मुफ्त की 'रेवड़ियां' नहीं, रोजगार दें
मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से भविष्य में समस्याएं पैदा हो सकती हैं
मुफ्तखोरी का चस्का लग जाता है तो उससे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल होता है
उच्चतम न्यायालय ने देश में चुनावों से पहले मुफ्त सुविधाएं देने के बढ़ते चलन की आलोचना कर इस मुद्दे पर सख्त टिप्पणी की है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, कोई भी ऐसा कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकता, क्योंकि इससे वोटबैंक नाराज हो सकता है। यह जोखिम कौन मोल ले? गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और चिकित्सा जैसी सुविधाएं सबको मुफ्त मिलनी चाहिएं। जो व्यक्ति बहुत ही जरूरतमंद है, शारीरिक या मानसिक स्थिति के कारण कामकाज करने में सक्षम नहीं है, उसे मुफ्त राशन जरूर मिलना चाहिए। वहीं, ऐसे लोग जो कई बीघा जमीनों के मालिक हैं, शानदार घरों में रहते हैं, सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं, जो अपने चौपहिया वाहनों में घूम रहे हैं, वे मुफ्त सुविधाएं पाने के हकदार कैसे हो सकते हैं? आज मुफ्त सुविधाओं की घोषणा करने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ मची है। जो जितनी बड़ी घोषणाएं करता है, वह उतना ही जनहितैषी समझा जाता है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उदय के बाद ऐसी घोषणाएं ज्यादा होने लगीं। इन्हें पूरी करने के लिए रुपए कहां से आ रहे हैं? क्या राजनीतिक दल अपने खाते से दे रहे हैं? करदाताओं से इकट्ठा किया गया धन यूं मुफ्तखोरी पर उड़ा देंगे तो देश का विकास कैसे होगा? उच्चतम न्यायालय के इन शब्दों पर हर राजनेता को चिंतन करना चाहिए- 'अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन देना शुरू कर देंगे, फिर मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली देंगे, तो कौन काम करेगा और फिर कार्य संस्कृति का क्या होगा?' यह भी ध्यान रखें कि जब लोगों को मुफ्तखोरी का चस्का लग जाता है तो उससे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल होता है। फिर वे ऐसी हर सुविधा को अपना अधिकार समझने लगते हैं। सरकारों को बहुत सोच-समझकर ही ऐसी सुविधाओं की घोषणा करनी चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसरों का सृजन करें। ऐसे वातावरण का निर्माण करें, जिसमें उद्योग-धंधे पनपें। लोगों को हुनर सिखाएं। उन्हें इस लायक बनाएं कि वे खुद कमाएं और अपने लिए संसाधन जुटाएं।
सरकार को महंगाई पर नियंत्रण रखना चाहिए। रोटी महंगी न हो। कम कीमत पर बिजली, पानी जैसी सुविधाएं मिलें। दवाइयां हर परिवार की पहुंच में हों। आम आदमी सुखी रहे। वह सम्मानपूर्वक जीवन बिताए। लोगों को मुफ्त यात्रा कराने के बजाय ऐसी योजनाएं लाएं, जो उनके भविष्य को बेहतर बनाएं। उदाहरण के लिए- यात्रा टिकट सस्ता करें। उसके साथ यह योजना लागू करें कि जो यात्री हमेशा टिकट लेकर यात्रा करेगा, उसे बैंक एफडी और अन्य बचत योजनाओं में ज्यादा ब्याज मिलेगा। इसे बिजली और पानी के बिलों से भी जोड़ा जा सकता है। जो नागरिक समय पर बिल जमा कराए, उसे बचत योजनाओं में विशेष लाभ दिया जाए। इन्हें आधार कार्ड से जोड़ा जाए और एआई की मदद से डिजिटल निगरानी रखी जाए, ताकि धांधली की गुंजाइश न रहे। इस तरह लोगों को अच्छा नागरिक बनने की प्रेरणा मिलेगी। वे बचत योजनाओं से जुड़ेंगे तो सरकार के पास विकास के लिए ज्यादा धन होगा। सरकारें नकद सहायता भी दे रही हैं। क्या इससे गरीबी दूर हो जाएगी? इतिहास गवाह है, रुपए बांटने से न तो गरीबी दूर होती है, न लोगों की स्थिति सुधरती है। इससे कुछ समय के लिए राहत जरूर मिलती है। उसके बाद सबकुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है। लोगों को रुपए बांटने की जगह कोई काम सीखने के लिए प्रोत्साहित करें। जब व्यक्ति स्वरोजगार की राह पर चलने के लिए तैयार हो, तब उसे सहायता दी जाए, जिससे वह जरूरी सामान खरीद सके। उदाहरण के लिए- दो लोग हैं, जिन्हें दस-दस हजार रुपए की नकद सहायता दी जाएगी। पहले व्यक्ति के बैंक खाते में रुपए आने के बाद वह उनसे कुछ चीजें खरीदेगा। वह एक-दो महीने में पूरी राशि खर्च कर देगा। दूसरा व्यक्ति थोड़ा-सा सामान खरीदकर अपना काम शुरू करेगा। वह शुरुआती लाभ से उसे आगे बढ़ाएगा। वह भविष्य में गरीबी और बेरोजगारी के चक्र से बाहर निकल जाएगा। सरकारों को चाहिए कि वे लोगों को आत्मनिर्भर बनना सिखाएं। मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से भविष्य में आर्थिक, सामाजिक और नैतिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

