फौजी ने अकेले दम पर बनाई दो किमी लंबी सड़क

फौजी ने अकेले दम पर बनाई दो किमी लंबी सड़क

चम्पावतकहते हैं अगर जीवटता हो तो इरादों के आगे कोई भी बाधा नहीं टिकती। जब भी पहा़ड काटकर स़डक बनाने की बात आती है, सबसे पहले बेमिसाल उदाहरण दिया जाता है बिहार के दशरथ माझी का। माझी ने काम ही ऐसा किया कि सालों साल दुनिया उनको सलाम करे, लेकिन चम्पावत के बृजेश भट्ट की जीवटता भी दशरथ माझी से कम नहीं है। उनके गांव के लिए हमारी सरकार स़डक नहीं बनवा पाई तो फौज के इस सिपाही ने ठान लिया कि सिस्टम को आइना दिखाना है। ॅष्ठफ्ष्ठ द्धद्मर्‍ फ्ठ्ठणक्क·र्ैंयह कहानी चम्पावत जिले की मझो़डा ग्राम पंचायत के पुष्पनगर गांव की है। यहीं रहते हैं बृजेश। गांव मुख्य स़डक मार्ग से कटा हुआ था। गांव के लिए कोई पहुंच मार्ग नहीं था। बीच में था पहा़ड। ड्यूटी से छुट्टी लेकर बृजेश जब भी घर आते, कुदाल, हथौ़डा, गेंदी पक़डते और अकेले चल प़डते पहा़ड का सीना चीरने। तब वह ३ कुमाऊं रेजीमेंट में थे और तैनाती थी पिथौराग़ढ में। उन्हें पहा़ड का सीना चीरने में तीन साल लग गए। उन्होंने इस काम के लिए न तो मजदूर रखे और न ही गांव के किसी अन्य व्यक्ति से सहयोग मागा। ३९ साल के इस फौजी ने दिन-रात मेहनत कर आखिर स़डक बना दी है। स़डक अभी कच्ची है, लेकिन हल्के वाहन आसानी से अब गांव तक पहुंच सकते हैं। अब मुख्य मार्ग से गांव तक दो किलोमीटर लंबी स़डक पर वाहन फर्राटे भरते हैं। पूरा गांव बृजेश की जीवटता को आश्चर्य से देखता है और फिर सैल्यूट करता है इस सिपाही को।ध्य्घ्य्द्य ्यफ्डट्टद्ब ·र्ैंह् द्बरुैंब्त्रह्ठ्ठणक्क ज्प्य्द्धउत्तराखंड में पलायन के पीछे एक ब़डा कारण गांव-गांव तक स़डकों का न पहुंचना भी है। बृजेश भट्ट की इस मेहनत ने न सिर्फ सिस्टम को झकझोरा है, बल्कि पूरे राज्य के लिए नजीर भी पेश की है। एनएच १२५ से जु़डने वाली खूनामलक स़डक से पुष्पनगर की दूरी करीब दो किलोमीटर प़डती है, लेकिन रास्ता नहीं होने की वजह से लोगों को जंगलों से होकर अपने गाव तक पहुंचना प़डता था। गांव के लोगों ने स़डक बनाने के लिए सरकार से फरियाद की, स्थानीय नेताओं से गुहार लगाई और अधिकारियों से पत्राचार किया, मगर कुछ नहीं हुआ। बृजेश ने सिस्टम की इसी अनदेखी के खिलाफ खुद ल़डने की ठानी और २०१४ में स़डक काटने का काम शुरू किया।€द्भय् त्र्र्‍ झ्द्यष्ठप्रय्य्द्मर्‍बृजेश बताते हैं कि गांव के लोगों को डे़ढ-दो किमी पैदल चलकर पहा़ड पार करना प़डता था। जहां मुख्य स़डक थी। पहा़डी जमीन और नालों को फादकर बच्चे स्कूल पहुंचते थे। साग-सब्जी को बाजार ले जाने में काफी दिक्कत होती थी। इससे व्यथित होकर उन्होंने स़डक बनाने की ठानी। गांव की ही ममता तिवारी और चंद्रकला पाडे कहती हैं, स़डक बन जाने से बाइक व कार से गाव आसानी से पहुंच जाते हैं। जो कार्य बृजेश ने किया, वह सरकार को करना चाहिए था। यह सबक है हमारे सिस्टम के लिए।

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