एक और गलतफहमी है। वे सोचते हैं कि बच्चों के साथ जितनी ज्यादा सख्ती बरतेंगे, वे उतने ही अनुशासित होंगे। ऐसा सोचना बिल्कुल ही बेबुनियाद है। छड़ी के जोर से जो अनुशासन आता है, वह क्षणिक होता है। क्या वजह है कि जापान स्वच्छता, ईमानदारी, आपसी सहयोग और अनुशासन के मामले में बहुत बेहतर स्थिति में है, जबकि वहां के स्कूलों में 'ज्यादा सख्ती' नहीं है? अनुशासन सिखाया जाता है, थोपा नहीं जाता। स्कूलों में अच्छी आदतें सिखाना पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। सिर्फ किताबें रटने से न तो बच्चे का भविष्य उज्ज्वल होता है, न देश को कोई फायदा मिलता है।

