स्वच्छता का पाठ

मैच जीतने की खुशी खुद पर इस कदर हावी नहीं होनी चाहिए कि अव्यवस्था फैले

स्वच्छता का पाठ

आखिर क्या वजह है कि हम सार्वजनिक स्वच्छता के संबंध में इतने गंभीर नहीं हैं?

टी-20 विश्वकप जीतकर आई भारतीय टीम का स्वागत करने के लिए मुंबई के मरीन ड्राइव पर उमड़ी भारी भीड़ बताती है कि देशवासियों के दिलों में क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए कितना सम्मान है। कपिल देव, सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, महेंद्र सिंह धोनी, विराट कोहली और कई खिलाड़ी अपने खेल कौशल के कारण प्रशंसकों के लिए किसी महानायक से कम नहीं हैं। अगर टीम मैच जीतकर आए तो उसका धूमधाम से स्वागत करना चाहिए। अगर हारकर आए, तो भी स्वागत करना चाहिए, हौसला बढ़ाना चाहिए। हां, 'जोश' के साथ 'होश' रखना जरूरी है। मैच जीतने की खुशी खुद पर इस कदर हावी नहीं होनी चाहिए कि अव्यवस्था फैले या कोई हादसा हो जाए। भारतीय क्रिकेट टीम का स्वागत करने के लिए उमड़ा जनसैलाब अपने पीछे जो 'निशान' छोड़कर गया, उसे देखकर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि लोगों को सार्वजनिक स्वच्छता का महत्त्व और गंभीरता से समझाने की जरूरत है। मरीन ड्राइव पर लोग पानी की बोतलें, जूते-चप्पल और कचरे का इतना ढेर छोड़कर गए कि उसे उठाने के लिए नगर निगम को कई वाहन लगाने पड़े! आखिर क्या वजह है कि हम सार्वजनिक स्वच्छता के संबंध में इतने गंभीर नहीं हैं? सफाई रखना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी तो नहीं है। लोग चाहते हैं कि उनके घर साफ-सुथरे हों, लेकिन सार्वजनिक स्थानों के लिए यही सोच क्यों नहीं होती, जबकि केंद्र सरकार 'स्वच्छ भारत' पर इतना जोर दे रही है? आज भी सार्वजनिक महत्त्व की कई इमारतों की दीवारें पान की पीक से रंगी हुईं मिलेंगी। हर कोई चाहता है कि ट्रेनों-बसों में उनका सफर अच्छा हो, लेकिन बहुत लोग मूंगफली और केलों के छिलके यहां-वहां फेंक देते हैं। क्या वे अपने घरों में इस तरह बिखरे छिलके देखना पसंद करेंगे?  

लोग शिकायत करते हैं कि भारत के कई पर्यटन स्थलों पर बहुत गंदगी होती है। यह शिकायत बेबुनियाद नहीं है। ऐसे कई स्थलों पर वास्तव में कचरे के ढेर मिल जाएंगे। वहां स्थानीय प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। उसके साथ लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। जब भारत से कोई व्यक्ति जापान, फिनलैंड, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड ... जैसे देशों में जाता है तो वहां की सफाई देखकर तारीफ जरूर करता है। यूरोप के कई देश ऐसे हैं, जिनकी नदियों, झीलों, जलाशयों को देखकर हम यह सोचने को विवश हो जाते हैं कि ऐसी सफाई हमारे देश में क्यों नहीं है, जबकि हमारी संस्कृति में नदियों को माता और जल को देवता का दर्जा दिया गया है? हमें तो स्वच्छता के मानकों का पालन करने में दुनिया में सबसे आगे होना चाहिए था! आखिर हमसे कहां त्रुटि हुई? क्या उन देशों का प्रशासन सफाई रखने में अधिक सक्षम है या लोग खुद ही इतने जागरूक हैं कि वे अपने देश को साफ और सुंदर रखना चाहते हैं? इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं- जब लोग जापान, सिंगापुर, ब्रिटेन ... जैसे देशों के हवाईअड्डे से बाहर आ जाएं और उनके हाथों में कोई अनुपयोगी चीज/कचरा आदि हो, तो वे डस्टबिन ढूंढ़ते हैं। अगर नहीं मिलता तो किसी से पूछते हैं, लेकिन कचरा उसी में डालते हैं। वहीं, जब लोग स्वदेश (भारत) के किसी हवाईअड्डे से बाहर निकलते हैं तो स्वच्छता से यह जुड़ाव कमजोर पड़ता दिखाई देता है। कुछ लोग डस्टबिन ढूंढ़ते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी बड़ी तादाद में हैं, जो कचरे को कहीं भी 'अधिकारपूर्वक' फेंक देते हैं। विदेश में उनका व्यवहार कुछ और होता है, स्वदेश में कुछ और होता है। अगर भारत में कोई जगह बहुत साफ-सुथरी हो और स्कूल-कॉलेज के बच्चे वहां घूमने जाएं तो घर लौटने के बाद उनमें से कई तो अपना अनुभव इस तरह सुनाते हैं - 'पता है, वह जगह इतनी साफ-सुथरी थी कि उसे देखकर लग ही नहीं रहा था कि हम इंडिया में हैं!' हमें यह सोच बदलनी होगी। स्वच्छता का पाठ सिर्फ किताबों और नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे असल ज़िंदगी में उतारना होगा। इसके लिए सफाई रखने वालों को पुरस्कृत करने के साथ ही कचरा फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई जैसे कदम उठाने होंगे। स्थानीय प्रशासन को भी चाहिए कि वह सफाई रखने को प्रोत्साहित करे।

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