साइबर ठगी का फैलता जाल

पहचान चुराकर साइबर ठगी को अंजाम देने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं

साइबर ठगी का फैलता जाल

साइबर ठगों के पास हमारा डेटा पहुंच रहा है

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने एक कार्यक्रम में यह कहकर देशवासियों को साइबर अपराध संबंधी खतरों से सावधान किया है कि हर दूसरे दिन उन्हें पता चलता है कि उनके नाम से एक नई वेबसाइट बनाई गई है और उससे संदेश भेजे जा रहे हैं। एक दिन उनकी बहन और बेटी को भी उनके नाम से बनी वेबसाइट से संदेश मिले थे। बाद में पता चला कि ये सभी वेबसाइट नाइजीरिया से बनाई जा रही हैं। पहचान चुराकर साइबर ठगी को अंजाम देने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। अगर सीजेआई के नाम से फर्जी वेबसाइट बनाई जा सकती है तो आम आदमी कितना सुरक्षित है? उसकी पहचान चुराकर साइबर ठगी बड़ी आसानी से की जा सकती है। ऐसा हो भी रहा है। साइबर ठगों के पास हमारा डेटा पहुंच रहा है। कुछ डेटा लोग खुद ही उन्हें सौंप देते हैं। इससे साइबर अपराधियों का काम आसान हो जाता है। लोगों को पता ही नहीं चलता कि जो जानकारी वे सार्वजनिक कर रहे हैं, वह उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है। उदाहरण के लिए- एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपने बेटे को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। कुछ दिन बाद उनके बेटे के पास अनजान व्यक्ति का संदेश आया कि मैं आपके पिताजी का मित्र हूं। आपको जन्मदिन पर एक उपहार भेजा था। वह मिला या नहीं? युवक ने कहा कि ऐसा कोई उपहार नहीं मिला। उस व्यक्ति ने एक लिंक भेजा और कहा कि इस पर चेक करें। जब युवक ने लिंक पर क्लिक किया तो उसके मोबाइल फोन में एक वायरस इंस्टॉल हो गया। इससे उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ। युवक ने साइबर ठग की बातों पर जल्दी विश्वास कर लिया, क्योंकि उसने जन्मदिन का जिक्र किया था। साथ ही, एक फोटो में उसके पिता नजर आ रहे थे। वह फोटो साइबर अपराधी ने एआई की मदद से बनाई थी। 

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साइबर ठग कितने शातिर हैं, यह एक और घटना से समझिए। भारत के एक पड़ोसी देश में कई बेरोजगारों से लाखों रुपए की ठगी हो गई। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखा, जिसमें लाइट हाउस पर नौकरी देने की बात कही गई थी। काम कुछ नहीं था। बस, रात को लाइट हाउस की बत्ती जलानी थी। उसके बाद आराम ही आराम था। वीडियो में कुछ ऐसे युवा भी नजर आ रहे थे, जो मर्चेंट नेवी में कार्यरत थे। उनके बारे में लोग जानते थे। बेरोजगार युवाओं ने लाइट हाउस में नौकरी के लिए आवेदन कर दिया। बाद में उनसे प्रशिक्षण, स्वास्थ्य जांच, दस्तावेजों के सत्यापन के नाम पर लाखों रुपए लिए गए। एक दिन साइबर ठगों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए। बेरोजगारों के अरमानों पर पानी फिर गया। ऐसी गतिविधियां करने वालों के लिए नाइजीरिया एक पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है। वहां लचर कानून व्यवस्था है। साइबर अपराधियों को सिम कार्ड आसानी से मिल जाते हैं। स्थानीय नेताओं, अधिकारियों और पुलिस पर ऐसे आरोप लग चुके हैं कि वे साइबर ठगी की रकम से अपना हिस्सा लेते हैं। वहां ठगी के ऐसे केंद्र बनाए गए हैं, जिनमें बैठकर साइबर अपराधी विभिन्न देशों के नागरिकों को ऑनलाइन लूटने के मंसूबे बनाते हैं। उनके कामकाज में व्यवधान डालने की सख्त मनाही होती है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान, म्यांमार और कंबोडिया जैसे देश साइबर ठगी के गढ़ के रूप में उभरे हैं। वहां नेपाल, श्रीलंका, भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बेरोजगार युवाओं को भर्ती किया जाता है। उन्हें ठगी का लक्ष्य देकर कहा जाता है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को लूटें। इसके बाद कोई युवा फर्जी पहचान का इस्तेमाल करता है, कोई नकली पुलिस अधिकारी बनकर कैमरे के सामने आता है, तो कोई नकली न्यायाधीश बनकर लोगों को डराता है। सरकार को साइबर अपराधों पर नियंत्रण के लिए सख्त और प्रभावी कदम उठाने होंगे। अब यह मुद्दा सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि भरोसा कायम रखने का भी है। जिस व्यक्ति के साथ एक बार साइबर ठगी हो जाती है, उसके मन में व्यवस्था को लेकर भरोसे में कमी जरूर आती है।

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