जन्म दर और पारिवारिक चुनौतियां
आज कई दंपति एक से ज्यादा संतान नहीं चाहते
कुछ दंपति एक भी संतान नहीं चाहते
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने यह कहकर युवाओं को कर्तव्य का बोध कराया है कि 'विवाह का उद्देश्य सृष्टि आगे चले, यह होना चाहिए, वासना की पूर्ति नहीं। इसी भावना से कर्तव्य बोध आता है।' उन्होंने हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए औसतन तीन संतानों के संबंध में जो टिप्पणी की, उससे बहुत लोग सहमत या असहमत हो सकते हैं। यह उनका अधिकार है, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज कई दंपति एक से ज्यादा संतान नहीं चाहते, कुछ तो एक भी नहीं चाहते। भविष्य में इससे कई सामाजिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। डॉ. भागवत पहले भी यह मुद्दा उठा चुके हैं। उनके अलावा कई पत्रकार, विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता समय-समय पर इस ओर समाज का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। सवाल है- क्या इन सुझावों का धरातल पर कोई असर दिखाई दे रहा है? जवाब है- नहीं। जब नवविवाहित दंपतियों के पास दुनियाभर की सूचनाएं पहुंच रही हैं तो क्या वे नहीं जानते कि एक संतान या शून्य संतान के कारण समाज का भविष्य कैसा होगा? वास्तव में समस्या 'जानकारी का न होना' नहीं है, बल्कि 'अनुकूल परिस्थितियों का न होना' है। आज हर दंपति चाहता है कि उसकी संतान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे और उसे रोजगार के लिए परेशान न होना पड़े। देश में ऐसे कितने स्कूल हैं, जहां सामान्य आर्थिक स्थिति वाले दंपति अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं? सरकारें इस बात को लेकर अपनी पीठ थपथपाती हैं कि उन्होंने शिक्षा का बजट बढ़ा दिया, भर्तियां कर दीं, कर्मचारियों का वेतन बढ़ा दिया ...। बड़ा सवाल है- शिक्षा की गुणवत्ता का क्या हुआ? अगर आपने सरकारी स्कूलों को इतना सुधार दिया तो कितने मंत्री, सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी अपने बच्चों को वहां पढ़ने के लिए भेजते हैं?
दंपतियों के एक संतान या शून्य संतान रखने की सबसे बड़ी वजह यही है। वे प्राइवेट स्कूलों की महंगी फीस दे नहीं सकते, सरकारी स्कूलों में पढ़ाना नहीं चाहते। किसी तरह बच्चे पढ़ाई पूरी कर लेते हैं तो समस्या आती है- अब कमाई कैसे करें? कॉलेज की डिग्री वाले बेरोजगारों की पहले से ही भीड़ है। उसमें हर साल नए बेरोजगार और जुड़ जाते हैं। ज्यादातर युवा ऐसी सरकारी नौकरी चाहते हैं, जिसमें काम कम से कम और कमाई ज्यादा से ज्यादा हो। उन्हें स्कूल और कॉलेज में ऐसा हुनर सिखाया नहीं जाता, जिसके दम पर कोई काम कर सकें। 'नौकरी नहीं लगी बेटा? अब क्या करोगे बेटा? भविष्य के लिए कुछ सोचा भी है?' - ये सवाल हर बेरोजगार को शूल की तरह चुभते हैं। जो दंपति ऐसी परिस्थितियों का सामना कर चुके हैं, वे कभी नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चों को इतना संघर्ष झेलना पड़े। इसलिए वे या तो एक ही संतान रखते हैं या उसे भी दुनिया में नहीं लाना चाहते हैं। पिछले दो दशकों में घर बनाना और चलाना बहुत महंगा हो गया है। सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें, मध्यम आय वाले परिवार के लिए चीजें आसान नहीं हैं। जयपुर जैसे शहर में एक छोटा-सा भूखंड खरीदकर उस पर घर बनाने का मतलब है- ज़िंदगीभर की कमाई लगाना। उसके बाद बच्चों की पढ़ाई, शादी और अन्य पारिवारिक खर्चों के लिए क्या बचेगा? सामान्य वर्ग के लिए तो और ज्यादा मुश्किलें हैं। उसके बच्चे कड़ी मेहनत करते हैं, ज्यादा शुल्क चुकाते हैं, लेकिन आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था उनके साथ न्याय नहीं करती। कुछ दंपति कर्ज लेकर अपने बच्चों को विदेश भेजते हैं। इससे प्रतिभा पलायन को बढ़ावा मिलता है। विदेश में पढ़ाई और रोजगार के बेहतर मौके मिलने से सामान्य वर्ग के कई प्रतिभाशाली युवा वहीं रहने को प्राथमिकता देते हैं। देश में जनसंख्या संतुलन बना रहे, भविष्य में सद्भाव कायम रहे, इसके लिए धरातल पर परिस्थितियों को आसान बनाएं। आज का दंपति ज्यादा शिक्षित और जागरूक है। वह अपने बच्चों को तकलीफें नहीं, बेहतर भविष्य देना चाहता है।

