क्या कहता है जनादेश?

कांग्रेस '99 के फेर' में फंसकर रह गई

क्या कहता है जनादेश?

अधूरा जनादेश भारत के विकास को वह रफ्तार नहीं दे सकता, जिसकी आज बेहद जरूरत है

लोकसभा चुनाव नतीजों से ऐसा जनादेश निकला, जिसने सभी की झोली में कुछ-न-कुछ डालकर उन्हें खुशी का मौका दे दिया। हालांकि उसने भाजपा को थोड़ा झटका दिया, लेकिन सरकार बनाने की भरपूर गुंजाइश भी छोड़ी। राजग ने सरकार बनाने की दिशा में कदम बढ़ा भी दिया, नरेंद्र मोदी को सर्वसम्मति से अपना नेता चुन लिया। कांग्रेस इसलिए हर्षित है, क्योंकि उसकी सीटों में जोरदार बढ़ोतरी हुई है। हालांकि वह '99 के फेर' में फंसकर रह गई। अगर उसके पास ज्यादा संख्याबल होता तो उसकी स्थिति और मजबूत होती। समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने शानदार प्रदर्शन से सबको चौंका दिया। इससे पार्टी पर अखिलेश यादव की पकड़ मजबूत होगी। वे अपने कुनबे और संगठन को यह संदेश देने में सफल रहे हैं कि उनमें पार्टी को आगे लेकर जाने की क्षमता है। तृणमूल कांग्रेस ने अपनी खोई हुईं सीटें दोबारा हासिल कर लीं। इससे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की स्थिति मजबूत होगी। तेदेपा और जदयू का राष्ट्रीय राजनीति में रसूख बढ़ गया। शिवसेना (यूबीटी) और राकांपा (शरद पवार) का शीर्ष नेतृत्व इस बात को लेकर खुशी मना सकता है कि उनकी साख और धाक उतनी कमजोर नहीं हैं, जितना माना जा रहा था। जिन दलों की सीटें कम आईं या नहीं आईं, वे भी खुश हो सकते हैं कि जनता ने उन्हें इतने वोट जरूर दिए, जिनसे अन्य उम्मीदवारों की हार-जीत का फैसला हुआ। इन नतीजों में उनकी भूमिका की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उन नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए भी अच्छी खबर है, जो कल तक ईवीएम में खोट ढूंढ़ते थे। उम्मीद है कि अब उन्हें ईवीएम में खूबियां नजर आने लगेंगी!

इस बार लोगों ने नोटा को भी खूब वोट दिए। इससे दो तरह के संकेत मिलते हैं- 1. जनता में राजनीति को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। वह सभी दलों और उम्मीदवारों के दावों और वादों को नकार कर बेहतर लोगों की मांग कर रही है। 2. देशभर में जितने लोगों ने नोटा को वोट दिया, उनकी आवाज उठाने वाला लोकसभा में कोई प्रतिनिधि नहीं गया। कई सीटों पर तो नोटा को इतने वोट मिले, जितना हार-जीत का अंतर नहीं था। नोटा का बढ़ता चलन यह कहता है कि मतदाताओं का एक वर्ग राजनीतिक दलों और नेताओं की कार्यशैली से खुश नहीं है। पूरे देश में नोटा के हिस्से में 63 लाख से ज्यादा वोट आए हैं। यह बहुत बड़ा आंकड़ा है। कहीं यह उस सोच (मैं किसी को वोट क्यों दूं, एक वोट से क्या हो जाएगा?) की तो प्रतिध्वनि नहीं है, जो लोकसभा चुनाव के विभिन्न चरणों में भी सुनाई दी थी? आज मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि वे लोग वोट दें या न दें, उससे देश को कोई फर्क नहीं पड़ेगा! मतदान प्रतिशत कम रहने से नतीजों पर असर पड़ता ही है। अगर राजस्थान की बात करें तो शेखावाटी समेत कुछ सीटों पर मतदाताओं ने खास उत्साह नहीं दिखाया था। बहुत लोग यह कहते नजर आए थे कि 'नेता हमारा कौनसा भला कर देंगे?' मतदाताओं की उदासीनता, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों से 'मोहभंग' की यह स्थिति कालांतर में ऐसी सरकार के निर्माण की स्थितियां पैदा करती है, जिनमें किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होता। जाहिर है कि ऐसी सरकारें दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ बड़े फैसले लेने से हिचकती हैं। गठबंधन की बंदिशें उन्हें कई फैसलों से रोकती हैं। देश में जिस राजनीतिक दल की सरकार बने, पूर्ण बहुमत से बने। इसके लिए जरूरी है कि मतदान प्रतिशत बढ़ाया जाए। मतदाताओं को प्रोत्साहित करने के लिए तकनीकी और कानूनी स्तर पर जो उपाय किए जा सकते हैं, वे किए जाएं। अधूरा जनादेश भारत के विकास को वह रफ्तार नहीं दे सकता, जिसकी आज हमें बेहद जरूरत है।

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