कला के नाम पर खुराफात

सिनेमा का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना नहीं होता है

कला के नाम पर खुराफात

कोई भी निर्माता और निर्देशक समाज के किसी वर्ग के खिलाफ विष वमन न करे

फिल्म 'घूसखोर ...' के बाद '... जी की ... स्टोरी' की घोषणा से एक बार फिर इस बात की पुष्टि हो गई है कि कुछ फिल्म निर्माता, निर्देशक, लेखक और अभिनेता कला के नाम पर जानबूझकर ओछी हरकतें करना चाहते हैं। 'घूसखोर ...' का ब्राह्मण समाज ने तीव्र विरोध किया था। मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंचा तो निर्माता और निर्देशक को झुकना पड़ा। इस विवाद के दूसरे पहलू को देखें तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसे नाम रखने से फिल्म का मुफ्त में ही प्रचार हो जाता है। टीवी चैनलों पर यह मुद्दा उठाया जाता है। सोशल मीडिया पर बहस होती है। अगर मामला ज्यादा ही तूल पकड़ लेता है तो निर्माता और निर्देशक यह कहकर अपना बचाव करते हैं कि उनका इरादा किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का नहीं था। न्यायालय उन्हें फटकार लगाता है तो वे फिल्म का नाम बदल देते हैं। इस घटनाक्रम के बाद लोगों के मन में फिल्म की कहानी को लेकर जिज्ञासा पैदा हो जाती है। वे उस दिन का इंतजार करते हैं, जब फिल्म रिलीज होती है। फिल्म देखने के बाद पता चलता है कि वह इतनी भी अच्छी नहीं थी, जितना उसका प्रचार किया गया था। वास्तव में कुछ फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों ने प्रचार का एक ऐसा नुस्खा ढूंढ़ लिया है, जिसमें हल्दी लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आ जाए। इसके तहत समाज के एक वर्ग को खलनायक की तरह पेश किया जाता है। इसे कला कहा जाए या खुराफात? इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी चाहिए। सिनेमा का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना नहीं होता है। उस पर बेहतर समाज के निर्माण की भी ज़िम्मेदारी होती है। केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी निर्माता और निर्देशक समाज के किसी वर्ग के खिलाफ विष वमन न करे।

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उनका यह तर्क स्वीकार न किया जाए कि 'हमें पता नहीं था ... हमारा इरादा ऐसा नहीं था।' ऐसी फिल्मों पर रोक लगाई जाए। उनके निर्माताओं, निर्देशकों, लेखकों और अभिनेताओं पर भारी जुर्माना लगाया जाए। हाथ में कलम और कैमरा हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि कुछ भी लिख दें और बना दें। इंटरनेट के प्रसार से ऐसे निर्माताओं और निर्देशकों को खुली छूट मिल गई है। सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री की भरमार देखने को मिल रही है। गीतों का स्तर बहुत गिर गया है। उनके शब्दों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि उनमें और अश्लील सामग्री में ज्यादा अंतर नहीं रह गया है। भोजपुरी सिनेमा, जो कभी पारिवारिक सद्भाव और संस्कारों के लिए जाना जाता था, आज वहां कैसे गीत लिखे और गाए जा रहे हैं? पंजाबी संगीत भारत की शान कहलाता है। लोग गर्व से कहते थे कि पंजाब इधर भी है, उधर (पाकिस्तान) भी है। तुलनात्मक रूप से कम आबादी के बावजूद हमारे पंजाब ने दुनिया में जो सांस्कृतिक पहचान बनाई, वह बेमिसाल है। पिछले कुछ वर्षों से पंजाबी गीतों में किन चीजों का महिमामंडन हो रहा है? शराब, लड़ाई और हथियार! ये चीजें पंजाब की पहचान नहीं हो सकतीं। लोगों के मन में यह विष घोला जा रहा है कि नशाखोरी और झगड़ा करना बहुत बहादुरी का काम है! ऐसे गीतों को सोशल मीडिया से हटाकर प्रतिबंधित करना चाहिए। राजस्थान और हरियाणा में ऐसे गीतों की बौछार देखने को मिल रही है, जिनमें किसी एक जाति का नाम लिया जाता है। उनमें महिलाओं को संबोधित करते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो उनके सम्मान एवं गरिमा के खिलाफ हैं। नशाखोरी को बढ़ावा देने वाले गीत यहां भी प्रचलित हैं, जिन्हें सुनकर युवा गुमराह हो रहे हैं। कला के नाम पर ऐसी सामग्री को किसी भी कीमत पर बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।

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